- पुरुषोत्तम शर्मा
देश के किसान अपने सैकड़ों संगठनों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय बनाकर पिछले 8 वर्षों से एमएसपी गारंटी कानून और कर्ज माफी के सवाल पर धारावाहिक आन्दोलन चला रहे हैं. इस बीच सन् 2020 में जब केंद्र की मोदी सरकार खेती के कारपोरेटीकरण के लिए तीन कृषि कानून ले आई, तो उन कानूनों को वापस कराने के लिए देश भर के किसान संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) का निर्माण किया और एसकेएम के नेतृत्व में ही दिल्ली के बॉर्डरों पर 13 माह तक किसानों का ऐतिहासिक आन्दोलन चला. उस आन्दोलन के दबाव में मोदी सरकार ने 19 नवम्बर 2021 को उन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान किया जिन्हें उसने बिना बहस कराए बहुत ही जल्दबाजी में संसद के दोनों सदनों में पास कराकर कानून बनवा दिया था. साथ ही इस सरकार ने एमएसपी गारंटी कानून सहित किसानों की बाकी मांगों के समाधान का लिखित वायदा भी एसकेएम के साथ किया था. पर समय बीतने के साथ मोदी सरकार किसानों से किए अपने लिखित वायदे पर चुप्पी साधे रही और चोर दरवाजे से इन कारपोरेट परस्त कृषि कानूनों को देश में लागू कराने के लिए राज्य सरकारों पर दबाव बनाती रही. देश की खेती किसानी पर ऐसा हमला वह मोदी सरकार कर रही थी जो देश के किसानों की आय को दोगुना कराने के वायदे के साथ 2019 में पुनः पूर्ण बहुमत से सत्ता में लौटी थी.
इधर एक तरफ देश भर में एसकेएम के आह्वान पर एमएसपी गारंटी कानून बनाने, किसानों व ग्रामीण मजदूरों की कर्ज मुक्ति, बिजली के निजीकरण और स्मार्ट मीटर योजना को रोकने, बटाईदार किसानों को किसान का दर्जा और मनरेगा व अन्य सरकारी कार्यों में लगे ग्रामीण मजदूरों को 600 रुपए प्रतिदिन मजदूरी भुगतान, जबरिया भूमि अधिग्रहण पर रोक जैसी प्रमुख मांगों पर देश के सैकड़ों किसान संगठन धारावाहिक आन्दोलन चला रहे हैं. दूसरी तरफ कुछ किसान संगठनों के नेतृत्व में एमएसपी की मांग पर दिल्ली जा रहे और हरियाणा सरकार द्वारा पंजाब-हरियाणा के खनौरी-शंभू बॉर्डरों पर पिछले 10 माह से रोके गए किसान आज भी आन्दोलन में डटे हैं. खनौरी बॉर्डर पर किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल एक माह से आमरण अनशन पर हैं और उनके जीवन को खतरा है. बिहार, तमिलनाडु, यूपी, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जबरिया भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लाखों किसान, आदिवासी अपनी जमीन और सड़कों पर उतर कर संघर्ष कर रहे हैं. पर केंद्र की मोदी सरकार देश भर में आन्दोलनरत किसान संगठनों के साथ उनकी समस्याओं पर बात करने तक को तैयार नहीं है.
इसके उलट देश में बने किसान आन्दोलन के इस वातावरण के बीच 25 नवम्बर 2024 को मोदी सरकार एक नई ‘कृषि विपणन (बाजार) पर राष्ट्रीय नीति ढांचा (फ्रेमवर्क)’ लेकर आ गयी है. इस बार भी मोदी सरकार ने खेती किसानी और कृषि उपज के व्यापार से जुड़ी इस कारपोरेट परस्त नीति को लाने से पहले न तो देश के किसान संगठनों से कोई चर्चा की, न ही इसके लिए उनकी कोई राय ली गयी. यही नहीं इस नीति को तब लाया गया जब सरकार के संरक्षण में हुई कारपोरेट लूट व धोखाधड़ी के सवाल पर विदेशों में भी देश की गिरती साख पर विपक्ष द्वारा चर्चा की मांग की जा रही थी. विपक्ष की उस जायज व देश के भविष्य तथा सम्मान से जुड़ी उस महत्वपूर्ण मांग को न मान कर मोदी सरकार ने खुद ही संसद में गतिरोध खड़ा किया था. असल में जिस तरह से कोविड काल और लॉक डाउन का फायदा उठाकर मोदी सरकार चुपके से तीन कारपोरेट कृषि कानून ले आई थी, उसी तरह देश भर में किसानों के अलग-अलग मुद्दों पर चल रहे आंदोलनों के माहौल और संसद में सरकार द्वारा खड़े किए गए गतिरोध के बीच चुपके से नई ‘कृषि विपणन (बाजार) पर राष्ट्रीय नीति ढांचा (फ्रेमवर्क)’ केंद्र सरकार ले आयी. यह नीति चोर दरवाजे से उन्हीं कारपोरेट परस्त तीन कृषि कानूनों की वापसी है, जिन्हें नवम्बर 2021 में मोदी सरकार को वापस लेने के लिए देश के किसानों ने मजबूर किया था.
यह सर्वविदित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत सातवीं सूची (राज्य सूची) की प्रविष्टि 28 के तहत कृषि बाजार (मंडी) राज्य का विषय है और इसके लिए नीति या नियम बनाने का अधिकार राज्यों को है. परन्तु इस नई नीति के जरिये मोदी सरकार देश की छोटी-मंझोली खेती-किसानी की बर्बादी के साथ ही राज्यों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला कर देश के संघीय ढांचे को तबाह करने पर तुली है. मोदी सरकार की यह नीति कहती है कि इस ‘राष्ट्रीय नीति ढांचे’ के साथ तालमेल बिठाने के लिए ‘राज्य नीति ढांचा’ तैयार करने की जरूरत है. इस नीति को लागू कर केंद्र सरकार चाहती है कि राज्यों द्वारा किसानों और कृषि मंडियों के संरक्षण और अपनी आबादी की खाद्य सुरक्षा के लिए बनाए गए अब तक के कानूनों व नियमों को बदल कर केंद्र की कारपोरेट परस्त नीतियों को राज्यों में लागू करने का रास्ता राज्य सरकारें खोलें. इसी काम को आसान बनाने के लिए यह नीति लाई गयी है. इस नीति का प्रारूप केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों को भेज रही है. राज्यों से इस नीति के हिसाब से अपने राज्यों में कृषि विपणन और मंडी कानूनों में बदलाव करने को कहा जा रहा है. विपक्ष शासित राज्यों पर केन्द्रीय सहायता की प्राप्ति के लिए वर्तमान कानूनों में इस बदलाव को लाने का दबाव बनाया जा रहा है.
इस नीति की प्रस्तावना में मोदी सरकार का दावा है कि वह देश के किसानों को ‘सर्वात्तम संभव बाजार और मूल्य उपलब्ध कराने का लक्ष्य’ पूरा करेगी. नई नीति के अनुसार किसानों की उपज के ‘मूल्य प्रतिस्पर्धा के लिए सार्वजनिक, निजी, कई विपणन बाजार प्रणालियों का विकास’ किया जाएगा. इसकी प्राप्ति के लिए राज्यों के कृषि विपणन कानून व नीतियों में बदलाव को सरकार जरूरी मानती है. इस नीति के जरिये मोदी सरकार देश की कृषि को 140 करोड़ आबादी वाले देश की खाद्य सुरक्षा से जोड़ने के बजाय ‘बाजार संचालित उत्पादन के लिए’ परिवर्तित करेगी. यानी देश की इतनी बड़ी आबादी की खाद्य जरूरत के बजाय हमारी कृषि ‘बाजार की जरूरत’ में बदल जाएगी. इसके लिए केंद्र सरकार एक ‘बाजार सूचना एवं बौद्धिक प्रणाली की स्थापना’ भी करेगी. इस नीति में विश्व व्यापार संगठन व अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के साथ ही देश के बड़े कारपोरेट घरानों का दबाव भारत सरकार पर साफ दिख रहा है. सबका लक्ष्य साफ है कि भारत की खेती, अन्न के भंडारण, अन्न के बाजार सब पर देशी-विदेशी कारपोरेट कम्पनियों का नियन्त्रण हो और भारत की कुल कृषक आबादी में से दो तिहाई आबादी को कृषि अर्थव्यवस्था से जल्दी बाहर धकेला जाये.
नई नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी मंडियों की बड़े पैमाने पर स्थापना का लक्ष्य रखा गया है. इसके अलावा ई मार्केट से बड़े पैमाने पर किसानों को जोड़ने तथा कृषि क्षेत्र में वायदा कारोबार को और बढ़ावा देने का लक्ष्य है. इसके जरिये सरकार कह रही है कि वह इन तीन तरह के बाजार से मूल्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगी. इससे किसानों के लिए न सिर्फ देश के किसी भी बाजार में अपना उत्पादन बेचना आसान होगा बल्कि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों से जुड़कर भी अपने उत्पादों का अच्छा दाम पा सकेंगे. इसी को मोदी सरकार अपनी नई नीति में ‘देश में जीवंत विपणन (बाजार) पारिस्थिकीय तंत्र का निर्माण, कई विपणन माध्यमों के साथ प्रतिस्पर्धा, नवीन डिजिटल प्रौद्योगिकी’ से किसानों को जोड़ना बता रही है. सरकार कह रही है कि इस नीति के लागू होने के बाद किसान का खेत भी बाजार बन जाएगा, क्योंकि तब फसल का खरीददार किसान के खेत से ही उसका उत्पादन खरीद लेगा. ‘मुगेरी लाल के इन्हीं हसीन सपनों’ को दिखा कर हमारी सरकार ने देश के किसानों के बड़े हिस्से के विरोध के बावजूद सन् 1996 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने का निर्णय लिया था. आज भारत की खेती और किसानों की तबाही तथा भारत में बढ़ते कृषि संकट के लिए भारत सरकार का वही निर्णय घातक साबित हुआ, जिसे कांग्रेस सरकार ने अपनाया और अटल बिहारी वाजपेई की एनडीए सरकार ने जमीन में लागू करना शुरू किया था.