वर्ष 29 / अंक 4 / शाहीन बाग अब किसी जगह का नाम भर नहीं

शाहीन बाग अब किसी जगह का नाम भर नहीं

[लोगों की बातचीत और सोशल मीडिया में ‘शाहीन बाग’ की चर्चा आम है. हमें उसे करीब से देखने का मौका मिला –  आसपास भी और सुदूर राज्यों में भी. पिछले साल के15 दिसंबर से लेकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दिल्ली का शाहीन बाग जाग रहा है. प्रस्तुत है इन शाहीन बागों पर एक रिपोर्ट.]
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कोलकाता का पार्क सर्कस

7 जनवरी से मध्य कोलकाता के पार्क सर्कस मैदान में नागरिकता संशोधन कानून (2019) के खिलाफ धरना चल रहा है. पार्क सर्कस की औरतों की अगुवाई में यह धरना दिल्ली के शाहीन बाग में दिसंबर से चल रहे धरने से प्रेरित है. ये औरतें सीएए, एनआरसी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में छात्रों पर हुए क्रूर हमलों का विरोध कर रही हैं.

पार्क सर्कस मुस्लिम बहुल इलाका है. औरतों का धरना स्थानीय मस्जिद के बाहर एक मैदान में हो रहा है. कोलकाता में हो रहे अन्य विरोधों में मुख्यतः छात्रों और उच्च एवं मध्यम वर्ग की भागीदारी है लेकिन पार्क सर्कस में बड़े पैमाने पर श्रमिक वर्ग के लोग शामिल हैं. सैकड़ों औरतें अपने बच्चों के साथ, पोस्टर और तख्तियां लेकर जमा हो रही हैं. अधिकांश औरतें पहली बार इस तरह के किसी कार्यक्रम में शामिल हुई हैं. धीरे-धीरे कोलकाता के अन्य हिस्सों के लोग इसमें शामिल होने लगे हैं. प्रदर्शनकारियों का इरादा कम से कम 22 जनवरी तक अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे रहने का है. उस दिन सुप्रीम कोर्ट सीएए को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली है. धरने में शामिल लोगों का कहना है कि इस आंदोलन का नेतृत्व आम जनता के हाथों में है, आंदोलन तिरंगे की छाया में हो रहा है.

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8 जनवरी की दोपहर बुर्का पहनी कई औरतों को एक ट्रक यहां पहुंचा. जब वे ट्रक से निकलकर मैदान की ओर चलने लगीं, तो औरतों ने नारे लगाए – ‘सांप्रदायिक राजनीति से आजादी’. काले बुर्के और गहरे काले धूप का चश्मा पहनी दक्षिण कोलकाता के इकबालपुर की 44 साल की तबस्सुम अख्तर आगे-आगे नारे लगा रही थीं. उन्होंने कहा हम बहुत गुस्से में हैं, हमारा जेएनयू के बच्चों के साथ कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन वे हमारा सब कुछ हैं.

22 साल की रफीका हयात ने मुझे बताया कि 7 जनवरी को, अपने जीवन में पहली बार, उसने नारे लगाए. हयात ने शिवनाथ शास्त्री कालेज से हाल ही में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है. कुछ महीने पहले तक उसे राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह इंस्टाग्राम और फेसबुक पर अपना सारा इंटरनेट डेटा खर्च करती थी. अब वह नियमित रूप से समाचार देखती है और खुद को शिक्षित करने के लिए एनआरसी और सीएए के वीडियो का ट्रैक रखती है.

औरतों के लिए मैदान में एक बड़ा स्थान साफ कर दिया गया है. कपास के गद्दों के साथ धूसर और सफेद फोम की पतली चादरें फैली हुई हैं. प्रदर्शनकारियों के अलावा विरोध स्थल पर लगभग सौ स्वयंसेवक थे जो कंबल, पानी की बोतलें, चाइनीज खाना या बिरयानी और चाय का निर्बाध प्रवाह बनाए हुए थे.

प्रदर्शन में शामिल 55 वर्षीय मुसर्रत परवीन विधवा हैं और उनके तीन बेटे हैं. उनका कहना था कि शायद ही कभी अपने घर से बाहर निकली हैं. लेकिन अब उनको लगता है कि सड़क पर आने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. ‘हमें देश को बचाने के लिए कुछ करना होगा,’ – उन्होंने कहा. परवीन 7 जनवरी की शाम विरोध शुरू होते ही यहां आ गई थीं और अगले दिन सुबह 8.30 बजे घर लौटीं. फिर उन्होंने अपने परिवार के लिए खाना बनाया, पूरे दिन घर का काम किया और फिर रात 11.30 बजे मैदान लौट आईं. 9 जनवरी को जब मैंने उनसे बात की तो वह पिछले दो दिनों से सोई नहीं थीं. ‘मैं अब सो नहीं सकती, कितना कुछ चल रहा है और मुझे उम्मीद है कि मोदी समझेंगे कि हम हिंदुस्तान का क्या हाल कर रहे हैं, अपनी भूमि को क्या बनाए दे रहे हैं.’ दूसरी औरतों ने भी जोर देकर बताया कि वे गृहिणी हैं और अब से पहले शायद ही कभी अपने घरों से बाहर आईं हैं. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम ने उन्हें बाहर आने के लिए ‘मजबूर’ कर दिया है.

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कुछ औरतों ने बताया कि वे दिहाड़ी करती हैं और प्रदर्शन की खातिर इसकी कुर्बानी कर रही हैं. पचास साल की एक औरत ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह यहां से बस कुछ ही मीटर की दूरी पर रहती हैं और पास के मलिक बाजार के परिवारों के लिए खाना बनाती हैं. वह तीन बेटियों की एक मां हैं और महीने में बमुश्किल पांच हजार रुपए कमा पाती है. उन्होंने कहा कि वह तीन दिनों से लगातार विरोध स्थल पर हैं और बस अपनी दवाएं लेने घर गई हैं. ‘हम अपने अधिकारों के लिए यहां आए हैं. हम हिंदुस्तान क्यों छोड़ें? हमें मोदी को सीएए और एनआरसी को लागू करने से रोकना है.’

भूरे हिजाब और शाही-नीले ऊनी शाल में लिपटी फिरदौस सबा माइक में अजादी के नारे लगा रही हैं. उनके पीछे खड़े लोग उसके साथ नारे लगा रहे हैं. सबा कोलकाता के आलिया विश्वविद्यालय में भौतिकी की छात्रा हैं. 8 जनवरी को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए छात्रावास से बाहर आते वक्त उन्होंने अधिकारियों को बता दिया था कि वह अगले दिन तक वापस नहीं लौटेंगी. उन्होंने पूरी रात ‘हल्ला बोल’ का नारा लगाते हुए काटी.

सबा बताती हैं – ‘मैं शाहीन बाग में विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहती थी. मैं ऐसा नहीं कर सकी. लेकिन मैं कोलकाता के ‘शाहीन बाग’ में तो भाग ले ही सकती थी. हम संयोग से भारतीय नहीं हैं, हम अपनी पसंद से भारतीय हैं. 1947 में हमने दो-राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज कर दिया, हमने एक इस्लामिक राज्य को खारिज कर दिया. आज हमारे हिंदू भाई-बहन हिंदू राष्ट्र को खारिज कर देंगे. हमने इस्लामाबाद या कराची, या बांग्लादेश नहीं चुना, हमने भारत को चुना क्योंकि यह एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश है.’

सबा ने कहा – ‘आजाद भारत के संस्थापकों ने लोगों को बोलने का अधिकार दिया है. हमें बोलने से क्यों रोका जा रहा है? समानता हमारा हक है. वह हमसे क्यों छीना जा रहा है? संविधान क्यों तोड़ा जा रहा है? हम यहां मुसलमानों के रूप में नहीं आए हैं, हम यहां भारतीय हैं. हम यहां खुद को बचाने के लिए नहीं आए हैं. हम यहां संविधान और कानून को बचाने के लिए आए हैं. हम संविधान को बचाने के बाद ही यह जगह छोड़ेंगे.’

शांति बाग, गया

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सभी समुदायों के हजारों लोग, जिनमें से ज्यादा महिलाएं हैं, भारी ठंड के बीच यहां इकट्ठा हुए हैं और गीत गा रहे हैं, कवितायें पढ़ रहे हैं, भाषण सुन रहे हैं. सबका उद्देश्य एक ही है – संविधान को बचाना. जनवरी की इस ठंड में दुलारी देवी और साजिया खुले आसमान के नीचे बैठ कर राष्ट्रगान गा रही हैं, फैज अहमद फैज की नज्में गा रही हैं और नारे लगा रही हैं. 29 दिसंबर से ही रात-दिन लगातार चल रहे इस प्रतिवाद ने, जिसमें महिलायें व छात्रा मुख्य रूप से शामिल हैं. गया शहर के नागरिकों का भारी समर्थन हासिल कर लिया है. यह वही शहर है जहां बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ था. एनआरसी, सीएए और एनपीआर के खिलाफ यह बिहार में अपने तरह का अनोखा प्रतिवाद है, जिसने 15 दिन पहले ही पूरे कर लिए हैं.

शांतिबाग के करीब ही रहनेवाली घरेलू महिला दुलारी देवी कहती हैं – ‘मैं पिछले दो सप्ताह से यहां हर रोज आ रही हूं. सीएए और एनआरसी न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह नागरिकों के बुनियादी अधिकार के खिलाफ है. मैं तबतक नहीं जाऊंगी जबतक सरकार इसे वापस नहीं ले लेती.’ यहां उनकी तरह अन्य महिलाएं भी हैं – नुसरत हसन, ममता देवी, नगमा परवीन, फातिमा खान, करूणा कुमारी, मरियम फरहाद, सुमन शौर्या, रोजी खातून जो इस प्रतिवाद में घंटों तक शामिल रहती हैं. एक छोटे से मंच पर बैठे नौजवानों द्वारा इंकलाब जिंदाबाद, लड़ेंगे-जीतेंगे, वी शैल फाईट-वी शैल विन, लांग लिव रिवोल्यूशन, हिन्दुस्तान जिंदाबाद आदि नारे लगातार जारी रहते हैं. अलग-अलग वक्ताओं का संबोधन चलता रहता है. धरना स्थल को पोस्टर, बैनर और रंगीन तख्तियों से सजाया भी गया है.

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एक अन्य प्रदर्शनकारी शाजिया कहती हैं – ‘राष्ट्रगीत को गाना, फैज और दूसरों की कविताओं का पाठ इस ठंउ के मौसम में भी हम लोगों के भीतर नई गर्मी पैदा कर देता है.’ नगमा जो अपने सिंर को ठंड से बचाने के लिए ढंके हुए हैं, कहती हैं – ‘यह प्रतिवाद हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के एकताबद्ध व शांतिपूर्ण विरोध की बानगी है. यहां नगमा, फरजाना परवीन, कहकशां और वसीम नैयर अंसारी हैं. तो ममता देवी, सुमन शौर्या, मुकेश कुमार, मुन्नी देवी, राजेन्द्र यादव, और मुकेश चौधरी भी हैं.’ करूणा कुमारी कहती हैं कि यह कहना पूरी तरह से गलत है कि सिर्फ मुस्लिम ही सीएए और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं. सैकड़ों गैर मुस्लिम – हिन्दू, सिख व इसाई भी इसमें शामिल हैं. मैं भी उन्हीं में से एक हूं.

संविधान बचाओ मोर्चा के बैनर से हो रहा यह धरना गया शहर के लिए नया इतिहास रच रहा है. हमेशा ही 4-5 हजार लोग धरना स्थल पर मौजूद रहते हैं. शनिवार और रविवार को यह संख्या और भी बढ़ जाती है. दो सौ से अधिक छात्र-युवा यहां रात में भी मौजूद रहते हें. धरना को निखिल कुमार, जीतनराम मांझी, उदयनारायण चौधरी, तेजस्वी यादव व वाम दलों के कई स्थानीय नेता अब तक संबोधित कर चुके हें. कन्हैया कुमार और कन्नन गोपीनाथन भी इसे संबोधित करनेवाले हैं.

रौशन बाग, इलाहाबाद

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नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में दिल्ली की तरह इलाहाबाद में भी महिलाएं शहर के रौशनबाग स्थित मंसूर अली पार्क में बीते तीन दिनों से धरने पर बैठी हैं. पुलिस और प्रशासन काफी मशक्कत के बाद भी उनका धरना समाप्त कराने में कामयाब नहीं हो सका है. जबरदस्त भीड़ और विरोध के चलते प्रशासन सफल नहीं हो पा रहा है.

प्रदर्शनकारियों के हाथों में नारे लिखीं तख्तियां हैं. ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘सबने इसे संवारा है, जितना तुम्हारा, उतना ही यह मुल्क हमारा है’, ‘संविधान का उल्लंघन, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’ जैसे नारे इन पर लिखे हैं.

खास बात यह है कि इस बार आंदोलन की कमान मुस्लिम महिलाओं के हाथों में है. मुस्लिम महिलाओं के साथ बड़ी संख्या में छोटे बच्चों और पुरुषों की जमात भी डटी हुई है. महिलाएं पूरी रात यहां खुले आसमान तले बैठती हैं, यहीं नमाज पढ़ती हैं, यहीं से सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं.

रोशनबाग निवासी रूबीना का कहना है कि उनका विरोध न किसी पार्टी से है और न ही सरकार से. उनका विरोध सिर्फ इस बात का है कि हिंदुस्तान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बिगाड़ने की कोशिशें की जा रही हैं.

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इसी तरह सबीना अहमद ने बताया कि उनके पास अपनी नागरिकता के प्रमाण हैं. लेकिन, कम पढ़े-लिखे तमाम ऐसे लोग हैं, जिन्होंने जागरूकता के अभाव में इस तरह के दस्तावेज नहीं बनवाए. उनके यहां घरेलू काम करने वाली महिला भी इनमें से एक है, तो क्या ऐसे लोगों को देश में रहने का अधिकार नहीं है?

इस आंदोलन में कई विपक्षी पार्टियों और वामपंथी संगठनों का समर्थन मिल रहा है. 100 से ज्यादा महिलाओं ने सीएए व एनआरसी के विरोध में खुल्दाबाद स्थित मंसूर अली पार्क में धरना प्रदर्शन शुरू किया था. सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहुंची और उन्हें हटाने की कोशिश की, लेकिन महिलाएं मानने को तैयार नहीं हुईं. भीड़ बढ़ती देख देर रात पीएसी भी बुलाई गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. पुलिस का मानना था कि रात होते ही प्रदर्शन खत्म हो जाएगा. हालांकि, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. छोटे-छोटे बच्चों को लेकर धरना प्रदर्शन कर रहीं महिलाएं रातभर मंसूर अली पार्क में डटे रहे.

मंसूर अली पार्क में चल रहे धरना-प्रदर्शन को विभिन्न संगठनों ने भी समर्थन दिया है. इनमें भाकपा(माले), आइसा, एक्टू, ऐपवा, (सीटू), ऐडवा, भारत की जनवादी नौजवान सभा, एसएफआई की जिला कमेटियां शामिल हैं.

लखमिनिया चौक, बेगूसराय

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सीएए एन आर सी एन पी आर रद्द करने की मांग को लेकर बेगुसराय जिले के बलिया प्रखंड अवस्थित लखमिनिया चौक पर विगत 11 जनवरी 2010 से से दिन-रात लगातार अनिश्चित कालीन धरना-प्रदर्शन जारी है. भाकपा(माले) की मुख्य पहल पर ‘अम्बेदकर संघर्ष विचार मंच’ के बैनर तले आयोजित हो रहे इस धरने में हजारों लोग शामिल हो रहे हैं. ये लोग कस्बे व आसपास के गांवों के गरीब खेत मजदूर व किसान, छोटे दूकानदार व छात्र-नौजवान हैं. हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोग और भारी तादाद में महिलायें इस धरना में शामिल हैं.

धरना पर बैठे लोगों का कहना है कि जब तक सरकार उनके मांगों को मान कर देश विरोधी सांप्रदायिक सीएए, एनआरसी चप एनपीआर को वापस नहीं ले लेती, उनका यह धरना चलता रहेगा. लोगो ने बताया कि हमने इस लंबी लड़ाई को लड़ने के लिए सिर मे कफन बांध लिया है. कांगेस, राजद, भाकपा व माकपा आदि दलों के स्थानीय कार्यकर्ता, सामाजिक संगठन व कायॅकर्ता तथा लोकतंत्र प्रेमी नागरिक इस धरना के प्रति अपनी एकजुटता जाहिर कर रहे हैं और मोदी-शाह सरकार की फासीवादी दमनकारी साजिश के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

धरना से देश भर में चल रहे शान्तिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध आंदोलनों के प्रति एकजुटता प्रकट की जा रही है तथा लोकतंत्र की आवज को दबाने की घटनाओं की निंदा की जा रही है. बिहार की नीतीश सरकार के अल्पसंख्यक विरोधी जन विरोधी चेहरे को भी बेनकाब किया जा रहा है और एनपीआर को लागू करने को लेकर उनके ढुलमुलपन का विरोध की आवाज तेज हो रही है. तमाम लोग सविधान, लोकतंत्र व धर्मनिरपेक्षता को बचाने को लेकर संकल्पित हैं.

पार्टी के जिला सचिव का. दिवाकर कुमार, बलिया प्रखंड सचिव का. नूर आलम, आइसा नेता वतन कुमार, स्थानीय नेता का. इन्द्रदेव राम, प्रशांत कश्यप, अजय कुमार, अभिषेक कुमार ने लगातार मौजूदगी से आन्दोलनकारियों का हौसला बुलंद है. शाहीन बाग आन्दोलन सहित देश के विभिन्न भागो में चल रहे विरोध कार्यक्रमों की कड़ी में यह धरना भी मिसाल बन रहा है.

बस पड़ाव मैदान, समस्तीपुर

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शाहीन बाग दिल्ली के आंदोलन से प्रभावित होकर समस्तीपुर में समाहरणालय के सामने स्थित धरनास्थल (सरकारी बस स्टैंड) पर विगत 10 जनवरी 2020 से एनआरसी, एनपीआर व सीएए के खिलाफ सत्याग्रह कार्यक्रम शुरू हुआ है. ‘संविधान बचाओ संघर्ष समिति’ जिसके संयोजक भाकपा(माले) जिला कमेटी सदस्य का. सुरेंद्र प्रसाद सिंह हैं, के बैनर तले आयोजित इस सत्याग्रह में भाकपा(माले) की मुख्य भूमिका है. साथ ही, भाकपा, माकपा, राजद, रालोसपा, वीआईपी, हम और कांग्रेस समेत कई अन्य पार्टियों के लोग भी हैं. कई पार्टियों की कमजोर भूमिका के बावजूद भाकपा(माले) और अन्य वाम दलों की मजबूती के कारण इसमें लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है. भाकपा(माले) जिला सचिव प्रोफ़ेसर उमेश कुमार, ऐपवा  नेत्री वंदना सिंह, आइसा नेता सुनील कुमार, माले नेता गंगा प्रसाद पासवान व फूलबाबू सिंह, प्रीति कुमारी व मनीषा कुमारी समेत पार्टी व जनसंगठनों के नता इसमें लगातार भाग ले रहे हैं.

पार्टी नेता व ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव का. कविता कृष्णन ने भी विगत 14 जनवरी को सत्याग्रह स्थल पहुंचकर वहां आयोजित सभा  सभा और संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया. इस मौके पर आंदोलनकारियों ने सत्याग्रह जारी रखने का संकल्प जाहिर किया. सत्याग्रह की बढ़ती ताकत से घबराये जिला प्रशासन व भाजपाई सत्याग्रह के दौरान लगातार व्यवधान भी पैदा कर रहे हैं. अनिश्चितकालीन सत्याग्रह की सूचना देने के बावजूद इसे मात्रा दो दिनों के बाद ही समाप्त करने का दबाव भी प्रशासन की ओर से बनाया गया और जिलाधिकारी ने सत्याग्रह स्थल को खाली कराने का आदेश भी जारी किया. लेकिन ‘संविधान बचाओ संघर्ष समिति’ के लोगों और आम जनता उनसे भी टकराने को तैयार दिख रही है. छठे दिन भी सत्याग्रह चलता रहा. कार्यकर्ता व नेता और भी तत्परतापूर्वक इसे आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं.

फुलवारीशरीफ, पटना

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पटना के फुलवारीशरीफ में, जहां बजरंग दल व भाजपा के गुंडों ने विगत 21 दिसंबर को राजद आहूत बिहार बंद के दौरान अपने हाथों में तिरंगा लिए चल रहे युवा मजदूर अमीर हंजला की हत्या के पैशाचिक व कायरतापूर्ण कारनामे को अंजाम दिया था, सीएए, एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ पिछले पांच दिनों से अनिश्चितकालीन धरना चल रहा है.

12 जनवरी को धरना जब शुरू हुआ कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. तब भी भारी तादाद में  महिलायें, बच्चे और नौजवानों की शिरकत हुई. धीरे-धीरे यह तादाद बढ़ती ही जा रही है. धरना का प्रबंध इस इलाके के नागरिक समूह, जिसमें इमारते शरिया, भाकपा(माले), भाकपा, इंसाफ मंच और अन्य सामाजिक-राजनीतिक संगठनों की अहम भूमिका रह रही है, के जरिए की जा रही है. भाकपा(माले) नेता का. गुरूदेव दास, इमारते शरिया के प्रधान जनाव रिजवी साहव और स्थानीय भाकपा नेता एडवोकेट महेश रजक शुरूआत से ही सारे प्रबंध कर रहे  हैं.

धरना शुरू हुआ तो अगले ही दिन भाकपा(माले) राज्य कमेटी के सदस्य व इंसाफ मंच के नेता का. अनवर हुसैन, तीसरे दिन भाकपा(माले) बिधायक दल के नेता का. महबुब आलम व पूर्व सांसद अली अनवर, चौथे दिन पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी तथा ऐपवा महासचिव का. मीना तिवारी ने इसे संबोधित किया.

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भागीदारों की लगातार बढ़ रही संख्या की वजह से धरना स्थल का हर रोज फैलाव हो रहा है. जल्दी ही इसके मुख्य सड़क (फुलवारी-खगौल सड़क) तक पहुंच जाने की संभावना है. 16 जनवरी को भी ऐपवा महासचिव का. मीना तिवारी ने धरना को संबोधिकरते हुए कहा कि आज पूरा देश एनआरसी, सीएए और एनपीआर के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है. अमित शाह कहते हैं कि हम इसे पूरे देश में लागू करेंगे और मोदी जी झूठ बोलते हुए कहते हैं कि ऐसी कोई वात नहीं है. नीतीश कुमार दोरंगी चाल चल रहे हैं. लोकसभा में एनआरसी के पक्ष में वोट करवाते हैं और यहां कहते हैं कि एनारसी लागु नहीं होगा  लेकिन, एनआरसी का जो पहला कदम एनआपी  है उस पर काम शुरू कर चुके हैं. गरीब-पिछड़े वर्गों के लोगों की नागरिकता छीनने की कोशिश कर रहे हैं. आहर-पोखर-नहर के किनारे या मालिक गैर-मजरूआ जमीन जमीन पर बसे गरीबों के पास कौन सा प्रमाणपत्र है कि वे अपनी नागरिकता प्रमाणित करेंगे. ये लोग बेरोजगारों का, भूमिहीनों का, रासन से वंचित लोगों रजिस्टर क्यों नहीं बना रहे हैं. इसलिए, एनआरसी जव तक खत्म नहीं होगा, यह आंदोलन जारी रहेगा. बिहार महिला समाज की निवीदिता झा, रंगकर्मी जावेद अख्तर, मोना झा और मौलाना काजी वसी अख्तर भी आज धरना में मौजूद रहे.

पटना के सब्जीबाग और लाल बाग में भी पिछले दिनों अनिश्चितकालीन धरना शुरू हुआ है.

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20 January, 2020