वर्ष 34 / अंक-03 / उत्तर प्रदेश : संविधान बचाओ अभियान के समापन पर निक...

उत्तर प्रदेश : संविधान बचाओ अभियान के समापन पर निकला तिरंगा मार्च

डॉ. भीमराव अंबेडकर पर गृहमंत्री अमित शाह द्वारा संसद में की गई अपमानजनक टिप्पणी के खिलाफ उनके इस्तीफे की मांग करते हुए गणतंत्र दिवस पर भाकपा(माले) ने पूरे प्रदेश में तिरंगा यात्रा निकाली. राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने, सभा व संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ करते हुए संविधान बचाने का संकल्प लिया. तिरंगा यात्रा 26 नवंबर (संविधान अपनाने के दिन) से 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस, संविधान लागू होने के दिन) तक चले ‘संविधान बचाओ अभियान’ के समापन पर निकाली गई.

लखनऊ के बीकेटी क्षेत्र में चतुरा बाग स्थित बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर प्रतिमा पर संकल्प सभा कर संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया गया. इस मौके पर भाकपा(माले) के राज्य सचिव का. सुधाकर यादव ने कहा कि मोदी राज में संविधान और लोकतंत्र पर चौतरफा हमले हो रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी देश के संसाधनों को अडानी, अंबानी जैसे अपने मित्र पूंजीपतियों को सौप रहे हैं. सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले नेताओं को देशद्रोही बताकर जेलों में डाला जा रहा है. सरकार बाबासाहेब का संविधान बदलकर मनुस्मृति को लागू करना चाहती है. मोदी सरकार अंबेडकर से इतनी डरी हुई है कि उन्हें अपमानित करने से भी बाज नहीं आ रही है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा अंबेडकर के खिलाफ की गई अपमानित करने वाली टिप्पणी की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि देश और संविधान बचाने के लिए भाजपा-विरोधी सभी राजनीतिक पार्टियों को एकजुट होकर इस फासीवादी निजाम के खिलाफ संघर्ष में उतरना होगा. सभा का संचालन पार्टी के जिला प्रभारी का. रमेश सिंह सेंगर ने किया. सभा को किसान महासभा के जिला संयोजक का. छोटे लाल रावत, ऐपवा जिला सहसंयोजिका का. कमला गौतम व राज्य कार्यकारिणी सदस्य का. सरोजिनी बिष्ट, आइसा प्रदेश उपाध्यक्ष निखिल, लखनऊ विवि के आइसा नेता शान्तम निधि, समर आदि ने संबोधित किया.

लखनऊ के सरोजिनी नगर क्षेत्र के दरोगा खेड़ा कालोनी स्थित शहीद चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति के पास पार्टी राज्य कमेटी सदस्य व ऐपवा नेता का. मीना के नेतृत्व में गणतंत्र दिवस मनाया गया. इस अवसर पर संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया गया. दरोगा खेड़ा व रानीपुर गांव में सभा का आयोजन हुआ. रानीपुर में बच्चों के नृत्य, गायन व कविता पाठ की प्रतियोगिता हुई.

इलाहाबाद में आइसा द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर ‘रीक्लेम द रिपब्लिक’ मार्च निकाला गया. इलाहाबाद विवि के छात्रसंघ भवन गेट पर दस्ता द्वारा जनगीतों की प्रस्तुति के बाद विश्वविद्यालय गेट से चंद्रशेखर आजाद पार्क तक मार्च निकाला गया. मार्च में भारतीय संविधान पर बढ़ते हमले, सांप्रदायिकता, पूंजीवाद, सामंतवाद, जातिवाद और मर्दवाद के खिलाफ नारे लगाए गए. मार्च के चंद्रशेखर प्रतिमा, आजाद पार्क पहुंचने के बाद सभा की गईं. सभा की शुरुआत करते हुए आइसा प्रदेश अध्यक्ष मनीष कुमार ने कहा कि भाजपा सरकार भारतीय संविधान और उसमें निहित उद्देश्यों के ठीक खिलाफ है और लगातार हमलावर है, जिसके परिणामस्वरुप शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और देश में बेरोजगारी व सामाजिक विषमता बढ़ती जा रही है. इसके खिलाफ देश का युवा गणतंत्र और समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़ रहा है. शोध छात्रा सोनाली ने कहा कि नई शिक्षा नीति द्वारा देश की शिक्षा का निजीकरण करने की कोशिश की जा रही है, जिसमें महिलाओं और गरीबों के शिक्षा अधिकार की अनदेखी हो रही है. इसके खिलाफ आवाज उठानी होगी. स्नातक के छात्र मणिकांत ने कहा कि विश्वविद्यालय में छात्र संघ बहाल किया जाना चाहिए, जिससे छात्रों के अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके. छात्र अमित ने डॉ. अंबेडकर और भगत सिंह के सपनों को याद करते हुए देश को बचाने के लिए एकजुट होने की अपील की. स्नातक के छात्र राज कौशल ने देश में दलितों पर लगातार बढ़ते हमले पर चिंता जाहिर की. विकास ने कहा कि देश की चुनाव प्रक्रिया में वन नेशन, वन इलेक्शन से राजतंत्र को बढ़ावा मिलेगा. मानवेंद्र ने कहा कि समाज में कुरीतियों को भारतीय संविधान द्वारा ही दूर किया जा सकता हैं. सभा में आर्यन, अद्वतेश, विश्वेंद्र, आशीष आदि ने भी बात रखी. संचालन शशांक ने किया. बृजेश, श्वेता, स्नेहा, अमित, आकाश, अमन, अमित, विकास, अवनीश, वंदना, बेअंत समेत दर्जनों लोग इसमें शामिल रहे.

गोरखपुर जिले के नराईचपार में भाकपा(माले) जिला सचिव का. राकेश सिंह के नेतृत्व में तिरंगा यात्रा निकाली गई. यात्रा के दौरान नफरत की राजनीति बंद करो, बुल्डोजर राज मुर्दाबाद, संविधान जिंदाबाद, संविधान पर हमला नहीं सहेंगे, बाबासाहेब का अपमान नहीं सहेंगे आदि नारे लगाए गए.

महराजगंज जिले के निचलौल, सोनबरसा में पार्टी जिला सचिव संजय निषाद व जिला कमेटी सदस्य महेश गुप्ता के नेतृत्व में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया व संकल्प सभा की गई. इसके अलावा दो अन्य गांवों में ध्वजारोहण कार्यक्रम किया गया.

आजमगढ़ जिले में रैदोपुर तिराहा स्थित गांधी प्रतिमा से संविधान बचाओ तिरंगा यात्रा निकाली गई. यात्रा का नेतृत्व भाकपा(माले) नेता व किसान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष का. जयप्रकाश नारायण और पार्टी जिला प्रभारी का. विनोद सिंह ने किया. तिरंगा यात्रा भगतसिंह तिराहा होते हुए अंबेडकर पार्क पहुंची और वहां सभा में तब्दील हो गई. सभा को संबोधित करते हुए जयप्रकाश नारायण ने कहा कि आरएसएस शुरू से ही देश के संविधान से नफरत करता रहा है और उस समय भी इनके द्वारा संविधान की प्रति जलायी गई थी. आज आरएसएस और भाजपा जब सत्ता में हैं तो उनके नेता संविधान को बदल कर देश में मनुस्मृति लागू करना चाहते हैं. इसीलिए गृहमंत्री अमित शाह ने संवैधानिक पद पर रहते हुए राज्य सभा में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का अपमान किया. यह कतई क्षमा योग्य नहीं है, इसलिए भाजपा और उसके नेता देश से माफी मांगें और गृहमंत्री अमित शाह से इस्तीफा लिया जाए. कार्यक्रम के माध्यम से राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा गया. तिरंगा यात्रा में बसंत, सुदर्शन राम, रामजीत, रामकृष्ण, हरिश्चंद्र, शिवम्, हवलदार राम, कालिका, राम सुधार राम, लालचंद निषाद सहित कई अन्य साथी शामिल रहे.

मऊ में ऐतिहासिक छिछोर कांड के शहीद का. सुभाष मुखर्जी को याद करते हुए भाकपा(माले) जिला सचिव का. वसंत व संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में कुड़वा मार्च किया गया. इसके अलावा दो अन्य जगहों पर ध्वजारोहण कर संकल्प सभा की गई.

बलिया के बहादुरपुर ब्लॉक में राज्य स्थाई समिति के सदस्य ओमप्रकाश सिंह तथा जिला कमेटी सदस्य लछमन यादव के नेतृत्व में चार किमी तक पैदल तिरंगा मार्च निकाला गया. केंद्रीय कमेटी सदस्य कामरेड श्रीराम चौधरी के नेतृत्व में पनदह गांव में ध्वजारोहण कर संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया गया. जिला सचिव कामरेड लाल साहब के नेतृत्व में सिकंदरपुर विधानसभा क्षेत्र के गयावीरा पट्टी की दलित बस्ती में मार्च आयोजित कर सभा की गई.

वाराणसी में दानियालपुर के वनवासी बस्ती में संकल्प सभा आयोजित की गई जिसमें आरडी सिंह विप्लवी, धनपत पाल, रानी बनवासी सहित कई साथी व अनेक बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल हुए. ऐपवा राज्य सचिव कुसुम वर्मा के नेतृत्व में घरेलू कामगार बस्ती  में संविधान की प्रस्तावना के पाठ, शपथ और झंडा फहराने का भी कार्यक्रम किया गया.

चंदौली जिले में के चकिया ब्लाक अंतर्गत उतरौत क्षेत्र में धरदे गांव से भजनपूरवा गांव तक करीब 7 किलोमीटर लंबा मार्च निकाला गया. भाकपा(माले) जिला सचिव अनिल पासवान के नेतृत्व में निकले इस मार्च में ब्लॉक सचिव विजई राम और इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य काउंसिल सदस्य रमेश चौहान, सुनैना कुमारी, हरिहर राम, पूर्णवासी राम, कमालुद्दीन सहित कई लोग शामिल रहे. शहाबगंज ब्लॉक के बरांव गांव से संविधान बचाओ तिरंगा मार्च शुरू कर हडौरा गांव तक किया गया. चंदौली ब्लॉक के कांटा साइफन से शुरू कर कांटा दलित बस्ती तक मार्च किया गया. सकलडीहा ब्लॉक में सलेमपुर से शुरू कर धरहरा गांव तक संविधान बचाओ तिरंगा मार्च किया गया.

भदोही में जिला सचिव का. बनारसी के नेतृत्व में वेदपुर वनकट में संविधान बचाओ संकल्प सभा की गई. सभा के पूर्व संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एक प्रभावशाली  मार्च निकाला गया.

up image

रायबरेली में रेलवे स्टेशन से डॉ. अंबेडकर प्रतिमा तक (दूरी 4 किमी) मार्च निकाला गया. इस मार्च में 300 से अधिक भाकपा(माले) कार्यकर्ताओं और 100 से अधिक महिलाओं ने हिस्सा लिया. सीएए-एनआरसी आंदोलन के बाद से रायबरेली के मुस्लिम बाहुल्य इलाके से कोई जुलूस निकालने नहीं दिया जा रहा था. पुलिस द्वारा इस तिरंगा मार्च को रोकने का काफी प्रयास किया गया लेकिन रास्ता न बदलते हुए आगे बढ़ने की दृढ़ता के सामने प्रशासन को पीछे हटना पड़ा और रेलवे स्टेशन से जहानाबाद चौकी, कहारो अड्डा और शहर के मुख्य बाजार होते हुए अंबेडकर प्रतिमा पर पहुंचकर सभा की गई. कार्यक्रम में प्रमुख रूप से उदयभान पटेल, डॉ. हलीम महमूद, फूलचन्द्र मौर्या, हनुमान अंबेडकर, अरुण कुमार प्रधान, रामेश्वर प्रधान, हरिलाल, शिवम्, गायत्री, विद्या, विमला, गुलाम अहमद सिद्दीकी, राजेश कुमार और मो. इरफान शामिल रहे.

मिर्जापुर के मड़िहान में राज्य कमेटी सदस्य जीरा भारती के नेतृत्व में मार्च निकालकर सभा की गई. राजगढ़ में जिला कमेटी सदस्य सोमारू पटेल के नेतृत्व में कार्यक्रम हुआ. इसके अलावा अहरौरा तथा तालर गांव में भी ध्वजारोहण व सभा की गई.

सोनभद्र जिले में गुरौटी गांव में डॉ. अंबेडकर का फोटो लेकर मार्च निकाला गया. मार्च में भाकपा(माले) जिला सचिव का. सुरेश कोल, का. शंकर कोल, दीना भारती, रोहित भारती, हीरालाल भारती, लक्ष्मण भारती और विनय आदि लोग शामिल थे. बरवे टोला, झांझवा में भाकपा(माले) कार्यकर्ताओं द्वारा उत्साह पूर्वक 76वां गणतंत्र दिवस मनाया गया जिसमें अनिल कुमार,धनेश्वर सिंह गोंड, जयसिंह गोंड, दयाराम, विनोद, रविन्द्रसिंह, सुनीता कुमारी, राजपति देवी आदि लोग उपस्थित रहे.

जालौन के उरई में भाकपा(माले) जिला सचिव का. राजीव कुशवाहा व ऐक्टू के राष्ट्रीय पार्षद रामसिंह चौधरी नेतृत्व में तिरंगा मार्च निकाला गया. मार्च में प्रमुख रूप से उरई पल्लेदार यूनियन अध्यक्ष राजाराम वर्मा, कार्यालय सचिव अशोक वर्मा, कोषाध्यक्ष का. रामबाबू अहिरवार, संयुक्त मंत्री, का. देवीदयाल वर्मा आदि शामिल थे.

सीतापुर जिले में डॉ. भीम राव अंबेडकर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राज्य सभा में अपमानित किये जाने के खिलाफ अभियान में तिरंगा यात्रा के साथ संकल्प सभा और गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें अमित शाह के माफी मांगने, इस्तीफा देने और बर्खास्त किये जाने की मांग की गई तथा ‘संविधान बचाओ, मोदी हटाओ, देश बचाओ’ का नारा बुलंद किया गया. 21 से 26 जनवरी तक छः दिन लगातार कार्यक्रम आयोजित किए गए. 21 जनवरी को महोली ब्लॉक के कोलहौरी गांव के अम्बेडकर पार्क में संकल्प सभा हुई. कार्यक्रम की खास बात यह थी कि पूरा गांव बसपा समर्थक था. सभी उपस्थित लोग दलित समाज के थे. 22 जनवरी को हरगांव ब्लॉक के कयोंटी खुर्द के ऊदा देवी पार्क मे आयोजित गोष्ठी में बसपा, कांग्रेस के साथ ही कुछ भाजपा समर्थक भी उपस्थित हुए जिनमें से अधिकतर पासी समाज से थे. गोष्ठी को भाकपा(माले) नेताओ के अलावा अर्जक संघ के जिलाध्यक्ष रामसागर वर्मा ने भी सम्बोधित किया.

23 जनवरी को महोली ब्लॉक के बोझवा में सम्राट अशोक स्तम्भ पर संकल्प सभा हुई जिसमें 40 से अधिक लोग उपस्थित हुए. इस कार्यक्रम के आयोजक नीलकंठ मौर्य थे जो महानदल के समर्थक थे. 24 जनवरी को एलिया बलॉक के जमलापुर स्थित अम्बेडकर पार्क में गोष्ठी हुई जिसमें 35 से अधिक लोग उपस्थित थे जिसमें अधिकतर बसपा समर्थक थे. गोष्ठी को अम्बेडकर मिशन प्रचारक जगदीश मिलिंद ने सम्बोधित किया.

25 जनवरी को हरगांव के अम्बेडकर पार्क, कुंवरपुर में मनोहर लाल शास्त्री की अगुआई में संकल्प सभा का आयोजन हुआ. यह पूरा गांव पहले बसपा समर्थक था. सभा में पचास से अधिक लोग उपस्थित हुए. सभा को शास्त्री जी के अलावा बौद्ध धर्म प्रचारक लालजी गौतम ने भी संबोधित किया. 26 जनवरी को परसेडी ब्लॉक के शाह महोली मे अभियान का समापन किया गया.

पीलीभीत जिले के राहुल नगर मजदूर बस्ती में गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा झंडे के साथ ‘संविधान बचाओ, देश बचाओ’ नारा लगाते हुए जलूस निकाला गया. पूरनपुर तहसील के ग्राम जादोपुर, गहलुईया में भी भाकपा(माले) कार्यकर्त्ताओं ने ‘संविधान बचाओ मार्च’ निकाला.

लखीमपुर खीरी में कुल 6 जगहों पर कार्यक्रम हुए. पलिया में बसही और घोला, गोल गोकर्णनाथ तहसील में गांव फुलहीया, पुनरभु ग्रांट लखीमपुर तहसील के गांव तापरपुरवा, निघासन व धौरहरा और निबियापुरवा में (संयुक्त रूप से) कार्यक्रम किया गया.

कानपुर में पार्टी जिला प्रभारी का. विद्या रजवार तथा पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार के नेतृत्व में ध्वजारोहण व तिरंगा मार्च निकाला गया.

उन्नाव जिले की बांगरमऊ तहसील के ग्राम धन्ना खेड़ा सकरौली में प्रस्तावना का पाठ संविधान बचाओ मार्च गांव मे भाकपा(माले) कार्यकर्त्ताओं ने निकाला.

फैजाबाद में गणतंत्र दिवस पर संयुक्त किसान मोर्चा के तत्वाधान में तारुन से रामपुर भगन तक तिरंगा यात्रा निकालकर संविधान रक्षा का संकल्प लिया गया.

बस्ती में गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर ‘लोकतंत्र व संबिधान बचाओ’ संगोष्ठी किया गया. कई अन्य जिलों में भी ऐसे ही कार्यक्रम आयोजित हुए.

संविधान और गणतंत्र की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर 26 जनवरी 2025 को गणतंत्र दिवस के मौके पर भाकपा(माले) ने पूरे बिहार में तिरंगा मार्च का आयोजन किया. इस तिरंगा मार्च में शामिल हजारों लोगों संविधान की उद्देशिका का सामूहिक पाठ भी किया. यह कार्यक्रम पार्टी द्वारा विगत दो महीने से चलाए जा रहे संविधान बचाओ अभियान (26 नवंबर 2024 - 26 जनवरी 2025) के तहत किया गया. इस अभियान के अंतर्गत राज्य के विभिन्न हिस्सों में संविधान की उद्देशिका के शिलापट्ट भी लगाए गए. इसके जरिए संविधान और उसकी मूल भावना को बचाने के लिए एक व्यापक जन जागरूकता अभियान संगठित किया गया. भाकपा(माले) ने इस तरह के जागरूकता कार्यक्रमों का लगातार आयोजन की घोषणा की और संविधान के मूल सिद्धांतों व आदर्शों को बचाने की प्रतिबद्धता जाहिर की.

संविधान बचाने के लिए व्यापक स्तर पर तिरंगा मार्च

दरभंगा में भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य, पोलित ब्यूरो सदस्य का. धीरेंद्र झा, विधान पार्षद शशि यादव, आरवाईए के राष्ट्रीय महासचिव नीरज कुमार, अगिआंव विधायक शिवप्रकाश रंजन, इंसाफ मंच के नेता नेयाज अहमद और आइसा के महासचिव प्रसनजीत सहित कई नेता तिरंगा मार्च में शामिल हुए.

मार्च को संबोधित करते हुए भाकपा(माले) महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि आज का दिन संविधान, आजादी, स्वतंत्रता, भाईचारा, बराबरी और समाजवादी मूल्यों को बनाए रखने के लिए संकल्प लेने का दिन है. मौजूदा मोदी सरकार संविधान को लगातार कमजोर करने की कोशिश कर रही है. संविधान की प्रस्तावना से पंथनिरपेक्षता और समाजवादी मूल्यों को हटाने की साजिश रची जा रही है. भाजपा और संघ परिवार द्वारा हो रहे इन हमलों का मुकाबला करने के लिए एक मजबूत जन आंदोलन की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतंत्र बचाने की जिम्मेवारी युवाओं के कंधे पर है.

राजधानी पटना में जीपीओ गोलंबर से तिरंगा मार्च निकाला गया. इस मार्च में शामिल सैकड़ों लोगों ने तिरंगा झंडा और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की तस्वीरें हाथ में लेकर संविधान को बचाने का संकल्प लिया. मार्च में आम लोगों की उल्लेखनीय भागीदारी रही. बुद्ध स्मृति पार्क पर सभा आयोजित की गई.

इसमें भाकपा(माले) के पोलित ब्यूरो सदस्य का. अमर, वरिष्ठ नेता का. केडी यादव, केंद्रीय कमेटीअ के सदस्य – का. सरोज चौबे, का. मंजू प्रकाश और अभ्युदय, आरएन ठाकुर, रणविजय कुमार, उमेश सिंह, रामबली प्रसाद, जितेंद्र कुमार, शिवसागर शर्मा, मुर्तजा अली, गालिब, शहजादे आलम, अनिल अंशुमन और प्रीति कुमारी आदि समेत पार्टी व जनसंर्गठनों के दर्जनों पार्टी नेता शामिल रहे.

तिरंगा मार्च को संबोधित करते हुए का. केडी यादव और का. मंजू प्रकाश ने कहा कि भाजपा लगातार संविधान के मूल्यों और सामाजिक न्याय पर हमले कर रही है. हमें इस हमले के खिलाफ संविधान बचाने के अभियान को एक व्यापक जनांदोलन में बदलना होगा.

बक्सर में भाकपा(माले) और छात्र संगठन आइसा ने तिरंगा मार्च निकला जो ज्योति चौक से डॉ. भीमराव अंबेडकर चौक तक गया. तिरंगा मार्च में भाकपा(माले) के नगर सचिव ओम प्रकाश, आइसा के नगर सचिव अंकित सिद्धार्थ, कैलाश लाइब्रेरी के निदेशक मनीष सिंह, आइसा नगर अध्यक्ष  अखिलेश ठाकुर आदि मौजूद रहे.

tricolor-march-against-attacks-on-independence2

संविधान की उद्देशिका के शिलापट्टों का लोकार्पण

संविधान बचाओ अभियान के तहत राज्य के कई जिलों में संविधान की उद्देशिका के शिलापट्ट लगाए गए और इसके जरिए संविधान को बचाने का संकल्प लिया गया.

जहानाबाद के घोषी में भाकपा(माले) विधायक का. रामबली सिंह यादव के नेतृत्व में 37 सरकारी विद्यालयों में संविधान की उद्देशिका के शिलापट्ट लगाए गए.

भाकपा(माले) जिला सचिव निरंजन कुमार ने गया के टिकारी में बेल्हड़ीया मोड़ स्थित शहीदे आजम भगत सिंह की मूर्ति के समीप स्थानीय लोगों के सहयोग से संविधान की उद्देशिका के शिलापट्ट को स्थापित किया.

इस मौके पर स्थानीय पार्टी कार्यकत्ताओं के अलावे अन्य प्रगतिशील नागरिकों – राजद जिला उपाध्यक्ष सह जिला परिषद सदस्य सुरेश प्रसाद यादव, राजद प्रखंड अध्यक्ष बंटी यादव, पूर्व वार्ड सदस्य सह बसपा नेता घनश्याम दास, कमल कुमार, ऐपवा जिला सचिव रीता बर्णावाल, एआईपीएफ जिला संयोजक सिद्धनाथ सिंह आदि उपस्थित थे.

अरवल प्रखंड परिसर में विधायक का. महानंद सिंह के हाथों एक विशाल शिलापट्ट का लोकार्पण करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों की याद में एक पार्क बनाने की घोषणा की गई.

पालीगंज के बालीपाकड़ स्थित शबरी भवन के बाहर संविधान की उद्देशिका का शिलापट्ट स्थापित कर उसका सामूहिक पाठ किया गया. कार्यक्रम का नेतृत्व स्थानीय विधायक का. संदीप सौरभ ने किया.

फुलवारी विधायक का. गोपाल रविदास ने अधपा गांव में शिलापट्ट का लोकार्पण किया. वहीं, अगिआंव विधायक का. शिवप्रकाश रंजन ने खेड़ी ग्राम में एक और शिलापट्ट स्थापित किया. अन्य विधायकों ने भी अपने-अपने इलाके में उद्देशिका के ऐसे ही शिलापट्ट स्थापित किए हैं.

tricolor-march-against-attacks-on-independence1

झंडोत्तोलन कार्यक्रम और अन्य गतिविधियां

लगभग सभी कार्यालयों और विधायक आवासों पर भी कार्यक्रम हुए. भाकपा(माले) राज्य कार्यालय में का. कुणाल ने झंडोत्तोलन किया. इस अवसर पर लोकयुद्ध के संपादक संतोष सहर, प्रकाश कुमार और अन्य नेता उपस्थित रहे.

भाकपा(माले) विधायक दल कार्यालय में झंडोत्तोलन के दौरान का. केडी यादव, सरोज चौबे, कुमार परवेज, अनिल कुमार, संजय यादव, दिनेश कुमार निराला, निशांत सहित कई नेता उपस्थित रहे.

पटना सिटी में फसियारी मथनी स्थित शहीद स्थल पर एक विशाल कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें सैकड़ों कार्यकर्ता और आम लोग शामिल हुए.

कंकड़बाग क्षेत्र में ऐक्टू नेता रणविजय कुमार के नेतृत्व में झंडोत्तोलन हुआ, जहां संविधान की उद्देशिका का पाठ किया गया. पार्टी के विभिन्न जिला व प्रखंड कार्यालयों पर भी झंडोत्तेलन कार्यक्रम हुए. भाकपा(माले) का यह अभियान आने वाले दिनों में भी राज्य के अन्य हिस्सों में इसी प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से जारी रहेगा.

2015 और 2020 में लगातार भारी बहुमत हासिल करने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) को 2025 के विधानसभा चुनावों में करारा झटका लगा है. वोट शेयर में करीब दस प्रतिशत की गिरावट (53% से 43%) के कारण ‘आप’ की सीटें घटकर सिर्फ 22 तक सिमट गई है. वहीं, भाजपा का वोट शेयर सात प्रतिशत बढ़कर 38% से 45% हो गया, जिससे उसकी सीटें छह गुना बढ़कर 8 से 48 हो गईं. साथ ही, यह 27 साल बाद दिल्ली में भाजपा की सत्ता में वापसी और 2024 लोकसभा चुनाव में बहुमत खोने के बाद एनडीए की तीसरी विधानसभा चुनाव जीत है.

दिल्ली में इस बड़े बदलाव के पीछे कई कारण हैं. 2020 के चुनावों से ही साफ हो गया था कि भाजपा दिल्ली की सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थी. उस समय उसने नागरिकता आंदोलन को कुचलने के लिए सांप्रदायिक हिंसा भड़काने वाला जहरीला प्रचार किया. जब इस रणनीति का कोई तत्काल राजनीतिक फायदा नहीं हुआ, तो मोदी सरकार ने विरोध की आवाज को दबाने के लिए दमन की नई मुहिम छेड़ दी. छात्र कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्षदों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के बाद, ‘आप’ नेतृत्व को राजनीतिक रूप से निशाना बनाया गया. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित कई नेताओं की लगातार गिरफ्तारियां इसी अभियान का हिस्सा थीं.

इस बदले की राजनीति से आगे बढ़ते हुए, भाजपा ने केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के पद का इस्तेमाल करके ‘आप’ सरकार को चारों ओर से घेरने की सुनियोजित रणनीति अपनाई. विडंबना यह है कि भाजपा खुद एक समय दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करती थी, लेकिन ‘आप’ सरकार को कमजोर करने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी नजरअंदाज कर दिया और दिल्ली सरकार की शक्तियों में भारी कटौती कर दी. 2023 में पारित विवादास्पद दिल्ली सेवा कानून (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार संशोधन अधिनियम) ने दिल्ली सरकार को लगभग अपंग कर दिया, जिससे वह केवल एक नाम मात्र की नगर पालिका बनकर रह गई.

इसके अलावा, दिल्ली सरकार की शक्तियों को कमजोर करने की इस साजिश के साथ-साथ भाजपा ने दिल्ली की मतदाता सूची में सुनियोजित छेड़छाड़ की – चुनिंदा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाए गए, नकली नाम जोड़े गए और बड़े पैमाने पर मतदाताओं को एक सीट से दूसरी सीट पर शिफ्ट किया गया. यह सब चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए किया गया.

भाजपा ने झारखंड में भी ऐसी ही रणनीति आजमाई थी – मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया गया, अंतरिम मुख्यमंत्री भाजपा में शामिल हो गए, और चुनावी रैलियों के नाम पर आदिवासियों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने के लिए एक जहरीला नफरत अभियान छेड़ दिया गया. लेकिन यह रणनीति पूरी तरह धराशायी हो गई और भाजपा लगातार दूसरे विधानसभा चुनाव में हार गई. सवाल यह है कि भाजपा की यही रणनीति दिल्ली में कामयाब क्यों हुई, जबकि झारखंड में नाकाम रही? इसका जवाब कुछ हद तक दोनों राज्यों में विपक्ष की चुनावी लड़ाई के तरीके में छिपा है.

झारखंड में भाजपा-विरोधी गठबंधन एकजुट था और संविधान की रक्षा, राज्य के संघीय अधिकारों और आकांक्षाओं के पक्ष में एक जोरदार प्रचार अभियान चलाया गया. इसके विपरीत, दिल्ली में, ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर कोई एकता नहीं दिखी और भाजपा के फासीवादी हमले को रोकने का मजबूत राजनीतिक एजेंडा चुनावी बहस में सचेतन रूप से गायब दिखा.

‘आम आदमी पार्टी’ (आप) और अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी’ वाली छवि में भी साफ गिरावट दिख रही है. दिल्ली के गरीब और निम्नमध्यम वर्ग के लोगों में 200 यूनिट मुफ्त बिजली और सार्वजनिक शिक्षा में सुधार की नीतियां अभी भी लोकप्रिय हैं, लेकिन दिल्ली के मजदूर वर्ग की मांगों की अनदेखी, नगर निगम की सेवाओं का खराब प्रदर्शन, और लोकतंत्र के दमन व नफरत फैलाने के मुद्दे पर लगभग पूरी चुप्पी ने ‘आप’ के उस सक्रिय जनसमर्थन को कमजोर कर दिया है, जिसने पिछले दो चुनावों में उसे इतना बड़ा बहुमत दिलाया था.

शराब घोटाले के आरोपों और मुख्यमंत्री आवास के 33.6 करोड़ रुपये के नवीनीकरण ने ‘आप’ नेतृत्व की सादगी और ईमानदारी की छवि को गंभीर ठेस पहुंचाई. ऐसे में, अपनी फीकी पड़ती सार्वजनिक छवि के सहारे केजरीवाल के लिए चुनावी जीत हासिल करना संभव नहीं था.

भाजपा का दिल्ली पर दोबारा पूरा कब्जा आम लोगों और राष्ट्रीय राजधानी में सक्रिय प्रगतिशील लोकतांत्रिक ताकतों और पहलकदमियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करेगा. उम्मीद है कि यह बदला हुआ राजनीतिक माहौल संसद मे सीमित एकता से आगे बढ़कर, दिल्ली के व्यापक भाजपा-विरोधी राजनीतिक गठबंधन में सहयोग की भावना को बढ़ाएगा.

पूरे भारत की निगाहें अब 2025 में चुनाव वाले एकमात्र राज्य बिहार पर टिकी हैं. दिल्ली में भाजपा 27 साल से सत्ता से बाहर थी और उसे ‘आप’ से जनता की नाराजगी का फायदा मिला. लेकिन बिहार में स्थिति अलग है – भाजपा पिछले बीस वर्षों में अधिकतर समय जेडीयू के साथ सत्ता में रही है, और अब इस सरकार की हर मोर्चे पर नाकामी और वादाखिलाफी के खिलाफ जन आक्रोश लगातार बढ़ रहा है.

अगर झारखंड में एकजुट विपक्ष भाजपा को रोकने में सफल रहा है, तो बिहार में भी ऐसा क्यों नहीं हो सकता? यदि चुनावी लड़ाई को जमीनी संघर्षों से और मज़बूती से जोड़ा जाए और ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर अधिक व्यावहारिक और व्यापक चुनावी समझ बने, तो बिहार भाजपा की महाराष्ट्र-हरियाणा-दिल्ली में जारी जीत के सिलसिले को तोड़ सकता है और संघ ब्रिगेड के फासीवादी हमले को निर्णायक झटका दे सकता है.

ऐसे समय में जब मोदी सरकार अमेरिका के सामने झुककर भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का अपमान कर रही है और संविधान के धर्मनिरपेक्ष व लोकतांत्रिक स्वरूप को कमजोर कर रही है, बिहार को अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभानी होगी. बिहार, जो हमेशा से औपनिवेशिक सत्ता और सामंती शोषण के खिलाफ संघर्षों का मज़बूत केंद्र रहा है, उसे एक बार फिर सच्चे लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तन की लंबी लड़ाई का अगुवा बनकर खड़ा होना ही होगा.

- पुरुषोत्तम शर्मा

वर्ष 2025-26 के केन्द्रीय बजट में एक बार फिर पहले से ही गंभीर आर्थिक संकटों का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को कोई गति देने की चेष्टा तक नहीं दिखती है. यह बजट भी मोदी सरकार के पूर्व बजटों की भांति जनता को भ्रमित कर दिल्ली व बिहार के तात्कालिक चुनावों को संबोधित करने वाला बजट ही साबित हुआ है. बजट पूरी तरह कारपोरेट कम्पनियों की निर्लज्ज लूट को बढाने और देश के किसानों और मजदूरों के जीवन को और भी कठिन बनाने वाला है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश 50 लाख करोड़ रूपए के वर्तमान बजट के लिए मोदी सरकार फिर से 14.2 लाख करोड़ रुपये बाजार से ऋण लेगी. एक अनुमान के अनुसार मोदी शासन के पिछले 11 वर्षों में देश पर कुल ऋण 200 लाख करोड़ रुपए के करीब पहुंच रहा है. यह स्थिति भयावह आर्थिक संकट की ओर इशारा कर रही है, क्योंकि यह ऋण हमारी वर्तमान जीडीपी के 70 प्रतिशत के करीब पहुंच रहा है. छः माह पूर्व संसद में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि 2024 के अंत तक देश पर 171.78 लाख करोड़ रुपए का ऋण हो जाएगा. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने से पूर्व 31 मार्च 2014 तक भारत सरकार ने मात्र 55.87 लाख करोड़ रुपया ऋण लिया था.

नए बजट ने एक बार फिर मोदी सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे विकास के सारे दावों को गलत साबित किया है. प्राप्त आंकड़े बता रहे हैं कि भारत में सरकारी राजस्व का 22% ही आयकर से आता है. जबकि जिस कारपोरेट क्षेत्र को मोदी सरकार देश की बेशकीमती परिसंपत्तियां और बैंकों में जनता का जमा धन लुटा रही है, वे कुल राजस्व संग्रह में केवल 17 प्रतिशत का ही योगदान कर रहे हैं. आज भी कठिन जीवन जी रहे देश के आम गरीबों से वसूली जाने वाली जीएसटी का हिस्सा इसमें सर्वाधिक 50 प्रतिशत से अधिक है. आर्थिक मामलों के जानकारों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा लिए गए ऋण का ब्याज भुगतान पिछले वर्ष के कुल व्यय के 24.12% से बढ़कर अब 25.19% हो गया है. इससे सरकारी खर्च और मुद्रास्फीति दोनों पर दबाव बढ़ रहा है. केंद्र सरकार चाहती तो बाजार से कर्ज उठाने की जगह देश में अति मुनाफा लूट रही कारपोरेट कम्पनियों के मुनाफे पर कारपोरेट टैक्स में बढोतरी कर ज्यादा संशाधन जुटा सकती थी. साथ ही, देश के सभी अरबपतियों व बड़े अमीरों पर संपत्ति कर और उत्तराधिकार कर को चार प्रतिशत तक बढ़ाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगारोन्मुखी योजनाओं के लिए अतिरिक्त संशाधन जुटा सकती थी. मगर केंद्र की मोदी सरकार ने देश की पूंजी और संशाधनों पर एकाधिकार करती जा रही इस छोटी सी जमात के लिए ही अपना आशीर्वाद जारी रखा है. मोदी राज में कौड़ियों के भाव देश की बेशकीमती परिसंपत्तियों की नीलामी और बाजार के बढ़ते ऋण ने भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बादी की दिशा में धकेल दिया है.

सरकार और मीडिया संस्थानों ने इस बजट में सबसे ज्यादा चर्चा 12 लाख तक आमदनी वाले लोगों को आयकर में पूरी छूट देने के निर्णय पर सीमित कर दी. आखिर इस देश में एक लाख से ऊपर की आमदनी वाली आबादी है ही कितनी! वर्ष 2023-24 के आयकर रिटर्न भरने वालों के आंकड़ों पर गौर करें तो 145 करोड़ की आबादी में से मात्र 7.54 करोड़ लोगों ने अपना आयकर रिटर्न भरा था. इनमें से 5.54 करोड़ लोगों की आमदनी सलाना 7 लाख रूपये से नीचे थी और उन्हें कोई आयकर नहीं भरना पड़ा. खुद को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का ढोल पीटने वाली मोदी सरकार देश में आय असमानता की बढ़ती इस खाई पर चुप्पी साधे रहती है. उच्च आय वर्ग व आजीविका के साधनों के लिए संघर्षरत हमारी आबादी के बीच इतना अंतर है कि भारत की कुल आबादी का 2.2 प्रतिशत हिस्सा ही आयकर अदा करने वालों की श्रेणी में आता है. जबकि फ्रांस की 78.3, यूएसए की 50.1, जर्मनी की 61.3 और यूके की 59.7 प्रतिशत आबादी की आमदनी इतनी है कि वह आयकर के दायरे में आती है. बिहार के लिए इस बजट में हुई घोषणाओं से बिहार के गरीबों और किसानों-मजदूरों को क्या मिलने जा रहा है? बिहार में पूर्व में हुए आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार वहां की दो तिहाई आबादी सलाना 10 हजार रूपये से कम आमदनी पर अपना जीवन बसर कर रही है. बिहार के लिए बजट में हुई घोषणाओं में प्रदेश की इस बड़ी आबादी के लिए तो कुछ भी नहीं है. हां, कारपोरेट कम्पनियों को ठेके और उनके लिए बुनियादी ढांचा खड़ा करने की घोषणाएं जरूर हैं. बिहार के लिए बजट में शामिल कृषि उत्पादक संघ और मखाना बोर्ड बिहार के किसानों को कारपोरेट कम्पनियों के साथ अनुबंध खेती में बांधने के षड़यंत्र के अलावा कुछ भी नहीं हैं.

पिछले पांच वर्षों में जब देश जीडीपी ग्रोथ 6 का आंकड़ा नहीं छू पा रहा था, तब हमारे देश में 10 करोड़ से ज्यादा वार्षिक कमाने वाले कुल 31800 लोगों की आमदनी 121 प्रतिशत बढी है. सालाना 50 लाख से ज्यादा कमाने वाले लोगों की संख्या भी इस बीच 49 प्रतिशत बढी. स्टैटिस्टा-कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 तक देश के एक प्रतिशत वयस्क लोगों की आय कुल राष्ट्रीय आय का 22.6 प्रतिशत थी. जबकि सबसे निचले पायदान पर खड़ी हमारी 50 प्रतिशत आबादी की हिस्सेदारी राष्ट्रीय आय में मात्र 15 प्रतिशत थी. ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ के अनुसार एक तरफ भारत में गरीब लोग बढ़ रहे हैं और दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग और समृद्ध हो रहा है. देश के 50 प्रतिशत लोग वार्षिक 53,610 रुपए यानी 4500 रुपए प्रतिमाह ही कमाते हैं और इनमें से आधे लोगों की आय में इस बीच 13 प्रतिशत की गिरावट आई है. जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत अमीरों की आय देश की कुल आय का 57 प्रतिशत है. रिपोर्ट के अनुसार भारत की निचली 50 प्रतिशत आबादी के पास सम्पत्ति के नाम पर 66,280 रूपये की औसत संपत्ति है. जो कुल सम्पत्ति का मात्र 6 प्रतिशत है. जबकि शीर्ष एक प्रतिशत के पास कुल सम्पत्ति का 33 प्रतिशत और शीर्ष 10 प्रतिशत के पास कुल सम्पत्ति का 65 प्रतिशत है.

इस बीच हमारे यहां की शीर्ष आईटी कम्पनियों के सीईओ के वेतन में 160 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी. वहीं इसी सेक्टर में नए कर्मचारियों को मात्र 4 प्रतिशत ही वेतन वृद्धि मिली. ‘ईटी नाऊ स्वदेश’ में छपे इन आंकड़ों के साथ इंडियन एक्सप्रेस में छपी फिक्की द्वारा तैयार आंकड़ों की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2019 से 23 के बीच इंजीनियरिंग, मैनुफेक्चरिंग, प्रक्रिया व बुनियादी ढांचा (ईएमपीआइ) क्षेत्र में मजदूरी वृद्धि दर मात्र 0.8 प्रतिशत रही. अगर इसे मुद्रास्फीति से जोड़ा जाए तो यह बढ़ोतरी नकारात्मक रही. उदाहरण के लिए वर्ष 2019 से 24 के बीच ग्रामीण मजदूरी दर में मात्र 5.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी. मगर मुद्रास्फीति के कारण वास्तविक मजदूरी में कोई बढ़ोतरी होने के बजाय -0.4 प्रतिशत की गिरावट ही दर्ज की गयी. इधर कृषि क्षेत्र में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढी है. यह वर्ष 2018-19 में 26.4 प्रतिशत थी जिसमें वृद्धि के बाद वर्ष 2023-24 में यह भागीदारी 47.6 तक पहुंच गयी है. ग्रामीण क्षेत्रों में गैर कृषि कार्यों में रोजगार का अभाव और महिला श्रम बल को कम मजदूरी भुगतान इस बढ़ोतरी की एक वजह है. दूसरी वजह भूमिहीनों और खेत मजदूरों के बीच से बढ़ते बटाईदार किसानों की संख्या है, जो पूरे परिवार के श्रम बल पर किया जाता है. पर इन सभी श्रेणियों के लिए वर्तमान बजट में कुछ भी नहीं है.

हमारी आधी से ज्यादा आबादी आज भी गांवों में है. हमारे श्रम बल का बड़ा हिस्सा किसान और ग्रामीण मजदूर आज भी गांवों की अर्थव्यवस्था से ही अपनी आजीविका चलाते हैं. वे घाटे की खेती और मजदूरी न मिलने के कारण लगातार कर्जजाल में फंसते जा रहे हैं. इसके बावजूद बजट इस क्षेत्र के लिए पूरी तरह न सिर्फ चुप्पी साधे है बल्कि ग्रामीण बजट में कटौती की राह पर ही है. 2024-25 के संशोधित अनुमान के अनुसार कृषि और संबद्ध क्षेत्र में किया गया व्यय 3,76,720.41 करोड़ रूपये था. जबकि  2025-26 के बजट में इसके लिए अनुमानित राशि 3,71,687.35 करोड़ रूपए रखी गयी है. यानी इस वर्ष कृषि व सम्बद्ध क्षेत्र के लिए इस बजट में पिछले वर्ष के बजट से 5042.06 करोड़ रुपए की कटौती की गयी है. अगर इसमें बढ़ी लागत व मुद्रास्फीति भी जोड़ दी जाए तो यह पिछले बजट से लगभग 40 हजार करोड़ रूपये की कटौती है. जहां तक मनरेगा का सवाल है, 2025-26 में इसके लिए आवंटन 85428.39 करोड़ रूपये है, जबकि पिछले साल यह 85279.45 करोड़ था. इसमें मात्र 148.94 करोड़ रूपये की वृद्धि हुई है. रोजगार सृजन और गांवों से शहरों की ओर पलायन को रोकने के बारे में बजट में कुछ नहीं कहा गया है. वर्तमान में मनरेगा के तहत दिए जाने वाले औसत कार्य दिवस मात्र 45 दिन हैं, जबकि वादा 100 दिन का था. मनरेगा मजदूरों की मांग है कि 600 रूपए प्रतिदिन की मजदूरी के साथ वर्ष में 200 कार्य दिवस सुनिश्चित किए जाएं. ऐसे में मनरेगा के लिए राशि को बढ़ाकर 2 लाख करोड़ किया जाना चाहिए था. मगर केंद्र का बजट सबसे निचले पायदान पर खड़े इस श्रम बल की पूरी तरह अनदेखी कर रहा है.

भारत में रोजगार को लेकर हो रहे हालिया सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व बढ़ रहा है. नाबार्ड का एक हालिया सर्वेक्षण बताता है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्र में कृषक परिवारों में तेज वृद्धि हुई है. भारत के कृषक परिवारों की संख्या 2016-17 में 48 प्रतिशत से बढ़कर 2021-22 में 56.7 प्रतिशत हो गई थी. कुल रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी 2018 में 42 प्रतिशत थी, जो 2024 में बढाकर 46 प्रतिशत हो गई है. कृषि उत्पादों से ही जुड़ा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग संगठित विनिर्माण में सबसे बड़ा नियोक्ता है. संगठित क्षेत्र के रोजगार में इसकी भागीदारी 12.02% है. अगर इसे भी जोड़ दिया जाए तो देश में उपलब्ध कुल रोजगार में 58 प्रतिशत रोजगार अकेले कृषि क्षेत्र ही उपलब्ध करा रहा है. प्रसंस्कृत खाद्य व कृषि उपज देश के कुल निर्यात में 11.7% का योगदान देता है. फिर भी आज एक किसान परिवार (औसतन 5 सदस्यों का) की औसत आय 150 रुपए प्रतिदिन से कम है. 2024 की न्यूनतम मजदूरी भी 178 रुपए यानी 5,340 रूपये प्रति माह प्रति मजदूर है. इसके बावजूद बजट में कृषि क्षेत्र की पूर्ण उपेक्षा और देश की आबादी के मात्र 2 प्रतिशत हिस्से पर सब कुछ लुटाने की मोदी सरकार की नीतियां इस बजट में साफ देखी जा सकती हैं. पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों की वास्तविक मजदूरी वृद्धि या तो कम हुई है या नकारात्मक रही है. यह स्थितियां बताती हैं कि कोविड काल के पहले से ही मंदी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर श्रम बल का अतिरिक्त बोझ लाद दिया है. ऐसे में कृषि और ग्रामीण रोजगार को बजट में विशेष महत्व देकर ग्रामीण क्षेत्र में किसानों की आमदनी और मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में वृद्धि के लिए विशेष कदम उठाने की जरूरत थी. आय और वास्तविक मजदूरी में यह वृद्धि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ ही उद्योग और व्यापार के क्षेत्र को भी गति देने में सहायक साबित हो सकती थी.

भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की 18.2 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि उद्योग की 27.6 प्रतिशत हिस्सेदारी है. देश में 82 प्रतिशत छोटे व सीमान्त किसान हैं. 70 प्रतिशत ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर हैं. सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि कोविड की मार के बावजूद पिछले पांच वर्षों में भारत के कृषि क्षेत्र ने 4.18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है. नीतियों व बजट में कृषि क्षेत्र को लगातार हतोत्साहित करने के कारण खाद्य फसलों के क्षेत्र में यह वृद्धि दर मात्रा 2.34 प्रतिशत ही रही है. कृषि आय में 5.23 प्रतिशत वृद्धि के सरकारी आंकड़े में मत्स्य से 9.08 प्रतिशत, पशुधन से 5.76 प्रतिशत और बागवानी का एक दहाई से ऊपर का प्रतिशत बड़ी भूमिका निभा रहा है. देश के बहुसंख्यक किसानों जो खाद्यान जरूरतों के लिए कृषि उत्पादन में लगे हैं, की वास्तविक आय बढ़ती महंगाई और लागत सामग्री की बढ़ती कीमतों के कारण लगातार घट रही है. किसानों की घटती आय और ग्रामीण मजदूरों की वास्तविक मजदूरी में गिरावट ने देश के किसानों और ग्रामीण मजदूरों को कर्ज के मकड़जाल में बुरी तरह फांस दिया है. इसका नतीजा है कि कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याओं के साथ ही अब माइक्रो फाइनेंस कम्पनियों के कर्ज जाल में फंसे मजदूरों की आत्महत्याओं का भूगोल भी देश में बढ़ता जा रहा है. बड़ी कारपोरेट कम्पनियों को 16 लाख करोड़ से ज्यादा राशि लुटाने वाली मोदी सरकार का बजट एमएसपी गारंटी कानून और किसानों, ग्रामीण मजदूरों की सम्पूर्ण कर्ज मुक्ति की मांग पर भी चुप्पी साधे है. बजट में खाद्य सब्सिडी राशि को 2.05 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 2.03 लाख करोड़ रुपये, उर्वरक के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपये से 1.67 लाख करोड़ रुपये, ईंधन के लिए 11.9 हजार करोड़ रुपये से 12.1 हजार करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास के लिए 2.65 लाख करोड़ रुपये से 2.66 लाख करोड़ रुपये किया गया है. जिसे देखने से साफ हो जाता है कि बजट में इस क्षेत्र को क्या महत्व दिया गया है?

डबल इंजन के बुलडोजर राज के नमूने दिखाने के बाद मोदी सरकार ने अब अपने बजट को भी इंजनों में बांट कर पेश किया है. इसमें कृषि को इंजन 1 के तहत रखकर महत्व देने की कोशिश की गयी है. कृषि के अंतर्गत प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना में 1.76 करोड़ आबादी की मदद करने वाले 100 कृषि जिलों का विकास कार्यक्रम दिया गया है, जिसमें किसानों को उत्पादक संघों में संगठित कर कम्पनियों के साथ अनुबंध खेती में बांधने का प्रावधान किया गया है. एमएसपी पर खरीद की गारंटी के बिना किसानों को दालों के उत्पादन में लगाकर देश को दाल उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने का झूठा सपना दिखाने की कोशिश पेश बजट में है. जबकि सच्चाई यह है कि देश का किसान आज भी दालों और सोयाबीन की फसलों को सरकार द्वारा घोषित एमएसपी पर खरीद की मांग कर रहा है, और उसे हमेशा अपनी फसल को आधे या दो तिहाई मूल्य पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. मोदी सरकार ने किसानों की आय बढाने और कर्ज से उनकी मुक्ति के लिए कोई भी प्रावधान बजट में नहीं किया है. उल्टे केसीसी व किसान उत्पादक संघों के गठन के माध्यम से किसानों को और भी कर्ज जाल में फांस कर उनकी जमीनों को छीनने का रास्ता ही तैयार किया है. मोदी सरकार ने फसल बीमा के लिए पिछली बार के बजट में 14, 600 करोड़ रुपए दिए थे. उसे घटाकर इस बार 12,242 करोड़ रुपया कर दिया गया है. सरकार ने बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा भी 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दी है, जिसका मतलब है कि बीमा क्षेत्र का पूरी तरह निजीकरण कर उसे विदेशी बीमा कम्पनियों के लिए भी पूरी तरह खोल दिया गया है. उधर अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड ट्रंप की धमकी के मद्देनजर मोदी सरकार ने सीमा शुल्क से 7 टेरिफ दरें घटा दी हैं.

01 February, 2025