एक बार फिर भ्रष्टाचार भारतीय जनता का सबसे बड़ा नासूर बनकर उभरा है. कोई हफ्ता ऐसा नहीं बीता जब देश के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई घोटाला उजागर न हुआ हो. वैसे तो किसी भी सरकार का कोई भी विभाग घोटालों से अछूता नहीं है, लेकिन अब इनकी लपेट में सेना के सर्वोच्च अधिकारी उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश और प्रमुख वैज्ञानिक शोध संस्थानों के उच्चाधिकारी भी आ गये हैं. इन घोटालों में हुई धन की लूट का ठीक-ठीक अनुमान लगाना तो मुश्किल है, लेकिन इन सभी घोटालों में ईमानदारी और न्याय की बुनियादी अवधारणा को ताक पर रखकर निजी फायदे के लिए जनता के खजाने को लूटा गया है. इतने बड़े पैमाने पर हर जगह लगातार हो रहे घोटालों को देखकर यह आसानी से कहा जा सकता है कि आज भ्रष्टाचार कोई अपवाद नहीं रह गया है, बल्कि कारपोरेट युग में शासन की पहचान बन गया है.
विडंबना यह है कि भारत में जैसे-जैसे घोटाले बढ़ते गए, विभिन्न एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जांचों के मामले भी बढ़ते गए. फिर भी इस व्यवस्था के द्वारा एक भी दोषी को दंडित होते देखना भारत को नसीब नहीं हुआ. ऐसे मामले जिनमें जांच के नतीजे कुछ नहीं निकले और दोषी छूट गये उनकी सूची अनंत है. भ्रष्टाचारियों, खासकर ऊंचे पदों पर बैठे भ्रष्ट अधिकारियों, को हासिल इस छूट की एक मुख्य वजह यह है कि देश में मौजूदा भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र नख-दंत विहीन है.
इसीलिए भ्रष्टाचार के विरुद् किसी भी सार्थक और सुसंगत अभियान को दो तरफा लड़ाई लड़नी होगी. एक तरफ तो उसे उन नीतियों और राजनीतिक माहौल को चुनौती देनी होगी जिसमें भ्रष्टाचार फलता-फूलता है. दूसरी तरफ उसे प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र के लिए भी लड़ना होगा ताकि भ्रष्ट लोगों को दंड मिल सके. पूरे देश को जकड़े हुए भ्रष्टाचार के मकड़जाल से कैसे छुटकारा पाया जाए? यह ऐसा सवाल है जिससे प्रत्येक भारतीय नागरिक बेचैन है, और इसी बेचैनी ने उसे जबर्दस्त भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के लिए उत्पे्रित किया है. आज इस आंदोलन के समक्ष अहम सवाल यह है कि इसके भविष्य की दिशा और लक्ष्य क्या होने चाहिए? जनता का आंदोलन कैसे भ्रष्टाचार की जनक नीतियों के खिलाफ हमला तेज करेगा और जन लोकपाल बिल के मुद्दे पर मिली शुरुआती जीत को किस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुकम्मल जीत में तब्दील करेगा?
यह पुस्तिका ऐसे ही कुछ सवालों और सरोकारों को संबोधित है. हमें आशा है कि भ्रष्टाचार से मुक्त भारत के लिए संघर्ष तेज करने हेतु यह आपको प्रेरित करेगी.
आज सभी इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार देश के सामने एक गंभीर संकट है. लेकिन सवाल है कि आज के भ्रष्टाचार का स्वरूप क्या है और कौन इसके लिए जिम्मेदार है?
कुछ लोगों का कहना है कि घूस लेने वाले राजनेता और नौकरशाह ही भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार हैं. उनका कहना है कि अगर संसाधनों, परिसंपत्तियों और संस्थानों को सरकारी नियंत्राण से ‘मुक्त’ कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा. लेकिन वे भूल जाते हैं कि 1990 के दशक में भी भ्रष्टाचार के लिए लाइसेंस-कोटा राज को जिम्मेदार माना गया था और कहा गया था कि उदारीकरण और निजीकरण के जरिये व्यवस्था पाक-साफ हो जायेगी. तब निजीकरण के बाद भ्रष्टाचार अकल्पनीय रूप से इतना कैसे बढ़ गया, जिसके बारे में पहले हम सोच भी नहीं सकते थे?
राडिया टेपों ने स्पष्ट रूप से यह जाहिर कर दिया है कि भ्रष्टाचार केवल घूसखोरी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ज्यादा व्यापक प्रक्रिया बन गया है, जिसमें निजी कारपोरेशन संसाधनों को लूट रहे हैं और विभिन्न संस्थानों को जर्जर कर रहे हैं.
हाल के दिनों में भ्रष्टाचार के विरुद्व उल्लेखनीय जन आंदोलन दिखायी पड़ा. इस आंदोलन को महत्वपूर्ण जीत मिली जब सरकार को प्रभावी भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने की दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया गया. किसी भी भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष के लिए प्रभावी और पूर्वाग्रहमुक्त भ्रष्टाचार विरोधी प्रक्रिया निश्चित रूप से उसका महत्वपूर्ण औजार है. लेकिन क्या केवल कोई कानून भ्रष्टाचार को खत्म कर पायेगा अगर भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली नीतियां नहीं बदली जाती हैं?
उदारीकृत अर्थव्यवस्था में भूमि, खनिज, स्पेक्ट्रम, (दूरसंचार वायु-तरंगें) जैसे कीमती प्राकृतिक संसाधनों तथा सड़क, हवाई अड्डा इत्यादि राज्य के एकाधिकार वाली सेवाओं के निजीकरण ने निजी घरानों के लिए अभूतपूर्व मुनाफे की संभावना पैदा कर दी है. कौड़ी के दाम भूमि, खनिज, स्पेक्ट्रम और अन्य कीमती संसाधनों को हथिया कर कोई भी कारपोरेट घराना बेशुमार मुनाफा कमा सकता है. इन आकर्षक ‘उपहारों’ के लिए होड़ करते हुए कारपोरेट घराने अपने इस बेशुमार मुनाफे का एक बहुत छोटा हिस्सा मधु कोड़ा या ए. राजा जैसे नेताओं तथा अन्य नीति निर्माताओं को घूस के बतौर देने के लिए तैयार रहते हैं.
देश की जनता का खजाना केवल कुछ बड़े वित्तीय घोटालों में ही नहीं लुट रहा है. हर रोज, तकरीबन नियमित दिनचर्या की तरह अरबों रुपए कारपोरेट करों में छूट के नाम पर बहाए जाते हैं और वह सब काला धन विदेशी बैंकों में जाकर जमा होता है. प्रतिदिन केंद्रीय बजट से कारपोरेट आयकर में 240 करोड़ रुपए की छूट दी जाती है और रोजाना यह राशि विदेशी बैंकों में चली जाती है.
2011 के बजट में, प्राथमिकता वाले करदाताओं को सब्सिडी भुगतान के नाम में कुल 88,263 करोड़ रुपए की विशाल राशि की कारपोरेट टैक्स में छूट दी गई है! ध्यान देने योग्य तथ्य है कि राजस्व में दी जाने वाली छूट की कुल मात्रा में तेजी से वृद्वि हो रही है. 2006-07 में यह लगभग 2.4 लाख करोड़ थी और 2010-11 में 5.7 लाख करोड़ हो गई! राजस्व छूट और राजस्व संग्रह का अनुपात भी तेजी से बढ़ रहा है. 2006-07 के 50 प्रतिशत से बढ़कर पिछले साल यह 80 प्रतिशत हो गया.
सर्वाधिक अमीर कारपोरेट घरानों, जिनके सी.ई.ओ. (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) दुनिया के अरबपतियों में शामिल हैं, को आखिर क्यों सब्सिडी दी जा रही है, जबकि गरीब भारतीयों के लिए निःशुल्क शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन की उपलब्ध्ता सुनिश्चित करने के लिए सरकार धन की कमी का रोना रोती है? आखिर क्यों इन बेहद अमीर लोगों को रोजाना काले धन के जरिए देश का खून चूसने का लाइसेंस दिया गया है? क्या इन नीतियों और सरकार की प्राथमिकताओं को चुनौती दिए बगैर भ्रष्टाचार कभी समाप्त हो सकता है ?
केवल व्यक्तिगत तौर पर घूसखोर राजनेता और नौकरशाह ही नहीं, बल्कि समूची सरकार और राज्य मशीनरी ही इस प्रक्रिया में भ्रष्ट हो जाती है, क्योंकि वह जनहित की बजाय निहित कारपोरेट हितों के प्रभाव में काम करने लगती है. आमतौर पर उदारीकरण वाले भारत में समूची सरकारी मशीनरी ऐसे कानून व नीतियां बनाती है और ऐसे फैसले करती है, जो भूमि, खनिज और अन्य संसाधनों की कारपोरेट लूट को बढ़ावा देने में मदद करें. यहां तक कि पर्यावरण, खनिज आदि से जुड़े हुए राष्ट्रीय कानूनों को नजरअंदाज भी करती है. यह एक बार घटित होने वाला घोटाला नहीं रह गया है. यह कारपोरेट मुनाफे के लिए हमारे संसाधनों के निरंतर दोहन की प्रक्रिया बन गयी है. जहां टेलिकाम घोटाले में देश के खजाने को तकरीबन 1.76 लाख करोड़ रुपयों का नुकसान उठाना पड़ा, वहीं कारपोरेट घराने हर साल भू-संपदा, खनिज निर्यात आदि से कई लाख करोड़ का मुनाफा कमा रहे हैं. कारपोरेट क्षेत्र को खुलेआम दी जा रही टैक्स माफी और अन्य रियायतों के जरिये होने वाली विशाल कमायी का तो कहना ही क्या!
उदारीकरण और निजीकरण से भ्रष्टाचार में कमी आयी या कि उसे बढ़ावा मिला? आइये, इसका जबाव खुद उदारीकरण के भरोसेमन्द पैरोकारों से ही जाना जाय. केपीएमजी नाम की सलाहकार संस्था ने कारपोरेटों के जवाबों पर आधारित अध्ययन घूसखोरी और भ्रष्टाचार का सर्वेक्षणः व्यापार के परिवेश पर इसका प्रभाव; (सर्वे आन ब्राइबरी एण्ड करप्शन: इम्पैक्ट आन बिजनेस एन्वायरन्मेंट) प्रकाशित किया है. इस सर्वे में ‘भ्रष्टाचार के बदलते हुए चेहरे’ की सच्चाई को सामने लाते हुए माना गया है कि "लाइसेंस राज के दिनों में तो भ्रष्टाचार ‘बाबुओं’ की छोटी-छोटी मांगों तक सीमित था, आज उसका दायरा बहुत बड़ा और व्यापक हो गया है. ... अब यह छोटी-मोटी घूस; (बख्शीश) तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि हजारों करोड़ रुपयों के ऐसे घोटालों की शक्ल ले चुका है जिनके पीछे एक राजनीतिक/औद्योगिक गठजोड़ काम कर रहा है और इस गठजोड़ पर यदि रोक न लगायी गयी तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे. मीडिया में आ रही वित्तीय घोटालों की खबरें बताती हैं कि छोटी-मोटी घूसखोरी थोड़ी बहुत परेशानी पैदा करती है, जिसके लिए निचले स्तर के सरकारी अध्किारी मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं लेकिन महाघोटालों के पीछे निजी क्षेत्र है जो अपना काम कराने के लिए ऊंचे पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों को खुद अपनी इच्छा से घूस देने को तत्पर है".
हाल ही में अण्णा हजारे के अनशन के साथ एक सफल आंदोलन की शुरूआत हुई, जिसने सरकार को लोकपाल बिल का मसौदा नये सिरे से तैयार करने के लिए एक संयुक्त कमेटी गठित करने को मजबूर किया जिसमें सिविल सोसायटी कार्यकर्ता और विशेषज्ञ तथा सरकार के प्रतिनिध शामिल हैं.
लेकिन इतना तो साफ है कि टू-जी घोटाले और केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में लीपा-पोती करने में सारी सीमायें लांघ चुकी सरकार इतनी आसानी से एक प्रभावी लोकपाल बिल नहीं आने देगी. लोकपाल बिल के लिए आगे का रास्ता सीध-सपाट नहीं होगा - एक अच्छा कानून बने यह सुनिश्चित करने के लिए जनता की निगरानी और संघर्ष की निरंतरता होना बहुत जरूरी है.
प्रभावी लोकपाल बिल की जरूरत को मानते हुए और इससे सहमत होते हुए कि लोकपाल बिल का सरकारी मसौदा बिल्कुल नख-दंत विहीन है, कुछ लोगों ने ऐसी आशंका जाहिर की कि एक सुपर-पुलिस जैसा तंत्र बनाने से तो लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जायेगा. निश्चित रूप से इस बात की गारंटी करना बहुत जरूरी है कि लोकपाल बिल न केवल प्रभावी हो, बल्कि उसके साथ ही उसमें पारदर्शिता व जवाबदेही भी हो. लोकतंत्र और जवाबदेही को लेकर व्यक्त की गई चिंतायें वाजिब हैं और बिल का मसौदा बनाने के दौरान इन पर ध्यान दिया जाना चाहिए. परन्तु इसके साथ ही यह जरूरी है कि लोकतंत्र की कीमत पर भ्रष्टाचार को किसी तरह की वैधता न मिल जाय. हमें एक सुपर-पुलिस बिल्कुल नहीं चाहिए, लेकिन एक ऐसे प्रभावी व स्वतंत्र पुलिस की तो निश्चित तौर पर जरूरत है जो दण्ड योग्य लोगों के हाथों का खिलौना बनने की जगह जनता के प्रति जवाबदेह हो.
इसके साथ ही लोकपाल कानून के संघर्ष को अगले चरण में ले जा कर कारपोरेट भ्रष्टाचार और लूट को खुली चुनौती देनी होगी ताकि भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाया जा सके.
कॉरपोरेट सेक्टर की राय (इस सर्वे में 48 प्रतिशत विदेशी बहुराष्ट्रीय निगमों और 28 प्रतिशत भारत आधारित बहुराष्ट्रीय निगमों से जुड़े लोग शामिल थे) के आधार पर केपीएमजी के सर्वेक्षण में कुछ उद्योगों और सेक्टरों को खासतौर पर चिन्हित किया गया है जहां भ्रष्टाचार की संभावना अधिक है. इस सूची में भूसंपदा और निर्माण क्षेत्र सबसे उपर हैं. इसके बाद दूरसंचार, सामाजिक विकास क्षेत्र, वित्त्त सेवायें, रक्षा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी/ मनोरंजन/बीपीओ, उर्जा और विद्युत क्षेत्र तथा अन्य क्षेत्र (मीडिया, उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र, दवाइयां, स्वास्थ्य, भारी इंजीनियरिंग और परिवहन समेत) हैं. 68 प्रतिशत उत्तरदाताओं का कहना था कि आम तौर पर निजी क्षेत्र द्वारा भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाता है. इसीलिए सर्वे के निष्कर्ष में निजी क्षेत्र को रिश्वत-विरोधी, भ्रष्टाचार-विरोधी विनियमों की परिधि में लाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.
उदारीकरण की वकालत करने वालों का एक और पसंदीदा झूठ यह है कि टैक्स की ऊंची दरों से भ्रष्टाचार पैदा होता है. मजेदार बात यह है कि केपीएमजी का सर्वेक्षण तो भ्रष्टाचार की वृद्वि में निजी क्षेत्र की सहभागिता को चिन्हित करता है लेकिन सर्वेक्षण की भूमिका में अर्थशास्त्री सुरजीत सिंह भल्ला इस विचार को जोरदार तरीके से व्यक्त करते हैं और मांग करते हैं कि भू-संपदा की लेन-देन पर लगाये गये पूंजी लाभांश कर सहित सभी करों में और कटौती की जाये. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी- भ्रष्टाचार को नियंत्रित और खत्म करने के लिए भल्ला साहब का यही सरल नुस्खा है. परन्तु हम सब जानते हैं कि पिछले तीन दशकों से भारत में विभिन्न सरकारें इसी नीति पर तो चलती रही हैं. हालिया 2011-12 के बजट में सरकार ने कॅारपोरेट टैक्स पर अधिभार 7.5 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है. तब, जबकि पिछले साल कॉरपोरेट टैक्स में दी गयी छूट 88 हजार 263 करोड़ रुपये थी; (2005-06 से लेकर 2010-11 तक कॉरपोरेट टैक्स में कुल छूट 3 लाख 74 हजार 937 करोड़ रुपये रही.)
अगर भारी कराधान से भ्रष्टाचार बढ़ता है तो टैक्स घटाने से भ्रष्टाचार दिन ब दिन कम होना चाहिए था. लेकिन फिर हमारे सामने एक और अध्ययन है, जो ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी (जीएफआई) द्वारा फोर्ड फाउन्डेशन के अनुदान से चलाया गया और इसके नतीजे उल्टी कहानी बयान करते हैं. अर्थशास्त्री देव कर द्वारा प्रकाशित "भारत से बाहर हुये अवैध वित्तीय प्रवाह के कारक और गतिकीः 1948-2000; (द ड्राइवर्स एण्ड द डायनमिक्स ऑफ इल्लिसिट फाइनेंशियल फ्लोज फ्रॉम इंडियाः 1948-2008) शीर्षक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि इन 61 सालों में भारत से अवैध वित्त पलायन 462 अरब बिलियन डॉलर हुआ. इस अवैध वित्त का 68 फीसदी पलायन उदारीकरण के बाद के वर्षों (1991 के बाद) में हुआ है. जीएफआई के निदेशक रेमण्ड डब्ल्यू बेकर के मुताबिक उदारीकरण के बाद पलायन की बढ़ी हुई दर से बजट घाटे और मुद्रा स्फीति का कोई खास लेना-देना नहीं है. जीएफआई अध्ययन में पूंजी के पलायन में हुई खतरनाक बढ़ोत्तरी को (आर्थिक) सुधारों की प्रक्रिया से जोड़ा गया है. यह स्पष्ट है कि 1991-2008 के उदारीकरण के दौर में नियंत्रण में ढील और व्यापार-उदारीकरण ने भारतीय अर्थतंत्र से धन के अवैध पलायन को तेज कर दिया. व्यापार में कीमतें तय करने की मनमानी के अवसर बढ़ गये और दुनिया के पैमाने पर ‘हॉट मनी’ (ब्याज व विनिमय दरों के अंतर से मुनाफा बनाने के लिए एक देश से दूसरे देश में काफी कम समय के लिए निवेश की जाने वाली पूंजी, इससे संबंधित बाजार में अस्थिरता बनने का खतरा रहता है) के प्रभाव वाली एक काली वित्तीय व्यवस्था का विस्तार हुआ, खासकर टापुओं में स्थित छोटे-छोटे देशों में जहां ऐसी पूंजी पर टैक्स नहीं लिया जाता. इन देशों में गोपनीयता के कानूनों द्वारा रक्षित छद्म कारपोरेट घरानों ने भारत से खरबों डॉलर उठाकर जमा किया और पुनः उन्हें लघु या दीर्धावधि निवेशों की शक्ल में भारत में ही लगा दिया. स्वयं-संचालित इस चक्र में बिना लिखा-पढ़ी के लेन-देन को बढ़ावा देने के मकसद से अक्सर ऐसा किया गया."
भारत के काले अथवा भूमिगत अर्थतंत्र का एक बड़ा हिस्सा अवैध पूंजी प्रवाह है. जीएफआई अध्ययन के अनुसार अवैध संपदा का 72 प्रतिशत हिस्सा विदेशों में जमा है और 28 फीसदी ही देश में मौजूद है. अध्ययन में यह भी पता चला कि उदारीकरण के बाद दोनों में ही बड़ी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है - भूमिगत अर्थतंत्र का हिस्सा उदारीकरण के दौर में सकल घरेलू उत्पाद के 42.8 प्रतिशत की औसत रफ्तार से बढ़ा है, जबकि उदारीकरण के दौर से पहले यह रफ्तार 27.4 प्रतिशत थी. दूसरी ओर अवैध प्रवाह की समग्र वार्षिक वृध्दि दर उदारीकरण के पहले के दौर में 9.1 प्रतिशत थी, लेकिन उदारीकरण के बाद के वर्षों में यह 16.4 प्रतिशत हो गयी.
अध्ययन में साफ तौर पर माना गया है कि अवैध पूंजी प्रवाह के उसके अनुमान वास्तविकता से बहुत ही कम है. क्योंकि इसमें मुख्य राशि ; उदाहरण के लिए इसमें तस्करी और व्यापार में मूल्यों की मनमानी को शामिल नहीं किया गया है, आधिकारिक आंकड़ों में दर्शायी गयी कमी की तो बात ही छोड़िए का आकलन तो कम किया ही गया है, ब्याज की राशि का भी कम आकलन किया गया है; अध्ययन में अमेरिकी लेन-देन की ब्याज दर शामिल की गयी है, जो भू संपदा, बहुमूल्य धातुओं, कलाकृतियों पर होने वाले वास्तविक मुनाफे से काफी कम है. फिर भी, यह कम आकलन 2008 के अंत में भारत के कुल विदेशी कर्ज; 230.6 खरब डालर से दो गुना है.
सुधारों के इस दौर में अवैध पूंजी प्रवाह ( पूंजी के कानूनी पलायन अथवा निर्यात से अलग ) के पीछे कौन से कारक काम कर रहे हैं? अध्ययन में इसके दो महत्वपूर्ण कारण बताये गये हैं- 1. विदेश व्यापार में बढ़ोत्तरी जिससे व्यापार में मनमानी कीमतें तय करने के अवसर बढ़ गये हैं (अध्ययन के मुताबिक कुल अवैध पूंजी प्रवाह का 77.6 प्रतिशत व्यापार में मूल्यों की मनमानी से पैदा होता है.) 2. देश के भीतर ही आर्थिक असमानता में बढ़ोत्तरी, जिससे अरबपतियों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है (इनमें से हर एक के पास 1 अरब डॉलर से अधिक की निवेश योग्य संपदा है.) ये लोग ही 'अवैध पूंजी प्रवाह की प्रचालक शक्ति हैं.' भारत में 2006 में 1 लाख अरबपति थे, वहीं महज तीन सालों के भीतर 2009 में यह संख्या 1 लाख 27 हजार हो गयी. हाल में फोब्र्स द्वारा प्रकाशित डॉलर-खरबपतियों की सूची में 55 खरबपतियों के साथ भारत तीसरे स्थान पर है- अमेरिका और चीन के ठीक बाद. यानि दुनिया के 1210 खरबपतियों में भारत में 55 खरबपति ! जबकि 2001 में दुनिया के 538 खरबपतियों में महज 4 भारतीय खरबपति थे.
इस अवैध पूंजी प्रवाह की मंजिल क्या है? यह काला धन या तो विकसित देशों के वाणिज्यिक बैंकों में पहुंच जाता है, या फिर वैश्विक पूंजी के उभरते हुए ‘ऐशगाह’ टापुओं में मौजूद पूंजी केंद्रों में. 1995 में भारत के इस अवैध पूंजी प्रवाह का 60 प्रतिशत हिस्सा विकसित देशों के बैंकों में पहुंचा था. लेकिन अगले दो दशकों में इन बैंकों का हिस्सा घटकर 40 प्रतिशत हो गया, जबकि टापुओं में मौजूद पूंजी केंद्रों का हिस्सा बढ़कर 60 प्रतिशत हो गया है. प्राथमिकताओं में इस परिवर्तन की वजह स्पष्ट है- टापुओं में मौजूद पूंजी केंद्र बैंकों के मुकाबले ज्यादा गोपनीयता और सुरक्षा प्रदान करते हैं. इसीलिए दुनिया भर से अवैध पूंजी आकर्षित होकर वहां पहुंचती है. फिलहाल भारत का 65 देशों के साथ दोहरा कराधान बचत समझौता है और अगर सरकार विदेशों में मौजूद गैरकानूनी भारतीय संपदा के बारे में जानती भी है तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और निवेशक में विश्वास बनाये रखने के नाम पर इन खाताधरकों का नाम उजागर करने से बचती है.
केवल भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों से ही भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता. भ्रष्टाचार को जन्म देने वाली नीतियों को बदले बगैर भ्रष्टाचार विरोध कानूनों पर ही भरोसा करना वैसा ही है, जैसे कि गंदगी का स्रोत बंद किये बगैर घर की साफ-सफाई करते रहना.
मजेदार बात तो यह है कि नव-उदारीकरण के पैरोकार भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी की बात तो मानते हैं, लेकिन उद्दंडता पूर्वक इस तथ्य का इस्तेमाल और अधिक उदारीकरण तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण का माहौल बनाने के लिए करते हैं. उपरोक्त केपीएमजी सर्वेक्षण यह बताने की कोशिश करता है कि भ्रष्टाचार में आयी बढ़ोत्तरी की वजह कुछ क्षेत्रों में हुई असंतुलित वृद्वि तथा नये खिलाड़ियों की बेरोक-टोक आमद है. ये नये खिलाड़ी घूसखोरी का सहारा लेते हैं, जिससे बराबरी पर होड़ न हो सके और इन्हें मनमाना खेलने की छूट मिल सके. इसीलिए एक मजबूत नियामक तंत्र बनाने से ही सब कुछ हल हो जायेगा.
लेकिन राडिया टेप तो एक दूसरी ही कहानी बयान करते हैं. असल में पुराने खिलाड़ी ही अपनी जमीन बचाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं और तथाकथित नये खिलाड़ी अक्सर मुट्ठी भर बड़े घरानों द्वारा पाले-पोसे गये छद्म खिलाड़ी हैं. सवाल यह नहीं है कि नये अथवा पुराने खिलाड़ियों में से कौन ज्यादा जिम्मेदार है, गौरतलब यह है कि बड़े व्यवसायियों के सम्मुख राज्यतंत्र की भूमिका सेवक की रह गयी है. वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है और आर्थिक सुधारों के सह-उत्पाद के बतौर उसे निरंतर कानूनी जामा पहना रहा है. दुर्भाग्य से शासन का यही मतलब रह गया है. वैसे तो अमेरिका में सबसे अच्छा नियामक तंत्र मौजूद है, फिर भी दुनिया ने देखा कि हाल के विस्फोटक वित्तीय संकट में उनकी भूमिका कौड़ी के तीन बनकर रह गयी. भारत में तो किसी भी नियामक तंत्र को न केवल घरेलू बड़े व्यवसायियों का दबाव झेलना पड़ेगा बल्कि उसे वैश्विक पूंजी तथा इसके प्रमुख अभिभावक अमेरिकी साम्राज्यवाद का दबाव भी झेलना पड़ेगा.
वैश्विक आर्थिक संकट के साल 2010 में भी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के सी.ई.ओ. मुकेश अंबानी दुनिया के सबसे धनी आदमियों की सूची में चौथे पायदान पर पहुँच गए. यह करतब उन्होंने कैसे कर दिखाया?
पहली बार 1997 में तेल और गैस सेक्टर में निजी संस्थाओं को आमंत्रित किया गया. रिलायंस को भरे-पूरे कृष्णा-गोदावरी बेसिन के इलाके कौड़ियों के दाम में आबंटित किये गए. रिलायंस ने यहां प्राकृतिक गैस का अकूत दोहन किया. 2007 में गैस की कीमत निर्धारित करने के लिए बनाए गए मंत्रियों के अधिक्रत समूह (EGOM), जिसमें पेट्रोलियम मन्त्री मुरली देवड़ा, वित्त मन्त्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया शामिल थे, ने सिपफारिश की कि RIL को 2.34 डालर की बजाय 4.20 डालर की बढ़ी कीमतों पर गैस बेचने की अनुमति दी जाय.
2009 में यूपीए सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा उत्पादित गैस की कीमतें दुगुनी कर दीं- 1.8 डालर प्रति इकाई से बढ़ाकर 4.2 डालर प्रति इकाई, ताकि ये रिलायंस द्वारा उत्पादित गैस की निर्धारित कीमत की बराबरी में आ सकें. इस तरह सरकार ने कीमतें बढ़ाकर खाद और ईंधन खरीदने वाले किसानों पर और अधिक बोझ लाद दिया. यह सब किया गया एक निजी कारपोरशन को फायदा पहुंचाने के लिए.
याद करिए, राडिया टेप में जदयू सांसद और पूर्व राजस्व सचिव एन.के. सिंह, मुकेश अंबानी की नुमाइंदगी करने वाली राडिया को बताते हैं कि संभवतः मुरली देवड़ा फिर से पेट्रोलियम मन्त्री इसलिए बने, क्योंकि मुकेश अम्बानी ने यह मंत्रालय ‘उन्हें दिलवा दिया’. इसी प्रकरण में एक दूसरी बातचीत में अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद, मुकेश अम्बानी के शब्द दोहराते हुए सुने जा सकते है - ‘कांग्रेस तो अब अपनी दुकान है’. विकीलीक्स के खुलासे से भी साफ होता है कि मुरली देवड़ा के पेट्रोलियम मन्त्री बनने के पीछे अमेरिका का हाथ था.
सिर्फ कांग्रेसी ही मुकेश अम्बानी की धुन पर फिदा नहीं थे, भाजपा नेता भी मुकेश अम्बानी की बोली पर मगन रहे. 2009 में वित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी ने रिलायंस को एक और नजराना दिया. उन्होंने इसी साल संसद में एक बिल पेश किया जिसके मुताबिक प्राकृतिक गैस या कच्चे तेल की पाईपलाइन, कोल्ड-स्टोरेज की श्रृंखला और कृषि भंडारों को स्थापित करने या चलाने में लगी सम्पूर्ण पूंजी पर शत-प्रतिशत कर-मुक्ति ( पिछले खर्चों पर भी लागू होगी) . इस कदम से सिर्फ एक कंपनी- रिलायंस गैस ट्रांसपोर्टेशन इन्फास्ट्रक्चर लिमिटेड (RGTIL) को 20,000 करोड़ रूपयों का फायदा हुआ. राडिया से बातचीत में एन.के. सिंह आशंका जाहिर करते हैं की राज्यसभा में बहस के दौरान अगर विपक्षी सांसद ‘कहना शुरू करेंगे कि प्रणब मुखर्जी ने जो भारी छूट दी है, उसका फायदा सिर्फ एक कंपनी (मुकेश अम्बानी की रिलायंस) को होगा, तो ... (इससे) प्रणव मुखर्जी रक्षात्मक हो जायेंगे और (करों में छूट को) पीछे की अविध की तरफ बढ़ाने का काम ठंढे बस्ते में चला जाएगा.’ आगे एन के सिंह बताते हैं कि राज्यसभा में इस मुद्दे पर बीजेपी के प्रमुख वक्ता अरुण शौरी संभवतः इस बिल का विरोध करने वाले हैं, और ‘हमने भाजपा से बोलने वालों का क्रम बदलवा दिया है, अब अरुण (शौरी) की जगह पहले वक्ता वेंकैया (नायडू) होंगे.’ वे यह भी कहते हैं कि चूंकि मुकेश अम्बानी के वेंकैया से ‘अच्छे रिश्ते’ हैं, वे मुकेश को विमान से दिल्ली पहुंचाने का इंतजाम करेंगे ताकि वे वेंकैया को समझा सकें. हकीकत में भी ठीक-ठीक यही हुआ- भाजपा की ओर से शौरी की जगह नायडू मुख्य वक्ता हुए, बिल का समर्थन किया और तब यह संसद में पास हुआ.
मुकेश अंबानी के लिए तोल-मोल करने वालों में सिर्फ सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी भाजपा ही नहीं, मीडिया के बड़े लोग भी शामिल थे. कृष्णा-गोदावरी बेसिन की गैस के मसले में अनिल और मुकेश अंबानी के बीच की तनातनी के बीच, राडिया टेपों में वरिष्ठ स्तंभकार वीर संघवी, राडिया से पूछते सुनाई देते हैं- ‘आप किस तरह का लेख चाहती हैं?’ संघवी, राडिया को बताते हैं कि उनका स्तम्भ ‘काउंटर प्वाइंट’ ‘सबसे ज्यादा पढ़ा जाता’ है. इसलिए मुकेश अंबानी के पक्ष में जनमत बनाने के लिए यह स्तम्भ एक आदर्श जगह है. वे राडिया से लेख की रूपरेखा के बारे में विस्तृत निर्देश लेते हुए सुने जा सकते हैं. फिर संघवी फोन करते हैं कि उन्होंने लेख लिख दिया है- ‘मैंने इसको ऐसा जामा पहनाया है ताकि लगे कि संसाधनों पर कब्जा किये जाने को लोग चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगें, कैसे हम ताकतवर कुलीनों की एक नयी सूची बना रहे हैं... चूंकि यह मनमोहन सिंह से दलील करते हुए लिखा गया है, इसलिए जानने वाले लोगों को छोड़ और किसी को यह अंबानी भाईयों के आतंरिक विवाद की तरह नहीं दिखेगा.’
हाल ही में रिलायंस ने बहुराष्ट्रीय कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम (पिछले दिनों मेक्सिको की खाड़ी में तेल फैलने से पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचाने के लिए कुख्यात) से सौदा तय किया है. इस तरह देश के तेल और गैस संसाधनों तक ब्रिटिश पेट्रोलियम के हाथ पहुँच चुके हैं. ब्रिटिश पेट्रोलियम के भारत प्रमुख ने उम्मीद जताई है कि यह समझौता ‘अंततोगत्वा प्राकृतिक गैस की कीमतों से राज्य के नियंत्रण को खत्म करने के लिए मंच तैयार करेगा.’
हमने देखा कि कैसे दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से एक मुकेश अंबानी अपनी पसंद का पेट्रोलियम मन्त्री बनवाने में सक्षम हैं. इस तरह वे पक्का करते हैं कि सरकार उनके अपने फायदे को दिन-दूना, रात चैगुना बढ़ाने के लिए बार-बार नीतियाँ बनाए. कृषि संकट और आत्महत्याओं से जूझते भारत के किसान बढ़े हुए लागत मूल्य के रूप में इस सब की कीमत चुका रहे हैं.
हमने देखा कि किस तरह विपक्ष के एक सांसद मुकेश अंबानी की प्रतिनिधि (लाबीइस्ट) के एक एजेंट की तरह काम करते हैं. वे गारंटी करते हैं कि मुकेश की कंपनी को फायदा पहुंचाने वाली सरकार की नीतियों का समर्थन मुख्य विपक्षी पार्टी करे. और यह भी कि किस तरह घुटने टेककर पत्रकार अंबानी की प्रतिनिधि के द्वारा कही गई बातें हू-ब-हू लिख रहे हैं, अंबानी के लालच को इस तरह ‘जामा पहना’ रहे हैं ताकि यह ‘राष्ट्रीय हित’ लगे!
अब जबकि अंबानी की कंपनी, तेल क्षेत्र की विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनी ब्रिटिश पेट्रोलियम के साथ मिल कर भारत के संसाधनों पर मुनाफे की फसल काटना चाहती है, तब गैस की कीमतों पर ‘राज्य के नियंत्रण को समाप्त करने’ का मतलब यह हुआ कि अब किसानों को ईंधन और खाद के लिए और अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी.
यह वाकया कोई संयोग नहीं है. यह याद दिलाता है कि उदारीकृत भारत में भ्रष्टाचार, क्रोनी ;पिठ्ठू पूंजीवाद की रोज-ब-रोज की सच्चाइयों के साथ ही गुंथा हुआ है.
हमारे समय के सबसे बड़े घोटालों में से एक टेलीकॉम घोटाले में प्रक्रियाओं को नकारते हुए राष्ट्रीय संपत्ति टू-जी स्पेक्ट्रम कुछ चुनिन्दा कम्पनियों को औने-पौने दामों में दे दिये गये. इससे जनता के खजाने में 1,76,397 करोड़ रूपयों का घाटा हुआ. सरकार ने घोटाले की जांच को बेअसर बनाते हुए यूपीए-1 सरकार के अपने पहले कार्यकाल के दौरान घोटाले में फंसे ए. राजा को टाटा और रिलायंस जैसी कंपनियों के दबाव में यूपीए-2 सरकार में फिर से टेलीकाम मन्त्री बना दिया. आखिरकार नियंत्रक-महालेखा परीक्षक ( (CAG) की रिपोर्ट ने घोटाले के सारे आरोपों को सही ठहराया. राडिया टेपों ने साफ कर दिया कि कैसे कार्पोरेशनों और उनके एजेंटों ने टेलीकाम मन्त्री के रूप में ए. राजा की नियुक्ति तय करवाई.
टू-जी स्पेक्ट्रम (चुम्बकीय वायुतरंगें- एक कीमती और सीमित राष्ट्रीय संसाधन) की नीलामी नहीं की गई, बल्कि इनका आवंटन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर सिर्फ 1651 करोड़ रूपये प्रति के हिसाब से कर दिया गया. रिलायंस कम्युनिकेशन और टाटा टेली सर्विसेज जैसी कंपनियों को जीएसएम और सीडीएमए के लाइसेंस वर्ष 2001 में निर्धारित कीमतों पर दिए गए. जबकि इस साल के शुरूआत में 3-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी 67,710 करोड़ रूपयों में हुई है.
लेकिन नीलामी की जगह ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की प्रक्रिया चुनने तक ही मामला नहीं रहा. ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की प्रक्रिया में भी तोड़-मरोड़ करके चुनिन्दा कंपनियों के लिहाज से मामला सुलटाया गया! पहले तकनीकी विभाग के केन्द्रीय रजिस्ट्री अनुभाग में पावती के हिसाब से प्रार्थना पत्रों की सूची बनती थी. यह शर्त बदल दी गयी. अब शर्त यह थी कि प्रार्थना पत्रा की तिथि वह मानी जायेगी जब बैंक ‘समझौता-प्रपत्र’ जारी कर गारंटी की शर्त स्वीकार करे. नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) ने पाया कि ‘समझौता-प्रपत्र’ के साथ आवेदन करने का समय घटाकर सिर्फ आध दिन कर दिया गया, फिर आश्चर्यजनक रूप से कुछ आवेदक; जिन्हें निश्चित रूप से इसकी सूचना पहले ही मिल चुकी थी डिमांड ड्राफ्ट और अन्य जरूरी कागजातों के साथ हाजिर हो गए. 2008 में जारी किये गए 108 लाइसेंसों में से 85 तो टेलीकॉम मंत्रालय द्वारा खुद निर्धरित शर्तों को ही पूरा नहीं करते थे!
स्पेक्ट्रम आवंटन में मात्रा 1651 करोड़ रूपयों के बदले में जिन कुछ कंपनियों की झोली भरी गयी, उनमें से कई को मोबाइल फोन के व्यापार का पहले से कोई अनुभव नहीं था और छह महीने बीतते न बीतते उन्होंने ‘निवेश’ की गई पूंजी पर कम से कम 700 प्रतिशत का मुनाफा बना कर अपने शेयर विदेशी कंपनियों को बाजार मूल्य पर बेच दिये! रिलायंस की ही एक फ्रन्ट कम्पनी स्वान ने दुबई की कंपनी ईटीसलात को और जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़ी कंपनी यूनीटेक जिसकी टेलीकॉम में कोई दिलचस्पी नहीं थी, ने नार्वे की टेलिनॉर नाम की कंपनी को अपने शेयर बेच दिए. इस घोटाले से लाभान्वित होने वाली रिलायंस से जुड़ी स्वान और टेलीकॉम क्षेत्र में पहले से कोई दिलचस्पी न रखने वाली यूनीटेक जैसी कंपनियों ने लाइसेंस आवंटन के लिए टेलीकॉम मंत्रालय के निर्देशों को पूरा करने की बजाय सिर्फ 1651 करोड़ में गलत तरीकों से स्पेक्ट्रम का आवंटन करा लिया और फिर मात्र छह महीने के भीतर इन लाईसेंसों के शेयर, बाजार भाव पर कम से कम 700 प्रतिशत लाभ ले कर बेच दिए. यूनीटेक और स्वान के ही नक्शे कदम पर टाटा टेली सर्विसेज ने अपने 25 फीसदी शेयर ( NTT )डोकोमो को 13,000 करोड़ में बाजार भाव पर बेचे.
कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने यह कहते हुए कि राजकोषीय घाटे की बात ‘ख्याली’ और काल्पनिक है, घोटाले को नकारने की कोशिश की, साथ ही साथ अपने गठबंधन की हिस्सेदार ए. राजा की पार्टी डीएमके पर पूरा आरोप मढ़ते हुए खुद को पाक-सापफ बताने लगी. प्रधानमन्त्री ने खुद ही यह कहते हुए कि वे ‘उतने दोषी नहीं जितने बताये जा रहे हैं’, घोटाले का ठीकरा ‘गठबंधन की मजबूरियों’ पर फोड़ दिया. अपना दामन बचाने और मामले को सिरे से नकारने की कितनी भी कोशिशें करें, कांग्रेस सरकार और प्रधानमन्त्री कार्यालय जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. सबूत बताते हैं कि संप्रग और कांग्रेस के बड़े नेता सिर्फ चुप रहने के दोषी नहीं बल्कि करोड़ों के इस घोटाले में उनकी सचेत रूप से मिलीभगत थी.
पूर्व केन्द्रीय टेलीकाम मन्त्री मारन द्वारा प्रधनमन्त्री को लिखी गयी एक चिट्ठी से खुलासा होता है कि प्रधनमन्त्री ने टेलीकाम मंत्रालय को ‘आश्वस्त’ किया था कि वह जैसे चाहे, उस तरह से टू-जी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर सकता है. अधिक्रत मन्त्री समूह इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा!
जब मामले को सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में ले लिया, तब ए. राजा का इस्तीफा लेकर संप्रग सरकार ने अपनी खाल बचाने का असफल प्रयास किया.
कोढ़ में खाज यह कि प्रधनमन्त्री और वित्त मन्त्री ने चैतरफा विरोध पर कान नहीं दिया और टेलीकाम के दागी सचिव पी.जे. थामस को मुख्य सतर्कता आयुक्त ( CVC ) बना दिया. थॉमस के खिलाफ न सिर्फ 1992 में केरल में पामोलिन आयात घोटाले में आपराधिक चार्ज-शीट लंबित थी, बल्कि राजा के मंत्रालय में सचिव के रूप में थामस ने टू-जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन मामले में मुख्य सतर्कता आयोग (CVC) और नियंत्राक-महालेखा परीक्षक (CAG) की जांच पर आपत्ति की थी. थॉमस को टू-जी घोटाले में मदद करने का ‘पुरस्कार’ मिला और उन्हें मुख्य सतर्कता आयुक्त बना दिया गया. मतलब यह कि रखवाली करने वाली देश की सर्वोच्च संस्था का प्रमुख घोटालों में शामिल आरोपियों में से ही एक को बना दिया गया. चमड़े का बाड़ा, और कुत्ते की रखवाली! सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संप्रग सरकार को अंततः थामस को बाहर निकालना ही पड़ा.
ऐसे ही, टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में प्रधनमन्त्री कार्यालय द्वारा कार्यवाही में अत्यधिक देरी करने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में जवाब देने के लिए सरकार द्वारा ए जी वाहनवती का चुनाव करने पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए. क्योंकि 26 दिसंबर 2007 के ए. राजा के एक पत्र के मुताबिक तब सालिसिटर जनरल के रूप में वाहनवती ने ही टेलीकाम मन्त्री को आगे बढ़ने’ की ‘सलाह’ दी थी.
सबसे बड़ा होने के बावजूद टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला टेलीकाम सेक्टर में पहला घोटाला नहीं था. असल में इस सेक्टर के निजीकरण के बाद घोटालों की श्रृंखला शुरू हो गयी. टेलीकाम सेक्टर की बड़ी कम्पनियां हमेशा ही टेलीकाम मन्त्री की नियुक्ति को प्रभावित करती रहीं. बदले में टेलीकाम मन्त्री देश के संसाधनों की खुली लूट का उनका काम आसान करते रहे हैं.
1995 में कांग्रेस मन्त्री सुखराम उस टेलीकाम घोटाले के केंद्र में थे, जिसके साथ ही इस सेक्टर का निजीकरण करने की शुरूआत हुई. अब इस सेक्टर में तेज गति से हो रहे निजीकरण के कारण घोटालों के आकार-प्रकार में भी लगातार बढ़ोत्तरी हुई है.
वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के दौरान सबको यह पता था कि टेलीकाम कंपनियों ने जगमोहन को हटाने का पुख्ता इंतजाम किया था, क्योंकि जगमोहन ने टेलीकाम संचालकों की लाइसेंस फीस के बकाये को चुकता करने के लिए एक अंतिम तारीख तय कर दी थी. जुलाई 1999 में जसवंत सिंह की अगुवाई में मंत्रियों के एक समूह ने तयशुदा लाइसेंस फीस की नीति को कुल आय के निर्धारित अंश की नीति में बदल दिया, जिससे निजी सेक्टर के टेलीकाम संचालकों को फायदा पहुंचा. नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) ने तब इस पफैसले के खिलाफ राय दी थी.
इसी राजग सरकार में जब भाजपा नेता स्व. प्रमोद महाजन टेलीकाम मन्त्री थे, तब उन पर रिलायंस के पक्ष में नियमों को तोड़ने-मरोड़ने के आरोप सामने आये थे. उन पर आरोप था कि उन्होंने भारतीय टेलीफोन नियामक प्राधिकरण (TRAI) की सिफारिशों की अनदेखी करते हुए रिलायंस को बिना लाइसेंस फीस चुकता किये ही सेल्युलर संचालन के क्षेत्रा में ‘पूरी छूट’ दे रखी थी.
फिर राजग सरकार में टेलीकाम मन्त्री अरुण शौरी ने टाटा समूह के पक्ष में विदेश संचार निगम लिमिटेड ( VSNL )का सिर्फ 1439 करोड़ में विनिवेश कर दिया. VSNL रणनीतिक महत्व रखने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की लाभ कमाने वाली इकाई थी, जिसका अंतर्राष्ट्रीय और एसटीडी कॉलों पर एकाधिकार था, जिसके पास हजारों करोड़ का अधिसंरचनात्मक ढांचा और 1200 एकड़ जमीन, जिसमें से 773.13 एकड़ अतिरिक्त जमीन ( चत्तारुर, कोलकाता, पुणे और चेन्नई ) में भविष्य में कम्पनी के विस्तार के लिए थी.
90 के दशक में पहली बार खनन का क्षेत्र निजी कंपनियों के निवेश के लिए खोला गया. तबसे यह क्षेत्र निजी कॉरपोरेट घरानों, राजनैतिक ताकतों, संसाधनों की लूट और राज्य दमन के बीच बने भ्रष्ट गठबंधन का बदतरीन उदाहरण बना हुआ है.
इस लिहाज से सबसे कुख्यात घटना कर्नाटक के बेल्लारी जिले की है. जहाँ बेल्लारी बंधुओं (जी. करुणाकर रेड्डी, जी. जनार्दन रेड्डी और जी. सोमशेखर रेड्डी) के माफिया परवाने के आगे कानून का राज पानी भरता है. रेड्डी बंधुओं के अवैध खनन के साम्राज्य ने उन्हें जबरदस्त राजनीतिक ताकत दी है. सो इनके राजनैतिक लगुए-भगुए इस बात की गारंटी करवाते हैं कि प्रशासनिक अधिकारी बेल्लारी जिले में बेहद बड़े पैमाने पर चलने वाली अवैध् गतिविधियों से आँख फेरे रहें.
जनार्दन और करुणाकर रेड्डी भाजपा की राज्य सरकार में कैबिनेट मन्त्री हैं और तीसरे सोमशेखर रेड्डी कर्नाटक के ताकतवर दुग्ध् संघ के अध्यक्ष हैं. रेड्डी बन्धु गर्व से भाजपा नेता सुषमा स्वराज को अपनी ‘ताई’ (मां) बताते हैं. सो जब कभी रेड्डी बंधुओं की इच्छाओं का टकराव मुख्यमन्त्री येदुरप्पा से होता है, बीजेपी की आलाकमान के लीडरान रेड्डी बंधुओं के पक्ष में हस्तक्षेप करते हैं. रेड्डी बंधुओं के पैसे से ही ‘आपरेशन कमला’ परवान चढ़ा, जिसमें भाजपा ने जनता दल ( सेक्युलर ) से बड़े पैमाने पर विधायक खरीदे.
बेल्लारी की भूमि उत्कृष्ट किस्म के लौह अयस्क से भरी हुई है, जिसकी चीन जैसे देशों में बेहद मांग है. लौह अयस्क की कीमतें सन् 2000 में 300 रुपये प्रति टन से उछलकर 2005-07 में इसकी कीमत 5000 से 7000 रुपये प्रति टन तक पहुँच गयी. लौह अयस्क के इलाकों में अंधाधुंध और अक्सरहां अवैध खनन करके लोहा चीन भेजा गया. नतीजे में बेल्लारी बन्धु अरबों-अरब के मालिक बन गये.
कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े द्वारा जारी की गयी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि खनन, ढुलाई और राजस्व के हिसाब से लौह-अयस्क की कीमत प्रति टन सिर्फ 427 रूपये पड़ती है, जबकि निर्यात किये जाने वाले लोहे की कीमत 5000-7000 रूपये प्रति टन है. इसमें लगभग 80-90 फीसदी का जबरदस्त मुनाफा होता है. पर राज्य सरकार सिर्फ 27 रूपये प्रति टन के हिसाब से राजस्व पाती है. ( अब इस दर को सुधार कर 10 फीसदी, एड-वेलोरम, बढ़ा दिया गया है.) राज्य सरकार के नसीब में यह थोड़ा सा राजस्व भी नहीं आता क्योंकि लौह अयस्क का खनन और उसकी ढुलाई बड़े पैमाने पर अवैध रूप में होती है. खनन संबंधी विनियमों में सीमित संसाधनों के ज्यादा दोहन के खिलाफ और पर्यावरण की रक्षा के लिए खनन की सीमा तय है. लेकिन बेल्लारी में किये जा रहे अनियंत्रित खनन के कारण वन से ढंके हजारों हेक्टेयर भू-भाग का बड़े स्तर पर क्षरण हो चुका है. क्षमता से अधिक और तेजी से हो रहे दोहन का मतलब यह भी है कि यह बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन खत्म हो जाएगा और ऐसा हमारी जरूरतों को पूरा करने के कारण नहीं, बल्कि एक अकेले खनन कारपोरेशन के लालच के कारण होगा!
बेल्लारी पर लोकायुक्त और सुप्रीम कोर्ट की सेन्ट्रल इम्पावर्ड कमेटी ( CEC ) दोनों की रपट दिखाती है कि लाखों टन लौह अयस्क अवैध ढंग से निर्यात के लिए हजारों ट्रकों में भरकर राज्य की सरहदों से बाहर भेजा गया. राज्य के खनन और भू-विज्ञान विभाग, परिवहन विभाग की तरह अपने आप को इस पूरी प्रक्रिया से अनजान बताते हैं. रेड्डी बंधुओं की ओबलापुरम खनन कारपोरेशन को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में केवल 68 एकड़ जमीन पर खनन का अनुबंध् हासिल है. यह अनुबंध् भी कडप्पा जिले में प्रस्तावित ब्राह्मिनी स्टील प्लांट के लिए खनन करने का था. इस अनुबंध् में लौह अयस्क के निर्यात का लाइसेंस नहीं है. पर ओबलापुरम खनन कारपोरेशन ने आन्ध्र और कर्नाटक, दोनों राज्यों के अधिकारियों को काबू में करते हुए अपने हाथ कर्नाटक के जंगलों तक पसार लिए. यहां तक कि दोनों राज्यों की सीमाओं से भी बारम्बार छेड़छाड़ की गयी और सीमा पर लगे पत्थरों को चकनाचूर कर दिया गया! अधिकारिक तौर पर बेल्लारी में 58 खदानें चालू हैं. पर इस इलाके में 2000 से लेकर अब तक अवैध खनन के 12000 मामले सामने आये हैं. 2003 से लेकर अब तक अवैध ढंग से खोदा गया लगभग 3.04 करोड़ टन लौह अयस्क राज्य से बाहर गया, जिसकी आज के लिहाज से कीमत होगी- 152 अरब रूपये.
बेल्लारी में पूंजी का जिस तरह से आदिम संचय किया जा रहा है उससे औपनिवेशिक समय की याद ताजा हो जाती है. रेड्डी बन्धु बेल्लारी के कीमती खनिजों और वन-भूमि को निचोड़ कर पैसा छाप रहे हैं. और इस सबके बीच बेल्लारी लगातार कर्नाटक के सबसे गरीब जिलों में से एक बना हुआ है. एक तरफ तो जनार्दन रेड्डी अपने लिए 60 कमरों वाला, बम-रोधी घर बनवा रहे हैं, निजी हेलीकाप्टरों के उतरने के लिए हेलीपैड बनवा रहे हैं, दूसरी तरफ बेल्लारी के बच्चे खदानों में खटने को मजबूर हैं. भीषण खनन के चलते पैदा होने वाली लाल धूल से बेल्लारी के लोग गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से गुजर रहे हैं. आन्ध्र प्रदेश में भी स्वर्गीय मुख्यमन्त्री वाई एस राजशेखर रेड्डी और उनके परिवार की छत्रछाया का लाभ उठाते हुए कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं ने अवैध् खनन का बड़ा साम्राज्य बना लिया है.
...देश की खनिज संपदा प्रकृति की देन है, हमारी आदिम विरासत का हिस्सा है. इस पर जितना हक हमारा है, उतना ही अगली पीढि़यों का. इन संसाधनों पर आधारित उद्योग केन्द्रीय या मातृ-उद्योगों में शामिल हैं. सार्वजनिक संपत्ति का उपयोग करके अपने लिए लाभ कमाने वाले कुछ सौभाग्यशालियों की बजाय इनका लाभ सारे देश को मिलना चाहिए. इसलिए खदानों और खनिजों की तलाश या खनन करने वाले, या देश के जीवनाधर इन संसाधनों पर आधरित महत्वपूर्ण उद्योग विकसित करने वाले निजी उद्यमों के ऐसा करने पर प्रतिबन्ध होना चाहिए. और यदि किसी सेक्टर में किन्हीं कारणों से ऐसा करना अपरिहार्य हो तो यह कम से कम समय के लिए हो और निश्चित किया जाय कि यह वहां के देशी बाशिंदों तक सीमित हो.
...आज के भारत के खनिज उद्योग में चिन्ताजनक खामी यह है कि ... (खनिजों का) मुख्यतः निर्यात व्यापार के लिए खनन किया जा रहा है, और इस दर से किया जा रहा है कि कुछ वर्षों में कीमती केन्द्रीय-खनिजों का भण्डार शून्य हो जाएगा … (निर्यातित खनिजों) से हासिल की गयी राशि हास्यास्पद ढंग से बेहद कम है... यह निर्यात... असली खनन करने वालों द्वारा नहीं बल्कि ज्यादातर व्यापारियों द्वारा किया जा रहा है... इस तथ्य के बावजूद कि धातुएं तेजी से खत्म होने वाली राष्ट्रीय संपदा हैं... और ऐसी कोई भी भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाएं नहीं हैं जो... खोदी गयी खदानों को फिर से भर दें...
- भारत के आर्थिक विकास के रास्ते को तय करने के लिए आजादी के पहले गठित की गई राष्ट्रीय योजना समिति की रपट से.
बेल्लारी और देश के अन्य भागों में खनिजों की लूट हमें राष्ट्रीय योजना समिति द्वारा भारत की आजादी की पूर्वसंध्या पर निर्धरित किये गए निर्देशों की याद दिलाती है – देखें बाक्स. राष्ट्रीय योजना समिति ने इस बात को दर्ज किया था कि औपनिवेशिक सत्ता ने देश की खनिज संपदा का शोषण निर्यात करने के लिए किया था. आयोग ने जोर देकर कहा था कि सम्पूर्णता में खनिज देश के बेशकीमती संसाधन हैं. ये निजी लाभ चाहने वालों के हाथों अंधाधुंध दोहन के लिए नहीं हैं, इनका अगली पीढ़ियों के लिए संरक्षण किया जाना चाहिए. आज हमारी अपनी ही सरकारें इस नियम के खिलाफ खड़ी हैं और उन्होंने खनिजों की लूट के लिए देश के दरवाजे चौपट खोल दिए हैं. खनन कारपोरेशन भारी लाभ कमा रहे हैं और वे लाभ का एक छोटा प्रतिशत सम्बंधित अधिकारियों और मंत्रियों को घूस के रूप में दे रहे हैं. इस लिहाज से भ्रष्टाचार हमारे खनिज संसाधनों की लूट के बड़े मुद्दे का ही नतीजा है. यह समय की मांग है कि हम इस लूट को रोकने के लिए उठ खड़े हों.
झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ वन-भूमि और खनिज संसाधनों से समृद्व राज्य हैं. इन राज्यों की आबादी का अच्छा-खासा हिस्सा आदिवासी लोगों का है जो अपनी आजीविका और जीवनयापन के लिए जंगलों पर निर्भर हैं. एक के बाद एक सरकारें आती रहीं और अंधाधुंध तरीके से खनन और इस्पात क्षेत्र की बड़ी राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों (मसलन आर्सेलर-मित्तल, रियो टिंटो, पोस्को, टाटा, जिंदल, एस्सार और ऐसी ही अन्य) के साथ समझौता प्रपत्र (एमओयूज) पर हस्ताक्षर करती रहीं. ऐसे में जंगल और जमीन से बेदखली झेलते आदिवासी स्वाभाविक तौर पर प्रतिरोध में उठ खड़े हुए. बदले में उन्हें भयावह दमन का सामना करना पड़ा. इस बीच कारपोरेशनों को जमीन और खनन अनुबंध मुहैया कराने की प्रक्रिया के साथ ही बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार पनपा और कानून की धज्जियां उड़ी. खनिज संपदा की इस लूट के साथ-साथ हमें इस पर भी गौर करना चाहिए कि भारत के सर्वाधिक पिछड़े 150 जिलों में झारखंड के 86 प्रतिशत, उड़ीसा के 90 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ के 94 प्रतिशत जिले शामिल हैं.
काले धन को सपफेद करने के मामले में पूछताछ के लिए बुलाये गए पहले मुख्यमन्त्री का रुतबा हासिल करने वाले झारखंड के मधु कोड़ा की कथा आपके दिलो-दिमाग में ताजा होगी ही. वे खनन समझौतों में 4000 करोड़ रुपयों का कमीशन खाने के आरोपी हैं. 2006 में मुख्यमन्त्री बनने के कुछ ही दिनों में कोड़ा ने 44 कंपनियों से दो लाख करोड़ रुपयों की कीमत के खनन अनुबंधों की संस्तुतियों और खनन समझौतों पर फिर से मोल-तोल किया और दस्तखत किये. याद रहे कि झारखंड की कोई पार्टी कोड़ा प्रकरण से अछूते रहने का दावा नहीं कर सकती क्योंकि जब से झारखंड बना, कोड़ा हर सरकार में प्रभावी मन्त्री पद पर रहे. कोड़ा खनन मन्त्री भी रहे और आखिरकार मुख्यमन्त्री बने. कोड़ा पर आरोप है कि उन्होंने एक समझौता पत्रा पर दस्तखत करने के लिए दो से लेकर बीस करोड़ तक का और किसी खदान द्वारा उत्पादित कोयले या लौह अयस्क की मात्रा के हिसाब से खनन हेतु पट्टे की संस्तुति के लिए तीस से अस्सी करोड़ तक की घूस ली. मुख्यमन्त्री द्वारा बड़े पैमाने पर की गयी घूसखोरी पर मचे शोरगुल के बीच जांच करने वाले और विपक्षी पार्टियां एक जरूरी सवाल पूछना भूल गयीं कि इतनी घूस दी किन कारपोरेशनों ने? जो कम्पनियां 4000 करोड़ रु. की घूस देने के लिए तैयार थीं तो अंदाजा लगाइए, खनन से वे कितने रुपयों के लाभ की उम्मीद कर रही थीं? निश्चय ही आदिवासियों की जमीन, उनके जंगल और जीविका की कीमत पर राज्य के संसाधनों को बेचने के लिए घूस खाने वाले राजनेताओं को सजा मिलनी चाहिए, पर ऐसे किसी भ्रष्टाचार की कोई भी जांच लुटेरे कारपोरेशनों की पहचान करने और उनको सजा देने के काम के बिना अधूरी ही रहेगी.
उड़ीसा भी भ्रष्टाचार और खनन-लूट के उदाहरणों से भरा हुआ है. ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी वेदांता/स्टरलाइट का उदाहरण लीजिये, जिसका नियमगिरि पहाड़ियों में बाक्साइट खनन का लाइसेंस हाल में ही रद्द हुआ है. नियमगिरि को लूटने का लाइसेंस हासिल करने की प्रक्रिया में वेदांता के साथ केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा न्यायपालिका भी शरीक थी.
नियमगिरि की आदिवासी जनता के विरोध को दरकिनार करते हुए और ( PESA ) पंचायतों का प्रबंध्न- अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार कानून के हर हिज्जे़ का उल्लंघन करते हुए संप्रग सरकार ने इस परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी दे दी.
इस पर्यावरणीय मंजूरी को चुनौती देने के लिए जब आदिवासी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ पर्यावरणीय मंजूरी को सही बताया बल्कि सरकार से वन्य मंजूरी देने के लिए भी कह डाला. वेदांता द्वारा बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के बारे में खुद अपने द्वारा गठित सीईसी (सेंट्रल इम्पावर्ड कमेटी) के प्रमाणों को जान-बूझकर नजरअंदाज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किस्म की राहत दी और वेदांता की जगह उसकी जुड़वां स्टरलाईट को लाइसेंस देने का फैसला दिया. फैसला देने वाले न्यायाधीश कपाड़िया ने स्वीकार किया कि वे खुद स्टरलाईट के शेयर धारक हैं, बावजूद इसके न्यायाधीश महोदय ने खुद को इस मुकदमे से अलग नहीं किया!
वेदांता के खिलाफ काले धन को सफेद करने के मुकदमे में अचानक बीच में ही प्रवर्तन निदेशालय ने अपना वकील बदल लिया. नए वकील नियुक्त हुए. गृह मन्त्री पी चिदंबरम जब वेदांता के निदेशक मंडल में थे और खनन कारपोरेशनों के मुकदमे लड़ते थे तब यही वकील साहब चिदंबरम को मामलों की जानकारी देने वाले वकील की भूमिका में थे! स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां यह तय करने में सक्षम हैं कि वे न्यायपालिका से लेकर नियामक प्राधिकरण तक सभी में अपने कारिंदों को ला सकें.
आखिरकार अंतर्राष्ट्रीय प्रतिरोधों के दबाव के चलते और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित एन.सी. सक्सेना कमेटी की तीखी रपट के बाद, जिसमें उड़ीसा सरकार के अफसरान के साथ मिलकर वेदांता द्वारा बड़े पैमाने पर वन और पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का कच्चा चिट्ठा पेश किया गया था, संप्रग सरकार पर्यावरणीय मंजूरी वापस लेने के लिए बाध्य हुई.
परन्तु भीषण दमन का सामना करते हुए उड़ीसा के लोग इसी तरह के भ्रष्ट कापोरेशनों - मसलन कलिंगनगर में टाटा परियोजना और जगतसिंहपुर में पोस्को परियोजना - के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं.
छत्तीसगढ़ में भी टाटा और एस्सार जैसे कापोरेशनों की नजर आदिवासियों की जमीनों पर गड़ी हुई है- इसीलिये वे एक निजी सेना ‘सलवा-जुडूम’ के पक्ष में हैं जिसने माओवाद से लड़ने के नाम पर तकरीबन 50,000 लोगों को उनके गांवों से बेदखल कर दिया है.
कम्पनियां अक्सर ही अपने लोगों को नीति निर्धारण करने वाले प्रभावशाली पदों और यहां तक कि नियामक निकायों तक में घुसाने में कामयाब हो जाती हैं. निश्चित रूप से इसके सबसे सटीक उदाहरण पी. चिदम्बरम हैं. चिदम्बरम साहब वित्त मन्त्री और बाद में गृह मन्त्री बनने से पहले वेदांता कम्पनी के निदेशक और कई खनन कम्पनियों के वकील हुआ करते थे. इसमें क्या आश्चर्य की बात है कि अब तक जो कम्पनियां उन्हें तनख्वाह दिया करती थीं, वे उन्हीं के पक्ष में आर्थिक और सुरक्षा नीतियां तैयार करें.
हाल ही में भारत के बाजार में बी.टी. नाम की बैंगन की एक ऐसी प्रजाति को उतारने की कोशिश की गई जिसकी अनुवांशिकी में तब्दीली की गई है. सरकार की सिफारिश पर बी.टी. बैंगन को हरी झंडी देने के लिए गठित समिति ( GECA ) यह दावा कर रही है कि इससे स्वास्थ्य या पर्यावरण को किसी किस्म का खतरा नहीं होगा. पर पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने चिन्हित किया है कि इस समिति के निष्पक्ष होने की सम्भावना बहुत कम ही है क्योंकि इसमें उन्हीं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रतिनिध बैठे हैं जिन्हें इस बी.टी. बैगन से फायदा मिलना है.
GECA (अनुवांशिक अभियांत्रिकी अनुमोदन कमेटी) के सह-अध्यक्ष सी.डी. माई, ISAAA ( कृषि-बायोटेक आवेदनों के अभिग्रहण की अंतर्राष्ट्रीय सेवा) के निदेशकों में से एक थे. इस संस्था को मानसेन्टो नाम की कम्पनी से पैसा मिलता है. ये वही कम्पनी है जिसके पास बी.टी. बैंगन के पेटेंट अधिकार हैं और जो भारत में इसकी मंजूरी के लिए ज
घोटालों के बाद महा-घोटालों से स्पष्ट हो रहा है कि कैसे व्यवस्था के हरेक अंग में भ्रष्टाचार की सड़ांध् तेजी से पफैलती जा रही है. जब भी कोई बड़ा घोटाला सामने आता है, कुछ जांचें तो शुरू की जाती हैं लेकिन अपवाद स्वरूप ही किसी अपराधी को सजा मिल पाती है. लेकिन आज हो रहे घोटाले कोई अपवाद नहीं हैं, बल्कि वे आम परिघटना बन गये हैं. पहले कुछ लोग मानते थे कि सरकार और नौकरशाही तो भ्रष्ट हैं, किन्तु न्यायपालिका और सेना पाक-सापफ हैं. लेकिन आज ऐसे मोहक भ्रम भी तार-तार हो चुके हैं.
केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार की अपनी प्राथमिक जांच में 16 संबंधित कार्यस्थलों पर भ्रष्टाचार के सबूत पाये काम के ठेके ऊंची दरों पर और अपात्र एजेन्सियों को दिये गये. नीलामी के टेण्डरों में हेरा-फेरी की गई, टेण्डर जारी करने में अनियमिततायें हुईं, स्ट्रीट लाइटों जैसी मूलभूत सुविधओं का अनावश्यक ‘उच्चीकरण’ किया गया. इस घालमेल में इन कार्यों को अंजाम देने में लगी सभी सरकारी एजेन्सियां - पीडब्लूडी, एमसीडी, डीडीए, एनडीएमसी, सीपीडब्लूडी और राइट्स आदि- दोषी पायी गईं.
रिपोर्ट के अनुसार कामनवेल्थ खेलों के कार्यों में लगे लगभग सभी संगठनों ने टेण्डरों को सही ठहराने के लिए जरूरी या आकस्मिक परिस्थितियों के नाम में न्यायसंगत कीमतों को बढ़ाने के बिल्कुल ही अस्वीकार्य कारकों को मान लिया.
यह बात सामने आयी है कि दिल्ली और केन्द्र की सरकारों, खुद प्रधानमन्त्री समेत, को सीवीसी की जांच में आये तथ्यों के बारे में आम जनता के सामने आने के काफी पहले से ही जानकारी थी. परन्तु प्रधानमन्त्री कार्यालय द्वारा इन खुलासों को ठण्डे बस्ते में डालने और खेलों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले सामने लाकर खेल खराब न करने के संकेत सीवीसी को दे दिये गये.
निर्माण की गुणवत्ता का स्तर इतना गिरा हुआ था कि खेल शुरू भी नहीं हुए थे और कई प्रतिष्ठित ढांचे (स्टेडियम, स्वीमिंग पूल आदि) या तो ध्वस्त हो गये अथवा उनमें भारी रिसाव होने लगा!
करीब 500 वस्तुओं को - कम्प्यूटरों से लेकर प्रसाधन के सामान तक, और कूड़ेदान से लेकर ट्रेडमिलों तक - उनके बाजार में खरीद मूल्य से दस गुनी अधिक कीमत चुका कर किराये पर लिया गया - वह भी अधिकांश विदेशी कम्पनियों से और इन पर 650 करोड़ रुपये खर्च किये गये.
खेलों की आर्गेनाइजिंग कमेटी (ओ.सी.) के अध्यक्ष कलमाडी ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भारतीय कम्पनी प्रतिद्वन्दिता में न आ पाये, टेण्डरों में निरपवाद रूप से एक ऐसी शर्त जोड़ दी जिसके अनुसार आवेदकों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में कार्य करने का अनुभव हो. ऐसे इस बात की गारंटी कर दी गई कि फर्नीचर से लेकर टायलट पेपर तक सभी कुछ ‘विदेशी’ आपूर्तिकर्ताओं से ही लिए जायें!
क्वींन्स बेटन रिले का मामला तो और भी अनोखा है. एक तो यह कि सबसे अधिक भाव बताने वाली कम्पनी - मैक्सम इण्टरनेशनल - को क्वींन्स बेटन रिले के लिए सलाहकार के रूप में काम दिया गया (इसने रु. 8.01 करोड़ का टेण्डर दिया था जबकि प्राइसवाटर हाउसकूपर और ब्रिलियेण्ट एण्टरटेनमेण्ट नेटवर्क ने क्रमशः रु. 1.19 और 1.85 का.)
उसके बाद ओसी ने करीब 2.5 लाख पाउण्ड भुगतान दो ब्रिटिश कम्पनियों - ए.एम. फिल्म्स और ए.एम. कार्स, जिनका मालिक कोई आशीष पटेल है - को लंदन में क्वीन्स बेटन रिले के दौरान ट्रांसपोर्ट, वीडियो स्क्रीन्स, और सचल टायलेट के लिए किया. इसमें न तो कोई ठेका दिया गया और न ही कोई टेण्डर प्रक्रिया अपनायी गई. इस धनराशि के अलावा ए.एम. फिल्म्स के खाते में हर महीने 25000 पाउण्ड जमा किये जाते रहे, और इस तरह 4 लाख 50 हजार पाउण्ड लंदन भेज दिये गये. यह साबित करने के लिए कि उक्त फर्म का अनुमोदन वहां के भारतीय हाई कमीशन ने किया था, कलमाडी ने एक ई-मेल पेश किया. परन्तु बाद में साबित हो गया कि वह ई-मेल फर्जी है. बाद में एक ई-मेल और सामने आया जिससे पता चला कि आर्गेनाइजिंग कमेटी के एक सदस्य संजय महेन्द्रू ने आशीष पटेल से टैक्सियों के किराये काफी बढ़ा-चढ़ा कर देने को कहा था.
कलमाडी के पिट्ठुओं के इस जमावड़े में भाजपा खेमे के भी कुछ खास लोग शामिल थे. स्टेडियमों में प्रसारण केन्द्रों के निर्माण के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने टेण्डर आमंत्रित किये - इनमें कुल लागत करीब 50 करोड़ रु. आनी चाहिए थी. कलमाडी की आर्गेनाइजिंग कमेटी ने इसका ठेका दीपाली टेण्ट हाउस को देने पर जोर दिया, जिसका मालिक भाजपा नेता सुधांशु मित्तल का भतीजा है. मंत्रालय ने दीपाली समेत तीन कम्पनियों को शार्टलिस्ट किया लेकिन दीपाली के रेट इतने ज्यादा ऊंचे थे कि मंत्रालय अंततः पीछे हट गया. आर्गनाईजिंग कमेटी के दबाव से बचने के लिए मंत्रालय ने तीनों में से किसी भी कम्पनी को ठेका नहीं दिया और यह काम एक सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई को सौंप दिया. दीपाली को इसकी ‘भरपाई’ करने के लिए कलमाडी ने उसे खेलों के ऊपरी ढांचे के काम-काज की आपूर्ति, टेस्टिंग, रखरखाव और हटाने आदि का ठेका रु. 230 करोड़ में दे दिया.
इन खेलों के दौरान घोटालों के खुलासों को ‘राष्ट्रीय सम्मान’ को क्षति पहुंचाने के नाम में दबाने की कोशिशें होती रहीं. बाद में यूपीए सरकार ने पूर्व सीएजी वी.के. शुंगलू के नेतृत्व में खेलों में हुई विभिन्न अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच कराने की घोषणा की. सीबीआई, केन्द्रीय सतर्कता आयोग, प्रवर्तन निदेशालय आदि भी कथित तौर पर कामनवेल्थ महाघोटाले के विभिन्न पहलुओं की जांच कर रहे हैं. घोटालों की भूल-भुलैया को देखते हुये और खेलों के संगठन व संचालन की पूरी प्रक्रिया में शामिल एजेंसियों की विविधताओं के चलते इस बात की पूरी संभावना है कि जांच प्रक्रिया नौकरशाही के जंजाल और परस्पर आरोप-प्रत्यारोपों के राजनीतिक खेल के बीच दम तोड़ दे. ऐसे संकेत तो दिखने ही लगे हैं जिनसे लगता है कि यह पूरा मामला एक कलमाडी और शीला दीक्षित या कामनवेल्थ आर्गनाईजिंग कमेटी बनाम दिल्ली सरकार में सिमट कर रह जायगा.
सरकार के पास ऐसी जांचों को लम्बा खींच देने और ध्यान हटाने अथवा उसकी धार कुंद करने के लिए एक-दो लोगों को मुहरा बना देने का दशकों का अनुभव है. ऊपर से, देश में खेलों व प्रतिस्पर्धओं का संचालन करने के व्यापार में सभी प्रमुख राजनैतिक दल घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं. कामनवेल्थ घोटाले की जांच को यथोचित रूप में आगे बढ़ा कर किसी तार्किक परिणति तक पहुंचाने का काम इसीलिए नागरिक समाज की अति सक्रिय भागीदारी की मांग करता है.
राडिया टेपों के माध्यम से हम पहले ही देख चुके हैं कि किस तरह वीर सांघवी ने अंबानी बंधुओं के विवाद में मुकेश अंबानी के हितों को ‘राष्ट्रीय हित‘ के रूप में पेश किया.
एक अन्य बातचीत में प्रसिध्द ऐंकर बरखा दत्त को डी.एम.के. के कनिमोझी-राजा गुट और कांग्रेस के बीच संदेशवाहक के रूप में काम करने हेतु राजी होते हुए सुना जा सकता है. उन्होंने यह काम किया या नहीं, यह तो नहीं मालूम, लेकिन बाद की एक बातचीत के दौरान राडिया को यह कहते हुए सुना गया कि ‘एक बयान जारी करने के लिए बरखा ने कांग्रेस को मना लिया है.’
इन टेपों में पूर्व लिखित स्क्रिप्ट के अनुसार कारपोरेट साक्षात्कार करने, यहां तक कि उनकी पहले से ‘रिहर्सल’ भी करने के बहुत से हैं.
राडिया टेपों से जो बात खुल कर सामने आ गई वह यह कि कैसे बड़े-बड़े मीडिया घराने और उनसे जुड़ी शख्शियतें बड़े निगमों की जेब में रहते हैं और इसीलिए कारपोरेट स्वार्थों को ‘राष्ट्रीय हितों’ का जामा पहना कर पेश करते हैं, झूठी आम राय बनाते हैं और यहां तक कि उनकी पसंद का मन्त्री बनवाने में मदद करने के उद्देश्य से कारपोरेट गुटों के संदेश शासक पार्टियों तक पहुचाते हैं.
कैसी शर्मनाक बात है कि सर्वोच्च न्यायालय के पिछले मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन अपने नजदीकी पारिवारिक सदस्यों के पास बड़ी मात्रा में अवैध संपत्ति होने के आरोपों का सामना कर रहे हैं. लेकिन हैरानी की बात यह है कि बालाकृष्णन अब भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बने हुए हैं.
उच्च न्यायालयों के कई न्यायाधीश भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं. जैसे- कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौमित्रा सेन, सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी. डी. दिनकरन (पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय में थे) और उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति निर्मल यादव (पहले पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में थीं.)
भ्रष्ट जजों से निपटने में मौजूदा प्रक्रिया बिल्कुल निष्प्रभावी है. अभियोग लगाए जाने से पहले न्यायिक जांच होती है- लेकिन वह जांच अक्सर उन जजों के अपने दोस्त और सहकर्मी ही करते हैं! न्यायमूर्ति दिनकरन के खिलाफ जांच के लिए बनी समिति का मामला ही लें- तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश बालाकृष्णन ने दिनकरन के एक घनिष्ट मित्र न्यायमूर्ति सिरपुरकर को जांच समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया! कड़े प्रतिरोध के बाद न्यायमूर्ति सिरपुरकर की जगह न्यायमूर्ति आफताब आलम को रखा गया.
23 करोड़ रुपए का एक गाजियाबाद पी एफ घोटाला भी है. जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत जज, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सात जज, अधीनस्थ न्यायालयों के 12 जज और उच्च न्यायालयों के 6 सेवानिवृत जजों के शामिल होने का आरोप है. मुख्य आरोपी आशुतोष अस्थाना की अक्टूबर 2009 में जेल में रहस्यपूर्ण मौत हो गई. उसने सी बी आई को कई पुख्ता दस्तावेज उपलब्ध कराए थे जिनसे इन जजों की मिलीभगत साबित हुई थी. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को दिल्ली लाए जाने के सी.बी.आई के अनुरोध को खारिज कर दिया है.
मामले दर मामले बड़े व्यापारिक हितों के जुड़े होने से, यह साफ हो गया है कि पक्षपात और भ्रष्टाचार के लिए खुद सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है.
न्यायिक कदाचार या भ्रष्टाचार को चुनौती देने वालों को डराने के लिए अक्सर ‘न्यायालय की अवमानना’ कानून का उपयोग किया जाता है. इसका ताजा उदाहरण सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण हैं जिन पर न्यायालय की अवमानना का आरोप लगाया गया क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले 17 प्रधन न्यायाधीशों में से लगभग आधे भ्रष्ट थे.
न्यायिक भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलाने वालों ने जजों के कामकाज और उन पर लगने वाले आरोपों की सही और पारदर्शी जांच के लिए संवैधानिक निकाय के रूप में एक स्वतंत्र न्यायिक कार्य निष्पादन आयोग की मांग की है, जिसके पास उनके खिलापफ अनुशासनिक कार्रवाई करने की शक्ति हो. उन्होंने न्यायाधीशों को भी लोकपाल कानून के दायरे में लाए जाने की मांग भी की है.
ट्रांसपेरेन्सी इण्टरनेशनल इण्डिया और सेण्टर फॉर मीडिया स्टडीज द्वारा 2007 में किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि राशन, स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, पानी और मनरेगा सहित ग्रामीण कल्याण की अन्य योजनाओं का लाभ पाने के लिए गरीबी की रेखा से नीचे रह रहे परिवारों ने एक साल में 900 करोड़ रुपयों का घूस के रूप में भुगतान किया!
इस ‘टीआईआई-सीएमएस इण्डिया करप्शन स्टडी 2007’ के अनुसार पुलिस सबसे ज्यादा भ्रष्ट है. उस साल पुलिस के पास जाने वाले 56 लाख बीपीएल परिवारों में से 25 लाख परिवारों ने काम करवाने के लिए पुलिस को रु. 215 करोड़ घूस में दिये.
टीआईआई-सीएमएस के अध्ययन में यह भी बताया गया है कि जन वितरण प्रणाली की सेवायें भी आसानी से नहीं मिल पाती और 53 लाख साठ हजार बीपीएल परिवारों को उन्हीं के लिए दी सेवाओं को हासिल करने के लिए घूस देनी पड़ी. राशन कार्ड पाने के लिए भी अधिकारियों को घूस देनी होती है!
दस लाख परिवार अस्पताल की सुविधा से इसलिए वंचित हो गये क्योंकि उनके पास या तो अस्पताल के स्टाफ/अधिकारियों को घूस देने के लिए पैसा नहीं था अथवा वे घूस देना नहीं चाहते थे. इसी प्रकार गरीब किसानों के बच्चों का स्कूल में दाखिला करने, उनके प्रमाणपत्र देने, या अगली कक्षा में प्रोन्नत करने में भी स्कूल कर्मचारी व अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं.
जन वितरण प्रणाली के खाद्यान्न ;सस्ती दर पर मिलने वाले राशन को बाजार में बेच दिया जाता है और मनरेगा में आने वाली धनराशि के बड़े-बड़े घोटाले आज सभी राज्यों में सामान्य बात बन गये हैं. ऐसे घोटालों का पर्दाफाश करने वालों को प्रायः ही दमन और हिंसा का सामना करना पड़ता है - झारखण्ड में ललित मेहता, कामेश्वर प्रसाद, और नियामत अंसारी; मनरेगा और बीपीएल घोटालों को चुनौती देते हुए मारे गये कार्यकर्ता के मामले अभी भी आम लोग भूले नहीं हैं.
कारगिल शहीदों के लिए ताबूतों की खरीद में घोटाले में राजग शासन रंगे हाथ पकड़ा गया था. अब कारगिल युद्ध के सिपाहियों और विधवाओं के नाम पर जमीन हड़पने, अवैध् निर्माण करने और फ्लैटों के आवंटन के घोटाले में महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार की संलिप्तता सामने आयी है. क्या ही मजाक है कि घोटालेबाजों ने इस अवैध हाउसिंग सोसायटी का नाम ‘आदर्श’ रख लिया है. यह पूरा घटनाक्रम सभी सत्ता केन्द्रों के बीच से पूरी तरह गायब हो चुके नैतिक मूल्यों या आदर्शों को खुद ही बयान कर रहा है.
राजनीतिज्ञों के कुख्यात भ्रष्टाचार और बेईमानी की तुलना आमतौर पर सेना की ‘ईमानदारी’ और सत्यनिष्ठा से की जाती है. आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले ने, जिसमें सर्वोच्च रैंक के बहुत से सैन्य अधिकारी शामिल हैं, ने इस मिथक को हमेशा के लिए तोड़ दिया है. रक्षा मन्त्री ए.के.एंटनी को रक्षा अधिकारियों की ‘आपराधिक साजिश’ को मानना पड़ा, जिसमें 6,490 वर्ग मीटर भूमि (जो सेना के कब्जे में पिछले साठ वर्षों से थी) प्रमोटरों से ‘सांठ-गांठ’ कर व्यवसायिक उद्देश्यों के लिए दे दी गयी.
सेना के कुछ अधिकारयों द्वारा कारगिल के वीरों और मातृभूमि की रक्षा में अपनी जान देने वालों को घर देने और पुरस्कृत करने के लिए फ्लैट देने की बात कर इस घोटाले की शुरूआत की गई. यद्यपि मुंबई के अभिजात कोलाबा इलाके में प्रस्तावित भूमि पर तटीय विनियमों के अनुसार ऊंचे भवन निर्माण प्रतिबंधित हैं. लेकिन विरोध कर रहे पर्यावरणवादियों को नजरअंदाज करने और अवैध ठहराने के लिए राष्ट्रवाद के आभामण्डल से आलोकित कारगिल के जादुई मंत्र के सहारे एक तीस मंजिला इमारत बन कर खड़ी हो गई. जब इस अपार्टमेण्ट काम्प्लेक्स के फ्लैटों के आवंटन की सूची सामने आयी तो वह अति विशिष्ट व्यक्तियों की ऐसी सूची थी जिसमें सर्वोच्च रक्षा अधिकारी, नौकरशाह, और मुख्य मन्त्री अशोक चह्वाण समेत कांग्रेस और एन.सी.पी. के महाराष्ट्र के बड़े बड़े नेता शामिल थे. जिन 103 लोगों को फ्लैट मिले उनमें से केवल 3 नाम ही कारगिल से संबंधित थे!
कांग्रेस ने अशोक चह्वाण को मुख्यमन्त्री पद से हटा दिया है और सीबीआई जांच का आदेश दिया है, केन्द्रीय पर्यावरण मन्त्री जयराम रमेश ने आदर्श सोसायटी को गिराने का आदेश दिया है, जिस पर उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है. महाराष्ट्र उच्च न्यायालय ने इस बीच दक्षिण मुंबई की 60 एकड़ भूमि पर कोस्टल रेग्यूलेटरी जोन एक्ट के भारी पैमाने पर हो रहे उल्लंघन के कारण हुये अवैध निर्माणों और उससे पहुंची पर्यावरणीय क्षति के आंकड़े मांगे हैं.
परन्तु अभी यह देखना बाकी है कि क्या सचमुच सीबीआई बिल्ली के गले में घण्टी बांध पायेगी और इस शर्मनाक घोटाले के अपराधियों को दण्ड मिलेगा.
इसी बीच महाराष्ट्र और देश के अन्य भागों में सेना की संलिप्तता वाले ऐसे ही कई और घोटाले सामने आ गये हैं. बोफोर्स मामला और राजग के शासनकाल में तहलका द्वारा उजागर किया गया घोटाला, हमें बताते हैं कि कैसे उच्च पदस्थ सेना के अधिकारी और राजनीतिज्ञों को रक्षा सौदों में रिश्वत दी जाती है. हम सेना को जांच के दायरे से बाहर रखने और उसके अधिकारियों को कानून का उल्लंघन करने पर दण्ड से मुक्ति नहीं दी जा सकती. भ्रष्टाचार के आरोपी सैन्य अधिकारियों पर भी मुकदमा चलना ही चाहिए.
64 करोड़ के बोफोर्स मामले ने एक सरकार गिरा दी थी. अब तकरीबन हर रोज हमारा सामना लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार के खुलासे से होता है. न केवल भ्रष्टाचार के पैमाने में बढ़ोत्तरी हुई है बल्कि आज के भ्रष्टाचार की प्रकृति से उदारीकृत तथा भूमंडलीकृत भारत में भारतीय राजसत्ता के चरित्र का भी पता चलता है. बड़ी पूंजीवादी तथा साम्राज्यवादी शक्तियों ने हमेशा ही भारत में राज्यसत्ता को प्रभावित किया है, लेकिन भूमंडलीकरण के दौर में, राजसत्ता की प्राथमिकताओं और नीतियों के निर्धारण में राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट घरानों और साम्राज्यवादी ताकतों की सीधी भूमिका लगातार बढ़ती ही जा रही है.
राडिया टेप प्रकरण से यह साफ उजागर हो गया कि कारपोरेट घराने किस प्रकार अपने हित के लिए अपने दलालों के जरिए मंत्रियों की नियुक्ति, संसद में पारित होने वाले कानूनों और नीतियों में दखल दे रहे हैं.
हाल के वर्षों में कारपोरेट पूंजी और राजनीति के बीच नजदीकियां तेजी से बढ़ी हैं. कुछ वर्षों पहले, भाजपा के प्रमोद महाजन और सपा के अमर सिंह को अपनी पार्टियों के लिए कम समय में ज्यादा पैसे इकट्ठा करने वाले बड़े नेताओं के रूप में जाना जाता था, जो मिनटों में अरबों रुपए हाजिर करने में माहिर थे. जाहिर है कि औद्योगिक घरानों से ये मदद खैरात में नहीं मिलती थी बल्कि बदले में उन्हें मदद पहुंचाई जाती थी. कारपोरेट जगत के राडिया जैसे लोग सेवाएं उपलब्ध कराने (मसलन ए. राजा को संचार मन्त्री बनवाना) के अपने हुनर में माहिर होते हैं. राजनेता कारपोरेट पूंजी का इस्तेमाल निजी और पारिवारिक हितों के लिए खैरात की तरह करते हैं जबकि उस काले धन को सफेद करने के लिए पारिवारिक संबंधों का सहारा लिया जाता है. इस तरह औद्योगिक घरानों का काला धन मनमाफिक फैसले करवाने और जजों तक को प्रभावित करने के काम आता है. अमर सिंह के टेप, महाजन प्रकरण तथा फिर राडिया टेप कांड में इसका सजीव और विस्तृत नज़ारा हमने देखा है.
सबसे बड़ी बात तो यह है कि, देश की आर्थिक एवं आंतरिक नीतियां ( जिनमें प्रमुख हैं - सेज कानून, पेटेन्ट कानून, नाभिकीय दायित्व कानून, आपरेशन ग्रीन हंट जैसे क्रूर कानून, और शिक्षा तथा स्वास्थ्य से भी जुड़े कानून ) बड़े पैमाने पर कारपोरेट हितों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही हैं.
राजनीतिक भ्रष्टाचार का सर्वाधिक शर्मनाक उदाहरण नाभिकीय सौदे के मसले पर संसद में विश्वास मत के दौरान नोट के बदले वोट प्रकरण में देखने को मिला. विकीलीक्स के खुलासों ने संप्रग सरकार पर लगे इस आरोप की पुष्टि कर दी है कि सरकार ने विश्वास मत जीतने के लिए सांसदों के वोट खरीदे और भारत-अमरीका नाभिकीय सौदे के लिए रास्ता तैयार किया. लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ही विकीलीक्स के खुलासों की असलियत को छिपाने की कोशिश रही है. आखिर कांग्रेसी नेताओं ने अमरीकी राजनयिकों को भारतीय संसद में वोट खरीदने की योजना के बारे में क्यों बताया, और यहां तक कि उन्हें पैसों से भरे ट्रंक भी क्यों दिखाए? ज़ाहिर है कि वे अपने अमरीकी आकाओं को आश्वस्त करना चाहते थे कि संप्रग सरकार को विश्वास मत जिताने और नाभिकीय सौदे पर मुहर लगवाने के लिए वे हर संभव प्रयास कर रहे हैं.
विकीलीक्स केबल का इससे भी बड़ा खुलासा यह है कि भारत की आर्थिक एवं विदेश नीति और कैबिनेट मंत्रियों के चयन तक में भी किस हद तक अमरीका का प्रभाव रहता है. 30 जनवरी 2006 को अमरीकी राजदूत डेविड सी. मलफोर्ड द्वारा वाशिंगटन भेजे गए अमरीकी दूतावास के एक केबल में कहा गया था कि मनमोहन सिंह सरकार ने जनवरी 2006 में अमरीका के हित में मणिशंकर अय़र को हटाकर मुरली देवड़ा को पेट्रोलियम मन्त्री बना दिया है. क्योंकि मणिशंकर अयर को ‘विवादित ईरान पाइप लाइन का खुला समर्थक’ कहा जा रहा था. मलफोर्ड ने यह भी कहा कि ‘संप्रग सरकार ने बड़ी संख्या में ( मुरली देवड़ा समेत ) ऐसे सांसदों को सरकार में शामिल किया है जो सार्वजनिक तौर पर अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी के पक्ष हैं, जिनमें भारत-अमरीका संसदीय फोरम के सात सांसद शामिल हैं. इस प्रकार कैबिनेट में किया गया यह फेरबदल भारत (और ईरान) में अमरीकी लक्ष्यों की पूर्ति के लिए बहुत उपयुक्त रहेगा, यह भारत-अमरीका संबंधों को तेजी से आगे बढ़ाने के मनमोहन सिंह सरकार के संकल्प को प्रमाणित करता है.’
विकीलीक्स के केबल खुलासों से यह तो जाहिर हुआ ही है कि भारत की आर्थिक नीतियों पर किस हद तक अमरीकी दखल है, बल्कि इससे यह भी साफ हो गया है कि भारत के मन्त्रीगण खुल्लमखुल्ला किसी न किसी औद्योगिक घराने के पोषक हैं! ऐसे ही एक केबल में अमरीकी विदेश मन्त्री हिलेरी क्लिंटन ने भारत के वित्त मन्त्री प्रणब मुखर्जी के बारे में सवाल उठाया है, प्रणब मुखर्जी किन औद्योगिक या व्यापारिक समूहों के एहसानमंद हैं ? वह अपनी नीतियों के माध्यम से किन्हें मदद पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं? जरा सोचिए, क्या हमें ऐसे ही वित्त मन्त्री की जरूरत है जो भारत की आम जनता के प्रति उत्तरदायी होने के बजाय कारपोरेट समूहों के प्रति कृतज्ञ हो!
हिलेरी क्लिंटन के केबल से यह भी पता चलता है कि अमरीका के लिए मंत्रियों से भी ज्यादा विश्वस्त व्यक्ति योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया हैं, जिन्हें प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह की ही तरह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुलाजिम माना जाता है. हिलेरी का सवाल यह है कि मोंटेक सिंह अहलूवालिया के होते हुए प्रणब मुखर्जी को वित्त मन्त्री क्यों बनाया गया?
विकीलीक्स के केबल इस बात के गवाह हैं कि यूपीए सरकार इजरायल और ईरान के साथ अपने संबंधों की वास्तविक प्रकृति के मामले में भारत की जनता से झूठ बोल रही है. ऐसे ही एक केबल में बताया गया है कि ईरान के साथ मधुर संबंध स्थापित करने की कोशिश सिर्फ जनता को दिखाने के लिए है, खासकर भारतीय मुसलमानों और गुट-निरपेक्ष आंदोलन के समर्थकों को खुश करने के लिए. एक अन्य केबल में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम. के. नारायणन को कथित तौर पर यह कहते हुए दिखाया गया है कि जब दूसरी बार आई.ए.ई.ए. में भारत ने ईरान के खिलाफ वोट करने का फैसला किया तो वे ‘घरेलू राजनैतिक हल्कों’ में इसकी प्रतिक्रिया को लेकर चिंतित हो गए थे.
केबल के अनुसार, अमरीकी प्रतिनिधियों ने भारत को चेतावनी दी थी कि आई.ए.ई.ए. में ईरान के खिलाफ वोट न करना नाभिकीय सौदे के लिए खतरनाक होगा. बाद की घटनाओं से साबित हो गया कि अमरीका से जैसे दिशा निर्देश मिले थे, मनमोहन सिंह सरकार ने बिल्कुल उसी के अनुरूप वोटिंग करके अपने अमरीकी आकाओं की खिदमत की. इन केबलों से सिर्फ रिश्वतखोरी के नहीं, बल्कि कहीं अध्कि संगीन मामलों के ताजा और ज्वलंत साक्ष्य मिले हैं- सबसे गंभीर आरोप यह है अमरीका की जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद भारत के हितों की अनदेखी की गई और लोकतंत्र को कमजोर किया गया. हमारे देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार का यह सबसे खतरनाक आयाम है, और इस भ्रष्टाचार का प्रतिरोध भारतीय राजसत्ता के बढ़ते हुए साम्राज्यवादी चरित्र का प्रतिरोध करना है.
मुख्य विपक्षी दल भाजपा को सरकारी नीतियों पर कारपोरेट और साम्राज्यवादी प्रभाव से कोई फर्क नहीं पड़ता. आखिर भाजपा समेत सभी शासक वर्गीय पार्टियां कारपोरेट धन की एक ही छूत की बीमारी से ग्रस्त हैं, और वे सभी ऐसा कुछ नहीं कर सकतीं जिससे कारपोरेट हितों को खतरा हो. राडिया के टेपों से ऐसे कई प्रसंग सामने आए हैं जिनमें भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भी निष्ठापूर्वक कारपोरेट हितों की रक्षा की.
विकीलीक्स के केबलों से भाजपा का दोमुंहापन बेनकाब हो गया है, इससे यह प्रमाणित हो गया है कि अमरीका की जी-हुजूरी के मामले में भाजपा और कांग्रेस दोनों एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने अमरीकी प्रतिनिधि को आश्वस्त किया कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन द्वारा अमरीका की जी-हुजूरी की आलोचना करने वाला भाजपा का राजनैतिक प्रस्ताव ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाएगा क्योंकि यह यूपीए के खिलाफ माहौल बनाने के लिए राजनैतिक भाषणबाजी मात्र है. एक अन्य केबल में बताया गया है कि लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि नाभिकीय सौदे पर भाजपा का कथित विरोध महत्वहीन है और आश्वासन दिया कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो नाभिकीय समझौते समेत भारत-अमरीका संबंधों की निरंतरता बनी रहेगी. एक अन्य केबल में नरेन्द्र मोदी को अमरीकी वीजा न दिए जाने पर वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली को यह शिकायत करते हुए दिखाया गया है कि जिस पार्टी ने अमरीका-भारत संबंधों की नयी शुरुआत की, उसी पार्टी के खिलाफ अमरीका द्वारा ऐसी कार्रवाई किए जाने से वे हतप्रभ हैं. इसी केबल में जेटली को विधिक सेवाओं तक के मामले में एफ डी आई पर विवाद करते हुए दिखाया गया है. अहम बात यह है कि पूरे साक्षात्कार के दौरान मोदी को वीजा न दिए जाने के मसले पर विरोध जताने के अलावा जेटली लगातार ‘विनम्र’ रहे, और इसी के मद्देनजर अमरीकी दूतावास के प्रतिनिधि ने व्यंग्य किया कि जेटली को अमरीका के साथ अपने निजी और व्यावसायिक संबंधों की कीमत अच्छे से पता है. (क्योंकि कई अमरीकी उद्योगपति उनके मुवक्किल हैं.)
जनता के बीच अपने राष्ट्रवादी मुखौटे के बावजूद भाजपा जिस प्रकार अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ करने को तैयार रहती है, उसी प्रकार भ्रष्टाचार विरोधी ढोंग के साथ वह नव उदारवादी नीतियों तथा कारपोरेट हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्व है.
जहां एक ओर विकीलीक्स केबल ने भाजपा की स्वदेशी छवि और यूपीए की अमरीकापरस्त नीतियों के विरोध के दावों के भ्रामक मुखौटों को उतारने का काम किया, वहीं दूसरी ओर उसकी ‘हिन्दुत्व’ की ‘अवसरवादी’ राजनीति भी बेनकाब हो गई. (‘अवसरवादी’ शब्द का प्रयोग खुद जेटली ने ही अमरीकी प्रतिनिध के साथ बातचीत के दौरान किया था) जेटली ने अमरीकी प्रतिनिध को उदाहरण के तौर पर बताया कि भारत के उत्तर-पूर्व में हिन्दुत्व का मुद्दा अच्छी तरह चलता है क्योंकि लोग बांग्लादेश से मुसलमानों के अवैध आगमन से चिंतित रहते हैं. भारत-पाक संबंधों में हाल में हुई प्रगति के चलते अब नई दिल्ली में हिंदू राष्ट्रवाद का स्वर धीमा पड़ गया है, लेकिन अगर भारतीय संसद पर सीमापार से कोई आतंकवादी हमला हो जाए तो फिर से स्थितियां बदल सकती हैं. जेटली की इस बेबाक टिप्पणी से पता चलता है कि भाजपा को संसद पर आतंकी हमले से भी कोई परहेज नहीं है क्योंकि इससे हिंदुत्व की राजनीति के लिए उर्वर जमीन तैयार होगी!
अपनी ही खेमेबाज नीरा राडिया के टेपों के कारण देश के अब तक के सबसे बुरे भ्रष्टाचार के मामले से बिंधे रतन टाटा ने घायल शहीद बनने का रास्ता अख्तियार किया. एक मीडिया हाउस से प्रसारित ‘वाक द टाक शो‘ में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता के साथ साक्षात्कार में टाटा ने कहा कि भारत के ‘क्रोनी पूंजीवादी’ तथा ‘बनाना रिपब्लिक’ (अस्थिर लोकतंत्र) बन जाने का खतरा है. टाटा ने यह बात ओबामा के उस बधाई संदेश के ठीक अगले दिन कही जिसमें विश्व मंच पर उभरने के लिए भारत को बधाई दी गई थी. क्रोनी पूंजीवाद की बात कहते समय क्या टाटा का आशय यह था कि मन्त्री, सत्तारूढ़ और विपक्षी दल, जज और मीडिया वाले सभी कारपोरेट खेमेबाजों की मुट्ठी में हैं? ‘बनाना रिपब्लिक’ की बात कहकर क्या वे इस चिंताजनक स्थिति की ओर ध्यान दिलाना चाह रहे थे जिसमें अति धनाढ्य कारपोरेट घराने, सरकारों तथा साम्राज्यवादी ताकतों के साथ गठजोड़ करके बेखौफ कानून तोड़ने, लोकतंत्र को कमजोर करने और देश के बहुमूल्य संसाधनों की लूट में कामयाब हो जाते हैं (जैसा कि लैटिन अमेरिका के असली ‘बनाना रिपब्लिक्स’ में हुआ था जहां लोकतंत्र बाहरी पूंजी के प्रभाव में पूरी तरह से अस्थिर हो गया था?) बिल्कुल नहीं. टाटा के कहने का मतलब तो सिर्फ इतना भर था कि एक कारपोरेट खेमेबाज की ‘निजता’ में खलल पड़ा है और उसके फोन टेप किए गए हैं और फिर (लीक होकर) टेप मीडिया के पास पहुंच गए. (उनके कहने का मतलब ये है कि टेप टाटा को कलंकित करने और उनके किसी प्रतिद्वंद्वी कारपोरेशन को लाभ पहुंचाने के लिए लीक हुए).
टाटा ने यहां तक चेतावनी दे डाली कि अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या किसी अन्य तथाकथित लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर लोकतंत्र के सुख भोग (लक्जरी आफ डेमोक्रेसी) का इसी तरह दुरुपयोग किया गया तो भारत एक ऐसा देश बन जाएगा जहां लोग बगैर किसी वाजिब साक्ष्य के जेल जाएंगे या जहां-तहां उनकी लाशें पायी जाएंगी. दिलचस्प बात यह है कि टाटा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों तथा खुद लोकतंत्र को ‘सुख भोग’ कहा ! सिंगूर के किसान और कलिंगनगर के आदिवासी, टाटा को इस मामले में कुछ नमूने दिखा सकते हैं कि जमीन दखल जैसे बड़े कारपोरेट हितों को चुनौती देने वाले कार्यकर्ता और राजनीतिक विरोधी किस तरह बगैर साक्ष्य के जेल भेजे जाते हैं, और फिर खेतों में उनकी लाशें मिलती हैं या पुलिस वालों द्वारा उनकी नृशंस हत्या कर दी जाती है. अपनी जीविका और जिंदगी बचाने के लिए कारपोरेट भू-अधिग्रहण के खिलाफ प्रतिरोध करना टाटा की नजरों में ‘लोकतंत्र की विलासिता’ है, और किसानों तथा आदिवासियों को इसका कोई हक नहीं है, जबकि टाटा जैसे अति धनाढ्य उद्योगपति ‘निजता के लोकतांत्रिक अधिकार’ का आनंद लेते हैं और ‘निजता की रक्षा’ के नाम पर साक्ष्य दबाने के लिए कोर्ट भी जा सकते हैं.
राडिया के टेप और विकीलीक्स केबल के साक्ष्य असल में इस बात के संकेत हैं कि भारत ‘बनाना रिपब्लिक‘ बनने की तरफ कदम बढ़ा चुका है, जहां औद्योगिक और साम्राज्यवादी ताकतें लोकतंत्र को कमजोर करती हैं और कॉरपोरेशनों के ‘अधिकारों’ की रक्षा के लिए जनता के अधिकार दबा दिए जाते हैं. अगर तत्काल नव उदारवादी नीतियों को रोका नहीं गया तो भारत सचमुच बनाना रिपब्लिक बन जाएगा. लैटिन अमेरिका के तत्कालीन ‘बनाना रिपब्लिक्स’ में एक नई चेतना आ रही है. लोकप्रिय आंदोलनों तथा सरकारों के माध्यम से वे साम्राज्यवाद को कड़ी चुनौती दे रहे हैं. क्या भारत उनसे कोई सीख लेकर अपनी स्वतंत्रता और लोकतंत्र तथा अपने संसाधनों की नव उदारवादी और साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध खड़ा करेगा?
पूरे देश भर में सरकार के साथ गठजोड़ करके व्यापारिक घरानों ने बड़े पैमाने पर खेतों तथा जंगल की जमीन पर खनन, भवन निर्माण तथा विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं और उद्योगों के लिए कब्जा जमा लिया है. हर मामले में बड़े पैमाने पर जमीन संबंधी कानून तोड़े गए और सरकारी कर्मचारी उस ओर से आंखें मूंदे रहे. लेकिन इस प्रकार के भ्रष्टाचार को सबसे ज्यादा शह पुलिसिया लाठियों, गोलियों और क्रूर कानूनों की ताकत ने दी है. और अगर किसी ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो उसे भयानक दमन झेलना पड़ा है.
जिन आदिवासियों और किसानों ने अपनी जमीने खो दीं, अपनी रोजी-रोटी और जीने के साधन गंवा दिए, उन्होंने स्वाभाविक तौर पर एक जबर्दस्त आंदोलन खड़ा किया. कलिंगनगर, जगतसिंहपुर, दादरी, सिंगूर, नंदीग्राम, सोमपेटा, श्रीकाकुलम आदि अनेक स्थानों पर उन पर पुलिस फायरिंग, नृशंस लाठीचार्ज और योजनाबद़्र तरीके से राजनैतिक हमले किए गए जिससे कई लोग हताहत हुए. जमीन दखल किए जाने के विरोध का यह व्यापक जनसंघर्ष माओवादी प्रकृति का नहीं था, बल्कि यह जनता का अपना प्रतिरोध था. लेकिन भू-अधिग्रहण के खिलाफ जनसमुदाय के बढ़ते प्रतिरोध पर ‘माओवादी’ छाप लगा दी गई. आदिवासियों को सीधे-सीधे जंगलों अर्थात उनके घरों से निकाल कर मारा जा रहा है. छत्तीसगढ़ में माओवाद से संघर्ष के नाम पर सलवा जुड़ूम नामक निजी लड़ाकों ने हजारों आदिवासियों को विस्थापित कर दिया है, और बलात्कार, हत्या, आगजनी तथा सामूहिक संहार की कई घटनाओं को अंजाम दिया है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा माओवादी हिंसा से निपटने के लिए ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ नामक एक सैन्य ऑपरेशन शुरू किया गया है. लेकिन यह साफ हो गया है कि माओवाद की तो आड़ ली जा रही है, असली निशाना तो जनप्रतिरोध को कुचलना है, ताकि कॉरपोरेट घराने आराम से अपनी लूट जारी रख सकें. बिनायक सेन जैसे लोग, जिन्होंने कॉरपोरेट लूट और सरकारी दमन की नीति की आलोचना की, उन्हें ‘राजद्रोही’ कह कर आतंकवादियों के समकक्ष रखते हुए जेल में डाल दिया गया. बिनायक सेन उन हजारों कार्यकर्ताओं और आम लोगों में से सिपर्फ एक व्यक्ति हैं जो संसाधनों की कॉरपोरेट लूट के खिलाफ आवाज उठाने के जुर्म में क्रूर कानूनों के तहत जेल में डाले गए हैं.
उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृह मन्त्री पी. चिदम्बरम जिन्होंने ऑपरेशन ग्रीन हंट को शुरू किया, वे खुद 2004 में वित्त मन्त्री बनने के एक दिन पहले तक बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी वेदान्ता के एक निदेशक हुआ करते थे.
चिदम्बरम का एजेंडा और सोच गृह मंत्रालय द्वारा खुफिया जानकारियों के डाटाबेस के एकीकरण के लिए बनाए गए नेशनल ग्रिड के अध्यक्ष और महिंद्रा स्पेशल ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैप्टन रघु रामन के विचारों में भी दिखाई देता है. एक रिपोर्ट में रघु रामन ने यह जोरदार सुझाव दिया कि कारपोरेट घरानों के लिए सुरक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने का यह सही समय है. इस विचार के समर्थन में उन्होंने इजरायल, अमेरिका और अन्य देशों का उदाहरण दिया जहां निजी सुरक्षा ठेकेदार सुरक्षा उपलब्ध करा रहे हैं. उन्होंने प्रस्ताव किया कि व्यापारिक घरानों को अपनी निजी प्रांतीय सेनाऐं बनाने की अनुमति दी जाए. अंत में उन्होंने यह भी कहा कि व्यापार जगत के राजागण अब अगर खुद अपने साम्राज्य की रक्षा करना शुरू नहीं करेंगे तो स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो जाएगी.”
व्यापारिक घरानों द्वारा निजी प्रांतीय सेना रखने का विचार कोई दूर की कौड़ी नहीं है, क्योंकि आखिर बस्तर, रायगढ़, सिंगूर या जगतसिंहपुर में क्या हो रहा है? सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की मदद से व्यापारिक घरानों ने निजी सशस्त्र समूह खड़े किए हैं और उनका इस्तेमाल प्रतिरोध करने वालों को डराने-धमकाने में किया जाता है. ऑपरेशन ग्रीन हण्ट भी भारत में व्यापारिक राजाओं के साम्राज्य की रक्षा में सरकारी पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के खुले इस्तेमाल का स्पष्ट उदाहरण ही तो है.
पेशे से डाक्टर और मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन को उपनिवेशकालीन राजद्रोह कानून के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. वे आपरेशन ग्रीन हण्ट, कारपोरेट लूट और सल्वा जुडूम के खिलाफ बोलने वाले लोगों में से एक हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ‘राजद्रोह’ का कोई सबूत न होने के कारण उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. हमारे देश में भ्रष्टाचार और कारपोरेट लूट के खिलाफ लड़ने वाले हजारों नागरिक राजद्रोह और एएफएसपीए व यूएपीए जैसे बर्बर कानूनों के तहत जेलों में बंद हैं.
जेल से रिहा होने के तुरंत बाद बिनायक सेन ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिसमें मध्यम वर्गीय लोगों की अच्छी भागीदारी रही थी, के बारे में कहा कि "क्रोनी पूंजीवाद लम्बे समय से यहां मौजूद है, लेकिन हाल के वर्षों में सामाजिक विषमतायें तेजी से बढ़ी हैं. इतने बड़े पैमाने पर हो रहे भ्रष्टाचार से जनता तंग आ चुकी है ... (मणिपुर में) इरोम शर्मिला ने इस तथ्य की ओर इशारा किया है कि (एएफएसपीए के खिलाफ) दस वर्षों से चल रहे उसके आमरण अनशन के बावजूद कुछ बदला नहीं है. उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही है. परन्तु ... भ्रष्टाचार विरोधी लोगों ने जो करने की कोशिश की है ... वह बहुत महत्वपूर्ण और अति आवश्यक है." (टाइम्स आफ इण्डिया, क्रैस्ट एडीशन, 23 अप्रैल 2011) उन्होंने राजद्रोह कानून के बारे में भी कहा, "वर्तमान कानून औपनिवेशिक शासन से आया है. हमें देश व भारत की जनता के प्रति निष्ठा की बेहतर परिभाषा की आवश्यकता है जो एक आजाद देश के आजाद नागरिक की स्थितियों के अनुरूप हो."
राजद्रोह कानून (आईपीसी की धरा 124 ए), एएफएसपीए, छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्यूरिटी एक्ट 2005, यूएपीए के व्यापक और कठोर प्रावधान - ये सभी कानून अपनी अंतर्वस्तु में लोकतंत्र की मूल अवधारणा से मेल नहीं खाते.
जागरूक लोगों की राय और जनप्रतिरोध के कारण बिनायक सेन को जमानत मिल सकी परन्तु बहुत से अनाम बिनायक आज भी न्याय मिलने का इन्तजार कर रहे हैं. जनप्रतिरोधों के तेज होते जाने के कारण सरकार को मजबूरन भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल बिल बनाने के लिए मान लेना पड़ा. अब जरूरत है कि वही जनता इस तरह के खतरनाक कठोर कानूनों को भी वापस लिये जाने की मांग को लेकर आवाज उठाये, जो कि हमारे संवैधनिक अध्किारों और स्वतंत्रता का मखौल बनाते हैं और जिनका इस्तेमाल कार्यकर्ताओं व उन आम लोगों के विरुद्व किया जाता है जो किसी भी प्रकार से कारपोरेट लूट और दमन को चुनौती देते हैं. जरूरी है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता कन्धे से कन्धा मिला कर आगे बढ़ें और भ्रष्टाचार और दमन से मुक्त लोकतांत्रिक भारत का झण्डा लहरायें!
(प्रशांत भूषण के लेख - जन लोकपाल बिलः कुछ सरोकार - द हिन्दू, 15 अप्रैल 2011) - से कुछ अंश. (प्रशांत भूषण उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ता और लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए गठित कमेटी के सदस्य हैं.)
भारत में भ्रष्टाचार बेहद चिन्ताजनक रूप से बढ़ चुका है, क्योंकि नीतियों ने इसे पनपने और फैलने के लिए पर्याप्त अनुकूल वातावरण बना दिया है. साथ ही ऐसी कारगर और प्रभावशाली संस्थाओं, जो सही जांच व भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्यवाही कर सकें, की गैरमौजूदगी भी इसके पीछे है. उदारीकरण और निजीकरण के नाम में भारत ने जिन नीतियों को अपनाया उनके माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक सम्पत्ति (खनिज संसाधन, तेल, गैस, स्पैक्ट्रम आदि) के, बिना किसी पारदर्शिता या सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया को अपनाये, निजीकरण के रास्ते खोल दिये. सरकारों ने रातों-रात निजी कारपोरेशनों के साथ ऐसे समझौता प्रपत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए जिनके तहत खनिज सम्पदा, जंगलों और जल से समृध्द भू-भागों की लीज दे दी गई. इससे संसाधनों के वास्तविक कीमत के 1 प्रतिशत से भी कम की रायल्टी सरकार को देकर निजी कारपोरेशनों को इनका दोहन करने और बेचने के अधिकार मिल गये.
कर्नाटक के लोकायुक्त न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े ने कर्नाटक में खनन पर दी गई रिपोर्ट में इस तथ्य पर रोशनी डाली है कि इस तरह के उद्यमों में मुनाफे की सीमा 90 प्रतिशत से भी अधिक होती है. जिससे बड़ी मात्रा में घूसखोरी की सम्भावनायें प्रबल होती हैं, साथ ही इससे भ्रष्टाचार को फलने-बढ़ने का मौका भी मिलता है. ठीक यही उदाहरण हमने ए. राजा के मामले में देखा जहां बगैर किसी सार्वजनिक नीलामी की प्रक्रिया के निजी संस्थानों को बाजार मूल्य के 10 प्रतिशत से भी कम पर स्पेक्ट्रम बेच दिया गया. बिजली, पानी, हवाई अड्डों का विकास और ऐसी अनगिनत सेवाओं में निजी एकाधिकारों को स्थापित किया जो नियन्त्राक को घूस दे कर और मनमाने दाम वसूल कर बेतहाशा अनुचित मुनाफा कमा सकते हैं.
हवाई अड्डा विकास, राजमार्गों का निर्माण, विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजे़ड) आदि की आड़ में दसियों हजार हेक्टेयर भूमि निजी कम्पनियों को व्यवसायिक उपयोग के लिए दे दी गई है. और वह भी इन भू-खण्डों के वास्तविक मूल्य के 10 प्रतिशत से भी कम मूल्यों पर.
ये नीतियां न सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए बड़े पैमाने पर अनुकूल माहौल बनाती हैं, बल्कि लाखों-लाख की संख्या में गरीब मेहनतकशों के जबरिया विस्थापन के लिए भी जिम्मेदार हैं. भुखमरी की कगार पर छोड़ कर उनमें से कईयों को माओवादियों के साथ जाने को विवश कर देती हैं. मुनाफाखोरों ने भूमि और प्राकृतिक संपदा का बेतहाशा दोहन किया है (साथ ही उसके उत्पादों की अच्छी खासी मात्रा का निर्यात किया है) और पर्यावरण को नष्ट किया है. इस प्रकार के सौदों के कारण ऐसे भीमकाय निजी कारपोरेशन बन गये हैं जो इतने ताकतवर और प्रभावशाली है कि वे लगभग सभी सत्ता संस्थानों को प्रभावित करने और उन पर अपना नियंत्राण कायम करने की स्थिति में आ गये हैं - राडिया टेपों से यह बात जगजाहिर हो चुकी है.
भ्रष्टाचार के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करने वाली नीतियों को अपनाने के साथ हमने भ्रष्टाचार पर रोक लगाने, जांच करने और भ्रष्टाचारियों को दण्डित करने के लिए जरूरी प्रभावकारी संस्थानों का निर्माण नहीं किया ...
... जन लोकपाल बिल का मसौदा एक ऐसी संस्था के गठन की दिशा में है जो मोटे तौर पर पुलिस से अलग हो और ऐसी शक्तियों से सम्पन्न हो कि स्वतंत्र रूप से जांच करने और सभी जन सेवकों (मन्त्री, सांसदों, नौकरशाहों, जजों आदि सहित) और अन्य ऐसे सभी लोगों जो उन्हें भ्रष्ट करने के अपराधी हैं, के विरुध्द अभियोग चलाने में सक्षम हो ...
... लेकिन किसी को भी इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि लोकपाल कानून अपने आप में भ्रष्टाचार की समस्या का समाधन है. जब तक हम उन नीतियों को चुनौती देकर नहीं बदल डालते हैं जो बड़े पैमाने पर भारी भ्रष्टाचार के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती हैं तथा दैत्याकार निजी कारपोरेशनों को इस तरह पनपने का मौका दे रही हैं कि वे अब किसी भी संस्थान के नियंत्रण बाहर जा चुके हैं, यह जंग अधूरी ही रहेगी. न्यायपालिका में भी समग्र सुधारों की आवश्यकता है.
प्रभावी रूप से भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और सशक्त लोकपाल का होना बेहद जरूरी है, यद्यपि सिर्फ इतना ही पर्याप्त नहीं है. आइये इसके माध्यम से कम से कम एक शुरूआत तो की जाय.”