संपादक : दीपंकर भट्टाचार्य और कविता कृष्णन
लिबरेशन पब्लिकेशन्स
चारु भवन, यू-90 शकरपुर,
दिल्ली – 110092
फोन: 011-42785864
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कामरेड विनोद मिश्र की चुनी रचनाओं को केन्द्रीय स्तर पर हिन्दी और अंग्रेजी में यथाशीघ्र प्रकाशित करने के सम्बंध में केन्द्रीय कमेटी द्वारा लिये गये निर्णय के अनुसार 1999 में अंग्रेजी एवं हिंदी में संकलित रचनाओं का प्रकाशन हुआ था. जहां अंग्रेजी संस्करण एक ही खंड में समाहित था वहीं हिंदी संस्करण दो खंडों में प्रकाशित किया गया. इसके बाद बांगला में भी कामरेड वी एम की संकलित रचनाओं का प्रकाशन हुआ.
दो खंडों में प्रकाशित हिंदी में संकलित रचनाओं में केवल अंग्रेजी संस्करण से अनूदित लेख ही शामिल नहीं हैं. बल्कि, जैसा कि 1999 के संस्करण के प्रकाशकीय में लिखा गया था : “पार्टी के नेतृत्व में चल रहा गांव के गरीबों, खेतिहर मजदूरों का आंदोलन बिहार में नवजागरण का बायस बनने लगा है. हमने पाया कि हाल के दिनों में बिहार को लेकर लिखे या विभिन्न सभाओं, सम्मेलनों, सेमिनारों में दिए गए भाषण-वक्तव्यों में, गरीब किसानों-खेतिहर मजदूरों के आंदोलनों को केन्द्र कर बिहार में एक नवजागरण सृजित करने की चिंता केन्द्रीय चिंता है. जिसे वे खुद 1974 आंदोलन की आत्मा को पुनर्सृजित करना कहते हैं. बाद की रचनाओं में यह अनुगूंज लगातार सुनाई पड़ती है. ... चुनी हुई रचनाओं के संकलन को जब हिन्दी में प्रकाशित करने की बारी आई तो यह जरूरी लगा कि उस काम को भी इसमें समाहित कर लिया जाए. सो हमें ऐसे कई लेखों, खासकर भाषणों को इसमें शामिल करना पड़ा जो अंग्रेजी संस्करण में नहीं हैं.”
कामरेड विनोद मिश्र की संकलित रचनाओं के हिंदी में छपे दोनों खंड अब दुष्प्राप्य हैं. जबकि पार्टी कतारों के लिये, खासकर पार्टी में लगातार आने वाली नई पीढ़ी के लिये ये रचनाएं अत्यंत आवश्यक हैं. इसी उद्देश्य से कामरेड विनोद मिश्र के निधन की पन्द्रहवीं बरसी पर केन्द्रीय कमेटी ने हिंदी में द्वितीय संस्करण प्रकाशित करने का निर्णय लिया. इस बार हमने दोनों खंडों को एकसाथ मिलाकर छापा है और साथ ही अंग्रेजी से कुछ बची रचनाओं तथा बंगला संस्करण में छपे कुछेक लेखों को भी इसमें शामिल कर लिया है. साथ ही पिछले संस्करण में अनुवाद सम्बंधी कुछेक त्रुटियों के संशोधन का प्रयास किया गया है. संकलन के प्राक्कथन में कोई परिवर्तन इस संस्करण में नहीं किया गया है.
अगस्त 2022
संपादक : दीपंकर भट्टाचार्य और कविता कृष्णन
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विषय सूचि :
भारत का उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष या आजादी का आंदोलन मुल्क के इतिहास का एक लम्बा और बहुरंगी अध्याय है. इस आंदोलन की चादर हज़ारों संघर्षों के धागों से बुनी गई है जिन्होंने आधुनिक भारत की खोज को गहन और समृद्ध बनाया. अलग-अलग वक्तों में, अलग-अलग इलाक़ों में तात्कालिक मुद्दों और संदर्भों के लिहाज से चाहे ज़मींदारों, सूदख़ोरों व स्थानीय राजाओं के खिलाफ चले आंदोलन हों, जाति और जेंडर के आधार पर होने वाले दमन और अन्याय के खिलाफ चले आंदोलन हों या भाषाई हकों और सांस्कृतिक विविधता के लिए चले आंदोलन हों, सभी ने आजादी के आंदोलन के आवेग और फलक को और ज्यादा बड़ा ही बनाया. गांधीवादियों और अंबेडकरवादियों से लेकर विभिन्न कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट धाराओं तक, विभिन्न विचारधाराओं की अगुवाई में जो गोलबंदी और संघर्ष के बहुत सारे तरीके अपनाए गए थे, सभी से मिलकर ही भारत की आजादी के आंदोलन की विराट धारा बनी थी. विडम्बना यह है कि एक धारा, जो आजादी के आंदोलन से साफ़-साफ़ गायब थी, और उस दौर में हिंदू श्रेष्ठता के आधार पर भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करने के अपने प्रोजेक्ट में लगी हुई थी, वही आज सत्ता पर काबिज है और आजादी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ मना रही है.
भारत में अंग्रेजी उपनिवेश के उभरने और उसके वर्चस्व का इतिहास तीन शताब्दियों से अधिक का है- पहला दौर अंग्रेजों के व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ाने, ईस्ट इंडिया कम्पनी के जाल को फैलाने से लेकर 1757 के प्लासी युद्ध तक का है, दूसरा दौर सौ सालों (1757-1858) तक चले कम्पनी राज और उसके बाद 1858 से 1947 तक सीधे अंग्रेजी राज के मातहत होने का है. क्रूर लूट और डाके पर टिके हुए औपनिवेशक अंग्रेजों के दमन और छल वाले राज के खिलाफ लगातार आंदोलन होते रहे, बार-बार विद्रोह होते रहे, जिसकी पहली अभिलिखित अभिव्यक्ति तिलका माँझी की अगुवाई में हुआ 1784 का आदिवासी विद्रोह था. प्रतिरोध आंदोलनों का यह समूचा इतिहास भारत की आजादी का आंदोलन माना जाना चाहिए.
1757 का प्लासी और 1764 में बक्सर युद्ध के बाद उत्तर भारत में कम्पनी राज बेहद मजबूत हुआ. इसे और मज़बूती देने के लिए अंग्रेज शासकों ने स्थायी बंदोबस्त या कार्नवालिस कानून के जरिये वफ़ादार ज़मींदारों का एक वर्ग तैयार किया. पर इस उपनिवेशवाद और ज़मींदारी चलन और उनसे जुड़ी सूदख़ोरी व्यवस्था की बहुसंख्य ग्रामीण आबादी ने, खासकर किसानों और आदिवासियों ने जमकर मुख़ालफ़त की. इस निज़ाम के खिलाफ लगातार फूटती बग़ावतें 1855 के हूल विद्रोह और 1857 की महान बग़ावत के साथ नई ऊँचाई पर पहुँचीं, जिसके बाद अंग्रेज सरकार को न सिर्फ भारत को कम्पनी की बजाय अपनी हुकूमत में शामिल करना पड़ा बल्कि अपनी रणनीति में कई बदलाव भी करने पड़े.
1857 की महान बग़ावत ने अंग्रेज शासन के सामने दो मुख्य चुनौतियाँ पेश कीं. अंग्रेजों की उम्मीद के उलट 1857 ने यह दिखा दिया कि हिंदू-मुसलमान एक साथ आ सकते थे, और टूटी-बिखरी भारतीय राजनीति के बावजूद लोग इकट्ठा हो सकते थे. उनकी उम्मीद के उलट मुल्क में राष्ट्रीय जागरण की विराट सम्भावना बन गयी थी जिसमें हिंदू और मुसलमान सिपाही, किसान, व्यापारी और यहाँ तक कि कुलीन तबका भी अंग्रेज-राज की मुख़ालफ़त में साथ-साथ था. 1857 के बाद इसी लिहाज से उन्होंने 'बाँटो और राज करो' की नीति अपनाई और राजे-रजवाड़ों (प्रिंसली स्टेटों) को अपना विश्वस्त सहयोगी बनाया. निश्चित ही आजादी के आंदोलन ने इस 'बाँटो और राज करो' की नीति के खिलाफ 'एकजुटता और प्रतिरोध' की नीति अपनाई पर बावजूद इसके वह विभाजन की भयावह त्रासदी को रोकने में नाकामयाब रहा. विभाजन की इस त्रासदी के साथ कत्लो-गारत, ज़बर्दस्ती पलायन, तबाही और विनाश की कहानी हमारे इतिहास में दर्ज है. 'बाँटो और राज करो' की नीति आगे बढ़ती हुई 'बँटवारे और पलायन' तक पहुँच गयी.
आज भाजपा के जरिये भारत पर शासन करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी विचारधारा और दृष्टि को सत्ता की विचारधारा की तरह मुल्क पर लादना चाहता है. जहां मोदी सरकार आजादी के आंदोलन के कई नेताओं को अपने खेमे के लिहाज से बना लेने में जोर लगाए हुए है और कुछ को तोड़-मरोड़ कर, बिगाड़ कर पेश कर रही है, वहीं संघ चाहता है कि भारत की आजादी के आंदोलन के इतिहास को सिर्फ विभाजन के जख्मों तक सीमित कर दिया जाए. बड़ी चालाकी से ये लोग आजादी के आंदोलन में संघ और हिंदुत्व के दूसरे तथाकथित नायकों की घटिया भूमिका के सच पर पर्दा डाल देना चाहते हैं. यह पूरा हिंदुत्व गिरोह आजादी के आंदोलन से गायब रहा, इसके सबसे बड़े प्रतीक सावरकर अब इस बात के लिए याद किए जाते हैं कि उन्होंने अंग्रेज सरकार को आधा दर्जन माफ़ीनामे लिखे थे, जबकि संघ, मुसोलिनी और हिटलर के क़सीदे काढ़ रहा था. गोलवलकर ने लिखा कि कैसे भारत को 'नस्लीय शुद्धता और गर्व' के हिटलर के नाज़ी जर्मनी के मॉडल का अनुकरण करते हुए उसका फ़ायदा उठाना चाहिए. सावरकर ने हिंदू भारत का ऐसा मॉडल बताया जिसमें सारी राजनैतिक और सैन्य ताकत वे लोग हासिल करेंगे जिनका जन्म भी इस देश में हुआ हो और जो इस देश में जन्मे धर्म को भी मानते हों.
भारत विभाजन के जवाब में संघ, अखंड भारत की बात करता है जिसमें 1947 से बने सिर्फ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं बल्कि उत्तर-पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान, उत्तर-पूर्व में म्यांमार, दक्षिण में श्रीलंका तथा उत्तर में नेपाल, भूटान और तिब्बत तक शामिल हैं. जर्मनी में जैसा राष्ट्रों का एकीकरण हुआ या जैसे कि कोरिया के एकीकरण की इच्छा का मामला है, संघ की वैसे एकीकरण की कोई इच्छा नहीं. बल्कि यह उसी तरह का विस्तारवादी साम्राज्यवादी सपना है जैसा पुतिन का विस्तृत रूस का सपना है जो यूरेशियन साम्राज्य के केंद्र में होगा. यह अखंड भारत इतिहास में कभी भी अस्तित्व में नहीं रहा. यह सिर्फ़ पुराने मिथकीय वैभव वाला कल्पित अतीत का ज़हरीला सपना है, जो लोगों की रोजमर्रा की तबाहियों और मुश्किलों से उनका ध्यान भटकाने के लिए दिखाया जा रहा है.
भारत और पाकिस्तान पचहत्तर सालों से अलग-अलग मुल्क हैं, बांग्लादेश की उम्र भी पचास साल से ऊपर हुई. साझे अतीत और साझा हितों को ध्यान में रखते हुए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश, ये तीन मुल्क निश्चित ही एक महासंघ के बारे में सोच सकते हैं जो अभी के लगभग निष्क्रिय और बेकाम सार्क (एसएएआरसी) की तुलना में दक्षिण एशिया में आपसी सहयोग के ज्यादा गतिशील और ऊर्जावान ढाँचे की राह ले. संघ के अखंड भारत के नुस्ख़े से दक्षिण एशिया में लगातार टकराव बना रहेगा और इससे भारत अपने पड़ोसियों से और अधिक अलगाव में जा पड़ेगा. पुराने अविभाजित भारत को ज़िंदा करने की तो छोड़ ही दीजिए, अगर कट्टर और एकरूप राजनैतिक हिंदुत्ववाद के आधार पर भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित किया जाएगा तो भारत की मौजूदा राष्ट्रीय एकता भी ख़तरे में पड़ जाएगी.
संविधान में वादा किया गया था कि अधिकारों की हर हाल में हिफ़ाज़त होगी, गहन लोकतंत्र होगा, स्वतंत्रता, बराबरी, भाईचारे पर कोई आँच नहीं आएगी और समग्र न्याय मिलेगा. हालाँकि ऐसा नहीं हो सका है पर हमारे संविधान की प्रस्तावना घोषणा करती है कि भारत का मूल मिज़ाज एक आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य का है.
पहले विश्वयुद्ध और रूसी क्रांति के बाद, और ठोस तरीक़े से कहिए तो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान और उसके बाद की कहानी में भारत की आजादी का आंदोलन अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेशवाद विरोधी, फासीवाद विरोधी जागरण का हिस्सा बन गया. 1947 में अंग्रेजी उपनिवेशवाद के भारत से भागने और 1949 में नए चीन के उदय ने पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध के अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक नक्शे को बदल कर रख दिया. इस बदले हुए अंतर्राष्ट्रीय माहौल में ही आधुनिक भारत की एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में यात्रा शुरू हुई थी.
'नियति से साक्षात्कार' (ट्रिस्ट विद डेस्टिनी) के पचहत्तर सालों बाद आज भारत एकदम अलग रास्ते और उल्टी दिशा में बढ़ रहा है. 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और 2019 की जीत के बाद संघ-भाजपा को इतनी मजबूती मिली है कि अब वे भारतीय राज्य के ढाँचे की मूलभूत चीजों को बदल रहे हैं. अब सत्ता के प्रबंधक विधायिका और न्यायपालिका पर ढिठाई से वर्चस्व क़ायम कर रहे हैं और संविधान के सिद्धांतों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है. राज्य और नागरिकता से धर्म के अलगाव के सिद्धांत को पूरी तरह त्याग दिया गया है. नई संसद के साथ ही लोकतंत्र को एक नए कट्टर दौर में धकेल दिया गया है जहां सामान्य आलोचना और विपक्ष को 'असंसदीय' करार दे दिया गया है. अगर 'आपातकाल' लोकतंत्र के दमन और बर्ख़ास्तगी का अनुभव था तो आज हम 'स्थाई आपातकाल' की हालत में पहुँच गए हैं. पुराने आपातकाल में सिर्फ राजसत्ता ही दमनकारी थी, इसका नया अवतार गोदी मीडिया और गलियों-चौराहों पर चिंघाड़ते हत्यारे गिरोहों को साथ लेकर आया है.
मोदी सरकार के लिए आजादी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और फिर से लिखने का मौक़ा भर है. हम भारत के लोगों को आजादी के आंदोलन के इतिहास को फिर से याद करना चाहिए ताकि हम स्वतंत्रता और बराबरी के सपने की लौ फिर से जला सकें, ताकि हम बढ़ते हुए फासीवादी हमले का मुँहतोड़ जवाब दे सकें.
मोदी सरकार ने भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ को भारतीय इतिहास को दुबारा लिखने और उसे हड़पने की बड़ी कवायद में बदल डाला है. आज की भाजपा के वैचारिक और सांगठनिक पूर्ववर्तियों ने भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय जागरण में कोई भूमिका नहीं निभाई थी, क्योंकि वे तो औपनिवेशिक शासकों के साथ सांठगांठ कर रहे थे और अपने हिंदुत्व की राजनीति अथवा हिंदू वर्चस्ववादी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के साथ धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्रवाद को खंडित करने और उसे भटका देने के जरिये औपनिवेशिक शासकों की ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति को लागू करने में उनकी मदद कर रहे थे. आज, उनके उत्तराधिकारी उसी विनाशकारी दिशा पर चलते हुए इतिहास को दुबारा लिखने और भरत को पुनर्परिभाषित करने में मशगूल हैं. मोदी सरकार इस 75वीं वर्षगांठ को भारतीय स्वतंत्रता के ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में मना रही है और पूरे माहौल को अमृत के नाम पर झूठ और नफरत से जहरीला बना रही है. वे कह तो ये रहे हैं कि भारत के अब तक अ-प्रशंसित रह गए नायकों का सम्मान करने पर उनका ध्यान रहेगा. इस घोषित मकसद से कोई आपत्ति नहीं हो सकती है, लेकिन अपवाद सिर्फ यह है कि स्वतंत्रता आन्दोलन के भाजपाई इतिहास में सबसे बड़े अ-प्रशंसित नायक वीडी सावरकर हैं – हिंदुत्व के सबसे पहले सिद्धांतकार, जिन्होंने ‘पाश्चाताप करने वाले पुत्र’ के लिए दया की भीख मांगते हुए तथा औपनिवेशिक आकाओं के हितों की सेवा करने का वादा करते हुए बारंबार अर्जियां देकर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवशाली परंपरा को कलंकित किया और साथ ही, बाद में भारत के बंटवारे की वैचारिक बुनियाद डाली. संघ परिवार के कई लोग नाथूराम गोडसे की ‘विरासत’ का भी खुलेआम गुणगान कर रहे हैं, जो एक हिंदुत्व आतंकवादी था और जिसने आजादी के तुरंत बाद गांधी की हत्या की थी.
संघ परिवार के प्रतीक पुरुषों को स्थापित करने और खुद को स्वतंत्रता आन्दोलन की ‘प्रशंसित धारा’ के बतौर उछालने, तथा स्वतंत्रता संघर्ष की विभिन्न घटनाओं को विरूपित करने और इसके प्रतीक पुरुषों को हड़पने की कोशिश कर रहा है. इतिहास के खिलाफ अपने युद्ध के जरिये भाजपा स्वतंत्रता आन्दोलन के लक्ष्यों व उपलब्धियों को कम करके आंकने व उसे बदनाम करने, और यहां तक कि आजादी को ‘विभाजन की विभीषिका’ तक सीमित कर देने का प्रयास कर रही है. महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने अब पाकिस्तान के स्थापना दिवस, 14 अगस्त को ‘विभाजन की विभीषिका स्मृति दिवस’ के बतौर घोषित कर दिया है. पूरे मुस्लिम समुदाय को खलनायकों के बतौर बदनाम किया जा रहा है जबकि हिंदुओं को विभाजन का संत्रास झेलने वाले पीड़ितों के बतौर पेश किया जा रहा है – जबकि सच यह है कि दोनों समुदायों के लोगों ने यह संत्रास को झेला है जो विभाजन की चारित्रिक विशेषता है.
इसीलिये, भारतीय स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मनाते हुए हमलोगों को न केवल स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास की प्रमुख घटनाओं और उस दरम्यान आए विभिन्न मोड़ों को तथा अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के शौर्यपूर्ण संघर्षों व उनकी कुर्बानियों को याद करना चाहिए, बल्कि उस वैचारिक संघर्ष और अवधारणात्मक विकास को भी याद करना चाहिए जो स्वतंत्रता आन्दोलन की विशेषता रहे हैं और उसकी उस क्रांतिकारी विरासत का निर्माण करते हैं जो आजादी के सात दशकों के बाद आज भी प्रतिध्वनित हो रही है. आज मोदी सरकार हमारे गणतंत्र के संवैधानिक लोकतांत्रिक ढांचे को रौंद रही है और पूर्व के औपनिवेशिक शासकों के उत्तराधिकारियों की तरह हुकूमत कर रही है, जिन्हें ‘भूरे अंग्रेज’ बताते हुए भगत सिंह ने हमें चेतावनी दी थी. ऐसे समय में हमें अपने स्वतंत्रता आन्दोलन की क्रांतिकारी विरासत को फिर से सामने लाना चाहिए ताकि हम फासीवाद से आजादी की अपनी जारी लड़ाई को ठीक से लड़ पाएं.
औपनिवेशिक युग में आजादी का पहला मतलब था औपनिवेशिक अधीनस्थता से मुक्ति. वह हमारा राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम था, और राष्ट्रीय मुक्ति के इस सपने की बुनियाद थे भारत के लोग, जो इस राष्ट्र के मालिक थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा पूना में औपचारिक रूप से ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव लेने के काफी पहले ही भारत के उपनिवेश-विरोधी योद्धाओं ने राष्ट्र की आजादी और जन-संप्रभुता को सूत्रबद्ध करना शुरू कर दिया था. 1857 के राष्ट्रगान में भारत के लोगों को देश का मालिक घोषित किया गया था – ‘हम हैं इसके मालिक, हिंदोस्तां हमारा’. बिरसा मुंडा के ‘उलगुलान’ ने युद्धघोष जारी किया ‘आबुआ दिशुम, आबुआ राज’ (हमारा राज्य, हमारा राज). जन संप्रभुता अथवा जनता के हाथों सत्ता की भावना को संविधान की प्रस्तावना में संवैधानिक स्वीकृति मिली, जिसमें “हम, भारत के लोग” के साथ यह भावना भारत को संप्रभु गणतंत्र के रूप में ढालने का दृढ़संकल्प बनी रही. इस प्रकार, भारत और भारतीय राष्ट्रवाद के विचार के केंद्र में जनता ही है.
भारत की जनता हमेशा से विविधतापूर्ण रही है. यह विविधता – नृजातीय, भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक – भारत की एकता का बुनियादी उसूल रही है. स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान परिष्कृत होते संचार माध्यमों और लगातार बढ़ती आवाजाही ने निश्चय ही जन-जुड़ाव को गहरा बनाया और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दिया, लेकिन इस एकीकरण को एकरूपता या समांगता की इच्छा समझने की भूल हर्गिज नहीं करनी चाहिए. एकरूपता या समांगता हासिल करने के प्रयासों ने हमेशा ही एकता को कमजोर बनाया है और इससे दुष्प्रभावित अंचलों और समुदायों ने इन प्रयासों को करारा जवाब दिया है. देश के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन ने कुछ हद तक इस विविधता को जरूर कमजोर बनाया, लेकिन यहां तक कि विभाजन के बाद का भारत भी दुनिया का सबसे बड़ा विविधतापूर्ण देश है. स्वतंत्रता आन्दोलन ने भारत की विविधता के बारे में स्वस्थ समझ तथा आपसी सम्मान और स्वीकृति को विकसित किया. यही वह एकमात्र तत्व था जिसने भारतीय राष्ट्रीय एकता को बारंबार जीवन प्रदान किया और भारतीय राष्ट्र-राज्य के तहत (हिंदू व मुस्लिक शासकों की हुकूमत वाले) सैकड़ों देशी रियासतों के शीघ्र एकीकरण को सहज बनाया.
संविधान ने हमें भेदभाव-रहित और समान नागरिकता की प्रतिबद्धता दी है, यह राज्य को सापेक्षिक तौर पर धर्म से अलग रखता है और यद्यपि कि यह भारत को पूर्णरूपेण संघीय देश नहीं मानता, फिर भी राज्यों को कई विषयों पर एक हद तक स्वायत्तता मिली हुई है. जरूरत तो यह थी कि धर्मनिरपेक्षता, संघीय पुनर्संयोजन और भारत की मौलिक विविधता व बहुलता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए. मोदी की रहनुमाई में भाजपा सरकार तेजी से इसकी उल्टी दिशा में आगे बढ़ रही है – सीएए ने यहां के नागरिकों, और नागरिकता के लिए आवेदन देने वाले आ-प्रवासियों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव पैदा किया; यह राज्य हिंदू राज्य के बतौर अपना आचरण बढ़ाता जा रहा है; केंद्र तमाम शक्तियां अपने हाथों में समेटता जा रहा है और राज्यों को दरअसल महिमामंडित नगरपालिकाओं की स्थिति में धकेलता जा रहा है. बहुलता की धारणा को लगातार बदनाम करते हुए उसे एकरूपता के अधीन करता जा रहा है.
आजादी के अलावा, हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन का एक दूसरा प्रमुख शब्द था – इंकलाब यानि क्रांति, जिसे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे ने अमर बना दिया. उर्दू कवि और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना हसरत मोहानी द्वारा गढ़े गए और भगत सिंह तथा उनके साथियों द्वारा अमर बना दिए गए इस नारे ने हमारा ध्यान आजादी के क्रांतिकारी महत्व तथा लगातार संघर्षों और प्रगतिशील बदलावों व अधिकारों के प्रति हमारी सतत जागरूकता की केंद्रीय अहमियत की ओर खींचा.
यकीनन, सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो दूसरा नारा उछाला, वह था ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’. भारत का स्वतंत्रता आन्दोलन अलग-थलग रूप से सिर्फ ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई नहीं था, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद-विरोधी प्रतिरोध के अभिन्न अंग के बतौर विकसित हुआ था. 1917 की रूसी क्रांति के बाद, जब यूरोप में फासीवादी प्रतिक्रिया को बढ़ते देखा गया, तो भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रगतिशील धारा ने यूरोप में फासीवाद-विरोधी प्रतिरोध का समर्थन किया. छह भारतीय लेखक मुल्कराज आनंद, पत्रकार गोपाल मुकुंद हुद्दर, डॉक्टर अटल मोहनलाल, अयूब अहमद खान नक्शबंदी व मैनुएल पिंटो, और छात्र रामास्वामी वीरप्पन – जेनरल फ्रांको की अगुवाई में चलने वाली फासिस्ट सेना के खिलाफ लड़ने के लिए बने ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ में शामिल हुए थे. लंदन में बसे भरतीयों ने फंड इकट्ठा किया और जवाहरलाल नेहरू ने एकजुटता जाहिर करने के लिए 1938 में स्पेन की यात्रा की. जहां आरएसएस मुसोलिनी और हिटलर से प्रेरणा ग्रहण कर रहा था, वहीं भारत के प्रगतिशील स्वतंत्रता संग्रामी यूरोप में फासिस्ट-विरोधी शक्तियों के साथ हाथ मिला रहे थे.
स्वतंत्रता आन्दोलन का मकसद सिर्फ भारत में अंग्रेजी हुकूमत को खत्म करना ही नहीं था, बल्कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक प्रगतिशील भारत का निर्माण करना इसका मकसद था. आदिवासी और किसान समुदाय इस स्वतंत्रता आन्दोलन के सबसे बड़े जनाधार थे, और वे जमींदारों तथा सूदखोर महाजनों से मुक्ति के लिए लगातार लड़ रहे थे. आदिवासी विद्रोह और 1857 के स्वाधीनता युद्ध के बाद ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत ने सिर्फ सैन्य नियंत्रण और दमनकारी कानूनों के जरिये ही खुद को सुदृढ़ नहीं बनाया, बल्कि ‘स्थायी बंदोबस्त’ व अन्य राजस्व प्रणालियों के जरिये निर्मित जमींदार वर्ग द्वारा लागू सामंती सत्ता को मजबूत बनाकर, देशी रियासतों की सत्ता को बरकरार रखकर और हिंदू व मुस्लिम समुदायों के बीच ‘फूट डालो, राज करो’ नीति को जोरदार तरीके से लागू कर भी खुद को मजबूत बनाया. उस जमाने के एक वरिष्ठ ब्रिटिश सैनिक अफसर ने स्पष्ट कहा, “हमारा पूरा प्रयास होना चाहिए कि हम पूरी ताकत से हमारे लिए फायदेमंद विलगाव को और बढ़ायें, जो विभिन्न धर्मों और नस्लों के बीच मौजूद है. ...फूट डालो, राज करो भारत सरकार का उसूल होना चाहिए” (लेफ्टनेंट कर्नल कोकर, ‘इंडिया टुडे’, रजनी पाम दत्त, 1940). चंद सम्माननीय अपवादों को छोड़कर, ये जमींदार और देशी रियासतों के कठपुतली शासक औपनिवेशिक हुकूमत के सामाजिक आधार थे, और इसीलिए उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष को जमींदारों व महाजनों के खिलाफ किसान संघर्षों से बल मिलता रहा.
जमींदारी और सूदखोरी प्रथा का उन्मूलन औपनिवेशिक भारत में किसान आन्दोलन के प्रमुख नारे के बतौर उभरा था. चूंकि गांधीवादी सत्याग्रह आन्दोलन ने पर्याप्त जोर नहीं दिया और किसान जुझारूपन के हर प्रतीक से दूर हटता गया, इसीलिए किसान आन्दोलन ने अपना खुद का जुझारू मंच निर्मित किया. वह था अखिल भारतीय किसान सभा के रूप में. यह किसान सभा 1936 में गठित की गई और स्वामी सहजानंद सरस्वती इसके पहले अध्यक्ष बने. इसने अगस्त 1936 में एक किसान घोषणापत्र जारी किया जिसमें जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने और ग्रामीण कर्जों को माफ़ करने की मांग उठाई गई थी. शक्तिशाली किसान संघर्षों ने न केवल ग्रामीण भारत में सामंती-औपनिवेशिक सत्ता को कमजोर किया, बल्कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और हिंसा के खिलाफ भी वह एक प्रतिकारी ताकत बन गया. स्वतंत्रता के बाद, जमींदारी के पुराने स्वरूप को कानूनन खत्म कर दिया गया, लेकिन उसके परे भूमि सुधार का काम अधूरा ही रह गया और अभी तो हम भूमि सुधार को उलटते हुए भी देख पा रहे हैं. औपनिवेशिक की जगह कॉरपोरेट रख दीजिये, और फिर हमलोग किसान आन्दोलन को कॉरपोरेट भूस्वामित्व और कर्ज संकट से जूझते हुए पाएंगे.
काम और जीवन की बेहतर स्थितियों के लिए संगठित होने व लड़ने के अधिकार समेत मजदूर वर्ग अधिकारों की लड़ाई भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की क्रांतिकारी विरासत का एक अन्य महत्वपूर्ण अंग रहा था. इन संघर्षों की बदौलत औपनिवेशिक काल में ही श्रमिक अधिकारों से संबंधित अनेक कानून पारित किए गए थे. फैक्ट्री कानून और ट्रेड यूनियन ऐक्ट 1926 से लेकर मजदूरी भुगतान कानून और न्यूनतम मजदूरी कानून तक, भारत के कई प्रमुख श्रम कानून स्वतंत्रता के पहले ही बनाये जा चुके थे. 1920 में गठित ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (ऐटक) और 1920-दशक से चले संगठित कम्युनिस्ट आन्दोलन के अलावा 1936 में डॉ. अंबेडकर द्वारा गठित इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आइएलपी) ने भी औपनिवेशिक भारत में मजदूर वर्ग के अधिकार हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. आइएलपी ने ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद, दोनों को मजदूर वर्ग का दुश्मन चिन्हित किया था; और वह बंबई प्रेसिडेंसी में एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के बतौर उभरी थी. उसने कई बड़ी चुनावी जीतें हासिल की थीं और विधान सभा के अंदर तथा व्यापक किसान-मजदूर संघर्षों में प्रमुख भूमिका अदा की थी.
1936 वह साल था जब दो क्रांतिकारी आह्वान जारी किए गए थे. जहां किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन का आह्वान जारी किया, वहीं अंबेडकर जाति उन्मूलन के नारे के साथ सामने आए. जाति उन्मूलन के इस आह्वान ने सामाजिक न्याय के एजेंडा को सामाजिक रूपांतरण के उच्चतर स्तर तक असरदार ढंग से उठा दिया. छुआछूत मिटाने की सीमित गांधीवादी सारवस्तु से अलग हटते हुए अंबेडकर ने समूची वर्ण व्यवस्था को ही खत्म करने की जरूरत की तरफ भारत का ध्यान आकर्षित किया. श्रम विभाजन के नाम पर जाति को उचित बताने के प्रयासों को धक्का मारते हुए अंबेडकर ने जाति को श्रमिकों के विभाजन के बतौर देखा. जाहिर है, उसका जवाब जाति-विरोधी आधार पर श्रमिकों की एकजुटता ही हो सकती थी जिसके जरिये जातियां वर्ग के अंदर विलीन हो जाएंगी. इन क्रांतिकारी विचारों – जमींदारी उन्मूलन, जाति उन्मूलन और श्रमिकों की एकजुटता – का समागम वर्गीय एकता और वर्ग संघर्ष को काफी बड़े पैमाने पर ले जाने की क्षमता रखता था, लेकिन इस संभावना को उस वक्त साकार नहीं किया जा सका. ठीक यहीं पर हमें इस अधूरी रह गई संभावना और स्वतंत्रता आन्दोलन की इस विरासत को आज के भारत में पुनः तलाश करने की जरूरत है.

मोदी सरकार ने चौदह अगस्त (पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस) को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. यह विभाजन की विभीषिका को हमारे देश के भीतर पुनर्जीवित करने और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बनाए रखने की कोशिश है.
मोदी सरकार चौहत्तर वर्षों की भारत की आजादी को विभाजन के खून सने अध्याय में सीमित क्यों कर देना चाहती है? इस विभाजन में सीमा के दोनों तरफ हिन्दू, मुसलमान और सिखों ने जनसंहार और बलात्कार झेले. यह संघ और हिंदुत्ववादी राजनीति द्वारा हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास को फिर से लिखने की कोशिश है. स्वाधीनता के उस इतिहास को वे बदलना चाहते हैं, जिसका वे कभी हिस्सा ही नहीं थे.
आरएसएस हिन्दू वर्चस्ववाद की विचारधारा और परियोजना है जिसका सपना भारत को एक ऐसे राज्य में तब्दील करना है जहाँ कोई विपक्षी राजनीति न हो, जहाँ हिंदुओं के नाम पर आरएसएस का शासन चले और गैर-हिन्दू दूसरी श्रेणी के नागरिक बनें या फिर वे नागरिक ही न रहें. भारत के बारे में उनका यह दृष्टिकोण स्वाधीनता संघर्ष की मूल भावना के एकदम खिलाफ है. देश के सभी समुदायों ने स्वाधीनता के लिए समान रूप से संघर्ष किया और बलिदान दिया, इसलिए इस मुल्क पर सभी का बराबरी का हक है.
संघ के नेताओं द्वारा किया जाने वाला यह दावा बुरी तरह गलत है.
यूरोप में राष्ट्र-राज्य का उदय एक ‘कल्पित’ अस्मिता के बतौर पूँजीवाद के उभार के साथ हुआ. इसका मकसद पूँजीवाद के लिए एकल घरेलू बाजार बनाने की ऐतिहासिक जरूरत को पूरा करना था. साथ ही इसका मकसद एक नई तरह की सरकार के लिए एकता के सूत्र की तरह काम करना था जहाँ किसी राजा के प्रति ‘वफादारी’ को राष्ट्र-राज्य के प्रति वफादारी में बदल दिया गया. भाषा और धर्म को राष्ट्रवाद के आधार के रूप में पेश किया गया. इस तरह सोलहवीं से अट्ठारहवीं शताब्दी के बीच उभरते हुए पूँजीवाद की आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाएँ ही राष्ट्रवाद का सारतत्व थीं.
उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी और बीसवीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्रवाद के एक नए दौर का आरंभ हुआ. इस दौर में पहली पीढ़ी के पूँजीवादी देशों द्वारा उपनिवेशित और उत्पीड़ित देशों के जनगण ने गुलामी से मुक्ति के आह्वान से राष्ट्रवाद में नया सारतत्व भर दिया. इस तरह साम्राज्यवादविरोध और संप्रभुता की आकांक्षा ने उपनिवेशित देशों में राष्ट्रवाद की अंतर्वस्तु निर्मित की. भारतीय राष्ट्रवाद एकताबद्ध करने वाले एक धर्म पर आधारित नहीं था, बल्कि इसका आधार औपनिवेशिक उत्पीड़कों से संघर्ष का साझा लक्ष्य था.
1857 में कंपनी राज (ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) के खिलाफ हमारा पहला स्वाधीनता संग्राम उपनिवेशविरोधी राष्ट्रवाद और एक राष्ट्र के रूप में संगठित होने की पहली अभिव्यक्ति है. सिधो-कान्हू के महान संथाल-हूल विद्रोह की पृष्ठभूमि में धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर ‘वर्दीधारी किसान’ 1857 में उठ खड़े हुए और उन्होंने बतौर भारतीय, बतौर हिन्दुस्तानी, हिंदुस्तान के मालिक के बतौर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी. उनकी जुबानों से अजीमुल्ला खान का लिखा कौमी तराना ‘हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा’ गूँज रहा था. इस तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पैदाइश के तीन दशक पहले ही सामंती रजवाड़ों के अलावा उत्पीड़ित जातियों और महिलाओं ने साम्राज्यवादविरोधी राष्ट्रवाद के जन्म की घोषणा कर दी थी.
1857 के पहले भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अनेक किसान और आदिवासी बगावतें हुईं. 1857 ऐसी पहली बगावत थी जिसने सबके हिन्दुस्तानी होने और लुटेरे फिरंगियों से अपने मुल्क की रक्षा करने का नारा बुलंद किया.
अंग्रेज 1857 में विभिन्न समुदायों द्वारा प्रदर्शित चट्टानी एकता से बौखलाए हुए थे. अंग्रेज अफसर थॉमस लो ने लिखा: “गाय मारने वाले और गाय की पूजा करने वाले, सूअर से नफरत करने वाले और उसे खाने वाले, अल्लाह को खुदा और मोहम्मद को पैगंबर मानने वाले तथा ब्रह्म के रहस्य के उपासक, इस एक मकसद के लिए संगठित हो गए थे.” बख्त खान, सिरधारी लाल, गौस मोहम्मद और हीरा सिंह, यानि मुसलमान, हिन्दू, सिख, सभी क्रांतिकारी सेना के कमांडर थे. रानी लक्ष्मीबाई के तोपखाने के सेनापति गुलाम गौस खान और पैदल सेना के सेनापति खुदा बक्श थे. उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी मुंदार, जो उनके साथ लड़ते हुए शहीद हुईं, एक मुस्लिम महिला थीं.
1857 में साथ-साथ लड़ते हुए हिन्दू-मुसलमानों के शहादत देने के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं. 1857 के क्रूर दमन के बाद अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनायी और यह नीति मुसलमान समुदाय के खिलाफ विशेष रूप से नफरत भरी थी.
आरएसएस दावा करता है कि मुगल शासन ‘विदेशी’ शासन था, हिन्दू उसके खिलाफ थे और उसका प्रतिरोध कर रहे थे. इसलिए सनातन काल से ही भारतीय राष्ट्रवाद का हिन्दू चरित्र था आगे भी इसे ही कायम रहना चाहिए. आरएसएस के सिद्धांतकार गोलवलकर उपनिवेशवादविरोधी राष्ट्रवाद की जगह ऐसे हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना करना चाहते थे जो मुसलानों के प्रति घृणा पर आधारित हो. उन्होंने लिखा: “अंग्रेज विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद के बराबर मान लिया गया था, इस प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण का भारत के पूरे स्वाधीनता संघर्ष, इसके नेताओं और जनसामान्य पर विनाशकारी असर हुआ.” (गोलवलकर, बंच ऑफ थाट्स)
आश्चर्य नहीं कि आरएसएस का यह दृष्टिकोण पूरी तरह अंग्रेज-परस्त है. सबसे पहले जेम्स मिल नामक अंग्रेज ने भारतीय इतिहास को “हिन्दू काल, मुसलमान काल और ब्रिटिश काल” में बाँटा था. जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि “मुगल शासन को याद करना गुलामी की मानसिकता का परिचायक है” तो वे अंग्रेजों के एक झूठ को ही फैला रहे होते हैं.
आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा से सहमत और जेम्स मिल के काल विभाजन को स्वीकार करने वाले इतिहासकार आर सी मजूमदार को भी स्वीकार करना पड़ा कि एक राष्ट्र के रूप में इंडिया या भारत का विचार ‘उन्नीसवीं शताब्दी के छठें और सातवें दशक से पहले वास्तविक राजनीति में कोई भूमिका नहीं रखता था’. इसलिए हिन्दू शासक और सिपाही न तो ‘भारत’ के चैंपियन थे और न ही मुस्लिम शासक और सिपाही ‘आक्रांता’ थे.
तथ्यों से जाहिर है कि मुगल काल के युद्ध, दो शासकों के बीच युद्ध हुआ करते थे, न कि दो धर्मों या समुदायों के बीच.
कुछ उदाहरण देखिए.
1576 में हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर के सेनापति आमेर के हिन्दू शासक मान सिंह थे और उनका मुकाबला महाराणा प्रताप की सेना से हुआ जिसके सेनापति हाकिम खान सूर, एक मुसलमान थे.
शिवाजी द्वारा अफजल खान को पराजित करने का उदाहरण भी हमारे सामने है. हमें यह कहानी पता है कि शिवाजी बिना किसी हथियार के अफजल खान से मिलने के लिए जा रहे थे लेकिन उनके अंगरक्षक ने उन्हें बघनखा साथ ले जाने की सलाह दी. जब अफजल खान ने शिवाजी पर हमला किया तो उन्होंने इसी बघनखे का इस्तेमाल करने खान की हत्या की. वह अंगरक्षक कौन था? उसका नाम था रुस्तम जवान, जोकि एक मुसलमान था. जब शिवाजी ने अफजल खान को मार दिया तो उसके सहायक कृष्णजी भास्कर कुलकर्णी [हिन्दू] ने अपने मालिक की हत्या का बदला लेने के लिए शिवाजी को मारने की कोशिश की.
तीसरा उदाहरण टीपू सुल्तान का है जोकि 1700 में मैसूर के शासक थे. उनके खिलाफ अंग्रेजों ने मराठा सेना नियुक्त की थी. अंग्रेजों के आदेश पर ‘हिन्दू’ मराठा सेना ने मैसूर के शृंगेरी मठ को बुरी तरह लूटा. टीपू ने इस लूटपाट के बाद न सिर्फ मूर्ति के उद्धार के लिए दान दिया बल्कि देवी को चढ़ावा भी भेजा. हिन्दू सेना ने मंदिर तबाह किया और एक मुसलमान शासक ने इसका उद्धार करने के लिए धन और संसाधन मुहैया करवाया.
भारतीय राष्ट्रवाद उपनिवेशकों, कंपनी राज के दमन और लूट के खिलाफ लड़ते हुए पैदा हुआ था, मुगल राज के खिलाफ नहीं. विभिन्न धर्मों, जातियों और समुदायों और एकता की बुनियाद पर यह राष्ट्रवाद खड़ा हुआ था.
मुगल राज के बारे में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का यह सटीक मूल्यांकन याद रखने लायक है कि “मुसलमानों के आगमन के साथ ही धीरे-धीरे एक नए तरह का मेल-जोल पैदा हुआ. हालांकि उन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार नहीं किया पर भारत को अपना घर बना लिया और यहाँ के लोगों के आम जन जीवन, उनकी खुशियों और तकलीफों के साझेदार बन गए. इस आपसी सहयोग से एक नई कला और नयी तहजीब का उदय हुआ.”
आरएसएस के विचारक गोलवलकर ने अपनी किताब ‘बंच ऑफ थाट्स’ के ‘शहीद, महान; पर आदर्श नहीं’ नामक लेख में लिखा कि “ऐसे लोग हमारे समाज के लिए आदर्श नहीं हो सकते. हम उनकी शहादत को महानता के ऐसे शिखर की तरह नहीं देख सकते जिनसे लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए क्योंकि वे अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम रहे. यह नाकामी इस बात का सबूत है कि उनमें कुछ भयानक कमियाँ मौजूद थीं.” गोलवलकर ने देशवासियों को सलाह दी कि देश की आजादी के लिए अपनी शहादत देने के लिये तैयार रहना “पूरी तरह राष्ट्रहित” में नहीं है.
स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में गोलवलकर के ये विचार कोई अपवाद नहीं थे. आमतौर पर हिन्दू वर्चस्ववादी विचारक ऐसा ही सोचते थे. हिन्दुत्व के विचारक सावरकर को सजा सुनाए जाने के बाद का रुख और मृत्युदंड के सामने क्रांतिकारी भगत सिंह का रुख, दोनों विचारधाराओं के अंतर को हमारे सामने बखूबी रखता है.
पचास वर्ष की सजा पाकर अंडमान की सेलुलर जेल में कैद होकर पहुँचने वाले सावरकर ने अपनी जल्द रिहाई के लिए 1911 में ही अंग्रेजी हुकूमत से विनती शुरू कर दी थी. फिर 1913 से लेकर 1921 में दूसरी जेल में तबादला होने के पहले तक उन्होंने रिहाई के लिए कई प्रार्थना पत्र लिखे और आखिरकार 1924 में रिहा कर दिए गए. अपने प्रार्थना पत्रों में उन्होंने अंग्रेजों से विनती की कि उन्हें रिहा किया जाए, बदले में वे हमेशा अंग्रेजों के वफादार बने रहेंगे. उन्होंने वादा किया कि वे न केवल स्वाधीनता के लिए संघर्ष को छोड़ देंगे बल्कि ‘भटके हुए’ युवा स्वतंत्रता सेनानियों को फिर से अंग्रेजी हुकूमत का वफादार बनाने के लिए काम करेंगे. जेल में रहते हुए उन्होंने ‘साधारण कैदियों’ की तुलना में ‘बेहतर खाना’ न मिलने, और ‘विशेष व्यवहार’ न किए जाने की शिकायत की, जबकि उन्हें ‘डी’ श्रेणी के कैदी का दर्जा प्राप्त था. सावरकर ने घोषणा की कि “मैं अंग्रेजी सरकार की वफादारी और संवैधानिक प्रगति का दृढ़ प्रचारक रहूँगा क्योंकि प्रगति का यही एकमात्र रास्ता है.”
इसके विपरीत औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ ‘युद्ध छेड़ने’ के इल्जाम में मृत्युदंड पाए भगत सिंह और उनके साथियों ने बहादुरीपूर्वक घोषित किया कि “हम युद्ध की घोषणा करते हैं. यह युद्ध जारी है और तब तक जारी रहेगा जब तक मुट्ठी भर परजीवी भारत की उत्पीड़ित जनता और इसके संसाधनों को लूटते रहेंगे.” उन्होंने आगे बढ़कर माँग की कि वे युद्धबंदी हैं और उनके साथ ‘युद्धबंदियों’ जैसा बरताव किया जाए. उन्होंने कहा “हम माँग करते हैं कि हमें फाँसी देने की जगह गोली से उड़ा दिया जाए.” उन्होंने अंत में लिखा “हम माँग करते हैं और यह उम्मीद करते हैं कि आप सेना की एक टुकड़ी भेजेंगे और हमारी हत्या को अंजाम देंगे.”
इस बात के पर्याप्त दस्तावेज हैं कि आरएसएस और हिन्दू महासभा ने स्वाधीनता संघर्ष में भागीदारी नहीं की बल्कि अंग्रेजों के साथ सांठ-गाँठ में लगे रहे. अब भाजपा और आरएसएस के नेता स्वाधीनता आंदोलन में संघ को ‘घुसाने’ की मूर्खतापूर्ण कोशिशों में मुबतिला हैं.
आरएसएस के प्रतिनिधि राकेश सिन्हा का हाल-फिलहाल का लेख ऐसी ही कोशिशों का एक नमूना है. 15 अगस्त 2021 को इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख की शुरुआत ही भारत की स्वाधीनता के पचहत्तरवें वर्ष के समारोह में “स्वाधीनता संघर्ष और उससे जुड़ी घटनाओं और प्रतीकों के विकृत महिमामंडन” के खिलाफ चेतावनी देते हुए होती है. वे प्रतीक और घटनाएं कौन सी हैं जिनके ‘विकृत महिमामंडन’ का सिन्हा विरोध कर रहे हैं? आरएसएस की अतीत में गाँधी के प्रति घृणा और आज नेहरू के प्रति घृणा को देखते हुए इस बात का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है.
राकेश सिन्हा का तर्क है कि स्वाधीनता सेनानियों के बीच हिंसक और अहिंसक तरीकों या धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल करने या न करने के बारे में काफी मतभेद थे. यह कोई नया बिन्दु नहीं है. सिन्हा से पहले भी बहुत से लोग इस बारे में लिख चुके हैं.
राकेश सिन्हा का यह दावा कि आरएसएस भी स्वाधीनता आंदोलन की ऐसी प्रतिवादी धारा थी जिसके योगदान को अब तक नकारा गया है, पूरी तरह बकवास है. वे लिखते हैं कि “सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित फारवर्ड ब्लॉक और आजाद हिन्द फौज जैसी शक्तियाँ, संघ-परिवार और अन्य क्रांतिकारी अपने सामाजिक आर्थिक दृष्टिकोण में मतभिन्नता के बावजूद अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करने के लिए अभियान संचालित कर रहे थे और हिंसा को नैतिक मानते थे. ठीक उसी समय जनता को मुख्यधारा के नेतृत्व के द्वारा ऐसी विचारधारा और उसके कार्यक्रमों के खिलाफ समझाया जा रहा था.” इस तरह सिन्हा आजाद हिन्द फौज और फारवर्ड ब्लॉक तथा भगत सिंह के एचएसआरए जैसी ‘हिंसा’ का समर्थन करने वाली ताकतों के बीच बिना किसी प्रमाण के आरएसएस को घुसा देने की कोशिश करते हैं और इसके खिलाफ ‘अहिंसा’ की मुख्यधारा की राजनीति को खड़ा करते हैं. यह पूरी तरह हास्यास्पद है. आरएसएस ने केवल मुसलमानों के खिलाफ ही हिंसा दिखाई, अंग्रेजों के खिलाफ कभी नहीं. कभी भी किसी संघ के नेता ने अंग्रेजी शासन को खत्म करने की वकालत नहीं की बल्कि उन्होंने तो ‘अंग्रेज विरोध’ से बचने की सलाह दी और मुसलमानों के खिलाफ नफरत और हिंसा का प्रचार किया. बोस, भगतसिंह गाँधी, नेहरू और आजाद, सभी हिन्दू वर्चस्वववादी राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक राजनीति को खारिज करने के मामले में पूरी तरह एकमत थे.
हिंसा और अहिंसा में स्वाधीनता संघर्ष को बाँटने का तरीका बहुत पुराना और जड़ हो चुका है. उनकी विचारधारात्मक प्रेरणाओं और रणनीतियों का अध्ययन करना इस तरह की फतवेबाजी से कहीं बेहतर तरीका होगा. हिंसा या अहिंसा का रास्ता अपनाना बहस का मुद्दा नहीं है. बहस का मुद्दा यह है कि उन्होंने सांप्रदायिक हिन्दू वर्चस्ववादी ‘राष्ट्रवाद’ को खारिज किया या नहीं. इस मामले में बोस, भगतसिंह, गाँधी, नेहरू और मौलाना आजाद, एक पक्ष में समझौताहीन ढंग से धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़ते हैं तो दूसरी तरफ लाजपत राय और तिलक जैसे नेता हैं जो हिन्दू वर्चस्ववादी विचारधारा के प्रति थोड़े आकर्षित जरूर हैं लेकिन अंग्रेजी शासन का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध करने के पक्ष को कमजोर नहीं पड़ने देते. आरएसएस, इन दोनों से एकदम भिन्न है, उसका मूल चरित्र अंग्रेजी हुकूमत के साथ साठ-गाँठ और मुसलमानों के प्रति घृणा है. इसलिए आरएसएस भात के कंकड़ की तरह है जो आप की आँखों को धोखा देते हुए भात में छिप तो सकता है लेकिन आपके दाँत उसे महसूस कर लेते हैं.
कांग्रेस के 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहानी ने पहली बार पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पेश किया. गाँधी और पूरी कांग्रेस 1929 के पहले तक इस माँग से सहमत नहीं थी.
1920 के दशक में अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं कौन सी थीं? भारत की कम्युनिस्ट पार्टी और आरएसएस, दोनों ही 1925 में अस्तित्व में आए.
भाकपा की स्थापना मजदूर वर्ग के संघर्षों और 1922-23 के बीच चार कम्युनिस्ट समूहों के उभार की पृष्ठभूमि में हुई. 1917 की रूस की बोल्शेविक क्रांति के प्रेरणादायी असर और चौरी-चौरा की घटना के चलते गाँधी द्वारा असहयोग आंदोलन को विवादास्पद ढंग से बीच में ही वापस ले लेने की घटना वह पृष्ठभूमि निर्मित करती है जिसने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
अरिंदम सेन ने अपनी लोकप्रिय पुस्तिका ‘स्वाधीनता संघर्ष में कम्युनिस्टों की भूमिका’ में लिखा कि “अंग्रेज शासकों ने कम्युनिस्टों को अपना सबसे खतरनाक दुश्मन माना. 1920 और 1930 के दशक के शुरुआती वर्षों में पेशावर, कानपुर, मेरठ समेत कई अन्य षड्यन्त्र केस इसका पुख्ता सबूत हैं. इनमें मेरठ षड्यन्त्र केस सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हुआ. मजदूर संघर्षों के उठते ज्वार, वर्कर्स पीजेन्ट्स पार्टी के तेज फैलाव, साइमन कमीशन के विरोध में साम्राज्यवाद विरोधी जन-आंदोलन के पुनर्जीवन, भगतसिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी गतिविधियों और राष्ट्रवादी नेताओं के एक धड़े के कम्युनिस्टों के करीब आने से अंग्रेज सरकार बुरी तरह बौखलाई हुई थी. 1929 में दमन चक्र चल पड़ा. इनमें सबसे महत्वपूर्ण थे मेरठ षड्यन्त्र केस, पब्लिक सेफ्टी बिल व ट्रेड डिसप्यूट बिल, भगतसिंह, राजगुरु व सुखदेव पर मुकदमा तथा मृत्युदंड. मार्च 1929 में कलकत्ता, बॉम्बे और देश के अन्य हिस्सों से 31 मजदूर नेताओं (इनमें तीन अंग्रेज भी शामिल थे) को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें एक षड्यन्त्र मामले में मेरठ लाया गया. आरोपित कम्युनिस्टों ने अदालत का भरपूर इस्तेमाल अपनी विचारधारा और उद्देश्यों के प्रचार के लिए बखूबी किया. कम्युनिस्ट और राष्ट्रवादी नेताओं के बीच फूट डालने की अंग्रेजों की कोशिश भी नाकाम रही. नेहरू, गाँधी व दूसरे नेताओं ने मेरठ जेल का दौरा किया और आरोपित कम्युनिस्टों ने भी विभिन्न जेलों में राजनीतिक कैदी का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत सत्याग्रहियों को एकता संदेश भेजे. शुरू से ही कम्युनिस्टों ने भारत में अंग्रेजी शासन के दोमुँहेपन और उनकी तथाकथित ‘सभ्य’ न्याय व्यवस्था का भंडाफोड़ किया. इस मुकदमे के खिलाफ न केवल दुनिया भर के मजदूरों ने आंदोलन किया बल्कि रोमाँ रोलाँ और अल्बर्ट आइन्स्टाइन जैसे लोगों ने भी इस मुकदमे के खिलाफ आवाज उठायी.”
कांग्रेस के भीतर पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष करने वालों, कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों द्वारा स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्षों व सामाजिक आर्थिक बदलाव के संघर्षों के बरक्स स्वाधीनता आंदोलन में भागीदारी के संदर्भ में आरएसएस के पास दिखाने लिए कुछ नहीं है.
‘शुद्धि आंदोलन’ के जरिए मुसलमानों को ‘शुद्ध’ करने और उनका फिर से हिन्दू धर्म में धर्मांतरण करने के जरिए सांप्रदायिक जहर फैलाने की कोशिशों और इसके जवाब में इस्लाम का प्रसार करने के लिए ‘तबलीग’ आंदोलन के चलते मृत्युदंड की सजा पाए हुए काकोरी के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान, राजेन्द्र लाहिड़ी और रोशन सिंह काफी चिंतित थे. 19 दिसंबर 1927 को फाँसी पर चढ़ाए जाने के तीन दिन पहले अशफाक की चिट्ठी फैजाबाद जेल से चोरी से बाहर आई. इस चिट्ठी में उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों से अपील की कि ‘एकताबद्ध रहिए और प्यार से रहिए. नहीं तो आप इस मुल्क की लूट के लिए जिम्मेदार होंगे और आप भारत की गुलामी के लिए जिम्मेदार ठहराए जाएंगे.’ उन्होंने लिखा कि “ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ/अबस तफरीक है तुममें ये हिन्दू औ मुसलमाँ की.”
हम सब जानते हैं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजी हुकूमत को हथियारों के जरिए चुनौती देने के लिए आजाद हिन्द फौज की स्थापना की थी. जापान और फासीवादी जर्मनी के साथ गठजोड़ करने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की जा सकती है लेकिन उनके धर्मनिरपेक्ष होने पर कोई सवाल नहीं है.
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में जून 1938 काे अपना भाषण देते हुए उन्होंने भारत काे 'हिन्दू राज' में बदलने के विचार का जाेरदार तरीके से खण्डन करते हुये कहा, ''हमें हिन्दू राज की बातें सुनायी दे रही हैं, यह बिल्कुल निरर्थक सोच है. क्या सांप्रदायिक संगठन मजदूर वर्ग की एक भी समस्या का समाधान कर सकते हैं? क्या ऐसे एक भी संगठन के पास बेराेजगारी और गरीबी की समस्या का समाधान है?
‘आजाद भारत और इसकी समस्याएं’ नामक लेख में उन्होंने लिखा कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक तनाव अंग्रेजों द्वारा पैदा किया गया है और यह तभी समाप्त होगा जब अंग्रेज यहाँ से चले जाएंगे. उन्होंने एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की जिसमें “व्यक्तियों और समूहों की धार्मिक और सांस्कृतिक आजादी” की गारंटी की जाएगी और कोई “राज्य धर्म” नहीं होगा. शाहनवाज खान, प्रेम सहगल, गुरुबक्श सिंह ढिल्लों, अब्दुल राशिद, सिंघाड़ा सिंह, फतेह खान और कैप्टन मलिक मुनव्वर खान अवाँ जैसे आजाद हिन्द फौज के नेताओं पर चला मुकदमा साम्राज्यवादविरोधी एकता के लिए बड़ा प्रेरणास्रोत बना तो सांप्रदायिक राजनीति के लिए बड़ा धक्का साबित हुआ.
इसके विपरीत हिन्दू महासभा के अध्यक्ष के बतौर सावरकर ने दूसरे विश्वयुद्ध में भागीदारी के लिए अंग्रेजी सेना में सिपाही भर्ती करवाने का अभियान चलाया.
“जहाँ तक भारत की सुरक्षा का संबंध है, हिंदुओं को जिम्मेदार सहयोगी की तरह बेझिझक ढंग से भारतीय सरकार का सहयोग करना चाहिए क्योंकि यही हिंदुओं के हित में है. हिंदुओं को सेना, नौसेना, वायुसेना के साथ-साथ हथियार और गोला-बारूद व युद्ध के अन्य साजो-सामान बनाने वाले कारखानों में अधिकतम संभव तादात में भर्ती होना चाहिए... इसलिए हिन्दू महासभा के कार्यकर्ताओं को खासकर बंगाल और असम के हिंदुओं को प्रेरित करना चाहिए कि बिना एक भी क्षण गँवाए वे सभी तरह की सेनाओं में बड़े पैमाने पर भर्ती हों.” (वी डी सावरकर, समग्र सावरकर वांगमय, हिन्दू राष्ट्र दर्शन, खंड 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदूसभा, पूना, 1963, पृष्ठ 460)
हिन्दू महासभा के एक और कट्टर नेता और आरएसएस के नायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल सरकार में उस समय वित्तमंत्री हुआ करते थे. वे बंगाल के प्रधानमंत्री और मुस्लिम लीग के नेता फजलुल हक के बाद दूसरे सबसे वरिष्ठ मंत्री थे. सांप्रदायिक राजनीति में एक दूसरे के कट्टर विरोधी हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग युद्ध के दौर में अंग्रेजों की मदद के मामले में साथ-साथ थे. जब भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में कांग्रेस के चुने हुए प्रतिनिधियों ने इस्तीफा दिया तो हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग, दोनों ने ही ऐसा करने से इनकार कर दिया. मुखर्जी ने 26 जुलाई 1942 को बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जॉन हर्बर्ट को लिख कर वादा किया कि “युद्ध के दौरान जो भी जन भावनाओं को भड़काने की कोशिश करेगा और विक्षोभ व असुरक्षा को बढ़ावा देगा, उसके खिलाफ इस दौर में काम कर रही सरकार को सख्त कार्यवाही करनी होगी.”
14 अगस्त 1947 को आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने राष्ट्रीय तिरंगे झण्डे को अपमानित करते हुए लिखा कि “भाग्य के चलते सत्ता में आ गए लोग हमारे हाथों में तिरंगा पकड़ाएंगे लेकिन हिन्दू न तो इसे अपना मान सकते हैं और न ही इसका सम्मान कर सकते हैं. तीन अपने आप में अशुभ संख्या है और तीन रंगों वाला झण्डा लोगों पर बुरा मनोवैज्ञानिक असर छोड़ेगा. यह देश के लिए घातक है.”
आजादी की पूर्व संध्या पर तिरंगे झंडे को 28 साल की सुरैया तैयबजी और उनके पति बदरुद्दीन तैयबजी द्वारा डिजाइन करने के पीछे बड़ी रोचक कहानी है.
उनकी बेटी लैला तैयबजी लिखती हैं कि आजादी के कुछ महीने पहले ही नेहरू की गुजारिश पर उनके पिता बदरुद्दीन तैयबजी ने “एक झण्डा कमेटी गठित की जिसकी अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद कर रहे थे. इस कमेटी ने सभी चित्रकला स्कूलों को खत लिखकर झंडे का डिजाइन तैयार करने का अनुरोध किया. सैकड़ों डिजाइन आए. सभी काफी खराब थे. इनमें से ज्यादातर अंग्रेजी राष्ट्र चिन्ह से प्रभावित थे और उन्होंने ब्रिटिश ताज के दोनों ओर बने शेर और यूनीकॉर्न के चिन्ह को हाथी और शेर या हिरण और हंस से बदल दिया था. ताज को कमल के फूल या कलश या ऐसी ही किसी और चीज से बदल दिया गया था.” समय बीतने के साथ-साथ नेहरू व अन्य सभी अधीर हो रहे थे. तभी उनके “माता-पिता को अशोक स्तम्भ के ऊपर शेर और चक्र का विचार आया. वे दोनों ही उस दौर की मूर्तिकला को पसंद करते थे. इसलिए मेरी माँ ने एक ग्राफिक संस्करण बनाया और वायसरीगल लॉज (मौजूद राष्ट्रपति निवास) के छापाखाने में उसके कुछ संस्करण तैयार किए गए और सब को पसंद आए. तब से ही अशोक स्तंभ के चार शेर हमारे राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में मौजूद हैं.”
तभी सुरैया और बदरुद्दीन ने मिल कर आज के भारत के झण्डे का डिज़ायन बनाया जोकि पिंगली वैंकय्या द्वारा बनाये गये कांग्रेस के तिरंगे झण्डे को बदल कर उसमें चरखा की जगह अशोक चक्र लगा कर बनाया गया.
लैला आगे लिखती हैं, ‘मेरे पिता ने उस पहले झण्डे को, जिसे मेरी मां की देखरेख में कनाट प्लेस के ‘एडी टेलर्स एण्ड ड्रेपर्स’ द्वारा बनाया गया था, रायसीना हिल्स पर फहराये जाते हुए देखा’. उनकी यही आत्मीयता और एक-एक बारीकी पर ध्यान देने के कारण राष्ट्रीय तिरंगा खास बन गया. लैला के शब्दों में ‘विभाजन के घावों के बावजूद तब एकता और सहभाजन था. आजादी की लड़ाई ने बहुत विविध तरह के लोगों को एक साथ जोड़ दिया था. लोग तब एक व्यापक पहचान से खुद को जोड़ते थे - जाति और समुदाय नहीं बल्कि भारतीयता की पहचान.’
मोदी ने पाकिस्तान और मुसलमानों को विभाजन की विभीषिका के लिए जिम्मेदार ठहराने की निर्लज्ज कोशिश करते हुए 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ मनाने की घोषणा की. ताकि आज फिर मुसलमानों के खिलाफ उसी तरह की विभीषिका को अंजाम देने के लिए भारत के हिन्दुओं को उकसाया जा सके.
विभाजन और आजादी के समय आरएसएस और हिन्दू महासभा ने गांधीजी के खिलाफ यह कह कर नफरत भड़काई कि वे विभाजन के लिए जिम्मेदार हैं, और इसी नफरती प्रचार ने गोडसे के दिमाग में विष भरा व उसे गांधीजी की हत्या करने के लिए उकसाया. आज मोदी के राज में गांधीजी को तो ‘स्वच्छ’ शौचालय के प्रतीक में संकुचित कर दिया गया है. सरदार पटेल के बारे में यह झूठ दावा फैलाया जा रहा है कि वे विभाजन के ख़िलाफ़ थे, ताकि सिर्फ़ नेहरु को विभाजन के लिए जिम्मेदार बताकर उनके ख़िलाफ़ नफ़रत भड़कायी जा सके. सच यह है कि वे पटेल ही थे जो सबसे पहले माउण्टबेटन द्वारा लाये गये विभाजन के प्रस्ताव से सहमत हुए थे.
सावरकर ने 1937 में अखिल भारत हिन्दू महासभा के कर्णावती अहमदाबाद सम्मेलन में घोषणा की थी, "भारत को आज एक राष्ट्र नहीं माना सकता है — एकरूप व समरूप — बल्कि भारत में मुख्य रूप से हिन्दू व मुस्लिम दो राष्ट्र विद्यमान हैं". (समग्र सावरकर वांग्मय, वोल्यूम 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिन्दूसभा पब्लिकेशन, 1963, पेज 296).
जबकि जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग और द्विराष्ट्र सिद्धांत 1940 में पेश किया था.
जैसा कि इतिहासकार शम्शुल इस्लाम ने प्रमाणित किया है, "वास्तव में मुखर्जी ने 1944 से ही विभाजन का समर्थन किया था, और एक बार तो कलकत्ता की रैली में बंगाल को बांटने की वकालत करने के कारण जनता ने उनके ख़िलाफ़ हल्ला मचाकर चुप करवा दिया था. मुखर्जी ने 2 मई 1947 को वायसराय लुई माउण्टबेटन को गुप्त रूप में लिख कर उनसे मांग की थी कि अगर भारत अविभाजित रहता है, तब भी बंगाल का विभाजन कर दिया जाय. तब बंगाल के प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी और कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं शरत चंद्र बोस (सुभास चंद्र बोस के बड़े भाई) एवं किरण शंकर रॉय द्वारा पेश की गई एक अविभाजित स्वतंत्र बंगाल की योजनाओं की भी मुखर्जी ने जोरदार मुखालफत की थी. मुखर्जी चाहते थे कि दो-राष्ट्र सिद्धांत के अनुसार साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल का बंटबारा हो जाये."
भारत विभाजन के खिलाफ मुसलमान
एक ओर जहां हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच खाई खड़ी कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर सुविख्यात प्रगतिशील मुसलमानों की कमी नहीं थी जो विभाजन के प्रस्ताव के खिलाफ पूरी शिद्दत से अभियान चला रहे थे.
उनमें सबसे अग्रणी थे मौलाना अबुल कलाम आजाद जिन्होंने इस प्रस्ताव को खारिज करने के लिए पटेल को हरसम्भव समझाने की कोशिश की. अपनी किताब ‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’ में उन्होंने लिखा है, "मुझे यकीन था कि अगर इस आधार पर आजाद भारत का संविधान बनाया जाता और उस पर कुछ समय के लिए ईमानदारी से काम किया जाता तो साम्प्रदायिक दुविधायें एवं अविश्वास शीघ्र ही खत्म हो जाते. देश की असली समस्यायें आर्थिक थीं
पंजाब हिंदू महासभा का गठन 1909 में, और हिंदू महासभा का गठन 1915 में हुआ था. आरएसएस का गठन 1925 में किया गया था. जब देश आजादी के लिए लड़ रहा था; जब स्वतंत्रता सेनानी जेलों में लंबा समय काट रहे थे और अपनी जिंदगी न्योछावर कर रहे थे, तब उस समय ये ‘हिंदू’ संगठन और उनके कर्ता-धर्ता क्या कर रहे थे ?
‘महासभा’ और आरएसएस के नेताओं ने अपना लक्ष्य साफ-साफ सामने रखा है. इसीलिये, हम उनके अपने खुद के लेखों, और स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले अन्य लोगों द्वारा किए गए इन संगठनों के मूल्यांकनों को ही अपना आधार बनाएंगे.
क्या हिंदू महासभा और आरएसएस ने कभी भी ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई का समर्थन किया था?
आरएसएस और हिंदू महासभा के नेताओं ने ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता संग्राम के प्रति बारंबार अपना तिरस्कार दिखाया था.
“ब्रिटिशवाद-विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद बताया गया. आजादी के आन्दोलन के समूचे दौर, इसके नेताओं और आम जनता पर इस प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण का विनाशकारी असर पड़ा था.” (एमएस गोलवलकर, बंच ऑफ थॉट्स, 1996, पृ. 138)
“लड़ाई के बुरे नतीजे निकले हैं. 1920-21 आन्दोलन के बाद नौजवान लोग उग्रवादी बनने लगे. ... 1942 के बाद लोग अक्सरहां यह सोचने लगे कि कानून की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं है...” – 1920-21 के असहयोग आन्दोलन और 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रभाव के बारे में गोलवलकर (श्री गुरुजी समग्र दर्शन, ग्रंथ 4, पृ. 41)
“1942 में भी अनेक लोगों के दिलों में प्रबल भावना मौजूद थी. उस समय भी ‘संघ’ का रोजमर्रा का काम जारी रहा. ‘संघ’ ने कोई सीधी कार्रवाई न करने का फैसला लिया था”. (1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के बारे में गोलवलकर, श्री गुरुजी समग्र दर्शन, ग्रंथ 4, पृ. 40)
मुखर्जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान बंगाल में मिनिस्ट्री छोड़ने से इन्कार कर दिया था. इतना ही नहीं, 1942 में बंगाल सरकार में एक मंत्री के बतौर उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश हुक्मरानों को सक्रिय सहयोग और सलाह भी दिए थे. 1942 में उन्होंने लिखा:
“सवाल यह है कि बंगाल में इस आन्दोलन का मुकाबला कैसे किया जाए? इस प्रांत में शासन इस प्रकार चलाया जाए कि सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद ... यह आन्दोलन इस प्रांत में जड़ नहीं जमा सके.”
“जहां तक कि इंग्लैंड के प्रति भारत के रवैये का सवाल है, तो इस वक्त उनके साथ किसी भी किस्म की लड़ाई नहीं होनी चाहिए. ... सरकार को उनलोगों का प्रतिरोध करना होगा, जो आंतरिक विक्षोभ अथवा असुरक्षा पैदा करने के लिए जन-भावानाओं को भड़काते हैं...” (श्यामा प्रसाद मुखर्जी, ‘लीव्ज फ्रॉम अ डायरी’, 1993, पृ. 175-190)
गोलवलकर को लगा कि वे शहीद ‘असफल’ हो गए जिनकी कुर्बानियां ‘संपूर्ण राष्ट्रीय हितों’ को पूरा नहीं कर सकीं. गोलवलकर ने हमें यह सवाल करने को कहा कि “क्या उससे (शहादतों से) संपूर्ण राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती है ?” (बंच ऑफ थॉट्स, पृ. 61-62)
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों के बारे में लिखा: “इसमें कोई संदेह नहीं कि ये शहीद होने वाले ऐसे लोग महान नायक हैं. ... लेकिन साथ ही, ऐसे लोग हमारे समाज में आदर्श नहीं समझे जा सकते हैं. हम उनकी शहादतों को ऐसी उच्चतम महानता नहीं मानते हैं जो आम लोगों के लिए वांछित हो. क्योंकि, आखिरकार वे अपना आदर्श हासिल करने में विफल रहे, और विफलता का मतलब है कि उनमें कोई घातक किस्म की त्रुटि थी....” (बंच ऑफ थॉट्स, पृ. 283)
वीडी ने हिंदू महासभा में शामिल होने के काफी पहले और जेल की सजा होने के पूर्व ब्रिटिश शासन का विरोध किया था. फिर से गिरफ्तार होने और मुकदमा चलने के ठीक बाद, जब उन्हें 1911 में अंडमान ले जाया जा रहा था, वे ब्रिटिश शासकों के प्रति अपनी निष्ठा जताने लगे और अपनी रिहाई की भीख मांगते हुए कई ‘क्षमा याचिकाएं’ लिखीं. उनके शर्मनाक खाते में ऐसी कम से कम सात क्षमा याचिकाएं हैं जिसमें उन्होंने अपनी रिहाई के बदले अंग्रेजों का स्वामिभक्त बने रहने की शपथ ली थी.
24 नवंबर 1913 को लिखी एक चिट्ठी में उन्होंने अपनी रिहाई मांगते हुए फिर से याचिका लिखी और वादा किया कि वे अपना रास्ता बदल लेंगे और ‘सरकार के प्रति निष्ठा के .... सबसे मजबूत पैरोकार’ बन जाएंगे – “यह भटका हुआ बेटा पितृतुल्य सरकार के नहीं, तो और किसकी चौखट पर लौटेगा?”
जनवरी 1924 में अपनी रिहाई हासिल करने के लिए सावरकर ने रिहाई आदेश में निर्धारित शर्तों को किसी मलाल के बगैर स्वीकार कर लिया “कि वे सरकार की अनुमति के बिना सार्वजनिक तौर पर या अकेले भी किसी किस्म की राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे.”
हाल के अपने एक भाषण में राजनाथ सिंह ने कहा कि सावरकर ने अपनी क्षमा याचिका इसीलिए लिखी, क्योंकि गांधी ने उन्हें ऐसा करने को कहा था. क्या यह सच है ?
तथ्य तो कुछ और कहते हैं:
सावरकर ने सात क्षमा याचिकाएं दी थीं, सबसे पहली याचिका 1911 में दी. उस वक्त गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे. वे 1915 में भारत लौटे थे. इसीलिए, जब सावरकर अपनी क्षमा याचिकाएं लिख रहे थे, तो उस समय गांधी का उनके साथ कोई संपर्क नहीं था.
1920 में गांधी ने सावरकर के छोटे भाई नारायण राव से कुछ कहा था, जब नारायण ने उनकी सलाह मांगी थी. गांधीजी ने एक चिट्ठी लिखकर कहा, “आपको सलाह देना मुश्किल है. बहरहाल, मेरी सलाह है कि इस मुकदमे के तथ्यों को एक संक्षिप्त याचिका में इस प्रकार समेटा जाए कि उससे यह स्पष्ट हो कि आपके भाई द्वारा किया गया जुर्म शुद्ध रूप से राजनीतिक किस्म का है.” इस प्रकार, गांधीजी ने सावरकर को अपना जुर्म कबूल करने को कहा; लेकिन यह भी बताया कि इसका मकसद राजनीतिक होना चाहिए, कोई अपराध नहीं. उन्होंने सावरकर को क्षमा मांगने की सलाह नहीं दी!
इतिहासकार राजमोहन गांधी, जो गांधीजी के पौत्र भी हैं, कहते हैं: “राजनाथ सिंह हमें यह विश्वास करने को कह रहे हैं कि सावरकर भाइयों के आग्रह पर गांधी ने 1920 में जो चिट्ठी लिखी थी, उसे 11 वर्ष पूर्व ही गांधी द्वारा दी गई सलाह के रूप में समझा जाए कि सावरकर को क्षमा याचिका देनी चाहिए. यह बात तो हद से ज्यादा बकवास है. यह बिल्कुल हास्यास्पद है.”
गांधीजी ने मई 1920 में ‘यंग इंडिया’ में जरूर लिखा था कि सावरकर भाइयों के साथ-साथ अली बंधुओं – मौलाना शौकत अली और मौलाना मोहम्मद अली – की रिहाई होनी चाहिए. लेकिन वे उनके लिए “दया की भीख नहीं मांग रहे थे” – वे तमाम राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग कर रहे थे, और उनमें वे भी शामिल थे जिनके विचार और तरीकों से वे सहमत नहीं थे.
हो सकता है, सावरकर द्वारा क्षमा याचना उनकी कार्यनीति रही हो? लेकिन क्या रिहा होने के बाद वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे?
यहां आइये, हम सावरकर और हिंदू महासभा के बारे में दो स्वतंत्रता सेनानियों – गांधीजी और सुभाष चंद्र बोस – के मतों पर विचार करते हैं.
मई 1920 के ‘यंग इंडिया’ के उस लेख में गांधीजी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे यह महसूस करते हैं कि सावरकर बंधुओं को दी गई कारावास की सजा अन्यायपूर्ण है, लेकिन वे स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे. गांधी ने लिखा, “सावरकर बंधु यह दो-टूक कहते हैं कि वे ब्रिटिशों के साथ जुड़ाव से आजादी नहीं चाहते हैं. इसके विपरीत वे महसूस करते हैं कि ब्रिटिशों के साथ जुड़े रह कर ही भारत का भाग्य संवर सकता है.”
सुभाष बोस जून 1940 में सावरकर से मिले थे. उन्होंने इस मुलाकात के बारे में लिखा, “ऐसा लगा कि श्रीमान सावरकर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से नावाकिफ हैं और वे सिर्फ यह सोच रहे थे कि भारत में ब्रिटिश सेना में शामिल होकर हिंदुओं को कैसे सैन्य प्रशिक्षण दिलाया जा सके.” उन्होंने यह भी पाया कि न तो जिन्ना को और न ही सावरकर को स्वतंत्रता संग्राम में कोई अभिरुचि है – “मुस्लिम लीग या हिंदू महासभा, इनमें से किसी से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है.” (नेताजी, कलेक्टेड वर्क्स, ग्रंथ 2, ‘द इंडियन स्ट्रगल’)
अपनी डायरी में लिखते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने यह दर्ज किया कि सुभाष बोस ने उनसे कहा कि अगर हिंदू महासभा बंगाल में एक राजनीतिक संस्था बनने की कोशिश करेगी तो “वे (बोस), जरूरत पड़ी तो बलपूर्वक भी, यह देखेंगे कि सचमुच जन्म लेने के पहले ही वह विनष्ट हो जाए.” (श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लीव्ज फ्रॉम अ डायरी, 1993)
पत्रकार आयुष तिवारी ने विक्रम संपत द्वारा पेश किए गए एक उद्धरण की जांच करने की कोशिश की है जिसे संपत ने सुभाष बोस का वक्तव्य बताया है और जिसमें सावरकर की भरपूर प्रशंसा की गई है. आयुष ने इस उद्धरण को धनंजय कीर द्वारा लिखित सावरकर की जीवनी में पाया, लेकिन कीर ने इस उद्धरण के लिए किसी स्रोत का जिक्र नहीं किया है. आयुष ने कहा, “वस्तुतः, ऐसा कोई प्राथमिक स्रोत नहीं है जहां से यह उद्धरण लिया गया हो.” इस प्रकार संपत ने कीर के लेखन से ऐसे उद्धरण का इस्तेमाल किया है जिसका कोई प्रमाणिक स्रोत नहीं है और जिसकी कोई जांच-पड़ताल नहीं की गई ! जैसा कि हमने ऊपर देखा, नेताजी के अपने खुद के लेखों में सावरकर और हिंदू महासभा के बारे में अत्यंत नकारात्मक मूल्यांकन किया गया है.
आयुष ने आगे लिखा, “नेताजी के संघर्षों के लिए सावरकर को श्रेय देने की प्रवृत्ति काफी पुरानी है. वस्तुतः इस प्रवृत्ति की शुरूआत खुद सावरकर ने शुरू की थी, जब उन्होंने अपनी पुस्तक ‘तेजस्वी तारे’ में लिखा जो स्वतंत्रता के बाद प्रकाशित हुई थी.”
पत्रकार आशुतोष भारद्वाज ने एक ऐसे भड़काऊ उद्धरण की जांच-परख की है जिसे संपत ने सी. राजगोपालाचारी (राजाजी) द्वारा लिखित बताया है और जिसमें यह दावा किया गया है कि राजाजी ने सावरकर की जीवनी (1926) लिखी है जो ‘चित्रगुप्त’ छद्मनाम से प्रकाशित हुई है.
लेकिन यह उद्धरण राजाजी की संग्रहीत रचनाओं में कहीं नहीं मिलता है. आशुतोष ने पाया कि संपत ने यह उद्धरण ‘हिंदू महासभा पर्व’ से लिया है, जिसे सावरकर के भाई बाबाराव सावरकर ने लिखा था. उस उद्धरण के लिए यह कोई प्राथमिक स्रोत नहीं है.
यह गौरतलब है कि वीर सावरकर प्रकाशन द्वारा 1986 में पुनः छापी गई 1926 वाली ‘जीवनी’ में जो प्राक्कथन है, उसमें साफ लिखा हुआ है कि “चित्रगुप्त और कोई नहीं, स्वयं वीर सावरकर हैं”.
विक्रम संपत और राजनाथ सिंह अब जोड़-तोड़ करके सावरकर के लिए विश्वसनीयता हासिल करना चाहते हैं. पर उनकी विश्वसनीयता अनेक क्षमा याचिकाओं और सांप्रदायिक व ब्रिटिश-परस्त नीतियों के चलते दागदार हो चुकी है. इसीलिए वे दावा करते हैं कि गांधीजी ने उन्हें क्षमा याचना करने को कहा था, कि बोस ने उनकी तारीफ की थी और कि राजाजी ने उनकी जीवनी लिखी है. लेकिन ये सब बातें मनगढ़ंत हैं जिसे खुद सावरकर और उनके भाइयों ने परोसा है !
यह स्पष्ट है कि कैद से रिहा होने के समय से लेकर अपने जीवन के अंत तक सावरकर ने अपनी क्षमा याचिकाओं में ब्रिटिश शासकों से किए गए अपने वादे को निभाते रहे. वे किसी भी रूप में आजादी की लड़ाई में कभी शामिल नहीं हुए. उन्होंने 1923 में अपना नफरत-भरा हिंदू वर्चस्ववादी घोषणापत्र हिंदुत्व लिखा, और पूरी जिंदगी सिर्फ हिंदू वर्चस्ववादी नीतियों के लिए काम करते रहे.
जैसा कि बोस ने पाया, सावरकर ने भारत छोड़ो आन्दोलन का समर्थन करने अथवा ब्रिटिश शासन के खिलाफ हथियारबंद प्रतिरोध खड़ा करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. उनके दिमाग में सिर्फ यह बात भरी हुई थी कि ब्रिटिश सेना में कैसे हिंदुओं को घुसाया जाए और उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दिलाया जाए, ताकि मुस्लिमों से लड़ाई लड़ी जा सके !
और, क्या हम यह भूल सकते हैं कि गांधीजी की हत्या के पीछे भी सावरकर ही मुख्य साजिशकर्ता थे?
नाथूराम गोडसे को गांधीजी की हत्या के लिए फांसी दी गई और उसके भाई को इस साजिश में शामिल होने के लिए जेल की सजा दी गई; लेकिन मुख्य साजिशकर्ता सावरकर किसी भी सजा से बच निकले. हालांकि हिंदू महासभा का सदस्य बडगे मुखबिर बन गया था और उसने गवाही दी थी कि आप्टे और गोडसे सावरकर से मिले थे, वहां से हथियार लेकर निकले और सावरकर ने उन दोनों को “यशस्वी होउंया” कहकर आशीर्वाद दिया. बडगे ने आगे कहा कि आप्टे ने उसे बताया कि सावरकर को यकीन था कि “गांधी के 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं” और इसीलिए हत्या की कोशिश सफल होगी. लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि न हो पाने के कारण सावरकर को संदेह का लाभ मिला और वे सजा से बच गए.
बहरहाल, गृह मंत्री सरदार पटेल सावरकर के अपराध के बारे में आश्वस्त थे. 27 फरवरी 1948 को प्रधान मंत्री नेहरू को लिखी एक चिट्ठी में उन्होंने कहा, “यह सावरकर के सीधे नेतृत्व में चलने वाला हिंदू महासभा का एक उन्मादी धड़ा है, जिसने यह साजिश रची और इसे पूरा करवाया.”
सावरकर की मौत के बाद जस्टिस कपूर आयोग की जांच में अतिरिक्त प्रमाण पाए गए जिससे बडगे के बयान की पुष्टि होती है और यह भी संपुष्ट होता है कि सावरकर इस हत्या की साजिश के मुख्य रचयिता थे. 1968 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कपूर आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि महात्मा गांधी की हत्या में जो लोग भी शामिल थे, वे सब जब-न-तब सावरकर सदन में इकट्ठे होते थे और सावरकर के साथ उनकी लंबी वार्ताएं होती थीं. ये तमाम तथ्य मिलकर केवल मात्र इसी सिद्धांत को पुष्ट करते हैं कि सावरकर और उसके ग्रुप ने ही हत्या की है.
हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखी एक चिट्ठी (18 जुलाई 1958) में पटेल ने कहा:
“मेरे मन में कोई संदेह नहीं कि हिंदू महासभा का चरमपंथी धड़ा (गांधी की हत्या की) साजिश में शामिल था. आरएसएस की कार्रवाइयां स्पष्टतः सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं. हमारी खबरें दिखाती हैं कि प्रतिबंध के बावजूद ये कार्रवाइयां खत्म नहीं हुई हैं. बल्कि समय बीतते जाने के साथ आरएसएस की शाखाएं ज्यादा उद्धत होती जा रही हैं और वे विध्वंसक गतिविधियों में अधिकाधिक शामिल हो रही हैं.”
सितंबर 1948 में गोलवलकर को लिखे एक पत्र में पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने को कारणों को फिर से बताया:
“उनके भाषण सांप्रदायिक जहर से भरे होते थे. ... इस जहर के अंतिम नतीजे के बतौर समूचे देश को गांधीजी के अमूल्य जीवन की कुर्बानी झेलनी पड़ी है. आरएसएस के प्रति सरकार अथवा जनता की लेशमात्र सहानुभूति नहीं रह गई है. ... गांधीजी की मृत्यु के बाद जब आरएसएस के लोगों ने खुशियां मनाईं और मिठाइयां बांटी तो उसके प्रति विरोध और ज्यादा प्रबल हो गया.”
आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेतागण जहां गोडसे से ‘शारीरिक दूरी’ बनाये रखते हैं, वहीं वे सावरकर का स्तुतिगान भी करते हैं. बहरहाल, ज्यों ज्यों भाजपा का चेहरा अधिक खुल रहा है और वह आश्वस्त बनती जा रही है, यह ‘दूरी’ भी क्रमशः मिटती जा रही है. भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा का उम्मीदवार बनाने का मोदी का फैसला और उनका एलान कि “कोई हिंदू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता है” इस संदर्भ में विचारणीय हैं. प्रज्ञा ठाकुर (सावरकर के उत्तराधिकारियों द्वारा संचालित) ‘अभिनव भारत’ की आतंकी साजिशों का हिस्सा थीं. वे खुलेआम और बारंबार बोलती रहीं कि गांधीजी की हत्या करने वाला आतंकी गोडसे एक देशभक्त था! और सावरकर भले ही यह दावा करते हों कि उन्होंने गोडसे के हत्या प्रयासों को आशीर्वाद नहीं दिया था, लेकिन आज हिंदू महासभा गोडसे के मंदिर बनवाने की मंशा जाहिर कर रहा है.
यह बिल्कुल स्पष्ट है कि आरएसएस और हिंदू महासभा ने ब्रिटिश शासन के साथ सांठगांठ की थी और वे स्वतंत्रता आन्दोलन में कभी शामिल नहीं रहे थे. इसके बजाय वे सांप्रदायिक और आतंकवादी साजिशों में संलिप्त रहे थे – जिनमें सर्वाधिक जघन्य थी गांधीजी की हत्या की साजिश! और आज, वही ताकतें साम्राज्यवाद के साथ सांठगांठ कर रही हैं और सांप्रदायिक हिंसा तथा दाभोलकर, पनसारे, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे लोगों की हत्या की साजिशों में संलिप्त हैं.
10 मई 1857 के दिन मेरठ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाहियों ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह शुरू किया था. कंपनी राज उसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहता था, लेकिन इतिहास उसे भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद करता है. सचमुच, वह भारतीय राष्ट्रीय चेतना की पहली शुरूआत थी, जिसमें भारतीय उप-महाद्वीप की जनता पहली बार एक साझा दुश्मन के खिलाफ - औपनिवेशिक कंपनी राज के खिलाफ - धर्म, जाति, समुदाय अथवा भाषा की सीमा लांघते हुए एकताबद्ध हुए थे. उस विद्रोह में किसानों और कारीगरों की व्यापक भागीदारी ने उसे वास्तविक शक्ति प्रदान की और उसे लोकप्रिय विद्रोह का स्वरूप भी दिया. विद्रोही किसानों ने सूदखोर महाजनों और कुछ ब्रिटिश-परस्त जमींदारों, अंगरेजों द्वारा बनाई गई अदालतों, राजस्व कार्यालयों (तहसीलों) और थानों पर हमले किए.
आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संगठन आरएसएस के हिंदू वर्चस्ववादी दृष्टिकोण के अनुसार ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के 75वें वर्ष के मौके का इस्तेमाल यह मिथ्या धारणा फैलाने के लिए कर रहे हैं कि हिंदू लोग हजारों साल तक ‘मुस्लिम शासन’ के गुलाम रहे थे. 1857 का विद्रोह इस मिथ्या विमर्श को चुनौती देता है: आखिरकार, मुस्लिम शासन के खिलाफ उस किस्म का कोई विद्रोह क्यों नहीं हुआ था?
1857 का विद्रोह ठीक इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत मुगलों के अथवा पूर्व के किसी भी अन्य शासकों की हुकूमत से गुणात्मक रूप से काफी भिन्न थी. मुगल एक पृथक भूभाग से और अलग पहचान लेकर जरूर आए थे, लेकिन उनके शासन को ‘विदेशी’ शासन के बतौर कभी नहीं सोचा गया था. मुगल शासन के तहत भारतीय संपदा का भारी दोहन करके किसी अन्य देश में नहीं भेजा गया था. उनका शासन उनके पूर्व के विभिन्न हिंदू शासकों की तुलना में कम या ज्यादा उत्पीड़नकारी नहीं था. इसके अलावा, साधारण हिंदुओं और इस्लाम अपनाने वाले हिंदुओं की जिंदगी में कोई बड़ा फर्क भी नहीं था. और सर्वोपरि, उस समय ‘राष्ट्रीय’ पहचान का कोई बोध भी नहीं पैदा हुआ था (यहां तक कि ‘हिंदू’ पहचान का भी बोध नहीं था. भले ही कुछ राजाओं ने, जो हिंदू थे, मुगलों के साथ युद्ध किया था) लेकिन हिंदू राजा तो अन्य हिंदू राजाओं के साथ भी युद्ध किया करते थे. मुगल सेना में हिंदू सेनापति भी थे और हिंदू राजाओं की सेना में भी मुस्लिम सेनापति हुआ करते थे. उन विभिन्न शासकों के बीच युद्धों में कहीं यह साक्ष्य नहीं मिलता है कि उन युद्धों को राष्ट्र-के-बतौर (धर्मों के बीच के युद्ध की बात ही छोड़िये) राष्ट्रों के बीच भी युद्ध के बतौर समझा गया हो.
इसके ठीक उलट, हम 1857 विद्रोह के बुद्धिजीवियों में इस देश को अपना समझने और इस पर अपना मालिकाना जताने की, तथा विदेश से होने वाली लूट से अपनी जमीन को आजाद कराने की जरूरत सामने रखने की स्पष्ट प्रवृत्ति देख पाते हैं. इसका सबसे उम्दा उदाहरण वह तराना है जिसे हम आसानी से भारत का पहला राष्ट्रगान घोषित कर सकते हैं और जिसे 1857 के क्रांतिकारी अजीमुल्ला खां ने लिखा था :
यह गीत आज भी ताजा और आधुनिक सुगंध बिखेरता है और इसमें साफ-साफ औपनिवेशिक शासक को दुश्मन चिन्हित किया गया है जो इस भूमि को लूट-खसोट रहे थे. इसमें ‘हम’, जिन्हें ‘प्यारा हिंदोस्तां’ का ‘मालिक’ घोषित किया गया है, ‘हिन्दू-मुस्लिम-सिख, भाई-भाई प्यारा’ हैं.
इसमें आश्चर्य नहीं कि संकीर्णतावादी और सांप्रदायिक भावना से मुक्त यह स्पष्ट उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय चेतना अंगरेजों को भारत पर अपने पूरे शासन काल में सता रही था. इस वर्ष जालियांवाला बाग जनसंहार पर प्रकाशित एक पुस्तक (जालियांवाला बाग : एन एंपायर ऑफ फियर एंड द मेकिंग ऑफ द अमृतसर मैसेकर) के लेखक किम ए. वागनर ने पुस्तक के पहले अध्याय में ही लिखा है कि “ब्रिटिश औपनिवेशिक सोच में वह ‘गदर’ कभी खत्म नहीं हुआ. शासक वर्ग को हमेशा देशी विद्रोह के संभावित खतरों के बारे में संदेश मिलते रहते थे. ... वह ‘गदर’ उनके मन में सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना - निरंतर भय की वजह - के बतौर नहीं आती थी, बल्कि वह उनके लिए अनुकरणीय दंड और अंधाधुंध हिंसा के रूप में औपनिवेशिक नियंत्रण को बहाल रखने के ब्लूप्रिंट (खाका) के बतौर भी मौजूद रही.”
अप्रैल 1919 में अमृतसर में रामनवमी जुलूसों के दौरान हिंदुओं को शरबत पिलाते या उनके साथ नाचते-गाते हुए मुस्लिमों की मौजूदगी ही 1857 के हौवा को खड़ा कर देने के लिए काफी थी, जिस दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता ने खुद को उपनिवेशवाद-विरोधी राष्ट्रीय भावना के बतौर पहले-पहल जाहिर किया था, और अमृतसर के ब्रिटिश हुक्मरान मशीनगन व सेना जैसे सैन्य संसाधनों की मांग कर बैठे थे ताकि 1857 के बाद हुए भारतीयों के कत्लेआम को दुहराया जा सके. आज के समय में इस बात को याद करने का कितना महत्व है, जब रामनवमी के जुलूस मुस्लिम घरों और मस्जिदों के खिलाफ हिंदू वर्चस्ववादी नफरत और हिंसा के प्रदर्शन बन जा रहे हैं!
कुछ दिन पहले ही मेरठ विश्वविद्यालय में 1857 विद्रोह के चंद नायकों - खान बहादुर खान रोहिल्ला और बहादुर शाह जफर - के दीवार पर लगे चित्रों पर हिंदू वर्चस्ववादियों ने कालिख पोत दी और लिख दिया ‘ये आजादी के योद्धा नहीं’.
ये रोहिल्ला सरदार खान बहादुर खान ही थे जिन्होंने बरेली को उस विद्रोह का प्रमुख केंद्र बनाया था, जहां लखनऊ पर अंगरेजों द्वारा फिर से कब्जा कर लेने के बाद नाना साहेब और अन्य नेताओं ने शरण ली थी. बरेली पर भी अंगरेजों द्वारा पुनः कब्जा कर लेने के बाद खान बहादुर खान नेपाल निकल गए थे जहां नेपाल नरेश ने उन्हें पकड़कर अंगरेजों के हवाले कर दिया. उन्हें मौत की सजा दी गई और 24 फरवरी 1860 को ‘कोतवाली’ (थाना, ढाका) में फांसी पर लटका दिया गया. यह शर्म की बात है कि आरएसएस के अनुयाई, जिन्होंने कभी भी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया, उनकी स्मृति का अपमान करें, सिर्फ इसलिये कि वे मुस्लिम थे.
1857 की विरासत कुछ ऐसी ही है कि जिसे हिंदू वर्चस्ववादी राजनीति जनता के स्मृति पटल से मिटा देना चाहेगी - लेकिन यह कर पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि यह ऐसी विरासत है जिसे अंगरेज शासक लाख चाहने के बावजूद अपनी स्मृति से नहीं हटा पाए - आजादी की पहली लड़ाई के बारे में हर गांव की अपनी-अपनी विशिष्ट स्मृतियां हैं और ये स्मृतियां मौखिक विमर्श बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती चली आ रही हैं. सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ने बुदेलखंड के कथावाचकों / गायकों के मौखिक विमर्श को अमर बना दिया कि कैसे रानी लक्ष्मीबाई ने आजादी के लिए लड़ने वाली सेना का नेतृत्व करते हुई मौत को गले लगा लिया था – “बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मरदानी वो तो झांसी वाली रानी थी.”
और फिर, 1857 की उस महागाथा से मुस्लिमों को भी मिटा पाना असंभव है : उन्हें हर स्तर पर आजादी के योद्धाओं के बीच पाया जा सकता है - राजा से लेकर आमजन और बुद्धिजीवियों तक.
1857 के विद्रोह ने समान रूप से हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच मजबूत एकता निर्मित की थी, और इस एकता को भंग करने में ब्रिटिश षड्यंत्रकारियों को लगभग सात दशक लग गए थे. 1857 के विद्रोहियों ने ‘हुकूमती अदालत’ का गठन किया था जिसमें छह लोग सेना से थे और चार नागरिकों के बीच से थे, और इसमें हिंदुओं और मुस्लिमों की बराबर की भागीदारी थी. विद्रोहियों की सरकार ने आम जनता के उपभोग की वस्तुओं पर लगे टैक्स खत्म कर दिए थे और जमाखोरी पर सजा मुकर्रर की थी. उसके चार्टर में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन भी शामिल था, जिसे ब्रिटिश शासकों ने लागू किया था. इस चार्टर में ‘जोतने वालों को जमीन’ का भी आह्वान किया गया था. ये सभी घोषणाएं लोकप्रिय भाषा में जारी की गई थीं. हिंदी और उर्दू में एक साथ ये घोषणाएं निकाली गई थीं. और, इन घोषणाओं को हिंदुओं और मुस्लिमों, दोनों के नाम से संयुक्त रूप से जारी किया गया था.
इतिहास में सावरकर का स्थान उनके दो राष्ट्र के सिद्धांत, हिंदू राष्ट्र के उनके सांप्रदायिक फासिस्ट दृष्टिकोण, अंगरेजों से मांगी गई उनकी कायरतापूर्ण माफियों और गांधी की हत्या में उनकी भूमिका के चलते कलंकित हो गया है. यही कारण है कि लाल कृष्ण अडवाणी ने भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर 10 मई 2007 को सावरकर के बारे में लिखते हुए स्वीकार किया था कि “अपने जीवन के उत्तरार्ध में अनेक मुद्दों पर सावरकर के विचार समस्याग्रस्त थे.” बहरहाल, अडवाणी ने फिर तर्क दिया कि सावरकर को अपने प्रकाशन - 1857 का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम - के चलते ‘बदनामियों से’ मुक्ति मिल गई.
मार्क्स और एंगेल्स ने सिलसिलेवार ढंग से 1857 को दर्ज करते हुए उसे ‘राष्ट्रीय स्वाधीनता’ के लिए युद्ध बताया है. सैयद अहमद खां (1817-98) पहले भारतीय थे, जिन्होंने 1857 को ‘गदर’ नहीं, बल्कि ‘भारतीय विद्रोह’ की संज्ञा दी थी. विश्वमय पति ने कहा, ‘अहमद खां का दृष्टिकोण वह पहला भारतीय दृष्टिकोण था जिसमें साम्राज्यवाद और उसकी नीतियों को उस ‘विद्रोह’ का मूल कारण बताते हुए उसकी आलोचना की गई है.’
खान के बाद, सावरकर की पुस्तक शायद पहली भारतीय पुस्तक थी जिसमें ‘गदर’ शब्द को खारिज किया गया और 1857 को ‘स्वतंत्रता युद्ध’ बताया गया. और इस रूप में, ‘गदर पार्टी’ के लिए, भगत सिंह और मैडम कामा तथा अन्य लोगों के लिए वह पुस्तक सूचना और प्रेरणा का बड़ा स्रोत बनी.
लेकिन अपने जीवन के इस समय में भी हम सावरकर को इतिहास के वास्तविक तथ्यों के साथ अपने हिंदू वर्चस्ववादी दृष्टिकोण का तालमेल करने के लिए कड़ी मशक्कत करते देखते हैं - खासकर तब, जब 1857 विद्रोह को पूर्ण स्वरूप देने वाली हिंदू-मुस्लिम एकता का मामला उठता था.
यह सच है कि इस पुस्तक के ढेर सारे पन्नों में हम मुस्लिम देशभक्तों और योद्धाओं के साहसपूर्ण कारनामों का जिक्र होता पाते हैं - 1857 पर लिखी किसी भी किताब में इस तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता है. लेकिन 1857 में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इस हिंदू-मुस्लिम एकता के तथ्यों के साथ ‘बाहरी शक्तियों’, और खास तौर पर ‘विदेशी मुस्लिम शासकों’ के प्रति भारतीय (हिंदू) प्रतिरोध की लंबी गाथा के बतौर भारतीय इतिहास की अपनी सोच का तालमेल बिठाने के अपने प्रयासों में वे काफी उलझी और आरोपित व्याख्याएं भी देते हैं. और यह सूत्र उनकी समूची पुस्तक में यहां से वहां तक व्याप्त है. अपने लेखकीय प्राक्कथन में वे लिखते हैं, “शिवाजी के समय में मुस्लिमों के प्रति नफरत की भावना उचित थी और जरूरी भी थी; किंतु अगर अभी उस भावना को तूल दिया गया तो यह अनुचित और मूर्खता ही होगी. ...” (द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस : 1857, राजधानी ग्रंथागार, नई दिल्ली 1970).
उस पुस्तक में एक दूसरी जगह पर सावरकर को हम मुस्लिमों के साथ हिंदुओं के संबंध और राष्ट्र में मुस्लिमों के स्थान के सवाल पर गुत्थमगुत्था होते देखते हैं : “वे (नाना साहब) भी यह महसूस करते थे कि इसके बाद ‘हिंदुस्थान’ का मतलब इस्लाम और हिंदूवाद, दोनों के मानने वालों का संयुक्त राष्ट्र था. जब तक मुस्लिम लोग भारत में विदेशी शासकों की हैसियत में रहे, तब तक उनके साथ भाइयों जैसे रहने का मतलब राष्ट्रीय कमजोरी को स्वीकार करना होता.... सैकड़ों साल के संघर्ष के बाद हिंदू संप्रभुता ने मुसलमानों की हुकूमत को परास्त किया. ...अब मुसलमानों के साथ हाथ मिलाने में राष्ट्रीय शर्म जैसी कोई बात नहीं है, बल्कि इसके विपरीत यह उदारता की कार्रवाई होगी. ...उनके बीच के वर्तमान संबंध शासक और शासितों, विदेशी और देशी, जैसे नहीं रह गए हैं; बल्कि सीधे भाइयों जैसे संबंध हो गए हैं, उनके बीच सिर्फ धर्म का फर्क रह गया है...” (वही, पृष्ठ 75-76).
1857 के किसी भी नायक को, यहां तक कि हिंदू नायकों को भी यह जरूरत नहीं महसूस हुई थी कि वे हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए ऐसी कोई रक्षात्मक व्याख्या पेश करें. 1857 के नायक नहीं, बल्कि ये सावरकर ही हैं जिनकी कल्पना मिथकीय ‘अतीत के नफरत’ से लबरेज है, और इसीलिए 1857 के उपनिवेशवाद-विरोधी एकता के ऐतिहासिक तथ्य के साथ अपनी इस कल्पना का तालमेल बिठाना उनके लिए इतना भारी पड़ रहा है.
सावरकर की इस परेशानी का स्रोत क्या है ? यह एक सैद्धांतिक विभ्रम से पैदा होती है - धर्म को राष्ट्र के साथ एकमेक करने की प्रवृत्ति से पैदा होती है. उनकी पुस्तक के पहले अध्याय का शीर्षक ही यह बता देता है – ‘स्वधर्म और स्वराज’, जिसमें वे पूछते हैं, ‘हमारे अलावा किस दूसरे इतिहास में अपने धर्म के प्रति प्रेम और अपने देश के प्रति प्रेम का उसूल इतनी उदारता के साथ अभिव्यक्त हुआ है ?’ लेकिन वे उपनिवेशवाद के बारे में और किसानों या आम जनता के जीवन पर उसके प्रभावों के बारे में कोई जिक्र नहीं करते हैं; उनके लिए ब्रिटिश हुकूमत का मतलब सिर्फ ‘विदेशी’ शासन का अपमान भर था.
और विदेशीपन का भी ज्यादा जुड़ाव धर्म से ही था - वे दावा करते हैं कि ‘प्राच्यों (एशिया के लोगों)’ के लिए स्वधर्म के बिना स्वराज घृणित है और स्वराज के बिना स्वधर्म शक्तिहीन’ (1857, पृष्ठ 9-10). सावरकर धर्मिक राष्ट्रवाद के अपने सिद्धांत को 1857 में भी खोजने की कोशिश करते हैं, और यही वह चीज है जो उनकी आंखों पर पट्टी चढ़ा देती है और उन्हें 1857 के असली महत्व और सारवस्तु को समझने से रोक देती है. सावरकर की टिप्पणी कि मुसलमानों के साथ भाइयों जैसा रहना ‘राष्ट्रीय कमजोरी’ थी, दिखाती है कि वे इसी प्राच्यवादी सिद्धांत पर चल रहे थे कि हिंदू लोग “कमजोर और स्त्रैण थे”, क्योंकि अपने अधिकांश समयों में मुस्लिमों के साथ भाइयों जैसा ही रहा करते थे. ‘हिन्दु-स्थान’ (इस शब्द का इस्तेमाल उन्होंने अपनी पूर्व की रचनाओं के साथ-साथ परवर्ती लेखों में भी किया है) की अपनी काल्पनिक सोच से भरे होने के चलते ही सावरकर उस हिदोस्तां को नहीं देख सके, जिसका सपना अजीमुल्ला खां और 1857 के योद्धाओं ने देखा था.
सावरकर अपने हिंदू वर्चस्ववादी खाके में 1857 को इस तरह से समंजित किया कि वह एक अस्थायी शांति (युद्ध-विराम) जैसा प्रतीत हो, जैसा कि उनकी कल्पना में मातृभूमि ने आदेश दिया था. 1857 के पांच दिनों का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं, “हिंदुस्थान के इतिहास में ये पांच दिन एक अन्य कारण से हमेशा याद रखे जाएंगे. क्योंकि इन पांच दिनों ने... किसी भी कीमत पर तब तक के लिए हिंदुओं और मुसलमानों के बीच निरंतर लड़ाई को रोकने की... उद्घोषणा की थी, जो गजनी के महमूद के आक्रमण के जमाने से चली आ रही थी. ...भारतमाता जो अतीत के समय में शिवाजी, प्रताप सिंह, छत्रसाल, प्रतापादित्य, गुरु गोविंद सिंह और महादजी सिंधिया के द्वारा मुसलमानों की बेड़ी से मुक्त करा ली गई थी - उस भारतमाता ने उस दिन यह पावन आदेश दिया था, ‘आज के बाद समान हो और भाई हो; मैं तुम दोनों की समान रूप से माता हूं.’ ...” (1857, पृष्ठ 126)
दिल्ली की गद्दी पर बहादुर शाह जफर की ताजपोशी के बारे में भी वे काफी असहाय महसूस करते हुए विकृत ढंग का स्पष्टीकरण देते हैं : “... पुराने जमाने का मुगल राजवंश इस देश की जनता द्वारा नहीं चुना गया था. वह बलपूर्वक भारत पर थोपा गया था - विदेशी आक्रांताओं और देशी लोभियों के मिलेजुले शक्तिशाली प्रयासों से लादा गया था. ... बहादुर शाह जफर की आज जो ताजपोशी की गई थी, वह पुरानी गद्दी नहीं थी. ...इसके पहले की तीन या चार शताब्दी के दौरान सैकड़ों हिंदू शहीदों ने जो अपना खून बहाया था, वह व्यर्थ चला जाता. ... पांच शताब्दी से भी ज्यादा समय से हिंदू सभ्यता अपने जन्मसिद्ध अधिकारों पर विदेशी अतिक्रमण के खिलाफ रक्षात्मक युद्ध लड़ती आई थी. ...विजेताओं पर विजय पाई गई, और भारत एक बार फिर मुक्त हुआ, दासता और पराजय का धब्बा मिटा दिया गया. हिंदू फिर से हिंदुओं की भूमि के स्वामी बन गए...” (1857, पृष्ठ 283-84).
1857 पर लिखी अपनी पुस्तक में सावरकर ने मुस्लिमों की साहसपूर्ण लड़ाइयों और कुर्बानियों को दर्ज किया है. लेकिन बाद में उन्होंने मुस्लिमों से रहित भारत के पक्ष में तर्क दिया, ठीक वैसे ही जैसे कि हिटलर ने जर्मनी से यहूदियों को खदेड़ बाहर किया था. 1944 में सावरकर ने अमेरिकी पत्रकार टॉम ट्रीनर को कहा कि भारत में मुस्लिमों के साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए “जैसे कि अमेरिका में नीग्रो के साथ किया जाता है” - अर्थात् अलग कर दिया गया समुदाय; बसों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर ‘गोरों की जगहों’ पर पहुंचने से रोक दिया गया समुदाय, मताधिकार और अन्य नागरिक अधिकारों से सर्वथा वंचित समुदाय.
1857 के योद्धाओं का सपना सावरकर की कल्पना से यथासंभव हद तक दूर था. वे लोग महज राजाओं और राजकुमारों की पुरानी व्यवस्था को बहाल करने के लिए नहीं लड़ रहे थे : वे नए समाज का खाका तैयार कर रहे थे जिसमें किसानों और उत्पीड़ित व हाशिये पर धकेली गई विभिन्न जातियों के लोगों को मर्यादा और मान्यता हासिल हो.
जब 1857 के योद्धाओं ने सत्ता संभाली, तो उनका शासन कैसा दिखता था ? तलमिज खलदुन ने अपने निबंध ‘द ग्रेट रिबैलियन’ (द 1857 रिबैलियन, बिस्मय पति द्वारा संपादित) में लिखा कि मुगल शासक वस्तुतः एक संवैधानिक बादशाह भर थे. उस विद्रोह का क्रांतिकारी लोकतांत्रिक चरित्र उसके दरबार (दिल्ली में उसकी सर्वोच्च निर्णयकारी निकाय) द्वारा लिए गए कदमों से स्पष्ट हो जाता है. खलदुन ने लिखा, “जरूरतों ने इस दरबार को भारी और मनमाने कर लगाने को विवश कर दिया था. लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि कराधान का यह बोझ लगभग पूरी तरह उन वर्गों पर पड़ा जो इसे वहन करने लायक थे. टैक्स के उपायों से सड़क-का-आदमी अछूता रहा था. इसके विपरीत, दरबार ने उसे राहत पहुंचाने की कोशिश की थी. उसने जमींदारी व्यवस्था को खत्म करने और वास्तविक काश्तकारों को संपत्ति अधिकार देने के आदेश जारी किए. दरबार द्वारा पारित आदेशों से स्पष्ट होता है कि उसमें राजस्व मूल्यांकन की प्रणाली को समग्रतः दुरुस्त करने की मंशा निहित थी. बहरहाल, वह शासन इतने कम दिनों तक टिका कि उसे ये कार्यभार पूरे करने का मौका ही नहीं मिला.”
कुंवर सिंह का जन्म बिहार के तत्कालीन शाहाबाद (अभी, भोजपुर) जिले के जगदीशपुर में एक भूस्वामी परिवार में हुआ था. गौर करने की बात यह है कि उन्होंने 80 वर्ष की उम्र में अपने गिरते स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए 1857 के हथियारबंद विद्रोह का नेतृत्व किया था. जुबानी इतिहास में सुना जाता है कि वे कहते थे कि वे तो इस विद्रोह का इंतजार ही कर रहे थे, और उन्हें इस बात का दुख था कि यह विद्रोह तब हुआ, जब वे इतने बूढ़े हो गए थे. वे छापामार युद्ध में प्रवीण थे - अपने सैन्य चातुर्य से वे ब्रिटिश सेना की आंखों में हमेशा धूल झोंकते रहे - और 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने शाहाबाद से बरतानवी फौज को खदेड़ बाहर किया. उसके चंद दिनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसके पहले उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को अपनी जमीन से खत्म कर दिया था.
भोजपुरी के एक गीत में उन्हें इस तरह से याद किया जाता है :
अब छोड़ रे फिरंगिया हमार देसवा
लूटपाट कैले तुहूं
मजे उड़ैले कैलस
देस पर जुलुम जोर
सहर गांव लूटी फूंकी दिहिया फिरंगिया
सुनी सुनी कुंवर के हिरदया में लागल अगिया
अब छोड़ रे फिरंगिया हमार देसवा
जहानाबाद से 1857 के नेता काजी जुल्फिकार अली के साथ उनके पत्राचार से यह साफ पता चलता है कि वे दोनों बहुत अच्छे और घनिष्ठ मित्र थे. उनके बीच 1856 में हुए पत्राचार में उन दोनों ने मेरठ की तरफ कूच करने की योजना पर विचार-विमर्श किया था, 1857 में विद्रोह फूट पड़ने के पहले ही ! अपनी चिट्ठियों में उन्होंने स्वतंत्रता योद्धाओं की सेना को दो भागों में बांटने की योजना बनाई थी - एक हिस्सा कुंवर सिंह के नेतृत्व में, और दूसरा हिस्सा जुल्फिकार की कमान में.
बहरहाल, 23 अप्रैल 2022 को गृह मंत्री अमित शाह उपनिवेशवाद-विरोधी विमर्श के बजाय सांप्रदायिक विमर्श को आगे बढ़ाने की मंशा से जगदीशपुर में भाजपा द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए. वहां भाजपा 1857 के गद्दार उसी डुमरांव महाराज की मूर्ति खड़ा कर रही है, जिसे अंगरेजों ने बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा पुरष्कार के रूप में दे दिया था. भाजपा स्वतंत्रता संग्राम के गद्दारों और शहीदों - डुमरांव महाराज और कुंवर सिंह; गोडसे और गांधी - को एक साथ सम्मान देने का नाटक नहीं कर सकती है.
विडंबना यह है कि जिस दिन अमित शाह कुंवर सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर रहे थे, उसी दिन वहां के जिला प्रशासन ने कुंवर सिंह की पौत्र-वधू को उनके घर में ही बंद कर रखा था, ताकि कुंवर सिंह के पोते बबलू सिंह की हाल में हुई हत्या को ढंकने में पुलिस और प्रशासन की संलिप्तता के मुद्दे को उठाने से उन्हें रोका जा सके.
फैजाबाद के मौलवी अहमदुल्ला 1857 विद्रोह के असाधरण नेता थे. ब्रिटिश ऑफिसर थॉमस सीटन ने उन्हें ‘महान योग्यताओं से युक्त, अदम्य साहस वाला, दृढ़ संकल्प से भरा, और सर्वोपरि विद्रोहियों के बीच से बेहतरीन सैनिक’ बताया है. एक अन्य ब्रिटिश ऑफिसर जीबी मलेसन, जिन्होंने 1857 का इतिहास लिखा है, ने लिखा कि “मौलवी एक शानदार व्यक्ति थे. उनका नाम अहमदुल्ला था और वे मूलतः औध (अवध) में फैजाबाद के रहने वाले थे. वे लंबे, छरहरे और गठीले बदन के थे; उनकी बड़ी और गहरी आंखें थीं, तनी भंवें थीं, ऊंची मुड़ी नाक और मजबूत जबड़े थे. इसमें कोई शक नहीं कि 1857 विद्रोह की साजिश के पीछे मौलवी के दिमाग और प्रयासों की बड़ी भूमिका रही थी. अभियानों के दौरान रोटियों का वितरण - चपाती आन्दोलन - वास्तव में उनके ही दिमाग की उपज था.”
लड़ाई में मौलवी अहमदुल्ला की मौत को दर्ज करते हुए मलेसन ने उन्हें यह श्रद्धांजलि दी : “अगर कोई देशभक्त ऐसा आदमी है जो आजादी की योजना बनाता है और उसके लिए लड़ता है, और अपने देश के लिए गलत ढंग से खत्म कर दिया जाता है, तो बिल्कुल निश्चित तौर पर मौलवी एक सच्चे देशभक्त थे.”
सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में आरएसएस और भाजपा के हिन्दुत्ववादियों द्वारा ढहाई 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद के ऐवज में मुसलमानों को जो पांच एकड़ भूमि का प्लॉट दिया है, उस पर मौलवी अहमदुल्ला शाह फैजाबादी के नाम पर एक कॉम्पैक्स विकसित करने का निर्णय लिया गया है. इसमें मस्जिद, अस्पताल, संग्रहालय, शोध केन्द्र और गरीबों के लिए एक सामुदायिक रसोई भी होगी. एक नफरत भरे कृत्य और नफरती व हिंसक हमलावरों के पक्ष में आये अदालती फैसले के जवाब में मुसलमानों ने आजादी की पहली लड़ाई की यादगार के रूप में - जिसमें मुसलमानों और हिन्दुओं ने मिल कर भारत की नींव रखी थी - एक ऐसी इमारत व संस्थान के निर्माण का फैसला लिया है जो फैजाबाद और अयोध्या के सभी लोगों को लाभान्वित करेगा.
इतिहासकार शशांक सिन्हा लिखते हैं कि “संथाल (‘हुल’ अथवा विद्रोह के क्रूर दमन के बाद) जहां संथाल परगना के नए जिले के निर्माण से उस क्षेत्र के आसपास के संथालों को थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन हजारीबाग और मानभूम (ये भूभाग भी हुल से प्रभावित थे) में रहने वाले उनके बिरादरों को कोई खास लाभ नहीं मिल सका.” नतीजतन, इन क्षेत्रों के संथाल सूदखोरों से हिसाब-किताब बराबर करने के लिए 1857 के विद्रोह में शामिल हो गए, और उन्होंने सैनिकों के साथ सक्रियतापूर्वक मिलकर उन सामंती शक्तियों पर हमला बोल दिया जो अंगरेजों के साथ सहयोग कर रहे थे.
सिन्हा लिखते हैं कि “चतरा की लड़ाई में उन सैनिकों की पराजय के बाद भी इन संथालों ने अपनी कार्रवाई जारी रखी. लगभग 10,000 लोगों ने एक थाना जला दिया, एसमिया चट्टी (हजारीबाग) को लूट लिया, और हजारीबाग तथा रांची के बीच के संचार माध्यमों को काट देने का प्रयास किया. बाद में, उनके एक ग्रुप ने गोमिया को लूटा और वहां के सरकारी भवनों और दस्तावेजों को जला डाला. संथालों की तरह, हजारीबाग जिले के उत्तरी हिस्से में विस्थापित भुइयां टिकैतों ने 1857 के विद्रोह में पुराने खरीदारों से अपनी जमीन वापस लेने का मौका पा लिया.”
सिन्हा ने यह भी बताया कि “हजारीबाग, सिंहभूम और पलामू जैसे इलाकों में, जहां आदिवासी लोग हिस्सा ले रहे थे, उन्होंने घिसेपिटे रास्ते पर चलना बंद कर दिया. गतिशील रहने के अलावा, हम उन आदिवासियों को अपने स्थानीय दुश्मनों और/अथवा साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ लड़ने के लिए गैर-आदिवासियों और स्थानीय कुलीन वर्गों के साथ भी एकजुट होते देख पाते हैं.” (‘1857 एंड द आदिवासीज ऑफ छोटानागपुर’, शशांक एस. सिन्हा, द ग्रेट रिबैलियन, पृष्ठ 16-31)
(‘द ग्रेट रिबैलियन’ में बी. रामा चंद्रन द्वारा लिखित अध्याय से उद्धृत)
अक्सरहां यह गलत तौर पर समझ लिया जाता है कि 1857 का विद्रोह उत्तर भारत तक ही सीमित रह गया था. वस्तुतः, वह आग फैलते हुए दक्षिण भारत में भी पहुंच गई थी.
रेड्डी लिखते हैं कि, “उस महान विद्रोह के ठीक पहले 28 फरवरी 1857 में विजयनगरम के ‘नैटिव (स्थानीय)’ सिपाहियों का विद्रोह हुआ था जो फर्स्ट रजिमेंट ‘नैटिव’ इन्फैंट्री के सिपाही थे.”
17 जुलाई 1857 को दो विद्रोहियों, तुराबाज खां और मौलवी अलाउद्दीन ने हैदराबाद में ब्रिटिश रेजिडेंसी पर हमले की अगुवाई की थी. लगभग 5000 लोगों की भीड़ उनका समर्थन कर रही थी जिसमें रोहिल्ला और आम नागरिक आबादी शामिल थी. उसके एक महीने के बाद फिर से कुडप्पन में 28 अगस्त 1857 को एक शेख पीर शाह ने ‘नैटिव’ अफसरों और 30वें रेजिमेंट ‘नैटिव’ इंन्फैंट्री के सैनिकों को ‘उकसाने’ की कोशिश की थी.
कोरुकोंडा सुब्बा रेड्डी, जो कोंडा रेड्डी कबीले से आते थे और गोदावरी नदी के किनारे बसे कोरातुर गांव के प्रधान थे, ने एक लंबा छापामार युद्ध चलाया और ब्रिटिश फौज को मजबूर किया कि वह उनका पीछा करते हुए मलेरिया-ग्रस्त पहाड़ी इलाके में चली आए. 7 अक्टूबर 1858 को आदिवासी विद्रोही नेताओं कोरुकोंडा सुब्बा रेड्डी और कोरला सीतारमैया को अंततः बुट्टैया गुडेम गांव में फांसी दे दी गई. कोरला वेंकट सुब्बा रेड्डी और गुरुगुंटला कोम्मी रेड्डी को पोलावरम गांव में तथा कोरुकोंडा तुम्मी रेड्डी को तुडिगुंटा गांव में फांसी दी गई.
मौखिक कथाओं के अनुसार, कोरुकोंडा सुब्बा रेड्डी के शव को अंगरेजों ने पहले तो लोहे के एक पिंजड़े में (जिसे कालांतर में ‘सुब्बा रेड्डी सांची’ कहा गया) रखा और फिर लंबे समय तक फांसी पर लटका छोड़ दिया, ताकि आम लोग उसे देख सकें और उनके दिमाग में यह आतंक फैल सके कि किसी विद्रोही की क्या नियति होती है.
गुडेम आदिवासी इलाके (विजाखापत्तनम जिला) में भी विद्रोह हुए थे.
(अजीजन बाई और बेगम हजरत महल के बारे में ये अंश ‘द ग्रेट रिबैलियन’ में लता सिंह द्वारा लिखित अध्याय से उद्धृत हैं)
इस अध्याय में अधिकांश वर्णन ये है कि जब अजीजन उस विद्रोह में शामिल हुई तो वह कैसे पदकों (मेडल) से सुसज्जित पुरुष वेशभूषा में पिस्तौलों का पट्टा लटकाये घोड़े की पीठ पर सवारी करती रहती थी.
अजीजन कानपुर में उमराव बेगम के घर में लुरकी महल में रहती थी. उसकी मां लखनऊ की एक नाचने-गाने वाली बाई थी. जब अजीजन काफी छोटी थी, तभी उसकी मां की मृत्यु हो गई थी और तब एक बाई ने उसे लखनऊ में पाला-पोसा. इस प्रकार, अजीजन ने जरूर लखनऊ छोड़ा होगा और कानपुर में बस गई होगी. ...अजीजन के कानपुर जाने के पीछे एक संभावित कारण यह होगा कि उसके मन में आजादी की मजबूत चाहत उमड़ रही होगी. संभवतः उसे किसी के संरक्षण में रहना पसंद नहीं होगा - वह जिस किस्म की महिला थी उससे तो यही लगता है, और फिर 1857 के विद्रोह में उसने जैसी भूमिका निभाई उससे भी ऐसा ही प्रतीत होता है.
अजीजन दूसरी घुड़सवार टुकड़ी के साथ बेहद घुलमिल गई थी, जो प्रायः उसके घर आती रहती थी. खासकर, वह दूसरी घुड़सवार टुकड़ी के शमसुद्दीन के बेहद करीब थी. शमसुद्दीन ने कानपुर में 1857 के विद्रोह में काफी सक्रिय भूमिका अदा की थी. उसके घर में विद्रोहियों की बैठकें होती रहती थीं, जिसमें विद्रोह की योजना बनाई जाती थी. शमसुद्दीन भी अक्सरहां अजीजन के घर जाया करता था.
यह भी तथ्य है कि नाना साहब और अजीमुल्ला खां, दोनों लोग अजीजन को जानते थे और उसका घर सिपाहियों की बैठकों का गुप्त स्थल था. अजीजन को 1857 के विद्रोह की एक मुख्य साजिशकर्ता समझा जाता था. ऐसा लगता है कि उसे जानकारी थी कि कानपुर में 4 जून 1857 के दिन विद्रोह करने की योजना बनाई गई थी. उसकी भूमिका खुफियागीरी करने और संदेश लाने-ले जाने की समझी जाती है. कुछ जगहों पर यह भी वर्णन मिलता है कि अजीजन ने औरतों का एक दल बना रखा था, जो बिना किसी डर-भय के हथियारबंद सैनिकों का मनोरंजन करती थीं, उनके जख्मों का इलाज करती थीं और उनके बीच हथियार और गोली-बारूद वितरित करती थीं.
नानक चंद के अनुसार, ‘अजीजन का बड़ा साहस ही था कि वह हमेशा हथियार से लैस रहती थी और घुड़सवार टुकड़ी के साथ अपने लगाव के चलते वह हमेशा तोपखाने में ही मौजूद रहती थी’. एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने लिखा है कि ‘तोपखाने में भारी आग के बावजूद वह पिस्तौलौं से लैस वहां दिखाई पड़ जाती थी. वह अपने दोस्तों, दूसरी रेजिमेंट के घुड़सवारों, के बीच रहती थी, जिनके लिए वह खाना पकाती थी और गीत गाती थी.’
हालांकि इस अध्याय में हम 1857 के विद्रोह में अजीजन का भूमिका पर चर्चा कर रहे हैं, किंतु उस विद्रोह में उन जैसी बहुत सारी ऐसी महिलाओं की सैकड़ों कहानियां जरूर होंगी, जो अधिकांशतः इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हो पाईं. ऐसी लड़कियों के भी जिक्र मिलते हैं जो बरतानवी फौज के खिलाफ लड़ाइयों में सड़कों पर उतर पड़ी थीं. लगभग सभी ‘कोठे’ (बाइयों के घर) षड्यंत्र के केंद्र बन गए थे, और उनमें से अनेक औरतें 1857 के विद्रोह में सीधे तौर पर शामिल भी हो गई थीं. विद्रोह की कार्रवाइयों को गुप्त रूप से, लेकिन खुले हाथों धन देने की उनकी भूमिका लिखित रूप में दर्ज है. हालांकि ये महिलाएं प्रत्यक्ष तौर पर लड़ाई नहीं लड़ रही थीं, लेकिन तथाकथित रूप से लोगों को उकसाने और विद्रोहियों को पैसे से मदद करने के आरोप में उन्हें दंडित भी किया गया था. अंगरेज अधिकारी यह जानते थे कि उनके कोठों पर विद्रोहियों की बैठकें होती हैं, और इसीलिए राजनीतिक साजिशों के अड्डे के बतौर उन कोठों को हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता था. वास्तव में, उनके खिलाफ बरतानवी हुकूमत ने जितनी उग्रता से दंड देने की कार्रवाइयां चलाईं, उससे विद्रोह में उनकी भूमिका को उचित तौर पर आंका जा सकता है. बड़े पैमाने पर उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया गया. लखनऊ में, जो बाइयों का केंद्र था, 1857 के विद्रोह को कुचल देने के बाद ब्रिटिश शासकों ने शक्तिशाली कुलीन तबके के खिलाफ अपने आक्रोश को मोड़ दिया. 1857 में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विद्रोह में प्रमाणित भागीदारी के चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने जिन लोगों की संपत्ति जब्त की थी, उनकी सूची में उनके नाम दर्ज थे.
बेगम हजरत महल एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शख्सियत बन कर उभरीं, जिन्होंने बाई के रूप में अपना जीवन शुरू किया था. अवध के नवाब वाजिद अली शाह के साथ उनकी शादी हुई, और जब शाह को निर्वासित कर दिया गया तो हजरत महल ने स्वतंत्रता सेनानियों की इस सलाह को मान लिया कि वे अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कदर को नवाब और खुद को रेजिडेंट घोषित कर दें. रोचक बात यह है कि उनके पहले नवाब की अन्य बेगमों के पास यह प्रस्ताव पेश किया गया था, लेकिन कोई भी अपने पुत्र को नवाब बनाने के लिए तैयार नहीं हुई, क्योंकि उन्हें इसके नतीजे भुगतने का खौफ था. लंबे समय तक लखनऊ पर विद्रोहियों का कब्जा रहने के बाद ब्रिटिश फौज ने फिर से उसे अपने हाथ में ले लिया और हजरत महल को 1858 में पीछे हटना पड़ा. उन्होंने ब्रिटिश शासकों के द्वारा प्रस्तावित किसी भी पुरष्कार अथवा भत्ते को स्वीकार नहीं किया. उन्होंने अपने जीवन का बाकी समय नेपाल में बिताया.
(‘अपसर्ज इन साउथ’, एन. राजेंद्रन, फ्रंटलाइन, जून 2007 से उद्धृत)
अभी जिसे हम तमिलनाडु कहते हैं, वहां भारत के अन्य हिस्सों की तरह ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध की आरंभिक अभिव्यक्तियां स्थानीय बगावतों के रूप में सामने आईं. इनमें सर्वप्रमुख था ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ पलयकारों का विद्रोह. जिन पलयकारों ने मद्रास प्रेसिडेंसी के सुदूर दक्षिणी इलाके में विद्रोह का झंडा बुलंद किया था, उनमें मुख्य रूप से पुली तेवर, वीरा पांडिया कट्टाबोम्मन और शिवगंगा के मारुडु बंधु के नाम आते हैं. 18वीं सदी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश हुकूमत ने पलयकारों के खिलाफ दो बड़े अभियान संचालित किए थे.
दो कार्यकर्ताओं गुलाम गौस और शेख मन्नू को ‘अत्यंत राजद्रोही चरित्र के’, अर्थात 1857 की क्रांति के पक्ष में, दीवाल पोस्टर लगाने और मद्रास के लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उठ खड़े होने की अपील करने के लिए फरवरी 1858 में गिरफ्तार किया गया था.
उस समय की रिपोर्ट के अनुसार, मद्रास और चिंगलपुट (चेंगलपेट) जैसे समुद्रतटीय इलाके और कोयंबटूर जैसे अंदरूनी इलाके 1857 की क्रांति के दौरान ‘अशांत’ क्षेत्र समझे जाते थे. दक्षिणी तमिलनाडु के तंजवुर में शेख इब्राहिम नामक एक क्रांतिकारी को मार्च 1858 में संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया और उनपर राजद्रोह का अभियोग लगाकर सजा दी गई.
उसी तरह, 1857 की क्रांति की संभावना देखते हुए उत्तरी अरकाट में जनवरी 1857 से ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ युद्ध संगठित करने के मकसद से योजनाएं बनाई जाने लगी थीं और गुप्त बैठकें चलने लगी थीं. यह तथ्य रेकॉर्ड में दर्ज है कि सैयद कुसा मोहम्मद और गुरजाह हुसैन ने उस संबंध में पुनगनूर (चित्तूर जिला, अब आंध्र प्रदेश में) और वेल्लौर के जमींदारों के साथ वार्ताएं की थीं. मार्च 1857 में सैयद कुसा को अंगरेजों ने गिरफ्तार कर लिया और उनसे जमानत मांगी गई.
1857 में ब्रिटिश सेना का एक रेजिमेंट वेल्लौर में पड़ाव डाले हुए था. नवंबर 1858 में उस रेजिमेंट के कुछ सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया. हथियारबंद मुठभेड़ में कैप्टन हार्ट और जेलर स्टैपफोर्ड मारे गए. चित्तूर के सेशन जज ने जानबूझकर की गई हत्या के आरोप में रेजिमेंट के एक सिपाही पर मुकदमा चलाया और उसे मौत की सजा सुनाई.
सलेम में 1857 विद्रोह शुरू होने की खबर सुनकर काफी शेरगुल मचा था, क्योंकि यह अफवाह थी कि देशभक्तों की सेना उस क्षेत्र में जल्द ही कूच करने वाली है. 1 अगस्त 1857 (शनिवार) की शाम में एक भीड़ पुतनूल सड़क पर अयम परमला चेरी के घर के पास इकट्ठा हुई जिसमें बड़ी संख्या में बुनकर लोग शामिल थे. भीड़ में शामिल लोग कह रहे थे कि भारतीय सैनिक आने वाले हैं और अंगरेजों का झंडा गिर जाएगा. थाना के अर्दली हैदर ने उस भीड़ को कहा कि, “उस दिन इसी समय मद्रास में (भारत का) झंडा फहराया जाएगा”.
विद्रोह के दौरान कोयंबटूर के निकट एक औद्योगिक शहर भवानी में मुलबगालू स्वामी नामक एक सन्यासी ने उपदेश देना शुरू किया कि ब्रिटिश हुकूमत को खत्म कर देना चाहिए. अपनी दैनंदिन की पूजा में वह अपने भक्तों को कहा करते थे, “सभी यूरोपियनों को नष्ट कर देना चाहिए और नाना साहब पेशवा की हुकूमत फैलनी चाहिए.” अंत में उस सन्यासी को अंगरेजों ने गिरफ्तार कर लिया और उसे कोयंबटूर ले आया गया.
विद्रोह फूटने के शुरूआती समय में चेंगलपेट गुप्त बैठकों का और क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा बन गया था. जुलाई 1857 में सुलतान बख्श मद्रास से चेंगलपेट गया ताकि अपने सहयोिगयों की मदद से ब्रिटिश-विरोधी बगावत को संगठित किया जा सके. चेंगलपेट में उसके दो स्थानीय सहयोगी अरुआनागिरि और कृष्णा उस इलाके में पहले से ही विद्रोह की अगुवाई कर रहे थे.
31 जुलाई को चेंगलपेट इलाके में एक विद्रोह हुआ. वह आन्दोलन फैलता गया. 8 अगस्त 1857 को चेंगलपेट के मजिस्ट्रेट ने मद्रास सरकार को इस गंभीर बगावत की खबर दी.