इस पुस्तिका के मूल अंग्रेजी संस्करण का लेखन 2013 के अंत में हुआ था और वह फरवरी 2014 में प्रकाशित हुई थी . उसके बाद हमारे देश में सरकार तो बदली लेकिन आर्थिक मोर्चे पर कोई बदलाव नहीं आया . यहां तक कि रंगराजन समिति द्वारा निर्धारित लज्जास्पद रूप से बेहद कम आय की गरीबी रेखा (देहात में 32 और शहरों में 47 रुपए प्रतिदिन) के अनुसार एक तिहाई आबादी अति गरीब बनी हुई है . मुद्रा स्फीति की ऊंची दर, अल्प वृद्धि, अटल बेरोजगारी और बैंकों में बढ़ता हुआ बट्टा खाता जैसी बीमारियां हालांकि पहले की तरह ही अब भी असाध्य बनी हुई हैं फिर भी पिछले दस सालों से जिन कार्पोरेट समर्थक जन विरोधी आर्थिक नीतियों का अनुसरण किया जा रहा था उन पर जोर पहले के मुकाबले बढ़ा ही है . इसका सबसे तकलीफदेह उदाहरण रेल भाड़े और माल भाड़े में हालिया बढ़ोत्तरी और उसकी रक्षा में दिए गए तर्क हैं (कि नई सरकार तो उसी फैसले को लागू कर रही है जो पुरानी सरकार का है) . मुकेश अंबानी की मांग के अनुसार गैस की कीमत बढ़ाने और गरीबों की सब्सिडी में कटौती से ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं .
जनता पर इतने बोझ और कार्पोरेट लाबियों के लिए भारी छूट को मोदी सरकार ‘देश के हित’ के नाम पर सही ठहरा रही है जिस तरह पिछली मनमोहन सरकार समेत सभी नव उदारवादी शासन अतीत में करते रहे हैं . देश के अर्थतंत्र को और अधिक खोलने की नीति को जारी रखते हुए सरकार ने रक्षा उपकरण निर्माण और रेलवे जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के मुक्त प्रवाह की अनुमति देने का फैसला किया है . ऐसे प्रशासनिक सुधार भी होने हैं जिनका मकसद भूमि अधिग्रहण और खदानों के पट्टों के आसान ‘क्लियरेंस’ के दिनों की वापसी है . सरकार इस बात को अच्छी तरह से जानती है कि इन सबसे जन प्रतिरोध की नई लहर पैदा होगी इसलिए वह जल्दी-जल्दी राजकीय दमनकारी संस्थाओं को मजबूत बनाने पर तुली हुई है . खुफिया ब्यूरो ने ऐसा ब्लू प्रिंट तैयार किया है जिससे पर्यावरणिक और रक्षात्मक नियमों तथा जल, जंगल और जमीन पर जनता के अधिकारों को धता बताते हुए बड़ी परियोजनाओं का रास्ता साफ करने के लिए संघर्षों को कुचला जा सके . ब्यूरो ने तमाम किस्म के जन आंदोलनों पर ‘विकास रोकने वाले विदेशी चंदा लेने वाले एन.जी.ओ.’ होने का आरोप लगाया है: परमाणु बिजली प्लांट (खासकर कुडनकुलम), कोयला आधारित बिजली प्लांटों, आनुवंशिक रूप से परिष्कृत जीवों (जेनेटिकली मोडिफाइड आर्गेनिज्म), उड़ीशा के पोस्को और वेदांता, पूर्वोत्तर का दोहन करने वाले उद्योगों के विरोध में चल रहे आंदोलन और नर्मदा बचाओ आंदोलन इसमें शामिल हैं. मजेदार बात यह है कि ब्यूरो की इस रिपोर्ट का काम मनमोहन सरकार ने दिया था लेकिन उसे नव निर्वाचित मोदी सरकार को दिया गया और इसने ही उसे लीक किया .
‘अच्छे दिन’ का चुनावी नारा चुनाव के बाद ‘कठिन समय’ की सच्चाई में बदल चुका है . इसी के साथ भारत के लोग मजबूती से लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं . इस लड़ाई में इस पुस्तिका को हथियार बन जाने दें .
नई दिल्ली
7 जुलाई 2014
सन 2000 में नव-उदारवादी पूंजीवाद बड़े जोखिम मोल लेता हुआ उच्च शिखर पर विराजमान हो गया था, और वहां कुछ समय तक यह महसूस करते हुए प्रसन्न होता रहा कि “जहां तक नजरें जाती हैं, वह मेरा साम्राज्य है;” और फिर जैसा कि अपरिहार्य था, वह औंधे मुंह नीचे लुढ़क पड़ा. यह 2007-08 की बात है. बादशाहों (दुनिया में जिनकी काफी संख्या है) के तमाम सिपहसालारों ने हरचंद कोशिश की, लेकिन वे इस ढलान को कत्तई रोक नहीं पाए.
बहरहाल, आधुनिक युग के ये सिपहसालार – आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) और विश्व बैंक, ओईसीडी और जी-20, अमेरिकी फेडरल रिजर्व और यूरोपीय साझा बैंक, हमारे देश में भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय – अपने विकास के तरह-तरह के नव उदारवादी माॅडलों को संभालने के हताशोन्मत्त प्रयास जारी रखे हुए हैं. किंतु, अब तक तो उलटे नतीजे ही सामने आए हैं.
एक ओर, जैसे कि आधुनिक मेडिकल तकनीक ने ऊपरी तौर पर मृत्यु-शय्या पर लेटे बूढे़, बीमार आदमी को भी चलने-फिरने लायक बना देने (अलबत्ता मुश्किल से और थोड़े समय के लिए ही) की सामर्थ्य हासिल कर ली है, उसी प्रकार साम्राज्यवादी राज्य और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियां भी इस काबिल हो गए हैं कि वे सदियों के शोषण व लूट से संचित अपने विपुल आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल करके किसी तरह इस संकट को वश में कर सकें और इस व्यवस्था को बचा लें – मगर वे मंदी की चिरस्थायी समस्या को हल करने में विफल रहे हैं, और साथ ही इस प्रक्रिया में अपने बौद्धिक-नैतिक वर्चस्व और राजनीतिक वैधता को भी काफी हद तक खो चुके हैं.
दूसरी ओर, आंशिक रूप से हासिल इन सफलताओं और इलाज के चिंताजनक “साइड इफेक्ट” ने, पश्चिम के सत्ता-प्रतिष्ठान से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने भी, देर से ही सही, कुछ आंशिक भूल-सुधार की जरूरत को मान लिया है. इस दौरान, दुनिया भर में विभिन्न रूपों में सड़कों पर और चुनावों के दौरान कटौती (आॅस्टैरिटी) के उपायों के खिलाफ लोकप्रिय प्रतिरोध लगातार जारी हैं.
हमने वैश्विक आर्थिक संकट के इस समूचे घटना-क्रम को तीन पुस्तिकाओं की शृंखला में समेटने का प्रयास किया है – यह पुस्तिका इसकी तीसरी कड़ी है. पहली पुस्तिका (अंग्रेजी संस्करण) फरवरी 2009 में प्रकाशित की गई थी, जब महाविनाशकारी वित्तीय संकट ने पूंजीवादी विश्व व्यवस्था को अपनी गिरफ्त में लेना शुरू ही किया था और जिसने शीघ्र ही कठिन वैश्विक मंदी की शक्ल ले ली थी. संकट में पूंजी; कारण, तात्पर्य और सर्वहारा प्रत्युत्तर नाम की इस पुस्तिका में मुद्रा बाजार की जटिलताओं तथा वित्तीय विघटन (मेल्टडाउन) जैसी स्थिति व इसके परिणामों की व्याख्या की गई थी. हमने इस संकट के प्रत्यक्ष और साथ ही मौलिक दीर्घकालिक कारणों व तात्पर्यों की बुनियादी मार्क्सवादी व्याख्या पेश की थी, और आर्थिक उथल-पुथल से उत्पन्न लोकप्रिय संघर्षों की ओर ध्यान आकृष्ट किया था.
शृंखला की दूसरी कड़ी के बतौर 2012 के अक्टूबर में प्रकाशित नव उदारवाद का संकट और लोकप्रिय आंदोलनों के समक्ष चुनौतियां (अंग्रेजी संस्करण) में यह दिखाने की कोशिश की गई कि साम्राज्यवाद – जिसे लेनिन ने वित्तीय पूंजी के वर्चस्व के अंतर्गत मरणासन्न इजारेदार पूंजीवाद के रूप में परिभाषित किया है – के युग में हासिल वैश्विक अनुभवों ने व्यावसायिक चक्रों और पूंजीवादी संकट की मार्क्सवादी-लेनिनवादी व्याख्या को प्रखरता से प्रमाणित किया है तथा उसे समृद्ध बनाया है. इसमें हमने एक विशिष्ट मामले के बतौर मौजूदा उथलपुथल की जांच-पड़ताल की और निष्कर्ष निकाला कि यह आम व्यावसायिक चक्र के अंग के बतौर कोई ‘सामान्य’ मंदी नहीं है, बल्कि इस अर्थ में युगांतरकारी संरचनात्मक संकट है कि वर्तमान नव उदारवादी प्रणाली में पूंजीवादी संचय की बुनियादी संरचनाएं और रणनीतियां ही संकट में फंस गई हैं, और उनका वह नतीजा नहीं निकल रहा है जो 1980-दशक के समय से निकला करता था. इसीलिए, हमने इसे खास तौर पर नवउदारवाद का संकट की संज्ञा दी. हमने इस संकट के सबकों तथा महामंदी के बाद से लेकर समकालीन आंदोलनों के दौर तक संकट व वर्ग संघर्ष के अंतर्संबंधों पर भी थोड़े विस्तार से चर्चा की थी.
शृंखला की तीसरी और आखिरी कड़ी के बतौर यह पुस्तिका, अपने शीर्षक के अनुरूप ही, वैश्विक संकट के भारतीय रंगमंच पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रही है.
2013-14 की तीसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 4.8 प्रतिशत की निम्न वृद्धि दर, जो 2010-11 में हासिल उच्च वृद्धि दर (9.9 प्रतिशत) के आधे से भी कम है; 1947 में अमेरिकी डाॅलर के बराबर मूल्य वाले रुपये की कीमत थोड़ा सुधरने के पहले एक डाॅलर में 65 रुपये की खतरनाक हद तक गिर जाने; आसमान छूती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी तथा फैलते व्यापार घाटे व विदेशी कर्ज – इन नकारात्मक प्रवृत्तियों के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था स्पष्टतः वहीं खड़ी हो गई है, जहां वह 1990-दशक के ‘सुधारों’ के पहले खड़ी थी. ये वे दो गंवा दिये गये दशक हैं, जिस दौरान इस देश की सत्ता पर काबिज रहे कांग्रेस-यूपीए और भाजपा-एनडीए गठबंधनों ने अत्यंत मामूली किस्म की उपलब्धियां दर्ज कराईं!
सुसंगत और समावेशी विकास हमारे लिए हमेशा छलावा क्यों बना रहा है? क्या हमारे देश में प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों की प्रचुरता नहीं है? हां है, लेकिन सवाल तो यह है कि हमारी व्यवस्था इन संसाधनों का क्या इस्तेमाल करती है? हमारे अधिकांश बाॅक्साइट व लौह अयस्क तथा अन्य खनिजों का विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है – हमारे देश में सामग्रियों के निर्माण और रोजगार-सृजन में उनका बहुत कम इस्तेमाल होता है. भारतीय वैज्ञानिकों, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों ने वस्तुतः हर क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम-यश हासिल किया है, लेकिन अपने देश की सेवा का अवसर या वातावरण उन्हें नसीब नहीं होता. सूचना टेक्नोलाॅजी के क्षेत्र में हमें एक महाशक्ति माना जाता है, लेकिन चीन या मलेशिया से महत्वपूर्ण कल पुर्जा मंगवाए बगैर हम एक कंप्यूटर तक नहीं बना सकते. हम अपनी जनसांख्यिकीय बरतरी पर गर्व करते हैं, लेकिन हम उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं समेत अपनी नौजवान आबादी को उचित रोजगार नहीं दे पाते हैं. हमारे उद्योगपतियों को भारी-भरकम छूटें व रियायतें दी जाती हैं, इसके बावजूद वे ज्यादातर विदेशों में पूंजी-निवेश कर रहे हैं, क्योंकि हमारी विशाल आबादी की बहुसंख्या इतनी गरीब है कि इस देश में पर्याप्त ‘बाजार’, यानी खरीदने की ताकत उपलब्ध नहीं है.
घिसा-पिटा सा सरकारी जवाब यह है कि ये समस्याएं वैश्विक मंदी के अनिवार्य परिणाम हैं और इनपर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा. आर्थिक बुनियाद काफी मजबूत है; हमें सिर्फ इस बात की जरूरत है कि अर्थतंत्र को राजनीति से मुक्त कर दिया जाए और एक बार फिर बड़े पैमाने पर सुधार के कार्यक्रम चलाए जाएं. यह स्थिति भारत सरकार को अपनी नीतियों की घोर असफलता से इनकार करने और इस संकट के बहाने वैश्विक रामबाण नुस्खे को अपनाने की इजाजत दे देती है – यह नुस्खा मेहनतकश अवाम के लिए और अधिक मितव्ययिता, देशी-विदेशी बड़े व्यवसायों को और अधिक रियायतें (‘प्रोत्साहन’), कठोरतर बाजार रूढ़िवाद और अपने नागरिकों को जीवन की बुनियादी जरूरतें मुहैया कराने भर की जिम्मेवारी से भी राज्य के इंकार जैसे उपायों को लेकर बना है, हालांकि इस बीच खाद्य सुरक्षा बिल जैसे चुनावी स्टंट जरूर किए गये.
लेकिन हम पूरी तरह भ्रष्ट, स्वार्थी, संवेदनहीन और नाकारा राजनेताओं व अर्थशास्त्रियों व नौकरशाहों के गिरोह द्वारा प्रचारित इस सिद्धांत को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकते – खासकर तब, जबकि अपना दांव खेलने में मशगूल इस गिरोह का यह सुधार का नुस्खा साफतौर पर उलटे नतीजे देने लगा है. हमें हमारी खुद की स्वतंत्र समझदारी विकसित करनी होगी और इसके लिए यहां से सोचना शुरू करना होगा कि जहां हमारे देश की आर्थिक मुसीबतों का विश्लेषण नव उदारवाद के वैश्विक संकट के संदर्भ में करना जरूरी है, वहीं यह समझना शायद ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारतीय संकट के लिए घरेलू संरचनात्मक व नीति-विषयक कारक ही मूलतः जिम्मेवार हैं और इसीलिए, इसका समाधान भी प्राथमिक रूप से राष्ट्रीय संदर्भ में भी खोजना पड़ेगा.
इस मकसद से हमने आने वाले पृष्ठों में पहले तो उभरते संकट के वास्तविक आकार को मापने की कोशिश की है (अध्याय - 1), फिर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसके प्रमुख आयामों व कारणों का विश्लेषण किया है (अध्याय - 2 से 4), इसके बाद आधिकारिक समाधान का विश्लेषण पेश किया है (अध्याय - 5), और अंत में रैडिकल वामपंथी विकल्प की आम रूपरेखा प्रस्तुत की है (अध्याय - 6).
हमने यह दिखाया है कि पिछले दो-तीन दशकों ने मार्क्स के उस अवलोकन को प्रखरता से संपुष्ट किया है, जिसकी सारवस्तु डेविड हार्वे ने अपनी पुस्तक लिमिट्स टु कैपिटल (मूलतः 1982 में लिखित) के 2006 के वर्सो संस्करण की भूमिका में प्रस्तुत की है: “पूंजी के पहले खंड में, मार्क्स दिखाते हैं कि कोई समाज अ-नियंत्रित, मुक्त बाजार अर्थतंत्र का जितना ज्यादा अनुगमन करेगा, उत्पादन के साधनों के मालिकों और इससे वंचितों के बीच की विषमता की शक्ति उतनी ही ज्यादा ‘एक ओर संपत्ति का संचय’ और ‘इसके विपरीत सिरे पर मुफलिसी, थकाऊ काम की पीड़ा, दासता, अज्ञान, क्रूरता व मानसिक अध:पतन का संचय’ को अंजाम देगी.”
जहां आम जनता मंदी और धीमे विकास के प्रभाव से कराह रही है, वहीं क्रोनी-वाद और भ्रष्टाचार अभूतपूर्व गति से फल-फूल रहा है, तथा धनी व शक्तिसंपन्न तबका खुले-गुप्त तरीके से विशाल संपदा इकट्ठा कर रहा है. यकीन मानिए, यह न कोई दैवी चमत्कार है और न सिर्फ कु-शासन का परिणाम भर है. सच्ची बात तो यह है कि आजादी के बाद विकास का जो रास्ता अपनाया गया है, उसने भारत को एक उभरती आर्थिक शक्ति तो जरूर बना दिया, लेकिन हमारे सामंती-औपनिवेशिक बंधनों को नहीं मिटाया, अर्थात् इसने हमारे समाज के अंदर ढांचाबद्ध पिछड़ेपन और विकृतियों को कोई चुनौती नहीं दी.
महंगे उपभोगों के साथ रंगरेलियां मनाने वाले शिखर पर विराजमान मुट्ठी भर धनिकों और समस्त संपदा का निर्माण करने के बावजूद वंचना की अंधेरी गहराइयों में फंसे विशाल जनसमुदाय के बीच का क्रूर विषमता अत्यंत अन्यायपूर्ण समाज व्यवस्था और अत्यंत असमान विकास रणनीति का परिणाम है, जिसके अंतर्गत कृषि क्षेत्र को नीचे गिरने दिया जा रहा है जो अभी भी हमारी विशाल बहुसंख्या के लिए जीवन-निर्वाह और रोजगार का स्रोत बना हुआ है, लेकिन जहां अर्ध-सामंती लघु कृषक अर्थव्यवस्था की प्रधानता बरकरार है और जो चिरस्थायी संकट से ग्रस्त है; जिसके अंतर्गत अधिकांश परंपरागत उद्योग गतिरोध झेल रहे हैं जबकि निर्यात बाजारों, विदेशी हितों या कुलीनवर्गीय उपभोग के लिए निर्मित क्षेत्र आम तौर पर फल-फूल रहे हैं; और जिसके अंतर्गत सट्टा कारोबार और रियल इस्टेट (भू-संपदा) के क्षेत्रों को विकास का इंजन समझा जाता है, जबकि हमारे प्राकृतिक व मानव संसाधनों को लगातार काॅरपोरेट-साम्राज्यवादी लूट का शिकार बनाया जा रहा है.
इस संपूर्ण नीति-समूह को विखंडित करना – जो उन वर्ग शक्तियों के हिंसक प्रतिरोध का मुकाबला करके ही किया जा सकता है, जिनका हित-साधन ये नीतियां करती हैं – और संतुलित, समतावादी, इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल), जन-केंद्रिक और सतत विकास का नया माॅडल अपनाना – यही वह रास्ता है जिसपर चलकर संकट को खत्म किया जा सकता है और, ईंट-दर-ईंट, जनता का समृद्ध भारत बनाया जा सकता है. यह पुस्तिका कार्यकर्ताओं व इससे सरोकार रखने वाले नागरिकों के सामने इस अत्यावश्यक राजनीतिक विमर्श/आंदोलन के बुनियादी अर्थतंत्र को स्पष्ट करने का ही एक प्रयास है.
आखिरकार, वर्ष 2004 के आसपास भारतीय अर्थव्यवस्था उड़ान भरती प्रतीत होने लगी, और तीन वर्ष में वह 9 प्रतिशत से भी अधिक की वृद्धि दर के शिखर पर जा पहुंची. वर्ष 2008 में ऐसा लगा, मानो अर्थतंत्र में ठंडी कंपकपी आई, लेकिन वह किसी प्रकार इससे निकलने में सफल रहा. किंतु यह राहत थोड़ी देर तक ही टिक पाई. वर्ष 2011 आते-आते अर्थतंत्र नीचे गिरने लगा, मानो गुब्बारे में कोई छेद हो गया हो. 2008 में अमेरिकी अर्थतंत्र में अचानक आई तबाही के विपरीत भारतीय अर्थतंत्र की यह ढलान धीमी थी, लेकिन बिलकुल निश्चित.
नव-उदारवादियों का दावा है कि 1990-दशक से ही हमारे देश में आपेक्षिक रूप से ऊंची वृद्धि दर देखी जा रही है. मगर तथ्य इसके विपरीत हैं. दरअसल, भारत की संवृद्धि की कहानी दो भिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरी है, जो अपने समयों की अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्तियों के अनुकूल बिलकुल भिन्न नीति-समूहों से चिह्नित होती हैं – बेशक, 1980 का दशक बीच का संक्रमणकालीन दौर था. दोनों अवस्थाओं के शुरूआती नतीजे अपनी पूर्ववर्ती अवस्था के मुकाबले बेहतर रहे, लेकिन दोनों का अंत देर-सवेर संकटों के साथ ही हुआ, जिससे नीति-समूह में बदलाव की जरूरत महसूस की गई. वस्तुतः, इस मामले में नवीनतम (1991 के बाद की) अवस्था के अनुभव पहले की अवस्थाओं से भिन्न नहीं हैं, जैसा कि हम अगले अध्याय में देखेंगे.
अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा वाशिंगटन डीसी से नवउदारवाद एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाने के लगभग एक दशक बाद, वह 1991 में नई दिल्ली पहुंची, जिसकी ड्राइवर की सीट पर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह विराजमान थे. जैसे कि 1950 और 1960 के दशकों में पूंजीवादी-भूस्वामी राज्य ने भारत और दुनिया भर में समाजवाद के प्रति मौजूद आकर्षण का इस्तेमाल करके “मिश्रित अर्थव्यवस्था” पर समाजवादी रंग चढ़ाने की कोशिश की, उसी प्रकार सुधारों के इस नए समुच्चय ने नव-उदारवादी ‘टिना’ (देयर इज नो आॅल्टरनेटिव – कोई विकल्प नहीं है) मंत्र से वैधता प्राप्त की.
इस नीति समूह के गौरव-गान में लोग प्रायः 2003-04 से 2009-10 के बीच हासिल आपवादिक रूप से गतिशील वृद्धि का बखान करते हैं. सिर्फ जीडीपी में वृद्धि के लिहाज से ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य सूचकों के लिहाज से भी, यकीनन, उस दौरान नई जमीनें तोड़ी गई थीं. वृद्धि सिर्फ सेवा क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि एक लंबे अंतराल के बाद मैन्युफैक्चरिंग (विनिर्माण) में भी वृद्धि देखी गई. बचत और निवेश अभूतपूर्व दरों से बढ़े. आयात व विदेशी निवेश कानूनों के उदारीकरण के साथ-साथ कुछ क्षेत्रों की प्रौद्योगिकी में भी सुधार हुआ. इससे प्रतिद्वंद्विता तेज हुई और उत्पादकता में काफी वृद्धि हुई. भारतीय काॅरपोरेट घराने बड़ी उमंग से विदेशों में – न केवल अल्प-विकसित देशों में, बल्कि विकसित अर्थतंत्रों में भी – पहुंचने लगे, हालांकि उन्होंने मुख्यतः विलय व अधिग्रहण का ही रास्ता पकड़ा.
2009-10 से भारत की वृद्धि-दर में गिरावट के प्रथम संकेत मिलते ही उच्च वित्त की आर्थिक व राजनीतिक एजेंसियां अपने पुराने खेल पर वापस आ गईं; वे दिल्ली सरकार पर और ज्यादा रियायतों के लिए तथा अर्थतंत्र को और अधिक खोलने के लिए दबाव बनाने लगीं. “नीति लकवाग्रस्तता” कहकर सरकार की आलोचना की गई, व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री को निशाना बनाया गया और ऋण रेटिंग एजेंसियों ने भारत की ऋण-योग्यता को निचले पायदान पर ले जाने की धमकी दी, और उन्होंने वस्तुतः ऐसा किया भी. स्वाभाविक ही था, कि भारतीय बड़े व्यावसायिक समूह और काॅरपोरेट मीडिया ने भी वही राग अलापना शुरू कर दिया. यकीन मानिए, सरकार तो उनकी बात मान लेने के लिए हमेशा तैयार थी, किंतु प्रस्तावित सुधार-उपायों की निपट अलोकप्रियता और यहां तक कि (भाजपा जैसी) उन पार्टियों, जो दरअसल ऐसे उपायों के पक्ष में रहती हैं, और यूपीए के कुछ घटकों के भी नपे-तुले विरोध ने उसके हाथ बांध रखे थे. लेकिन अधिक समय तक नहीं. कुछ हीला-हवाली करने के बाद, वर्ष 2012 के अंत तक कांग्रेस ने बड़ी पूंजी के पक्ष से एक बार फिर धावा बोलने का फैसला कर लिया. यह कई रूपों में जाहिर हुआ: सुधार की बूस्टर खुराक, बजट 2013 और जनविरोधी काॅरपोरेट-परस्त नीति निर्णयों की अंतहीन शृंखला. तत्क्षण, जिसे झिड़कियां पर झिड़कियां दी जा रही थीं, उस पर प्रशंसा के फूल बरसाये जाने लगे: मनमोहन सिंह के बारे में कहा गया – “शेर फिर दहाड़ रहा है”. साधारण लोगों के लिए मुश्किलों भरे दिन फिर आने वाले थे.
जैसा कि मार्क्स ने बहुत पहले बताया था, “आधुनिक राज्य की कार्यपालिका संपूर्ण पूंजीपति वर्ग के साझा क्रियाकलापों को संभालने वाली एक कमेटी भर होती है.” दूसरे शब्दों में, व्यवसाय और राज्य अथवा व्यवसाय और राजनीति का गठबंधन पूंजीवादी राजनीतिक तंत्र का मूल अवयव होता है. जब से भारतीय राज्य की उत्पत्ति हुई है, इसका भी यही हाल रहा है.
बहरहाल, चूंकि संसदीय प्रणाली में सरकार को मतदाताओं का भी थोड़ा ख्याल रखना पड़ता है, इसलिए आम जन समुदाय और शोषक धनी वर्ग के बीच लगातार खींचतान मची रहती है, जिसमें हर पक्ष राज्य-नीति को प्रभावित करने तथा उसे अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करता है; और इसका परिणाम इस प्रणाली की व्यापक सीमाओं के अंदर, दोनों पक्षों के बीच के शक्ति संतुलन से निर्धारित होता है. भारतीय संदर्भ में, पूंजीपति वर्ग आर्थिक रूप से जैसे-जैसे मजबूत होता गया, एक के बाद एक आने वाली सरकारों पर उसका राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत बनता गया. 1980 के दशक से यह बात स्पष्टता से दिखाई पड़ने लगी और 1990 के दशक में तो वह और भी साफ हो गई, जब राज्य की भूमिका अर्थतंत्र के नियामक से बदलकर निवेश का सहायक भर होकर रह गई.
इसीलिए, आज जिसे हम लोकप्रिय शब्दावली में “व्यवसाय-राजनीति गठजोड़” कहते हैं, वह विकास की एक लंबी प्रक्रिया की उपज है, जो आज एक ऐसी अवस्था में पहुंच गया है, जहां उसकी ठीक-ठीक व्याख्या के लिए नए नामकरण की आवश्यकता हो गई है. यह नाम क्रोनी पूंजीवाद या महज क्रोनीवाद है, जहां “क्रोनी” का मतलब होता है पुराने मित्र या चहेते लोग, जिन्हें उनका गुण-अवगुण देखे बगैर बेजा विशेषाधिकार/रियायतें/लाभदायक पद आदि प्रदान किए जाते हैं.
इसी प्रकार, हम सब जानते हैं कि आर्थिक घोटाले – या सामान्य अर्थों में भ्रष्टाचार – भी कोई नई चीज नहीं हैं. नया सिर्फ यह है कि आज भ्रष्टाचार का पैमाना अतुलनीय रूप से बड़ा हो गया है, जो नवउदारवाद की ही देन है. अगर हम 1991 के पहले के आर्थिक घोटालों के साथ हाल में हुए घोटालों की तुलना करें, तो यह बात बिलकुल साफ हो जाएगी. उदाहरण के लिए बोफोर्स घोटाले को लीजिए. यह ‘महज’ 64 करोड़ रुपये का घोटाला था. मुद्रास्फीति के साथ सामंजित करने के बाद भी यह आंकड़ा अभी लगभग 300 करोड़ रुपये तक पहुंचेगा. जबकि 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला में 1.76 लाख करोड़ रुपये की राशि शामिल है! अर्थात्, बोफोर्स राशि का लगभग 600 गुना!
उस धनराशि पर भी नजर डालिए, जो हमारे देश से अवैध तौर पर स्विट्जरलैंड और अन्य कर-स्वर्गों (जहां से व्यवसाय करने पर कर नहीं लगता है) में खींच ली जाती है. अमेरिका-स्थित शोध निकाय ग्लोबल फाइनांशियल इंटिग्रिटी द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार 1948 से 2008 के बीच की 60 वर्षों की अवधि में 20 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक राशि इसी प्रकार देश से निकल चुकी है. इसमें से लगभग आधी राशि की निकासी 1992-2008 के बीच, यानी 16 वर्षों में हुई, जबकि 21वीं सदी के आठ वर्षों में करीब एक तिहाई राशि निकली है.
दिमाग चकरा देने वाले ये आंकड़े दिखाते हैं कि “लायसेंस-कोटा-परमिट राज” – पिछले वर्षों में बेलगाम भ्रष्टाचार का सबसे असरदार जरिया – पर ग्रहण लगने से भी इस रोग में कोई कमी नहीं आई है. इसके विपरीत, सर्वव्यापी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने भ्रष्टाचार के दरवाजे को पूरी तरह खोल दिया है. यह गौरतलब है कि 2-जी घोटाला अभी हाल में सतह पर आया; किंतु इसकी शुरूआत काफी पहले, यानी 2000-दशक के उभार के दौरान ही हो चुकी थी. यही बात उन अन्य अधिकांश घोटालों के लिए भी सही है, जो वृद्धि दर में गिरावट शुरू होने के बाद सामने आए हैं. यह दिखाता है कि वृद्धि दर में सबसे बड़ी उछाल की अवधि भ्रष्ट आचरण के सबसे बड़े विस्फोटों की भी अवधि रही है.
इसीलिए, नई बात यही है कि राजनीति और व्यवसाय के बीच का युगों पुराना गंठजोड़ आज सत्ता की आंच में तपकर एकाकार हो गया है. वाड्रा-डीएलएफ करार और गडकरी के पूर्ति कंपनी समूह के क्रियाकलापों से उन जटिल तौर-तरीकों का संकेत मिलता है, जिनके जरिए राजनीतिक प्रभाव को दंडमुक्त काॅरपोरेट संपदा में तब्दील किया जाता है और फिर इस धन का इस्तेमाल आगे के लिए जरूरी ‘संपर्कों’ को साधने में किया जाता है. लेकिन, इसके लिए सिर्फ “राजनीतिक वर्ग” पर आरोप नहीं मढ़ा जा सकता है. हर तरह की नई और पुरानी कंपनियों और संगुटों (कंग्लोमरेट्स) ने तमाम किस्म के घोटालों में बड़े मजे से नाजायाज फायदे बटोरे हैं – और हवाई अड्डों के आधुनिकीकरण से लेकर कोल ब्लाॅकों के आवंटन तथा सैन्य बलों के लिए ट्रकों व ताबूतों की खरीद तक में ये घोटाले किए गए हैं. टाट्रा ट्रक ठेका जैसे कुछ मामलों में तो विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हैं, जबकि 2-जी स्पेक्ट्रम की बिक्री जैसे कुछ अन्य मामलों में जिन कंपनियों ने निर्धारित दक्षता या क्षमता के बगैर ही बोली लगाने की प्रक्रिया में भाग लिया, उन्होंने विदेशी खिलाड़ियों को भरपूर मुनाफे में अपने शेयर बेच दिए. इसके अलावा, ढेर सारे बड़े खिलाड़ी ट्रांस्फर प्राइसिंग, मिस-इनवाइसिंग (गलत आंकड़े पेश करना) और हवाला जैसे गैर कानूनी तरीकों से निरंतर हमारे देश से पूंजी बाहर ले जा रहे हैं.
कोई भी पूर्वाग्रह-रहित पर्यवेक्षक इस बात से इनकार नहीं करेगा कि भारत में परिस्थिति सचमुच निराशाजनक है. यह भी नहीं कहा जा सकता है कि अतीत में इससे बेहतर हालात थे. इस फटेहाल स्थिति के लिए इस या उस आर्थिक माॅडल/रणनीति, अथवा इस या उस राजनीतिक दल/गठबंधन पर दोष मढ़ते हुए 60 वर्ष से भी ज्यादा समय बीत चुका है. क्या अब यह स्वीकार करने का सही वक्त नहीं आ गया है कि यह एक गंभीर प्रणालीगत समस्या है, जो बुनियादी रूप से आंतरिक कमजोरियों और विकृतियों से पैदा हुई है, और जिसे वैश्विक आर्थिक हलचल ने और तीखा बना दिया है? और क्या अब समय नहीं आ गया है कि इसका एक सच्चा समाधान खोजा जाय - ऐसा समाधान जो रैडिकल लेकिन व्यवहार्य हो, कठिन व सुदीर्घ किंतु कदम-ब-कदम प्राप्य हो?