हिटलरशाही का उभार मोदी के भारत से एक नज़र
अरिन्दम सेन
अनुवाद : वी के सिंह
लिबरेशन प्रकाशन
अगस्त 2018
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“विभ्रम
फ़ासीवाद पर अन्तोनियो ग्राम्शी (1921)
यह ग्रंथ कामरेड विनोद मिश्र (वी एम) की प्रतिनिधि रचनाओं का चुनिंदा संग्रह है. ये रचनाएं मुख्यत: चार स्रोतों से ली गई हैं : पार्टी सम्मेलनों और महाधिवेशनों में प्रस्तुत और ग्रहीत दस्तावेजों से; पार्टी मुखपत्रों के लिए, अधिकांशत: अंग्रेजी में और हिंदी एवं बंगला में भी, लिखे लेखों से; प्रकाशित व अप्रकाशित साक्षात्कारों और पार्टी प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तिकाओं तथा पुस्तकों के प्राक्कथनों से; सेमिनारों, कन्वेंशनों, अंत: पार्टी मीटिंगों व सार्वजनिक सभाओं तथा पार्टी स्कूलों व महाधिवेशनों में उनके भाषणों से. ये चरनाएं जिस अवधि को समाविष्ट करती हैं वह इमर्जेंसी के बाद चलाए गए शुद्धीकरण आंदोलन से शुरू होती है जब पुनर्संगठित पार्टी ने जन राजनीतिक पहलकदमियों पर जोर देना शुरू किया; फिर वह अवधि आईपीएफ अवस्था से गुजरती है जब पार्टी भूमिगत स्थिति में रहते हुए ही एक खुले और कानूनी अखिल भारतीय बहुआयामी राजनीतिक मोर्चे के वैचारिक-राजनीतिक केंद्र तथा सांगठनिक कोर की भूमिका निभा रही थी; और अंत में उन छह वर्षों तक फैल जाती है जो दिसंबर 1992 में कलकत्ता में आयोजित पार्टी के पांचवी महाधिवेशन में खुली पार्टी बन जाने के बाद बीते हैं.
इस संकलन का उद्देश्य है वी एम की मार्क्सवादी सिद्धांत और व्यवहार की विशाल दुनिया की एक झलक प्रस्तुत करना, लगभग एक दर्जन खंडों में समूहबद्ध ये रचनाएं वी एम के सपनों के भारत से शुरू होती हैं और अपनी प्राणप्रिय पार्टी के लिए एक मुखर आह्वान के साथ समाप्त होती हैं. एक एकल ग्रंथ में इन चयनित रचनाओं को समाहित करने की बाध्यता का मतलब था इसमें शामिल हर एक रचना के बदले कम से कम चार-पांच लेखों को छोड़ देना. जो छूट गए उनमें उनकी वे समस्त रचनाएं हैं जो उन्होंने श्रमिक सॉलिडैरिटी और समकालीन जनमत जैसी हिंदी पत्रिकाओं के लिए, और वॉयस ऑफ अल्टरनेटिव तथा पीपुल्स फ्रंट जैसी अंग्रेजी की सावधिक बुलेटिनों के लिए लिखी थीं, और उनमें शामिल हैं पार्टी सम्मेलनों व महाधिवेशनों में ग्रहीत विभिन्न दस्तावेजों के लंबे अंश, केंद्रीय कमेटी व पोलितब्यूरो की बैठकों के विवरण तथा अन्य अनेक लिखित रिकार्ड.
फिर भी, पाठकगण इस मौजूदा संकलन के जरिए उथल-पुथल भरे बीस-एक वर्षों के दौरान – जब वी एम ने पार्टी की कमान संभाल रखी थी – उनके बौद्धिक योगदान की विशालता और विविधता का स्पष्ट परिचय हासिल कर सकते हैं और इससे भी ज्यादा, हम उनकी हर एक रचना में जो विलक्षणता पाते हैं वह है उनका पैना सृजनात्मक आवेग – चाहे हम लीक से हटकर लिखा “मेरे सपनों का भारत” पढ़ रहे हों या लिबरेशन और माले समाचार के लिए लिखे उनके संपादकीय.
सत्तर के दशक और अस्सी-दशक की शुरूआत में घोर अनिश्चयता तथा भूमिगत जीवन की कठोरता के बीच भूमिगत प्रेस के लिए युद्ध स्तर पर रचित और मुश्किल से पढ़ी जा सकने वाली पांडुलिपियों से लेकर नब्बे-दशक के उत्तरार्ध में अपेक्षाकृत सहज गति से कभी-कभार सीधे कंप्यूटर पर लिखे गए लेखों की यात्रा में हमने उनकी बौद्धिक उत्पत्तियों के इर्द-गिर्द मौजूद भौतिक वातावरण को अक्सरहा बदलते देखा है. लेकिन उनके लिए लेखन हमेशा ही वर्ग संघर्ष की एक सचेतन कार्रवाई बनी रही और वी एम में मौजूद लेखक की रचनात्मक प्रेरणा, उनमें निहित क्रांतिकारी कम्युनिस्ट नेता के अक्लांत उत्साह से हमेशा नियंत्रित होती रही. मार्क्सवाद की क्रांतिकारी परंपरा का निर्वाह करते हुए, उन्होंने विचारों और विचारधाराओं के बीच संघर्ष को वर्ग का एक मुख्य अंग समझा; इसीलिए उनकी अधिकांश राजनीतिक रचनाएं वाद-विवाद का चरित्र ग्रहण कर लिया करती थीं.
विषयवस्तु के लिहाज से ये रचनाएं अत्यंत विस्तीर्ण हैं, जो सत्तर के दशक में पार्टी की वस्तुत: राख से जी उठने की अवस्था से लेकर अस्सी और नब्बे के दशकों की संकटपूर्ण विचारधारात्मक चुनौतियों के दैरान उसकी आत्मविश्वास से भरी प्रगति तक के लंबे अभियान को प्रतिबिंबित करती हैं. पाठकगण इनमें एक ओर अराजकतावाद तथा अति वामपंथी लफ्पाजी और दूसरी ओर सामाजिक जनवाद के आत्मसमर्पण एवं क्षुद्र उदारवादी सुधारवाद – इन दोनों प्रवृत्तियों के खिलाफ एक साथ चलाए गए संघर्ष के क्रम में भाकपा(माले) की क्रांतिकारी लाइन के सतत विकास की साफ झलक देख सकते हैं.
उनकी तमाम रचनाओं के केन्द्र में स्थित थी पार्टी और क्रांति – अमूर्त और शुद्ध विचारधारात्मक उप्तत्तियों के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास और समाज की गहरी और जटिल प्रक्रियाओं के रूप में. पार्टी उनके लिए एक संगठक भी थी और सर्वहारा का संगठन भी, तथा क्रांति उनके लिए लक्ष्य भी थी और एक बढ़ती संभावना भी, जो बुर्जुआ के साथ अनवरत प्रतिद्वंद्विता के जरिए ‘खुद-में-वर्ग’ के आरंभिक दिनों से लेकर ‘खुद-के-लिए-वर्ग’ के विकसित दौर तक सर्वहारा के लगातार रूपांतरण को रूपायित और मार्गनिर्देशित करती है. तथापि, ये प्रक्रियाएं सरल एकरेखीय प्रगति के नियमों का पालन नहीं करती हैं. इसका दौर टेढ़ा-मेढ़ा है, गति सर्पिल है और प्रगति की राह एक समान लय की अटूट स्थिरता के बजाय झटकों व टूटों, विलगावों व छलांगों से कहीं ज्यादा अटी पड़ी है.
वी एम का यकीन था कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी सर्वहारा को क्रांति के नेता के बतौर उसकी भूमिका के लिए तैयार न कर सके और इसी के साथ-साथ वह सर्वहारा हिरावलों के हाथों का जन क्रांतिकारी हथियार नहीं बन सके तो वह अपने अस्तित्व का संपूर्ण औचित्य ही खो देगी. इसीलिए, सर्वहारा की स्वतंत्र राजनीतिक दावेदारी वी एम के कम्युनिज्म की आधारशिला बनी रही और वे संभावित विलोपन, विकृति और विचलन के हर खतरे के खिलाफ इस सारवस्तु की हिफाजत के कार्यभार को हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे. एक कृषक-प्रधान देश में जनवादी क्रांति की रहनुमाई करने के कार्यभार से युक्त कम्युनिस्ट पार्टी के लिए सर्वहारा सुदृढ़ीकरण तथा सर्वहारा के नेतृत्व में मजदूर-किसान संश्रय को अंजाम देने के कार्यभार की कोई भी उपेक्षा सर्वहारा को तथा उसके संभावित संश्रयकारी किसान समुदाय को बुर्जुआ-भूस्वामी गठजोड़ के राजनीतिक वर्चस्व का महज एक निष्क्रिय पुछल्ला बना दे सकती है. सर्वहारा स्वतंत्रता की दावेदारी का यह अभाव अगर सामान्य समयों में वर्ग सहयोग की लाइन और बुर्जुआ राजनीति की मौन स्वीकृति के रूप में प्रतिबिंबित होता है, तो संकट की घड़ियों में यह वस्तुत: उस पार्टी को लकवाग्रस्त स्थिति में धकेल देता है. सत्तर के दशक में इमर्जेंसी के दौरान यह त्रासदी साफ-साफ परिलक्षित हुई थी!
अपनी अनेक रचनाओं में वी एम बांरबार पार्टी इतिहास के खुलते पन्नों पर लौटते हैं और व्यवहार की कसौटी पर पार्टी लाइन के विकास की आलोचनात्मक जांच-पड़ताल करते हैं, मगर ऐसा करते हुए वे मार्क्सवाद-लेनिनवाद के प्रति पार्टी की प्रतिबद्धता को कभी ओझल नहीं होने देते – वे हमेशा पार्टी की सर्वांगीण परिमाणात्मक वृद्धि तथा उसके गुणात्मक विकास के लिए संघर्षरत दिखते हैं. वे हर चीज की तफसील में जाते थे, लेकिन उन्होंने इन तफसीलों में उसकी सारवस्तु को कभी गायब नहीं होने दिया. भारत की अर्ध-सामंती, अर्ध-औपनिवेशिक अवस्थिति में क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण के महान मिशन के हर पहलू पर पार्टी के अंदर सटीक कार्यशैली तथा जीवंत लोकतांत्रिक माहौल विकसित करने से लेकर सिद्धांत और व्यवहार की एकरूपता तथा पार्टी के तमाम स्तरों पर महिलाओं की वृहत्तर भागीदारी के लिए प्रोन्नयन तक हर मामले में, वे चौकस और जोरदार ध्यान देते थे.
अपने आधार और ऊपरी ढांचा के बीच जटिल अंत:क्रिया में भारतीय समाज के अध्ययन को गहरा बनाना और इसके जरिए भारतीय क्रांति के बारे में पार्टी की कार्यक्रमगत समझदारी को परिमार्जित करना – यह उनके बौद्धिक प्रयत्नों का एक दूसरा स्थायी केंद्रबिंदु था. विकसित होती परिस्थिति तथा सतह पर उभरते व परिपक्व होते अंतरविरोधों व प्रवृत्तियों का अध्ययन करते वक्त उनकी कोशिश रहती थी कि उसका हर तार समाज की अंतर्निहित सच्चाइयों से जाकर जुड़ जाए ताकि उससे पार्टी की रणनीतिक समझदारी समृद्ध हो सके. यह चीज स्थापित वामपंथी ढर्रे के बिलकुल विपरीत है, जिसकी दृष्टि सतही उदारवादी व संवैधानिक परिधि से बाहर जाती ही नहीं है. सवाल चाहे जाति और वर्ग का हो, धर्म और धर्मनिरपेक्षता का हो अथवा जनजातीय स्वायत्तता या महिला मुक्ति का – वी एम हमेशा अपनी गहरी क्रांतिकारी मार्क्सवादी अंतर्दृष्टि के जरिए एक ओर उदारवादी भ्रमों द्वारा उत्पन्न भ्रांतियों की धज्जियां उड़ाने थे, चाहे वे भ्रम सीधे सपाट ढंग से आए हों या परिष्कृत रूप में – तो दूसरी ओर, वे उत्तरआधुनिकता के अनेकानेक प्रवर्तकों द्वारा उत्पन्न भ्रांतियों की भी बखिया उधेड़ देते थे.
अपनी तमाम सैद्धांतिक रचनाओं में वी एम मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओ विचारधारा की सार्वभौम क्रांतिकारी सारवस्तु को भारत की ठोस सच्चाइयों के साथ सृजनात्मक ढंग से मिलाते रहे हैं. निश्चय ही, यह एकीकरण एक कष्टसाध्य और निरंतर जारी रहने वाली प्रक्रिया है और इसे, खासकर रूस और चीन की विजयी क्रांतियों के ऐतिहासिक अनुभवों की रोशनी में ही अंजाम दिया जा सकता है. साठ के दशक में भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के लिए चीनी मॉडल के साथ शुरू करना ही बिलकुल स्वाभाविक था, और यह इसलिए भी ज्यादा, कि भारत में आधिकारिक कम्युनिस्ट नेतृत्व ने चीन के अनुभवों पर कभी गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया. चीनी मॉडल की नकल करने के प्रयासों में भारतीय परिस्थिति की विशिष्टताएं सर्वाधिक स्पष्ट रूप से जाहिर हो रही थीं और बाद की पीढ़ी के कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों का कार्यभार यह था कि वे इन विशेषताओं के साथ संगति बिठाते हुए कार्यक्रम और कार्यनीतिक लाइन विकसित करें. वी एम का विश्वास था कि सिर्फ इसी तरह से भारत में क्रांति का अपना विशिष्ट भारतीय रास्ता और मॉडल विकसित हो सकेगा.
सोवियत संघ के बिखराव और ध्वंस तथा समाजवाद के मौजूदा मॉडलों के संकट ने वी एम को गहरे विचार मंथन के लिए प्रेरित किया. भारतीय कम्युनिस्ट संगठनों के बीच स्पष्टत: भाकपा(माले) ही सोवियत ध्वंस को समझने और उसे झेल पाने के लिहाज से सर्वाधिक बेहतर स्थिति में थी. जब सोवियत प्रणाली के गतिरोध और पतन ने उसके अंतिम ध्वंस का पलीता सुलगा दिया था, उस वक्त भी जहां सीपीआई और सीपीआई(एम) सोवियत समाजवाद के स्तुतिगान में मशगूल थीं, वहीं भाकपा(माले) सोवियत परिस्थिति के मूल्यांकन के मामले में शुरू से ही खुली आलोचना करती रही थी. लेकिन वी एम ने कभी भी ‘हमने पहले ही कहा था’ – की तर्ज पर अपना पल्ला नहीं छुड़ाया. सोवियत पतन के बाद उभरे बुर्जुआ विजयवाद की लहर का सामना करते हुए भी उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन पर मंडराते खतरे को कभी कम करके नहीं आंका और यह नहीं कहा कि यह महज मार्क्सवाद के प्रयोग की असफलता का मामला है. असली समस्या पर हाथ रखने की सच्ची मार्क्सवादी-लेनिनवादी भावना के साथ उन्होंने आगे बढ़कर समाजवादी उत्पादन प्रणाली के गति-नियमों का गहरा अध्ययन करने की चुनौती चिन्हित की – एक ऐसा कार्यभार जिसके विस्तार की तुलना, उनकी नजर में, मार्क्स द्वारा पूंजीवादी प्रणाली के ऐतिहासिक अध्ययन – पूंजी – के ही साथ की जा सकती है.
संक्षेप में, वी एम की चयनित रचनाएं बीसवीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की सहज-सरल, सीधी-सादी, आत्मआलोचनात्मक और आत्मकथात्मक गाथा हैं. नक्सलबाड़ी में वसंत के वज्रनाद में और बिहार के धधकते खेत-खलिहानों में उसकी गरजती अनुगूंज में अपने मार्क्स, लेनिन और माओ को पढ़ने वाले स्वातंत्र्योत्तर मार्क्सवादी वी एम के सर पर न तो लंदनपंथी सामाजिक जनवाद का बोझ था और न कांग्रेस-समाजवाद तथा भारतीय राष्ट्रवाद के गांधी-नेहरू विमर्श का भार ही लदा था. बुर्जुआ लोकतंत्र के भारतीय संस्करण के साथ उनका संघर्ष एक व्यवहारिक क्रांतिकारी का संघर्ष था, जो इस प्रणाली के अंदर से संचालित हो रहा था, लेकिन जिसने अपने विश्लेषण और दृष्टिकोण को बुर्जुआ उदारवाद और संवैधानिकता की लगातार सिकुड़ती परिधि तक सीमित नहीं होने दिया. इसीलिए, उनके तमाम लेख क्रांतिकारी उद्देश्य की स्पष्टता और सच्चाई से देदीप्यमान थे.
उनकी रचनाएं मार्क्सवादी द्वंद्ववाद के भी महत्वपूर्ण पाठ हैं. यह उनका द्वंद्वात्मक दृष्टिकोण ही है, जो हमेशा उन्हें एकांगीपन और जड़सूत्रवाद से बचाए रखता है. वे अपने अध्ययन की विषयवस्तु को उसके प्रासंगिक संदर्भों में चिन्हित करते हैं और अनोखी वस्तुनिष्ठता के साथ उसके हर पहलू का अध्ययन करते हैं. लेकिन यह वस्तुनिष्ठता निरपेक्ष और स्थैतिक नहीं है, यह क्रांतिकारी और गतिशील है. उनके द्वंद्ववाद का केंद्रबिंदु हर प्रक्रिया में विद्यमान छोटे लेकिन विकासमान सकारात्मक पहलू को आत्मसात करने और फिर उसे प्रधान व निर्णायक पहलू में रूपांतरित करने के प्रयासों में निहित रहता है.
मार्क्स की अंत्येष्टि के अवसर पर एंगेल्स ने अपने संक्षिप्त भाषण में सिर्फ एक शब्द का प्रयोग किया था, जो उनके दिवंगत सहयोद्धा के बहुआयामी और सजीव सृजनात्मक व्यक्तित्व का सर्वाधिक निर्णायक विवरण पेश करता था. एंगेल्स ने श्रोताओं को याद दिलाया – मार्क्स, सर्वोपरि एक क्रांतिकारी थे. बाद में, लेनिन ने भी मार्क्सवाद के विद्रूपीकरण के खिलाफ चेतावनी दी थी. अपने क्रांतिकारी सार से वंचित होकर मार्क्सवाद निष्प्राण और संशोधनवादी बन जाएगा – यही उनकी चेतावनी थी. वी एम भी सर्वोपरि एक क्रांतिकारी थे और मार्क्सवाद के सार को ढूंढना तथा उसे समृद्ध बनाना उनका सर्वाधिक उत्कट और सुसंगत मिशन था.
विनोद मिश्र की संकलित रचनाएं भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के गर्भ से पैदा हुए एक महानतम क्रांतिकारी के अपूर्ण मिशन का संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत करती हैं. अगली सहस्राब्दि में प्रसारित हो जाने वाली क्रांति के उबलते जोश से स्पांदित ये रचनाएं विश्व भर में क्रांतिकारी मार्क्सवाद के अग्रगामी अभियान के प्रति समर्पित हैं.
दीपंकर भट्टाचार्य,
महासचिव
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)
फासीवाद और इसका राज्य रूप – बुर्जुआ जनतंत्र और संसदीय प्रणाली जैसे अन्य रूपों की तरह ही – वर्ग संघर्ष का एक उत्पाद है. मगर वर्ग संघर्ष का रास्ता हर एक देश से दूसरे देश में व्यापक रूप से बदलता रहता है और उसी के अनुसार उसके नतीजे भी.
1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के रचनाकारों के पास यह घोषित करने के पर्याप्त कारण थे कि जर्मन सर्वहारा संभवतः समाजवादी क्रांति करने वाला दुनिया का पहला देश होगा. मगर यथार्थ में यह रूस में घटित हुआ और विजयी रूसी कम्युनिस्टों को उम्मीद थी कि अगला विजय ध्वज पड़ोसी जर्मनी का मजदूर वर्ग फहरायेगा. प्रथम विश्व युद्ध के बाद का जर्मनी सबसे भयावह आर्थिक संकट, सामाजिक उथल-पुथल, और राजनीतिक तंत्र के ध्वस्त होने के भंवर में फंसा दो नितान्त विपरीत संभावनाओं के दोराहे पर खड़ा था : समाजवादी क्रांति या फिर पूंजीवादी सुदृढ़ीकरण. जर्मनी के सबसे अगुआ मजदूर वर्ग तबकों ने बुलन्दी के साथ समाजवादी क्रांति का रास्ता लिया. बड़े बुर्जुआ ने जुन्कर भूस्वामियों के साथ गंठजोड़ कर के प्रतिक्रांति से इसका जबाब दिया. वाम असफल रहा और जैसा कि क्लारा ज़ेटकिन ने 1923 में ही कह दिया था (परिशिष्ट-1 देखें), उसे इसकी सज़ा फासीवाद के रूप में मिली. इसलिए हम अपने अध्ययन की शुरुआत जर्मनी के गृहयुद्ध से करेंगे क्योंकि यही गृहयुद्ध फासीवाद के उभार की पूर्व पीठिका बना.
जब प्रथम विश्व युद्ध का अंत हो रहा था, जर्मनी की राजशाही पूरी तरह बदनाम और अलग-थलग पड़ चुकी थी. व्यापक जन असंतोष और उथल-पुथल उफान पर था. साल 1918 की शुरुवात अमन, रोटी और साम्राज्यवादी कैसरशाही सरकार की बर्खास्तगी की मांग के साथ दस लाख से ज्यादा मजदूरों की आम हड़ताल से हुई. बर्लिन के मजदूर सोवियत जैसी काउंसिलों में संगठित हो रहे थे. क्रान्तिकारी विक्षोभ की आग समूची सेना में फ़ैल चुकी थी. लगता था, देश पूरी तरह रूस के रास्ते पर चल पड़ा था.
आसन्न पराजय को देखते हुए जर्मनी शांति वार्ता के लिए लालायित था मगर अमेरिका पूर्वशर्त के रूप में पराजित आक्रान्ता देश में नागरिक सरकार की स्थापना पर अड़ गया. विदेशी विजेताओं और घर में व्यापक जन असंतोष के दबाव में चान्सलर मैक्स वॉन बादेन की अगुवाई वाले शासन तंत्र ने अक्टूबर 1918 में एक तथाकथित जनतांत्रिक गठबंधन सरकार स्थापित कर दी. सरकार की कमान खुद प्रिंस बादेन के हाथ में थी जिसमें शायदेमान जैसे सामाजिक जनवादी शामिल थे. स्वाभाविक रूप से इसका मकसद क्रांति की सम्भावना को ख़त्म करना और विजेताओं को एक ऐसे संवैधानिक सुधार के जरिये संतुष्ट करना था, जिसमें आर्थिक ढ़ांचा और राजनीतिक सत्ता संरचना यथावत बनी रहें.
स्पार्टाकस लीग और जनवरी 1918 की हड़ताल में चुनी गयीं क्रन्तिकारी परिषदों के प्रतिनिधियों ने इस विश्वासघाती सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए एक और आम हड़ताल और सशत्र विद्रोही उभार का आह्वान किया. जनवरी 1919 में बर्लिन पूरी तरह आम हड़ताल की गिरफ्त में था: बर्लिन की सड़कों पर कब्ज़ा किये हुए हथियारबंद मजदूरों के साथ सैनिक भी शामिल हो चुके थे. विद्रोही उथल-पुथल चलती रही. नवम्बर में जहाजियों ने क्रांति की ज्वाला तमाम प्रमुख तटवर्ती शहरों और मुख्य भूमि में म्यूनिक, फ्रैंकफर्ट, हनोवर आदि तक फैला दी. 9 नवम्बर को कैसर गद्दी छोड़ कर भाग गया और उसी दिन स्पार्टाकस लीग के नेता कार्ल लीबनेश्त ने सोशलिस्ट रिपब्लिक की घोषणा कर दी. जबाबी कार्यनीति के रूप में शायदेमान ने “फ्री जर्मन रिपब्लिक” का नारा बढ़ाया. म्यूनिक और देश के अन्य तमाम प्रमुख शहरों में मजदूरों और सैनिकों की परिषदों का गठन होने लगा (बर्लिन में ये पहले ही बन चुकी थीं). मगर एस. एल. (स्पार्टाकस लीग) के पास परिषदों में बहुमत जीतने और उन्हें मजदूर वर्ग व व्यापक श्रमशील जनता के सच्चे हितों की प्रतिनिधि संस्थाओं में बदलने की क्षमता नहीं थी. परिषदों में बहुमत हासिल कर के सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी और निर्दलीय (अथवा आई.एस.डी.पी. – सोशल डेमोक्रेटों का मध्यमार्गी गुट) के अवसरवादी नेताओं ने परिषदों को अपनी लाइन पर चलने को मजबूर कर दिया. बर्लिन परिषदों की जनरल असेंबली द्वारा 10 नवम्बर को चुनी गयी “दि काउन्सिल ऑफ़ पीपुल्स कमिसार्स” में ऍफ़. एबर्ट व शायदेमान सहित दक्षिण पंथी सोशल डेमोक्रेटों के तीन प्रतिनिधि, और तीन निर्दलीय शामिल थे, मगर एस. एल. से कोई नहीं था. काउन्सिल ने कैसर के अधिकारियों को अपने पदों पर बने रहने दिया और राजशाही सेना के प्रमुख पी. वाॅन. हिन्डेन्बर्ग के साथ गठबंधन बना लिया.
दिसंबर 16-21, 1918 को हुई वर्कर्स काउंसिलों की पहली आल जर्मन कांग्रेस में सोशल डेमोक्रेटिक नेता बुर्जुआ संविधान सभा के लिए चुनाव कराने और सरकार को विधायी शक्ति हस्तांतरित करने के प्रस्ताव पारित कराने में सफल हो गए. क्रांतिकारियों ने सत्ता दखल के लिए विद्रोही बगावत शुरू की. शायदेमान सरकार ने क्रांतिकारी मजदूरों के खिलाफ खुले और निर्मम दमन का रास्ता लिया. 15 जनवरी 1919 को इसने दक्षिण पंथी पैरामिलट्री “फ्राइकोर’’ के सदस्यों के जरिये क्रांति के दो सबसे अगुआ नेताओं- कार्ल लीबनेश्त और रोज़ा लक्ज़ेम्बर्ग की हत्या करवा दी.
इस बीच म्यूनिक में सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ़ बावेरिया की घोषणा हो गयी. बिना किसी समुचित तैयारी के बने इस रिपब्लिक को भी मई 1919 की शुरुवात में सेना द्वारा बुरी तरह से कुचल दिया गया. आगे उसी साल वेइमार शहर में हुई संविधान सभा की बैठक ने नया संविधान पारित करते हुए वेइमार रिपब्लिक के रूप में एक संसदीय गणतंत्र की औपचारिक नींव रख दी. राजशाही की जगह एक अधपके बुर्जुआ गणतंत्र ने ले ली और बड़े जुन्कर भूस्वामी यथावत अछूते रहे. अवसरवादी राजनीति से विचारधारात्मक रूप से प्रभावित और सांगठनिक रूप से बंटा हुआ मजदूर वर्ग इस हैसियत में नहीं था कि वह क्रांति का समाजवाद की मंजिल की ओर नेतृत्व कर सकता. इसके बावजूद प्रशिया पर हाउस ऑफ़ होहेंजोलेर्न के चार सौ साल और जर्मनी पर तीस साल के शासन को देखते हुए अपनी सारी कमियों (प्रेसिडेंट के पास चान्सलर की नियुक्ति और बर्खास्तगी और राजाज्ञाएं जारी करने के लगभग एकाधिकार आदि) के बावजूद रिपब्लिक इस अर्थ में सापेक्षिक रूप से प्रगतिशील संस्था थी कि इसमें वर्ग संघर्ष के कहीं ज्यादा खुले और मुक्त विकास की गुंजाईश थी. यह संघर्ष ठीक-ठीक कैसे खुद को राजनीतिक अखाड़े में अभिव्यक्त करेगा और – कौन सा पक्ष जीतेगा – यह मुख्यतः प्रतिद्वन्दी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के राजनीतिक व्यवहार पर निर्भर करेगा.
(पार्टी के अन्दर रोज़ा लक्जे़म्बर्ग का मत था कि जब दक्षिण की ताकतें अपनी ताकत बटोर रहीं हो, तब जन विद्रोह संगठन के लिए घातक हो सकता है. मगर जब वह शुरू हो गया, उसने यह तर्क देते हुए अपने कामरेडों का साथ दिया कि अब चीज़ें गति में थीं और इस समय किनारे खड़े रह कर सही समय का इन्तजार करना कहीं ज्यादा भयावह भूल होगी. चन्द दिनों बाद ही, लक्जे़म्बर्ग और लीबनेश्त को फ़्रीकार्प्स ने गिरफ्तार कर के बेरहमी से क़त्ल कर दिया. लीबनेश्त का मृत शरीर गुमनाम रूप से शहर के लाशघर में फेंक दिया गया और लक्जे़म्बर्ग की लाश महीनों बाद लैंडव्हेर नहर में उतराई पाई गयी. अपने क़त्ल की शाम को, विद्रोह की विफलता और अपनी आसन्न मृत्यु को लगभग सुनिश्चित जानते हुए रोज़ा ने लिखा):
“नेतृत्व विफल हो गया है. इसके बावजूद भी, नेतृत्व जन समुदायों से और जन समुदायों के बीच से ही फिर से खड़ा किया जा सकता है और निश्चय ही किया जाना चाहिये. जन समुदाय ही निर्णायक तत्व हैं, वे वह चट्टान हैं जिस पर क्रांति की अंतिम निर्णायक विजय खड़ी की जायेगी ... बर्लिन में व्यवस्था का शासन है ! तुम मूर्ख जल्लादों ! तुम्हारी व्यवस्था बालू पर बनी है. कल को क्रांति पूरी गड़गड़ाहट के साथ खुद को फिर से खड़ा कर चुकी होगी और पूरे उत्साही आवेग के साथ तुम्हें आतंकित करते हुए यह घोषणा कर रही होगी: “मैं थी, मैं हूँ, मैं रहूंगी !”
हर असफल क्रांति शासक वर्ग (जो खतरे में तो है मगर नष्ट नहीं हुआ है) की ओर से दोहरी प्रतिक्रिया को जन्म देती है. पहला: क्रांतिकारी पार्टी को दबा कर ख़त्म कर देने के लिए बर्बरतम दमन; और दूसरा: क्रांति के भावी प्रयासों को रोकने और जन समुदायों में अपना सामाजिक आधार बढाने के उद्देश्य से कुछेक सुधार. जर्मनी में दमन का निशाना एस. एल और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ जर्मनी (के.पी.डी.) थे और राज्य का सुधार वेइमर रिपब्लिक के रूप में पेश किया गया. पहली और आगे की सरकारें लिबरल बुर्जुआ पार्टियों और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एस.पी.डी.) के गठबंधन से बनीं. स्पष्टतः ये वर्ग सहयोग की सरकारें थीं. क्रांति की अभी भी सुलगती राख को दबाने के लिए एस. पी. डी नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार ने वे कदम उठाये जिन्हें आजकल श्रमशील जनता के लिए सामाजिक सुरक्षा नेट कहा जाता है. पूंजीपतियों ने भी इसके खिलाफ मूर्खतापूर्ण आत्मघाती टकराव के बजाय इसे एक परिणामवादी तात्कालिक समायोजन के रूप में स्वीकार कर लिया. जून 1919 में एक प्रमुख जर्मन उद्योगपति ने अपने साथी पूंजीपतियों के बीच इस बात को कुछ इस तरह से स्पष्ट किया :
“महोदयों, रूस में घटनाओं ने गलत मोड़ ले किया था और शुरुआत से ही उद्योग ने क्रांति को खारिज करने की नीति ले ली थी. अगर हमने भी, और यह संभव भी था, असहयोग का रुख ले लिया होता, तो मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि आज हमारे सामने भी वही स्थितियां होतीं जो रूस में हैं.”
लेनिन ने भी यह इंगित किया कि बड़े बुर्जुआ ने रूस के उदाहरण से सीख ले कर एक बेहतरीन रणनीति अख्तियार की थी. आर्थिक सहूलियत की एक छोटी सी कीमत दे कर उन्होंने और जुन्कर भूस्वामियों ने खुद को रूस से फैलती क्रांति के खतरे से बचा लिया. एस.पी.डी. और इससे जुड़े ट्रेड यूनियन नेताओं ने भी (जिनके पास मजदूरों के विशाल समुदाय का समर्थन था), क्रांति को फिर से आगे बढ़ाने के लिए वर्ग संघर्ष तेज करने की कोशिश नहीं की.
जैसा कि हम जानते हैं, राजनीतिक समझौते दो संघर्षरत पार्टियों/पक्षों के बीच अस्थायी युद्ध विराम भर होते हैं – वह समय जिसमें लड़ाई परोक्ष-सूक्ष्म तरीकों से चलती रहती है, और हर पक्ष दूसरे को चालाकी से मात देने की कोशिश में रहता है. एक पक्ष जीतता है, दूसरा हारता है. सोशल डेमोक्रेटों ने 1914 में कैसर की युद्धनीति को दिए गये समर्थन के अपने विश्वासघाती चरित्र को बनाये रखते हुए, इस बार सरकार का इस्तेमाल वर्ग संघर्ष के आयाम को विस्तार देने में करने के उलट अपने खुद के भूमि सुधार कार्यक्रम से भी किनारा कर लिया. उनकी नीति वर्ग शांति को मजबूत करने के जरिये बुर्जुआ संसदीय व्यवस्था में पद से चिपके रहने की थी. ऐसे में, उन्होंने क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों को अपने लिए एक बड़ी बाधा के रूप में लेते हुए राजनीतिक व हथियारबंद क्रांति और हथियारबंद प्रतिक्रांति के सीधे टकराव के दौर में उन्हें भौतिक/षड्यंत्रकारी तरीकों से भी रास्ते से हटाने का प्रयास किया.
बड़े बुर्जुआ के साथ समझौतों, लिबरल बुर्जुआ के साथ गंठजोड़ों और क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों के साथ संघर्ष पर आधारित सोशल डेमोक्रेटिक प्रतिरूपों के साथ एक और प्रतिरूप जो आने वाले दशकों में पूरी दुनिया में दुहराया जायेगा – नवजात एस.एल. – के.पी.डी. की तर्ज का होगा जिन्होंने “लेफ्ट विंग कम्युनिज्म: ऐन इन्फेनटाइल डिसआर्डर” की अपने हिस्से की अदायगी की थी. उन्होंने जनतांत्रिक क्रांति से समाजवादी क्रांति की ओर निर्बाध संक्रमण की जरूरत को बिलकुल सही रेखांकित किया, मगर जारी गृह युद्ध में वर्ग शक्तियों के समवेत संतुलन का सटीक आकलन कर पाने से शुरुवात में चूक गए, जरूरत से कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश की और भारी नुकसान उठाया. इसने क्रांति की सम्भावना को और भी कमजोर कर दिया. बहरहाल, रिपब्लिक की स्थापना के बाद, उन्होंने जनतंत्र की रक्षा की दिशा में सोशल डेमोक्रेटों के हर कदम का समर्थन किया और साथ ही उनके घुटने टेकने के हर कदम का विरोध भी किया. फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में दोनों पार्टियों के एकजुट होने की विफलता ने प्रतिक्रियावादी बड़े बुर्जुआ को धीरे-धीरे अपना वर्चस्व वापस हासिल करने में मदद की (1920 दशक के मध्य में आठ घंटे काम के दिन को ख़ारिज करना, जो रिपब्लिक की स्थापना के बाद जल्दी ही लागू किया गया था, और 1932 में ओट्टो ब्राउन के नेतृत्व वाली प्रशिया की सोशल डेमोक्रेटिक सरकार को बर्खास्त करना आदि). संसद के अन्दर और बाहर नेशनल सोशलिस्टों के सबसे मजबूत दक्षिण पंथी और दुर्दांत वाम-विरोधी व मजदूर विरोधी पार्टी के रूप में उभरने के साथ-साथ बड़े बुर्जुआ और नात्जि़यों का लगातार निकटतर सम्बन्ध बनता गया. वेइमार रिपब्लिक की जगह हिटलर के “थर्ड राइक” की स्थापना के साथ बड़े बुर्जुआ का निर्णायक वर्चस्व स्थापित हो गया.
1920 दशक के आर्थिक संकट ने, जिसकी परिणति 1929 की महामंदी में हुई और जिसने व्यापक पैमाने पर आर्थिक तबाही मचाते हुए वर्ग संघर्ष को आवेग दिया, इटली, फ्रांस, अमेरिका, आस्ट्रिया, रोमानिया, पुर्तगाल, इंग्लैंड और स्पेन जैसे देशों में फासीवादी गुटों के उभार की साझी पृष्ठभूमि तैयार की. इनमें से कई फासिस्ट समूहों ने सत्ता भी दखल की. मगर यह जर्मनी था जिसे सबसे नृशंस रूप में एक बर्बर व सफल नस्लीय जनसंहारी फासिस्ट सत्ता का बसेरा बनने का दुर्भाग्य मिला.
ऐसा अपवाद सरीखे सामाजिक-राजनीतिक विकासक्रमों के संश्रय और एक असाधारण राजनीतिक नेता के चलते संभव हो सका जो अपने मिशन को किसी भी कीमत पर हासिल करने पर आमादा था. अभूतपूर्व आर्थिक संकट की तकलीफें, निजी और सामाजिक जीवन में उथल-पुथल और आहत राष्ट्रीय गर्व, जो युद्ध में पराजय व वर्साय संधि की अपमानजनक शर्तों के चलते उपजा था और जिसने औद्योगिक सर्वहारा का गर्वीला अपवाद छोड़ कर सारे वर्गों व सामाजिक संस्तरों को फासीवादी प्रोपेगैंडा का आसान शिकार बना दिया, आदि सहायक वस्तुगत कारक काफी जाने-पहचाने हैं, इसलिए हम इनके विस्तार में नहीं जायेंगे. इसके बजाय, हम फासीवाद की राजनीति की पड़ताल करेंगे. यह समझने की कोशिश करेंगे कि ठीक-ठीक कैसे, किस रणनीतिक परिप्रेक्ष्य, कार्यनीतिक चालबाजियों और कार्य पद्धति के साथ हिटलर युद्धोत्तर जर्मनी की राजनीति में तूफानी समुद्रों को पार करता हुआ इतनी तेजी और इतने मारक प्रभाव के साथ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने लक्ष्य तक पहुँच सका.
एडोल्फ़ हिटलर का जन्म 20 अप्रैल 1889 को ऊपरी आस्ट्रियाई सीमान्त शहर ब्रौनाऊ एम इन् में हुआ था जो म्यूनिख से बहुत दूर नहीं था. उसने 30 अप्रैल 1945 को बर्लिन के एक भूमिगत बन्कर में अपनी जीवन लीला खुद ख़त्म की जब उसे खबर मिली कि उससे प्रतिशोध लेने के लिए रूस की लाल सेना शहर में दाखिल हो चुकी है. हिटलर का पिता अलोइस हिटलर एक मझले दर्जे का कस्टम कर्मचारी था. अपनी युवावस्था में हिटलर ने दो बार अकादमी ऑफ़ फाइन आर्ट्स में दाखिला लेने की असफल कोशिश की. इसके बावजूद वह विएना के दृश्यों की जलरंग पेंटिंग बना कर अपनी आजीविका किसी तरह कमाता रहा. वह अपने अभिभावकों की छोड़ी अच्छी-खासी विरासत उड़ा चुकने के बाद सालों तक बेघर-बार आश्रयों में गुजारा करता रहा. उन्हीं दिनों उस पर जर्मन नस्लवादी व यहूदी विरोधवादी धाराओं का प्रभाव पड़ा. 25 साल की उम्र में वह युद्ध में एक “प्राईवेट” (सबसे निचले दर्जे का सिपाही) के रूप में शामिल हुआ और मार्च 1920 में वर्साय संधि लागू होने के बाद अन्य लोगों के साथ “डिसचार्ज” हुआ.
1918-1919 में, क्रांतिकारी उभारों और प्रति-क्रन्तिकारी प्रतिक्रियाओं के दौर में हिटलर म्यूनिक में रह रहा था जो चरम दक्षिण राष्ट्रवादी ताकतों का गढ़ था. वह न तो क्रांति का समर्थक था और न ही विरोधी. प्रारंभिक क्रांतिकारी ज्वार के दौर में वह सुविधाजनक-अवसरवादिता के साथ सोशल डेमोक्रेटों के खेमे में नज़र आता था. मगर कुल मिला कर वह बच-बचा कर रहने की नीति पर ही चलता रहा[1]. हाँ, बाद में वह हमेशा इसकी और इसके उत्पाद वेइमार रिपब्लिक की आलोचना और साथ ही उन एस पी डी नेताओं- नोस्के, एबर्ट, शायदेमान, और बावेरियाई नेता अउएर आदि की सराहना भी करता रहा जिन्होंने “भूले से भी कभी क्रांति की चिंगारी जगाने की नहीं सोची”.
हिटलर सितम्बर 1919 से सक्रिय राजनीति में आया जब उसने जर्मन वर्कर्स पार्टी (डी.ए.पी) की एक सभा में शिरकत की. डी.ए.पी. उन बहुतेरे नस्लवादी – उन्मादी अंधराष्ट्रवादी गुटों में से एक था जो 1918 के बाद से म्यूनिक में उभरने लगे थे. उसके भाषण की काफी सराहना हुई और जल्दी ही उसे पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण मिला. वह झटपट तैयार भी हो गया क्योंकि भले ही डी.ए.पी अभी एक छोटे, प्रभावहीन और शुरुवाती दौर में था, यह उसके लिये तेजी से आगे बढ़ने और पार्टी को अपने अनुसार ढाल लेने का सुनहरा मौका था. “स्टार वक्ता” के रूप में हिटलर के साथ डी.ए.पी. की सभाओं में भीड़ बढ़ने लगी. हिटलर के कट्टर अति-राष्ट्रवाद और संवाद अदायगी की नाटकीय शैली ने पार्टी नेताओं का ध्यान खींचा और आश्चर्यजनक रूप से उसे अपनी रेजिमेंट के शिक्षा अधिकारी के सहायक की नियुक्ति मिल गयी.
वाक् पटुता का वरदान हिटलर के राजनीतिक कैरियर के उभार का सबसे बड़ा हथियार था.
आम धारणा के विपरीत, हिटलर ने कभी बिना तैयारी के भाषण नहीं दिया. वह अपने सारे जन संबोधनों के लिए शातिर चतुराई के साथ तैयारी करता था. अपने दो से तीन घंटों के नाटकीय भाषणों पर केन्द्रित रहने के लिए वह दर्जनों पन्ने जुमलों और नारों से भर कर रखता था. लोगों में उत्सुकता की उत्तेजना बढाने के लिए वह आम तौर पर सभाओं में देर से पहुँचता था. उसके भाषण एक बंधे-बंधाये ढर्रे पर होते थे. ज्यादातर वह शुरुवात धीरे-धीरे, जैसे हिचकिचाते हुए करता था. इतिहासकार जॉन तोलैंड के अनुसार वह करीब दस मिनट एक मंजे हुए अदाकार की तरह श्रोताओं का मन भांपने में लगाता था. उनके मूड के प्रति आश्वस्त हो जाने के बाद वह इत्मीनान से अपना धाराप्रवाह शुरू करता. इसके बाद वह अपनी लाइनों के बीच अपनी नाटकीय अदायें भरता – सर को पीछे झटकना, दायाँ हाथ आगे बढ़ाना-तानना-लहराना, खास कर मसालेदार वाक्यों में अपने आक्रोश को दिखाने के लिए – वक्ता मंच पर मुट्ठियाँ मारना ... शब्दों का चयन और लहज़ा लगातार आक्रामक होता जाता. उसकी खुद की उत्तेजना जैसे संक्रमण की तरह फैलती. उत्तरोत्तर चरम पर पहुँचती उत्तेजना के साथ जब वह अपना भाषण पूरा करता, समूचे श्रोता उन्माद के नशे में पागल हो रहे होते और वक्ता भी पसीने में तर-ब-तर अपने बनाए माहौल का अभिवादन स्वीकार कर रहा होता.
ऐसे तमाम कारक थे जिन्होंने हिटलर की वक्तृत्व शक्ति में योगदान किया : समूचे शरीर से बोलती हुई लचकदार बोली उसका सबसे बेहतरीन हथियार था जिसका उसने भरपूर और शातिर इस्तेमाल किया. उसने “युद्ध के बाद के सताये अकिन्चन की भाषा-बोली” पर पूरी तरह महारत हासिल कर ली थी. अपने भाषणों में वह न सिर्फ भूतपूर्व सिपाही की उजड्ड शब्दावलियों, बल्कि व्यंग और विडंबनाओं के भी मसाले भरता. वह धार्मिक छवियों और भावों के इस्तेमाल के जरिये अपने श्रोताओं के विचारों व भावनाओं को व्यक्त कर सकने में भी खूब माहिर था : उसने न सिर्फ उनके भय, पूर्वाग्रहों, आक्रोश-असंतोष, बल्कि उनकी आशाओं-उम्मीदों-आकांक्षाओं का भी भरपूर शोषण किया. हिटलर का पहला जीवनीकार, कोनार्ड हीदेन कहता है कि हिटलर “खुद से सम्मोहित” – अपने शब्दों से इस कदर अविछिन्न व्यक्ति था कि जब वह सरासर झूठ बोल रहा होता तब भी उसके श्रोता उसे पूरी तरह सच मान रहे होते.”
हिटलर के भाषण आमतौर पर श्रोताओं को “युद्ध के पहले के फलते-फूलते-खुशहाल अद्भुत जर्मनी” में ले जाते. वह बार-बार श्रोताओं का ध्यान “1914 के महान शौर्यवान समय” की ओर ले जाता, जब जर्मनी के लोग अभूतपूर्व रूप से एकजुट थे और उन्हें बाहरी ताकतों द्वारा जबरन थोपे गए युद्ध में घसीट लिया गया था. इस महिमामंडित अतीत का इस्तेमाल हिटलर वर्तमान को निपट अँधेरे का रंग देने के लिए करता. उसके भाषणों का स्थायी सन्दर्भ यह था कि 1918-19 की क्रांति जर्मनी को पतन और गुलामी की ओर ले गयी. इसके लिए यहूदी और “वाम” जिम्मेदार थे जिन्हें वह “क्रांतिकारी” अथवा “नवम्बर के अपराधी” कहता : “गजब की निर्भीक सेना” की पीठ पर “यहूदी-सोशलिस्टों” द्वारा छुरा भोंका गया, जिन्हें यहूदी पैसे की घूस मिलती थी. यह हिटलर का वह वक्तव्य था जिसे यू.पी.एस.डी. के पर्चे में अप्रैल 1920 में उद्धृत किया गया था. तीसरी सुप्रीम कमांड के भूतपूर्व प्रमुखों – पॉल वॉन हिन्डेन्बर्ग और एरिच लुदेन्दोर्फ़ ने इस “पीठ में छुरा” जुमलेबाजी की शुरुवात की जो दक्षिण पंथी राष्ट्रवादियों के प्रोपेगेंडा शस्त्रागार का स्थाई तत्व बन गया.
वर्साय संधि पर जबदस्त हमले हिटलर के अभियानों का केन्द्रीय हिस्सा थे. निहायत शर्मनाक और अपमानजनक शांति संधि के रूप में पेश कर के इसका इस्तेमाल लोगों में व्याप्त कड़वाहट को भरपूर हवा देने में होता. हिटलर लगातार अपने श्रोताओं के दिलो-दिमाग में इसे “गुलामी” के रूप में बैठाने के लिए प्रहार करता और इसे वेइमार रिपब्लिक व उसके नेताओं के खिलाफ नफ़रत-हिकारत भरे हमलों के काम में लाता. इसके जरिये वह जर्मनी की नयी जनतांत्रिक व्यवस्था की बारी-बारी से “नीच-दुष्टों की रिपब्लिक”, “बर्लिन की यहूदी सरकार” और “अपराधियों की रिपब्लिक” के रूप में भर्त्सना करता.
अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुवात से अंत तक हिटलर की विश्व दृष्टि और राजनीति के तीन आधारभूत तत्व थे:
(i) रेडिकल यहूदी विरोधवाद[2] (ii) आक्रामक बोल्शेविकवाद /साम्यवाद /मार्क्सवाद विरोध और (iii) नस्लीय / राष्ट्रीय पुनरुत्थानवाद और अंध राष्ट्रवाद जिसके साथ “पूर्वी इलाकों में रहने के लिए स्थान” का आक्रामक उन्माद अविछिन्न रूप से जुड़ा था. जर्मनी की उस समय की दक्षिण पंथी राजनीति में ये सारी बाते कोई नयी नहीं नहीं थी, मगर हिटलर ने इनकी अतुलनीय रूप से बेहतर “पैकेजिंग और मार्केटिंग” की. तीसरा तत्व – भयावह-तीक्ष्ण, श्रेष्ठतावादी राष्ट्रवाद उसके भाषणों और लेखों में हमेशा ही मौजूद रहता, मगर इसी के साथ वह स्थान और श्रोताओं की जरूरत के हिसाब से इस या उस तत्व पर विशेष बल दिया करता.
1920 के एक भाषण में उसने कहा : राज्य बना सकने में असमर्थ यहूदी घुमंतू ... अन्य लोगों के शरीरों पर परजीवियों ... अन्य नस्लों के अन्दर एक नस्ल और अन्य राज्यों के अन्दर एक राज्य की तरह रहते थे. अपनी दो सबसे खास नस्लीय प्रवृत्तियों – “धन लोलुपता और भौतिकतावाद” के चलते उन्होंने और तमाम नश्वर मनुष्यों की तरह जरूरी पसीना और श्रम लगाये बिना ही अकूत धन-सम्पदा जमा कर ली है. इसी के साथ हिटलर अपने प्रिय विषय-अंतर्राष्ट्रीय “महाजनी और स्टॉक मार्केट पूँजी” पर आ जाता है – जिसने “कल्पनातीत रूप से बढ़ते चले जाते पैसे और सबसे खराब बात यह कि इसके जरिये सारे ईमानदार प्रयासों को भ्रष्ट करते हुए व्यवहारतः समूची दुनिया पर अपना कब्ज़ा” जमा रखा है. हिटलर ने दावा किया “यहूदी समुदाय के खिलाफ अपने लोगों की सहज घृणा की प्रवृत्ति को जागृत, संवर्धित और आवेगित करने के जरिये” नेशनल सोशलिस्ट इस विनाशकारी ताकत से लोहा लेने के लिए आगे आये हैं. यहाँ से – “स्टॉक मार्केट और महाजनी पूँजी के जर्मनी को अपने शिकंजे में जकड़ने” से – हिटलर आराम से “विश्वव्यापी यहूदी साजिश” के त्रासद आतंक की ओर मुड़ जाता.
24 फरवरी 1928 को पार्टी कार्यक्रम की आठवीं वर्षगाँठ पर हिटलर ने घोषणा की : “अगर वह (यहूदी) सुधर जाता है, वह रह सकता है – अगर नहीं तो उसे निकाल बाहर करो” (लगता है गोलवलकर ने मुसलमानों के लिए अपनी कुख्यात चेतावनी सीधे यहीं से ली थी). मगर उसी साँस में वह यह भी दावा करता है कि “हम अपने घर के मालिक हैं” और फिर यह कातिल चेतावनी जारी करता है “परजीवियों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकती, उन्हें सिर्फ नष्ट ही करना होता है”.
1920 के एक अन्य भाषण में हिटलर कहता है : “जो रूस में आज शीर्ष पर हैं वे मजदूर नहीं, बल्कि बिना किसी संदेह के हीब्रू हैं. हिटलर ने “यहूदी तानाशाही” और रूसी जनता के जीवन से प्राण सोख लेने वाली “मास्को यहूदी सरकार” की बातें करते हुए एन.एस.डी.ए.पी. से “यहूदी बोल्शेविज्म के गन्दे भोजन” के खिलाफ “कूट कर कीमा बना देने वाले जर्मन चरित्र वाला प्रहारक” बनने का आह्वान किया.
आखिर किस आधार पर कोई “यहूदी बोल्शेविज्म” या “मास्को यहूदी सरकार” की बात कर सकता था? यह सही है कि कई बोलशेविक नेता यहूदी पृष्ठभूमि के थे, और ऐसा कई अन्य देशों के कम्युनिस्ट नेताओं के साथ भी था. हिटलर इस तथ्य का इस्तेमाल करके यह दावा करने वाला अकेला नहीं था कि बोल्शेविज्म का निर्देशन-संचालन यहूदी कर रहे थे. ऐसा कर के वे अपने दो दुश्मनों को एकाकार कर रहे थे. बानगी के लिए देख सकते हैं कि विन्स्टन चर्चिल बोल्शेविकों के खिलाफ कैसा विष वमन करता है (बॉक्स देखें).
मार्क्सवाद को ले कर हिटलर का मानना था कि इसे नष्ट कर के वह वर्ग संघर्ष का नामो-निशान मिटा कर एक “सच्चे एथनिक – लोकप्रिय समुदाय” का निर्माण कर सकेगा. इसी के साथ वह लगातार राष्ट्रवाद और समाजवाद के समागम” के लिए दिमाग के श्रमिक और मुट्ठियों के श्रमिक “की एकजुटता के नये-नये जुमले भी ईजाद कर रहा था. नेशनल सोशलिज्म न तो बुर्जुआ को जानता था न ही सर्वहारा को, वह सिर्फ “अपने लोगों के लिए काम करते जर्मन” को जानता था.
अक्सर हिटलर नफ़रत के अपने दोनों शिकारों को मिला दिया करता था; 1927 में उसने लिखा : “यहूदी दुनिया का दुश्मन है और रहेगा, और उसका सबसे बड़ा हथियार, मार्क्सवाद मानवता के लिए प्लेग है और रहेगा”.
नेशनल सोशलिज्म खुद को एक राजनीतिक धर्म के तौर पर निरुपित करता था. गोएबेल्स ने अपनी डायरी में लिखा : “ईसाइयत का आज हमारे लिए क्या अर्थ है? नेशनल सोशलिज्म एक धर्म है”. यह दृष्टिकोण पार्टी के एक “आस्था के समुदाय” में विस्तार और इसके कार्यक्रम को “विचारधारात्मक पंथ” बनाने की नीति की पूरी संगति में था. बाइबिल प्रचारकों की तरह, फ्यूरर के शिष्यों का काम नात्ज़ी सिद्धान्तों को “अपने लोगों में ईसाई धर्म शिक्षा की तरह” फैलाना था. यह एक बड़ा कारण था कि हिटलर एन.एस.डी.ए.पी. के पच्चीस सूत्री मूल मेनिफेस्टो में किसी भी तरह के संशोधन पर विचार करने से हमेशा इनकार करता रहा. उसके निकटतम विश्वस्त हैन्फ्स्तेगल ने एक बार उसे इनमें कुछ व्यवहारिक संशोधन करने का सुझाव दिया था जिस पर उसने जबाब दिया : “हरगिज़ नहीं. यह जैसा है वैसा ही रहने जा रहा है. न्यू टेस्टामेंट भी अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है, मगर इससे ईसाइयत के प्रसार में कोई बाधा नहीं आयी”. नात्ज़ी पार्टी के 1925 के क्रिसमस समारोह में उसने शुरुवाती ईसाइयत और अपने “आन्दोलन” के बीच साम्य को रेखांकित किया. ईसा मसीह का भी शुरू में उपहास उड़ाया गया, इसके बावजूद ईसाई आस्था एक विशाल-व्यापक वैश्विक आन्दोलन बन गया था. एन.एस.डी.ए.पी. के चेयरमैन ने गर्जना की : “हम वही चीज राजनीति के क्षेत्र में हासिल करना चाहते हैं”. साल भर बाद वह खुद को खुले तौर पर जीसस के उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर रहा था जो अपना काम पूरा कर के रहेगा. हिटलर ने घोषित किया : “नेशनल सोशलिज्म क्राइस्ट की शिक्षाओं के अनुपालन के अलावा कुछ भी नहीं है.”
अपने भाषणों, खासकर इनके चरम उत्तेजना के प्रलापों में हिटलर अक्सर धार्मिक शब्दावलियों का इस्तेमाल किया करता था. वह धार्मिक उद्घोष “आमेन”, या फिर “नए पवित्र जर्मन साम्राज्य के प्रति आस्था घोष” अथवा “सारे राक्षसों की चुनौती का मुकाबला करते हुए मुझे अपना कर्तव्य करते रहने की शक्ति देने के किये हमारे प्रभु से याचना” के आह्वान के साथ अपना भाषण पूरा किया करता. वह अपने अनुयाइयों को बराबर आगाह करता कि उनके मार्ग में बलिदानों की कभी कमी नहीं रहेगी. यहाँ भी वह शुरुवाती ईसाइयत के साथ साम्य बनाता था : “चलते रहने के लिए हमारे पास काँटों से भरा पथ है और हमें इस पर गर्व है”. हिटलर ने वादा किया कि वे “रक्त साक्षी” जिन्होंने नात्ज़ी आन्दोलन के लिए अपना जीवन बलिदान किया है, वही सम्मान और गौरव पायेंगे जो कभी क्रिश्चियन शहीदों के लिए सुरक्षित हुआ करता था.
“... स्पार्टाकस-वेइशाउप्ट दिनों से ले कर कार्ल मार्क्स, और ट्रात्स्की (रूस), बेला कुन (हंगरी), रोज़ा लक्जे़म्बर्ग (जर्मनी), और एम्मा गोल्डमान (अमेरिका) तक, सभ्यता को उखाड़ फेंकने और समाज के अवरुद्ध विकास, ईर्ष्यालु विद्वेष, और असम्भव समानता पर आधारित समाज के पुनर्निर्माण की विश्वव्यापी साजिश लगातार बढ़ती जा रही है...
बोल्शेविकवाद के निर्माण और रूसी क्रांति को सचमुच साकार करने में इन अंतर्राष्ट्रीय और ज्यादातर अनीश्वरवादी यहूदियों द्वारा अदा की गयी भूमिका को बढ़ाने-चढ़ाने की जरूरत नहीं है....लेनिन के उल्लेखनीय अपवाद के साथ, प्रमुख नेतृत्वकारी लोग यहूदी ही हैं.”
– विन्स्टन लियोनार्ड स्पेंसर चर्चिल
ज़ायनवाद बनाम बोल्शेविकवाद
(“इलस्ट्रेटेड संडे हेराल्ड”, 8 फरवरी, 1920)
डी.ए.पी. नेता अन्तोन ड्रेक्स्लर के साथ मिल कर, जिससे उसने राष्ट्रवाद और समाजवाद को मिलाने, मजदूर वर्ग को मार्क्स की झूठी शिक्षाओं से मुक्त कराने, और उन्हें राष्ट्रवादी पाले में खींच लाने का विचार हासिल किया था, हिटलर ने पार्टी कार्यक्रम पेश किया जो उस समय के जातीय-अंधराष्ट्रवादी व यहूदी-विरोधी हलकों-तबकों में प्रचलित विचारों की जबर्दस्त अभिव्यक्ति था. एजेंडा के शीर्ष पर सारे जातीय जर्मनों से एक वृहत्तर जर्मनी के अन
पहले दिन से ही हिटलर पार्टी का सबसे विश्वसनीय और सक्रिय नेता था : भारी भीड़ के सामने – ग्रामीण अंचलों में भी, भाषण देना, पैनल बहसों में भाग लेना. इस दौर में उसका केन्द्रीय बल लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने पर था. हिटलर ने “मेरा संघर्ष” में उन प्रारंभिक दिनों की अपनी मनोदशा पर लिखा : “कौन परवाह करता है कि वे हम पर हँसते हैं या हमें अपमानित करते हैं, हमें मूर्ख या अपराधी मानते हैं? मुख्य बात यह है कि वे हमारे बारे में बात करते हैं और बराबर हमारे बारे में सोचते हैं.” अब तक पुलिस और मििलट्री के आका भी एन.एस.डी.ए.पी. की गतिविधियों के “लाभकारी देशभक्ति प्रभाव” को सराहने लगे थे.
एन.एस.डी.ए.पी. नेता हमेशा अपने राजनीतिक एजेंडे पर पूरी तरह केन्द्रित रहता. जनवरी 1923 में वर्साय संधि द्वारा निर्धारित क्षति-पूर्ति वसूली के लिए देश के औद्योगिक संकुल रुह्र घाटी में फ्रेंच और बेल्जियन टुकडियां घुस आईं. पूरे देश में इसका भारी प्रतिवाद हुआ, घुसपैठिये आक्रांताओं के खिलाफ संयुक्त प्रदर्शन हुए. मगर दूसरों को चकित करती हुई हिटलर के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी पार्टी इस सब से अलग रही. इसने जनता के आक्रोश को घर के अन्दर के दुश्मनों “नवम्बर के अपराधियों” की दिशा में मोड़ने की चाल चली. हिटलर ने जनसभा में कहा कि “सेना की पीठ में छुरा भोंक कर” प्रथम विश्व युद्ध के अंत में राजनीतिक नेताओं ने जर्मनी को सुरक्षा विहीन कर के “सम्पूर्ण गुलामी” के लिए खोल दिया था. वह वस्तुतः उन नेताओं को संकेत दे रहा था जिन्होंने वर्साय संधि पर हस्ताक्षर किये थे और जो वेइमार रिपब्लिक की स्थापना के लिए जिम्मेदार थे. उसने बल दे कर कहा कि असल कार्यभार यह सुनिश्चित करना था कि उन अपराधियों (मुख्यतः सोशल डेमोक्रेट और कम्युनिस्ट ) को सज़ा मिले और एक नए मज़बूत जर्मनी का निर्माण हो. इसलिए उसने तर्क दिया कि “संयुक्त मोर्चे के लिए हल्ला-गुल्ला” सिर्फ जर्मन जनता का उनके मुख्य कार्यभार से ध्यान बंटाने का काम करेगा.
मगर इस “मुख्य कार्यभार” के उन्मादी अनुसरण और बावेरियन पुलिस व केन्द्रीय सैन्य नेतृत्व की पुचकार से उन्मत्त हिटलर कुछेक भारी गलतियाँ कर बैठा.
हिटलर को लगने लगा कि परिस्थितियाँ बेहद तेजी से गर्म हो रही थीं और अब सिर्फ प्रोपेगैंडा से काम नहीं चलने वाला है. उसने अपने सबसे संगठित राजनीतिक दुश्मन नम्बर 1 – मजदूर वर्ग पार्टियों से मई दिवस के अवसर पर सीधे टकराने का दुस्साहसी फैसला लिया. उसने बड़े शातिर तरीके से बावेरियन सरकार से मई दिवस समारोहों पर यह कहते हुए प्रतिबन्ध लगाने की मांग की कि यह दिन 1919 में गठित क्रांतिकारी परिषदों से म्यूनिक के कंजर्वेटिव “लिबरेशन” की वर्षगाँठ का भी दिन था. सरकार ने ऐसा भड़काऊ और कड़ा कदम उठाने से इनकार कर दिया. तब हिटलर ने खुद मई दिवस परेड को रोकने की ठानी. उसके आह्वान पर दो हजार की संख्या में हथियारबन्द पैरा मिलिशिया “फ्राइकोर” परेड जबरन रोकने को जुटे. हिटलर ने खुद पूरी मिलट्री वर्दी, स्टील हेलमेट और आयरन क्रास के साथ गुरूर से कमान संभाली. मगर इस बार प्राधिकारियों ने फैसला लिया कि इन नए उभरते हुड़दंगियों को प्रशासन के समर्थन का मनमाना फ़ायदा लेने की इजाज़त नहीं दी जायेगी और सेना बुला ली गयी. उसके कुछ उन्मत्त सिरफिरे अनुयायी अभी भी लड़ने को तैयार थे, मगर हिटलर राज्य के साथ ऐसे व्यर्थ के हथियारबन्द टकराहट पर अपना समूचा राजनीतिक कैरियर दांव पर लगाने का जोखिम उठाने से पीछे हट गया. विशाल मई दिवस समारोह शान्तिपूर्वक संपन्न हो गए.
इस फुस्स तमाशे से हिटलर की इज्जत की जबरदस्त किरकिरी हुई. उसके साथी और अनुयायी, खासकर एस.ए. (नात्ज़ी पार्टी का मूल पैरामिलट्री विंग जो स्टार्मट्रूपर्स या ब्राउनशर्ट्स के नाम से भी जाना जाता है), बेहद निराश हुए. बहुतेरे राजनीतिक पर्यवक्षक – विश्लेषक मानने लगे कि नात्जि़यों का सितारा अस्त होने लगा है. मगर वस्तुगत परिस्थिति उनके अनुकूल होती जा रही थी. 1920 की गर्मियों से ही मजदूर वर्ग का बगावती तेवर अपने चरम पर पहुँचने लगा था. अगस्त में ज्यादातर एस.पी.डी. नेतृत्व वाली ट्रेड यूनियनों की हडतालों और प्रदर्शनों के दबाव में चान्सलर विल्हेम कूनो को पद से हटना पड़ा. दक्षिण पंथी तख्तापलट की अटकलें तेज होने लगीं. वृहत्तर दक्षिण पंथी हलकों में एक धारणा बन रही थी कि सबसे प्रतिभाशाली नौजवान नेता लिबरल वाम फेडरल सरकार को हटा कर हार्ड-कोर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी सरकार की स्थापना के लिए किसी-न-किसी बड़ी कार्यवाही के साथ आगे आयेगा जैसा कि बस साल भर पहले मुसोलिनी ने इटली में “मार्च ऑन रोम” के रूप में किया था.
यह सपना कई और दक्षिणपंथी ताकतों का भी था. इनमें सबसे बढ़ कर बावेरिया में बर्लिन की रिपब्लिकन सरकार के प्रति घोर बैर व नफ़रत से शासन कर रही कार (बावेरिया स्टेट कमिसार ), लोस्सोव (बावेरिया सैन्य कमांडर), और साइस्सर (बावेरिया पुलिस प्रधान) की त्रिमूर्ति थी. हिटलर ने खुले आम मांग की कि बावेरिया शासकों को तुरंत कार्यवाही करनी चाहिये : “अब समय आ गया है ! आर्थिक त्रासदी हमारे लोगों को इस कदर त्रस्त कर रही है कि हमें कार्यवाही करनी ही होगी अन्यथा अपने समर्थकों के कम्युनिस्टों के पाले में चले जाने का जोखिम उठाना पड़ सकता है.” उसने उन पर दबाव डालने की हर चन्द कोशिश की मगर वे टाल-मटोल करते रहे. अब नात्ज़ी नेता साल की अपनी दूसरी दुस्साहसिक कार्यवाही में उतर पड़ा.
कार ने म्यूनिक के एक सबसे बड़े बियर हॉल बर्गरब्रौक्लेर में सारे मंत्रियों, अधिकारियों, और राजनीतिक वीवीआईपी लोगों की बैठक बुलाई थी. हिटलर ने फैसला लिया कि अगर उसके समर्थक बर्गरब्रौकेलेर पर कब्जे में सफल हो जाते हैं, उनके पास म्यूनिक के समूचे राजनीतिक वर्ग को अपने कब्जे में लेने का सुनहरा अवसर होगा. योजना यह थी कि त्रिमूर्ति के लिए बर्लिन के खिलाफ बगावत के अलावा कोई चारा न छोड़ा जाय.
ट्रकों में भर कर पहुंचे हथियारबंद एस.ए. दस्तों की पहरेदारी में अपने इलीट अंगरक्षकों के साथ हिटलर तूफ़ान की तरह बियरहॉल में घुसा, भीड़ को शांत-आतंकित करने के लिए एक गोली दागी, और उत्तेजना के चरम में घोषणा की : “राष्ट्रीय क्रांति जारी है. हॉल पूरी तरह हथियारबंद 600 लोगों के कब्जे में है. किसी को हॉल छोड़ने की इजाज़त नहीं है. अगर चीज़ें तुरंत नियंत्रण में नहीं आ जातीं, मेरे पास गैलरी पर मशीनगन तैनात है. राइक सरकार अपदस्थ कर दी गयी है. एक प्रोविजनल सरकार बना दी गयी है.”
हिटलर ने तब बन्दूक की नोक पर कार, लोस्सोव और साइस्सर को उनकी जान की सुरक्षा की गारंटी करते हुए बगल के कमरे में अपने साथ चलने को कहा. वहां उसने एक साथ धमकाते और क्षमा मांगते हुए, उनसे वचन निभाने का वादा लिया, और हॉल में लौट आया. सभी जबरदस्त गुस्से और हिकारत में थे. मगर अपने एक छोटे से भाषण से हिटलर ने पूरे हाल का माहौल बदल दिया.
इसके बाद हिटलर वापस त्रिमूर्ति के पास हॉल में आ कर सबके सामने समझौते पर मुहर लगाने के दबाव के लिए गया. भीड़ के छंटने के पहले एस.ए. कमांडो मंत्रिमंडल के सारे सदस्यों को गिरफ्तार कर चुके थे. कार, लोस्सोव और साइस्सर को भूतपूर्व जनरल लुदेन्दोर्फ़ की निगरानी में छोड़ कर हिटलर शहर के अन्य हिस्सों में विद्रोह की मदद के लिए निकल गया. मगर जनरल ने त्रिमूर्ति को इस कोरे आश्वासन के भरोसे हॉल छोड़ कर जाने की इजाज़त दे दी कि वे समझौते का पालन करेंगे. एक बार छूट जाने पर त्रिमूर्ति ने विद्रोह को दबाने के लिए सारे उपाय कर दिए. तख्तापलट असफल हो गया. हिटलर और उसके साथी गिरफ्तार कर लिए गए.
मगर इस असफल तख्तापलट ने हिटलर को लोगों के उस बड़े हिस्से के लिए “हीरो” बना दिया जो म्यूनिक और बर्लिन के शासक गुटों से पूरी तरह तंग आ चुके थे. म्यूनिक और बावेरिया के अन्य शहरों में त्रिमूर्ति के खिलाफ “गद्दारों का गुट” नारों के साथ स्वतःस्फूर्त प्रदर्शन हुए. खासकर छात्र हिटलर और उसके साथी षड्यंत्रकारियों से खासे प्रभावित थे. म्यूनिक विश्वविद्यालय में 12 नवम्बर की जन सभा में “हिटलर तुम आगे बढ़ो” और “कार का नाश हो” के जबर्दस्त नारे लगे. जब विश्वविद्यालय के डीन ने सभा में मौजूद छात्रों से जर्मन राष्ट्रीय गान गाने को कहा, उन्होंने इसके बजाय फ्राइकोर का “स्वास्तिका ऑन अ स्टील हेलमेट” गीत गाया.
मुकदमे में हिटलर और अन्य नेता देशद्रोह के दोषी पाये गए जिसकी न्यूनतम सज़ा पाँच साल के लिए जेल थी. मगर कोर्ट ने कहा कि अच्छे आचरण के आधार पर यह सज़ा सिर्फ छः महीने बाद ही मुल्तवी की जा सकती है. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि हिटलर, चूंकि अपने विचारों और भावनाओं में इस कदर जर्मन था, अत: आस्ट्रिया में संभावित देशनिकाले से मुक्त था. सजायें बेहद मामूली थी और इनकी तीखी आलोचना हुई : वाम धारा की पत्रिका दिए वेल्त्बुह्ने ने लिखा : “म्यूनिक में रिपब्लिक की न्यायिक हत्या कर दी गयी है.” वस्तुतः कोर्ट ने अपराधियों की यह कहते हुए प्रशंसा की थी कि उन्होंने परम पवित्र निःस्वार्थ इच्छाशक्ति से प्रेरित हो कर विशुद्ध देशभक्ति की भावना से काम किया था.
जेल की सज़ा हिटलर के लिए मानो वरदान बन गयी. हिटलर ने बाद में लिखा कि जेल में रह कर उसे विश्वास हो गया कि हिंसा काम नहीं आएगी क्योंकि राज्य पूरी तरह जड़ जमाये हुए है और उसके कब्जे में सारे हथियार हैं. उसने यह भी दावा किया कि इस दौरान उसे उन तमाम चीज़ों पर स्पष्टता हासिल हुई जिनको ले कर पहले उसके मन में कुछ धारणायें भर थी और इससे उसे “मेरा संघर्ष” का पहला खंड लिखने में बहुत मदद मिली. हिटलर ने लिखा कि उसे जेल में डालना सरकार का मूर्खतापूर्ण कदम था: “उनके लिए मुझे बार-बार बोलते रहने और कभी भी अपनी मानसिक शांति हासिल न कर पाने के लिए बाहर ही छोड़ देना बेहतर रहा होता.”
नात्ज़ी नेता के नायकीय अतिराष्ट्रवाद से सम्मोहित बावेरिया की सर्वोच्च न्यायालय ने पाँच साल की सज़ा को घटा कर एक साल कर दी. दिसम्बर 1924 में जेल से बाहर आने पर हिटलर ने एन.एस.डी.ए.पी. को पुनर्गठित करते हुए सारे निर्णय प्राधिकार खुद में केन्द्रित कर लिया. पार्टी मुख्यालय बर्लिन ले जाने से भी उसने यह सोच कर इनकार कर दिया कि उसकी निजी ताकत का आधार म्यूनिक होने के नाते पार्टी मुख्यालय भी यहीं होना चाहिये. आम लोगों के लिए उसने यह भावनात्मक तर्क दिया कि आखिरकार नात्ज़ीवाद की जन्मस्थली तो म्यूनिक ही है : “रोम, मक्का, मास्को – इनमें से हर स्थान एक विश्व दृष्टिकोण का द्योतक है. हम उसी शहर में रहेंगे जिसने पहले पार्टी कामरेडों को हमारे आन्दोलन के लिए अपना खून बहाते हुए देखा है. इसे ही रहना चाहिये हमारे आन्दोलन का मास्को.”
जेल से बाहर हिटलर ने परिस्थितियों को अपनी राजनीति के लिए अनुकूल नहीं पाया. 1925 से, मुद्रा के सुस्थिर हो जाने के बाद से, जर्मन अर्थव्यवस्था तेजी से सुधार रही थी. औद्योगिक उत्पादन, रोजगार, और कुछ मामलों में वास्तविक वेतन भी बढ़ने लगा था. जर्मनी सम्मानपूर्वक लीग ऑफ़ नेशन्स में शामिल किया जा चुका था और वेइमार रिपब्लिक भी मजबूत स्थिति में लग रहा था. प्रारंभिक 1920 दशक के मुकाबले एन.एस.डी.ए.पी. की राजनीतिक सक्रियता उतार पर थी और सदस्यता की गति भी बहुत धीमी थी. हिटलर ने बावेरिया सरकार से उसकी पार्टी पर से प्रतिबन्ध हटाने की अपील की. पार्टी की घटी प्रोफाइल और जनता में हिटलर की निजी साख को देखते हुए, प्राधिकारियों ने अपील मान ली. बी.वी.पी. नेता और “मिनिस्टर प्रेसिडेंट “(प्रधानमंत्री के समतुल्य) हाइनरिक हेल्ड ने कहा: “जंगली जानवर पर काबू पा लिया गया है, अब हम उसकी बेड़ियाँ ढीली कर सकते हैं.” मगर जेल से आने के बाद हिटलर का पहला ही भाषण इतना भड़काऊ था (या तो दुश्मन हमारी लाशों पर से गुजरेगा या फिर हम उसकी) कि सरकार ने उस पर सार्वजानिक सभाओं में बोलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. करीब दो साल बाद, जब पार्टी की लोकप्रियता और भी घट चुकी थी, यह प्रतिबन्ध भी हटा लिया गया.
मई 1928 के राइकस्ताग (राष्ट्रीय संसदीय) चुनावों में पार्टी की हालत बेहद बुरी थी, उसे सिर्फ 2.6% वोट मिले जो पिछले दिसंबर 1924 के चुनावों से भी कम थे. चार बुर्जुआ पार्टियों – दि सेंटर पार्टी, बीवीपी, डीडीपी, और डीवीपी के तथाकथित “महा गठबंधन” के साथ एस.पी.डी. सत्ता में आयी और हरमन मुलर चान्सलर बना.
जर्मनी का आर्थिक पुनरुत्थान 1928 के अंत तक बिखर चुका था और अगले साल की विश्वव्यापी महामंदी देश को वापस गहन संकट के भंवर में खींच लाई. फरवरी 1929 में बेरोजगारों की संख्या एक बार फिर तीस लाख पार कर गयी. कृषि उत्पादों के दाम लगातार गिर रहे थे. उत्तरी जर्मनी में किसानों ने काले झंडों के साथ प्रदर्शन किया. क्लाउस हेइम नाम के किसान के नेतृत्व में एक रेडिकल गुट ने स्थानीय टैक्स व अन्य सरकारी दफ्तरों पर बमों से हमला कर दिया. एन.एस.डी.ए.पी. की लोकप्रियता अब ग्रामीण व शहरी दोनों ही अंचलों में बढ़ रही थी. 1928 और 1929 के जर्मनी के छात्र संसदों के चुनावों में इसे भरपूर सफलता मिली. नवम्बर 1928 में म्यूनिक विश्वविद्यालय के ढाई हजार छात्रों की सभा में हिटलर के भाषण को जबर्दस्त सराहना मिली.
यह वह परिस्थिति थी जिसमे दो नितान्त विपरीत ध्रुवीय रेडिकल पार्टियां – कम्युनिस्ट और नात्ज़ी दोनों ही मध्यमार्गियों की कीमत पर तेजी से बढ़ रहीं थी.
दिसंबर 1929 के लैंडटैग चुनावों में, एन.एस.डी.ए.पी. को थुरिन्गिया में छः सीटें और 11.3% वोट मिले थे. कंजर्वेटिव और लिबरल पार्टियाँ एस.पी.डी. के बिना सरकार बनाना चाहती थीं, मगर तब इसके लिए नेशनल सोशलिस्टों के समर्थन की जरूरत थी. हिटलर ने तय किया कि पार्टी शासकीय गठबंधन में तभी शामिल होगी जब उसे दो सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय – आतंरिक और संस्कृति व जन शिक्षा मिलेंगे. हिटलर ने दो फरवरी के एक गुप्त पत्र में लिखा : “वह जिसके पास ये दोनों विभाग होंगे, और जो इनकी ताकत को निर्द्वन्द दृढ़ता के साथ इस्तेमाल करेगा, असाधारण हासिल कर सकेगा.” आतंरिक मंत्रालय से एन.एस.डी.ए.पी. को राज्य पुलिस बल पर अधिकार और सांस्कृतिक मंत्रालय से उसे राज्य के समस्त स्कूलों और शिक्षण प्रणाली पर प्रभुत्व मिल गया. जाहिर था, हिटलर की रुचि सरकार में हिस्सेदारी में नहीं, बल्कि अन्दर से राज्य की प्रशासनिक प्रणाली पर कब्जे में थी. दोनों मंत्रालयों के लिए हिटलर ने अपने बियर हॉल बगावत षड्यंत्र के साथी विल्हेम फ्रिक्क का नाम प्रस्तावित किया. शुरू में डी.वी.पी. ने किसी दूसरे नाम की मांग की, मगर हिटलर अड़ गया कि : “या तो डॉ. फ्रिक्क हमारे मंत्री होंगे या फिर नया चुनाव होगा”. मध्य-दक्षिण पार्टियों ने यह जानते हुए कि फिर से चुनाव होने पर एन.एस.डी.ए.पी. की स्थिति और भी मज़बूत हो सकती है, हिटलर के अल्टीमेटम के आगे घुटने टेक दिए.
अपने चौदह महीनों के कार्यकाल में, गठबंधन सरकार में शामिल एक सदस्यी नात्ज़ी सेना ने सूक्ष्म मगर स्पष्ट रूप से दिखा दिया कि भविष्य का राष्ट्रीय नात्ज़ी शासन कैसा होगा. अनुभवी और दक्ष नागरिक सेवकों को एस.पी.डी. से सहानुभूति रखने के शक में हटा कर उनकी जगह नात्ज़ी चमचों से भर दी गयी. प्रार्थनायें स्कूलों में अनिवार्य कर दी गयी. इसका उद्देश्य फ्रिक्क ने लैंडटैग को बताया : “लोगों को मार्क्सवाद और यहूदियों से ठगे जाने से बचाना है”! जेना विश्वविद्यालय में नस्ल विज्ञान के एक चेयर की स्थापना की गयी और वहां समूचे प्रोफ़ेसर समुदाय के वोट को नकारते हुए कुख्यात यहूदी विद्वेषी हांस ऍफ़.के गुन्थेरर को बैठाया गया. वेइमार रिपब्लिक के कला व वास्तु कला के नए डायरेक्टर और नेशनल सोशलिज्म में पूरी आस्था रखने वाले पॉल शुल्त्ज़ – नौम्बर्ग ने शहर के रॉयल म्यूजियम से कला की सारी मॉडर्निस्ट कृतियाँ हटवा दी. फ्रिक्क ने पबों में “निग्गर ज़ैज” (अफ़्रीकी-अमरीकी संस्कृति जड़ों वाला अपार लोकप्रिय संगीत रूप) प्रतिबंधित कर दिया और स्कूलों में नात्ज़ी प्रार्थना अनिवार्य कर दिया. उसने वेइमार पुलिस प्रभारी सहित पुलिस विभाग में भी सेंधमारी कर के नात्ज़ी सदस्यों को घुसाया. लगातार बढ़ती आलोचना और विरोध के चलते लैंडटैग में अविश्वास मत के जरिये फ्रिक्क को 1 अप्रैल 1931 को हटा दिया गया.
थुरिंगिया राज्य में एक महत्वपूर्ण अनुभव मिला जिसने समूचे देश पर नात्ज़ी सत्ता के काबिज होने के कुछ साल पहले नात्ज़ी शासन की प्रयोगशाला की भूमिका अदा की. आगे मार्च 1930 में मुलर सरकार गिर गयी. राइकस्ताग के सितम्बर चुनावों में एस.पी.डी. के वोट 6% लड़खड़ा गये जब कि कम्युनिस्ट के.पी.डी. को मई 1928 के मुकाबले 40% की बढ़त मिली. मगर गिनती में के.पी.डी. का उभार एस.पी.डी. की घटत की भरपायी नहीं कर सका, इसलिये उनकी संयुक्त हिस्सेदारी घट गयी जबकि नात्ज़ी वोट हिस्सेदारी में 700% की बढ़त हुई. राइकस्ताग में एन.एस.डी.ए.पी. अब नौवें स्थान से दूसरे स्थान पर आ गई.
यहाँ बेहतरीन क्रान्तिकारी परिस्थिति के इस्तेमाल के मामले में फ़ासिस्टों ने मिलिटेंट वाम को भारी अन्तर से पछाड़ दिया. मगर यह आम पैटर्न नहीं था. महज दो साल बाद, नवम्बर 1932 में, नात्ज़ी वोट उस साल की जुलाई के मुकाबले घटा और के.पी.डी. का बढ़ा. बहरहाल, कांटे की टक्कर बराबर धुर दक्षिण और क्रन्तिकारी वाम के बीच बनी रही.
नात्ज़ी शानदार सफलता के तीन बड़े राजनीतिक दुष्परिणाम निकले. पहला : नात्जि़यों को संसद में रोकने की गरज से एस.पी.डी. ने सेंटर पार्टी नेता हाइनरिक ब्रूनिंग की उस सरकार को समर्थन दिया जिसने खुद उसी की सरकार को अपदस्थ किया था. इसके चलते ब्रूनिंग सरकार अगले दो सालों तक सत्ता में बनी रही और उसके कुशासन ने हिटलर के उत्कर्ष का रास्ता बनाया.
दूसरे: पूंजीपतियों ने एन.एस.डी.ए.पी. के भविष्य को भांप लिया और उसके खजाने में योगदान देना शुरू कर दिया. इसे सुनिश्चित करने के लिए हिटलर चुनाव वाले महीने में भूतपूर्व चान्सलर और हैम्बर्ग-अमेरिका ओसियन लाइन (एच.ए.पी.ए.जी.) के चेयरमैन विल्हेम कूनो से मिला. उसने कूनो और उसके जरिये अन्य उद्योग महाबलियों को भरोसा दिलाया कि एन.एस.डी.ए.पी. उद्यमिता पहलकदमियों और निजी पूँजी का पूरा समर्थन करेगी और सिर्फ गैर-कानूनी तरीके से हासिल सम्पदा के मामलों में ही हस्तक्षेप करेगी. बावजूद इसके, उद्योगपति पार्टी के आर्थिक कार्यक्रम को ले कर सशंकित बने रहे. उनकी शंका और भी मजबूत हुई जब अगले ही महीने (अक्टूबर 1930) में एन.एस.डी.ए.पी. ने संसद में तमाम ऐसे प्रस्ताव पेश किये जो न सिर्फ यहूदी-विरोधी बल्कि वित्तीय पूँजी के भी विरोधी थे : बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण, ब्याज दर 5% पर सीमित करना, सेक्युरिटीज ट्रेडिंग पर प्रतिबन्ध आदि. ये प्रस्ताव दिखाते थे कि एन.एस.डी.ए.पी. चेयरमैन पूंजीपतियों की शंकायें मिटाने की कोशिश करने के बावजूद पार्टी के सोशलिस्ट विंग को अलगाव में नहीं डालना चाहता था. पूंजीपतियों के राजनीतिक प्रभाव को रेखांकित करते हुए हिटलर ने अपने विश्वस्त ओट्टो वेगनर से, जिसकी नजर में पूंजीपतियों से पेंग मिलाना अगर नुकसानदेह नहीं तो भी व्यर्थ जरूर था, कहा : “मैं सोचता हूँ कि हम उनके सरों पर से गुजर कर विल्हेम्स्त्रास (चान्सलर प्राधिकार) नहीं जीत पायेंगे.”
तीसरी और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात : पार्टी सदस्यता (1930 के अंत में 3,89,000 से एक साल बाद करीब 8,06,000 ) और एस.ए. सदस्यता (जनवरी 1931 में 77,000 से एक साल बाद 2,90,000 और फिर 19 अगस्त 1932 को 4,45,000) में विस्फोटक उभार के साथ नात्ज़ी बिरादराने में अब सबसे चर्चित चर्चा “अगला कदम क्या?” थी. राज्य सत्ता अभी काफी दूर लग रही थी और एस.ए. के लोगों का “कार्यवाही” – ठीक-ठीक कहें तो तख्तापलट के लिए सब्र का बाँध टूटता लग रहा था. मगर हिटलर जेल, पार्टी पर प्रतिबन्ध या उसके सार्वजनिक सभाओं में बोलने पर प्रतिबन्ध का एक और जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं था जो पार्टी के विकास के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुए थे. उसने एस.ए. के लोगों को “भेदियों और उकसावेबाजों” से सावधान रहने के लिए आगाह किया जो उन्हें कानून तोड़ने के लिये ललचा रहे थे : “हमारी वैधता राजसत्ता पर वर्तमान में काबिज लोगों के सारे कदमों को ध्वस्त और पराजित कर देगी.” मार्च 1931 की शुरुवात में म्यूनिक एस.ए. ब्रिगेड की बैठक में उसने गैर कानूनी रास्तों से लड़ने के मामले में बेहद कायर होने के आरोप का जबाब देते हुए कहा कि वह उन्हें वहां बाहर मशीनगनों से भून डाले जाने के लिए नहीं भेजना चाहता क्योंकि उसे उनकी कहीं ज्यादा जरूरी कामों, खासकर “थर्ड राइक” बनाने के लिए जरूरत पड़ेगी.
हिटलर के पास यह मानने के पर्याप्त कारण थे कि किसी भी दुस्साहसी कदम से एस.ए. और समूचे एन.एस.डी.ए.पी. पर भी प्रतिबन्ध लग सकता है. प्रेसिडेंट द्वारा जारी आपात राजाज्ञा से यह साफ मतलब निकलता था. इसलिए उसने 30 मार्च को आदेश जारी किया कि राजाज्ञा का उल्लंघन करने वाले को तुरंत पार्टी से निकल बाहर किया जायेगा. उसे एस.ए. के बर्लिन प्रधान वाल्टर स्टेन्स को पार्टी कार्यक्रमों के लिए सुरक्षा प्रदान करने से इनकार और घोर अराजक कार्यवाहियों के लिये निकालना पड़ा. स्टेन्स और उसके साथियों ने बर्लिन में बगावत की कोशिश की, मगर यह अन्य शहरों में नहीं फ़ैल सकी और चन्द दिनों में ध्वस्त हो गयी[1].
मगर यह घटना भी बर्लिन एस.ए. के अगले प्रधान काउंट वुल्फ़-हाइनरिक वॉन हेल्दोर्फ़ को 12 सितम्बर 1931, यहूदी नव वर्ष पर 500 हथियारबंद लोगों को ले कर “जागो जर्मनी, यहूदी को मरना ही होगा” चीत्कार करते हुए यहूदियों की दुकानें लूटने-नष्ट करने और यहूदी नज़र आने वालों को आतंकित-उत्पीडि़त करने से नहीं रोक सकी. गैंग लीडरों समेत कुछेक दंगाइयों पर मुक़दमे चले मगर उन्हें हल्की-फ़ुल्की सज़ा के साथ बरी कर दिया गया. हिटलर ने पार्टी के अन्दर एस.ए. नेताओं को फिर आगाह किया कि उन्हें भड़कावे में हरगिज़ नहीं आना है – उन्हें समझना ही होगा कि इस समय कानूनी रास्ता ही एकमात्र सुरक्षित रास्ता है. इसी के साथ उसने यह भी सुझाव दिया कि बड़े शहरों में “लोगों के क्रान्तिकारी मूड को सँभालने के किये एस.ए. को कुछ-न-कुछ करने की जरूरत है.” इन कार्यवाहियों में शामिल होने वाले एस.ए. नेताओं से सार्वजनिक दिखावे के तौर पर पार्टी दूरी बनाएगी, मगर उसने अपने जल्लादों को आश्वस्त किया : “निश्चिन्त रहो कि पार्टी तुम्हारी सेवाओं को नहीं भूलेगी और सही समय आते ही तुम्हें तुम्हारे पदों पर बहाल कर दिया जायेगा.”
1932 में एन.एस.डी.ए.पी. ने कई चुनावों में भागीदारी की जिनमें नतीजे ऊपर-नीचे होते रहे. पहला, मार्च का प्रेसिडेंट चुनाव था जिसमें हिन्डेन्बर्ग के खिलाफ़ हिटलर प्रमुख दावेदार था. भावी सरकार के मुखिया के रूप में खुद को पेश करने कोशिश में हिटलर ने सम्मानित व विख्यात दुसेल्दोर्फ़ के औद्योगिक क्लब में भाषण देने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया जिसमें रुर घाटी के औद्योगिक महाबली भी शामिल थे. ऐसे अवसरों पर अपनी आदत के अनुरूप वह खुले रूप से किसी यहूदी विरोधी वक्तव्य से बचता रहा. उसने यह भी आश्वासन दिया कि “रूस में लिविंग स्पेस” हासिल करने के अलावा उसके नेतृत्व में पुनरावेगित जर्मनी अपने पड़ोसियों के साथ “शांति और मैत्री” से रहेगा. मगर उसका प्रभावहीन भाषण कुछ खास प्रभाव छोड़ पाने में नाकामयाब रहा. क्रूप्प और द्यिस्बेर्ग जैसे चोटी के उद्योगपतियों ने खुल कर हिन्डेन्बर्ग का साथ दिया और हिटलर की पार्टी को अपेक्षाकृत काफी कम अनुदान मिले.
खुद हिटलर समेत सारे नात्जि़यों की आशाओं – आकलनों को ध्वस्त करते हुए निवर्तमान प्रेसिडेंट को एक करोड़ अस्सी लाख वोट मिले और हिटलर को एक करोड़ दस लाख. नात्ज़ी कतारों और समर्थकों का मनोबल इस कदर गिर गया कि कई जगहों पर स्वास्तिका झंडे आधे झुका दिए गए.
10 अप्रैल को चुनाव के दूसरे दौर की घोषणा हुई क्योंकि हिन्डेन्बर्ग बहुसंख्या वोट से जरा सा चूक गया था. हार से और भी कृतसंकल्प हो कर हिटलर ने अपना पहला “जर्मनी का उड़न दौरा” शुरू किया जो इतिहास की भी ऐसी पहली पहलकदमी थी. “जर्मनी के ऊपर हिटलर” नारा पार्टी अखबारों में चीखती हेड लाइनों के रूप में छपने लगा. यह हिटलर के न सिर्फ “सर्वव्यापी” होने का इशारा कर रहा था, बल्कि उसके सारे वर्गों और पार्टियों से ऊपर होने और आने वाले “जातीय समुदाय” के दावे को भी प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त कर रहा था. और इस बात ने कि, मौसम उड़ान के लिए चाहे जितना खराब हो, हिटलर ने कभी कोई कार्यक्रम रद्द नहीं किया, इस मिथक को मज़बूत करने का काम किया कि हिटलर वह “राष्ट्र रक्षक” था जो किसी भी खतरे से बेपरवाह अपना बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार था. हिन्डेन्बर्ग जीत तो गया मगर इस बार हिटलर को बीस लाख वोट ज्यादा मिले. मगर इस वृद्धि का एक बड़ा कारण यह भी था कि एक राष्ट्रवादी उम्मीदवार ने उसके पक्ष में अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी.
अप्रैल के अंत में प्रशिया, बावेरिया, वुर्तेम्बर्ग, और अनहाल्ट में लैंडटैग्स के लिए और हैम्बर्ग में नागरिक निकायों के लिये चुनाव हुए. हर जगह एन.एस.डी.ए.पी. ने शानदार प्रदर्शन किया. प्रशिया में, जो जर्मनी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण राज्य है, 1928 के 1.8% वोट से छलाँग लगा कर यह 36.3% वोट हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गयी. मगर सिर्फ अनहाल्ट को छोड़ कर अन्य किसी राज्य में वे अपनी ताकत को सरकार में नहीं बदल सके क्योंकि उन्होंने किसी भी गठबंधन में शामिल होने से इनकार कर दिया. यह एक अजीब स्थिति थी. एन.एस.डी.ए.पी. की अदभुत-अभूतपूर्व जीत के जश्न के बीच गोएबेल्स ने अपनी डायरी में दर्ज किया : “अब इसके बाद क्या? कुछ-न-कुछ तो करना ही होगा. हमें सत्ता हासिल करनी होगी. अन्यथा हम सब खुद को मृत्यु की विजय के हवाले कर देंगे.”
इसी बीच नात्जि़यों के लिए इस असमंजस से बाहर निकलने का रास्ता बनता दिखायी देने लगा. मध्यमार्गी चान्सलर और धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी प्रेसिडेंट के बीच राजनीतिक मतभेद तीखे होने लगे थे. प्रेसिडेंट के अनुसार ब्रूनिंग एस.ए. दंगाइयों के खिलाफ तो कठोर कार्यवाही कर रहा था (उसने नात्ज़ी पैरामििलट्री यूनिटों को भंग करने के लिए आपात राजाज्ञा जारी करने का दबाव डाला था) मगर 'कम्युनिस्ट खतरे' के प्रति चुप था. इसलिए उसने चान्सलर से तत्काल केबिनेट पुनर्गठन के जरिये दक्षिणपंथी वर्चस्व बनाने की इच्छा जताई. चान्सलर, जो खुद प्रेसिडेंट और मििलट्री हाईकमान की शक्ति को संसद के अधिकार क्षेत्र की कीमत पर लगातार बढ़ाते रहने का जिम्मेदार था, अन्ततः निरंकुशता के इस दबाव के आगे झुक गया और मई के अंत में इस्तीफ़ा दे दिया. फ्रान्ज़ वॉन पापेन नया चान्सलर बना.
एस.ए. पर प्रतिबन्ध सरकार के काफी लोगों को रास नहीं आया जो इन हथियारबंद गिरोहों में जर्मनी की सैन्य ताकत के पुनर्निर्माण की जबरदस्त सम्भावना देख रहे थे. इनमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली रक्षा मंत्री जनरल कुर्ट वॉन श्लाइकर था जो हिन्डेन्बर्ग की ही तरह यह मानता था कि एन.एस.डी.ए.पी. से डील करने का सही तरीका उसे शासकीय गठबंधन में ला कर नकेल डालने की कोशिश करने का है. उसने हिटलर से गुप्त मुलाकात कर के गठबंधन में शामिल होने या कम से कम इसका विरोध न करने के लिए राजी कराने की कोशिश की. हिटलर गठबंधन में शामिल होने से इनकार करते हुए, पापेन के नेतृत्व वाली अपेक्षाकृत ज्यादा दक्षिणपंथी अंतरिम कैबिनेट के साथ “सकारात्मक सहयोग” (आज के अर्थों में बाहर से समर्थन) के लिए सहमत हो गया. इसके लिए उसकी शर्तें जल्द से जल्द नए चुनाव कराने और एस.एस. पर से प्रतिबन्ध हटाने की थीं जिनके लिये उसे पूरा आश्वासन मिला. हिटलर की बांछें खिल गयीं, उसने अपने हाथ भी नहीं बंधने दिए और इसके बावजूद उसके पास सारे तुरुप के पत्ते थे. हिन्डेन्बर्ग और पापेन ने अपना आश्वासन पूरी तरह से निभाया. राइकस्ताग को 4 जून को भंग करके 31 जुलाई नए चुनाव की तिथि घोषित कर दी गयी. 16 जून को एस.ए. पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया. ब्राउनशर्ट्स दंगाई, जो दो महीने पहले प्रतिबन्ध लग जाने के बावजूद किसी तरह के दमन या गिरफ्तारी न होने के चलते, छद्म वैध रूप से अपनी कार्यवाहियां संचालित कर रहे थे, प्रतिबन्ध हटने के बाद अब अपने असली रंग में आ गए. हिंसा अकल्पनीय रूप से बढ़ने लगी; फासिस्ट अब रोज सड़कों पर खूनी खेल खेल रहे थे.
“फ़ासिस्ट तानाशाही की स्थापना से पहले, बुर्जुआ सरकारें आम तौर पर कई सारे प्राथमिक स्तरों से गुजरती हैं और ऐसे तमाम प्रतिक्रियावादी कदम उठाती हैं जो फ़ासीवाद के सत्ता तक पहुँचने में सीधे मददगार होते हैं. जो भी इन तैयारी के स्तरों पर बुर्जुआ के प्रतिक्रियावादी कदमों और फ़ासीवाद के विकास के खिलाफ नहीं लड़ता है, वह फ़ासीवाद की विजय को रोक सकने की स्थिति में नहीं होता, बल्कि इसके उलट इस विजय में मददगार होता है.”
– ज्यार्जी दिमित्रोव
कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल की सातवीं विश्व कांग्रेस के लिए रिपोर्ट ,
अगस्त 1935
जुलाई में प्रशिया की सोशल डेमोक्रेटिक सरकार भंग करने के बाद सैन्य आपात काल लागू करके संसदीय जनतंत्र पर दूसरा बड़ा हमला किया गया. इसके लिए नात्ज़ी हथियारबंद गिरोहों और मजदूरों के बीच हाल की झड़पों का हवाला दे कर कानून-व्यवस्था की असफलता और राज्य विधायिका में बहुमत खो देने का बहाना बनाया गया. पापेन ने खुद को प्रशिया का राइक कमिश्नर नियुक्त कर लिया. एस.पी.डी. से सड़कों पर जबदस्त प्रतिरोध में उतरने की उम्मीद थी : आखिरकार उसकी सरकार को अपदस्थ कर दिया गया था, और
1932 भारी अस्थिरता, अनिश्चितता और उथल-पुथल का साल बनता जा रहा था. जुलाई अंत के चुनावों के लिये गोएबेल्स ने नारे दिए : “जर्मनी जागो! एडोल्फ़ हिटलर को ताकत दो” और “इस व्यवस्था, इसकी पार्टियों और इसके प्रयोगों का नाश हो”. अपने भाषणों में हिटलर वेइमार “व्यवस्था” को आम आर्थिक और राजनीतिक पतन-पराभव के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए “पार्टियों के भाई-भतीजावाद” से मुक्ति दिलाने के वादे करता था. अपनी एक अंतिम चुनावी सभा में वह दहाड़ा : वह “इन तीसों पार्टियों को जर्मनी से बुहार फेंकेगा”. यह एक पार्टी तानाशाही का स्पष्ट संकेत था. हिटलर ने दावा किया कि नात्जि़यों का लक्ष्य संसद की सीटें या मंत्री पद नहीं बल्कि “जर्मन जनता का भविष्य” था. एन.एस.डी.ए.पी. खुद को किसी विशिष्ट हित अथवा जनता के किसी खास वर्ग की पार्टी के रूप में नहीं बल्कि “जर्मन जनता की पार्टी” के रूप में पेश करती थी. इस बार वह शायद लिबरल मध्य वर्ग के वोट बटोरने की गरज से जान-बूझ कर तीखे नफ़रत भरे यहूदी विरोध के प्रलापों से बचता रहा (ठीक हमारे अपने हिटलर की तरह, जो कभी-कभी मुस्लिम वोटों की गोलबंदी के लिए हाथ आजमाता रहता है).
नतीजे शानदार थे. 37.3% वोट हिस्सेदारी (14 सितम्बर राइकस्ताग चुनाव से 19% ज्यादा) और 230 सीटों के साथ एन.एस.डी.ए.पी. सबसे बड़ी संसदीय पार्टी थी. बावजूद इसके सरकार बनाने के लिए पचास फ़ीसदी से ज्यादा वोट अभी दूर की कौड़ी थी. गठबंधन सरकार बनाने की एक चक्र वार्ता असफल रही क्यों कि हिटलर खुद के चान्सलर बनने पर अड़ा हुआ था जब कि राइक प्रेसिडेंट एन.एस.डी.ए.पी. के समर्थन के लिए उत्सुक होने के बावजूद हिटलर को चान्सलर बनाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था. ऐसे में नयी सरकार नहीं बन सकी और हिन्डेन्बर्ग ने पापेन को “प्रेसिडेंशियल सरकार” के चान्सलर के रूप में शासन चलाने को कहा.
गतिरोध लम्बा होते जाने के साथ “स्टॉर्म ट्रूपर्स” के सब्र का बाँध टूटने लगा. हिटलर के इस आश्वासन को पूरी तरह से झुठलाते हुए कि वे कानूनी रास्ते से तनिक भी इधर-उधर नहीं होंगे, एस.ए. ने अगस्त में के.पी.डी. सदस्यों, ट्रेड यूनियन भवनों, वामपंथी अखबारों, राइक ध्वज, और यहूदी बस्तियों के खिलाफ बर्बर उन्मादी राजनीतिक ख़ूनी खेल खेलना शुरू कर दिया. वर्दीधारी एस.ए. गुंडों के गिरोह ने पोटेम्पा के एक के.पी.डी. कार्यकर्ता और खनन मजदूर को रात में बिस्तर से घसीट कर उसकी मां और भाई के सामने मार डाला. हिटलर ने शांति और क़ानूनवाद का अपना मुखौटा नोच कर फेंकते हुए हत्यारों को खुला समर्थन-संरक्षण दिया.
सत्ता के लिए अन्धी-भूखी दक्षिणपंथी पार्टियाँ इन हत्याओं – दंगों को छिटपुट उन्मादी तत्वों के काम के रूप में देखते हुए (जैसे एस.ए. का नात्ज़ी परिवार से कोई रिश्ता था ही नहीं!) दक्षिणपंथी महागठबंधन की गणित में लगी रहीं. बावजूद इसके कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा था. न तो पापेन नेशनल सोशलिस्टों को सरकार के साथ गठबंधन में लेने में कामयाब हो रहा था और न ही हिटलर के चान्सलर बनने की दिशा में कोई प्रगति हो पा रही थी जो उसकी तानाशाही सत्ता के लिए प्रस्थान मंच था. ऐसे में, जब किसी पार्टी के पास जरूरी बहुमत संख्या नहीं थी, एकमात्र विकल्प दुबारा चुनाव करने का था. मगर हिन्डेन्बर्ग-पापेन सरकार इसे “राज्य की आपात स्थिति में असाधारण उपायों की जरूरत” बता कर अनिश्चित काल तक टालती गयी. राइकस्ताग जुलाई चुनावों के बाद पहली बार 12 सितम्बर 1932 को बैठी.
कार्यवाही शुरू होने से पहले, के.पी.डी. डेपुटी अर्नेस्ट तोर्गलर ने सदन के फ्लोर पर कब्ज़ा करते हुए उसकी पार्टी द्वारा लाये गए मोशन प्रस्ताव पर तत्काल वोटिंग की मांग की जिसमें सरकार के आपात उपायों को ख़ारिज करने और पापेन सरकार के प्रति अविश्वास की बातें शामिल थीं. सबको सकते में डालते हुए नात्जि़यों ने इस कम्युनिस्ट प्रस्ताव का समर्थन किया. हिटलर का मकसद सब को यह दिखाना था कि पापेन सरकार के पास कितना कम संसदीय समर्थन था. एस.डी.पी. और मध्य पार्टी ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया और यह भारी बहुमत से पारित हो गया. पापेन संसद भंग करने पर मजबूर हो गया. नए चुनावों की तारीख़ 6 नवम्बर घोषित हुई.
द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत के पहले तक जर्मनी के लिए अंतिम स्वतंत्र चुनाव बनने जा रहे इस चुनाव के लिए नात्ज़ी प्रचार अभियान दो केन्द्रित बिंदुओं का अजीब मिश्रण था. एक ओर, जुलाई अभियान से बिलकुल उल्टा रुख लेते हुए, हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ जबरदस्त विषवमन करते हुए इस प्रलाप को सरकार विरोधी रंग देने की कोशिश की. उसने आरोप लगाया कि पापेन के आर्थिक कार्यक्रम को यहूदी बैंकर जैकब गोल्डस्मिथ ने यहूदी हितों के लिए तैयार किया था. दूसरी ओर, इस बार का नात्ज़ी प्रचार अभियान असाधारण रूप से पूंजीपति-विरोधी तेवर भी लिए हुए था (गोएबेल्स ने अपने डायरी में लिखा : “ठीक अभी, सबसे रेडिकल सोशलिज्म सामने लाया जाना है”). संभवतः ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि महामंदी अपना भयावह रूप दिखा रही थी और श्रमशील जनता व मध्यम वर्ग में पूंजीपति –विरोधी भावना अपने चरम पर थी. बर्लिन के प्रभारी पार्टी नेता के रूप में गोएबेल्स ने सुनिश्चित किया कि चुनाव से कुछ दिनों पहले शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट मजदूरों की हड़ताल का एन.एस.डी.ए.पी. समर्थन करे. कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले “रिवोल्युशनरी यूनियन अपोजिशन (आर.जी.ओ.) के साथ नात्ज़ी फैक्ट्री सेल ऑर्गनाइजेशन (एन.एस.बी.ओ.) ने पिकेट बना कर बर्लिन के परिवहन संचार को पूरी तरह जाम कर दिया.
इस तरह नात्जि़यों ने समाज के हर हिस्सों-वर्गों को लुभाने के लिए अपने सारे टोटके-तरीके आजमाए. मगर नतीजा जुलाई से भी निराशाजनक निकला. नवम्बर चुनावों से उनके बीस लाख वोट कम हो गए, वोट हिस्सेदारी 4.2% घट कर 33.1% पर आ गयी और सीटें 230 से घट कर 196 रह गयीं. डी.एन.वी.पी. के साथ इस चुनाव के बड़े विजताओं में के.पी.डी. भी थी जिसकी वोट हिस्सेदारी 14.5% से बढ़ कर 16.9% और सीटें 100 हो गयीं. एस.पी.डी. की 21.58% वोट भागीदारी के साथ दोनों वाम पार्टियाँ मिल कर नात्जि़यों से कहीं आगे थीं. सीटों के मामले में भी 584 सीटों वाली संसद में दोनों की कुल 233 सीटें नात्जि़यों के 196 से ज्यादा थी. मगर वाम पार्टियों ने मिल कर इस ऐतिहासिक अवसर का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया जो उन्हें फिर कभी भविष्य में नहीं मिलने वाला था.
नवम्बर के धक्के के बाद थुरिन्गिया का 4 दिसंबर, 1932 का चुनाव नात्जि़यों के लिए एक और भारी धक्का बन कर आया. जुलाई के मुकाबले इस बार करीब 40% वोट कम हो गए और इसे हिटलर की निजी पराजय के रूप में देखा गया क्यों कि उसने खुद इसके प्रचार अभियान का निर्देशन-संचालन किया था. इन लगातार असफलताओं से जर्मनी और बाहर भी कई राजनीतिक प्रेक्षक-विश्लेषक यह नतीजा निकालने लगे कि सारी ताकत हथियाने की हठधर्मी में हिटलर की बस छूट गयी थी. ब्रिटिश राजनीतिशास्त्री और लेबर राजनीतिज्ञ हेरोल्ड लास्की ने फब्ती कसी कि हिटलर के जीवन का अंत बावेरिया के किसी गाँव में एक बूढ़े के रूप में होगा.
पार्टी के अन्दर भी ऐसा सोचने वाले कम नहीं थे. पहली बार, पार्टी सदस्यता अगस्त 1932 में 4,55,000 से घट कर अक्तूबर में 4,35,000 हुई और घटने का यह क्रम जारी रहा. देश भर से हताशा और शिकायतों की खबरें आ रही थीं. शीर्ष नेतृत्व के अन्दर, ग्रेगोर स्त्रास्सेर ने, जिसने 1925 में गोएबेल्स के साथ पार्टी कार्यक्रम में राष्ट्रवाद के सापेक्ष समाजवादी धारा को मजबूत करने के अभियान में मुख्य भूमिका निभाई थी, एक राजनीतिक बहस की शुरुवात की (बॉक्स देखें).
स्त्रास्सेर विवाद ने एन.एस.डी.ए.पी. को एक और तगड़ा झटका दिया. पार्टी अपने कैरियर के चरम उत्कर्ष से अतल गहराई की ओर भयावह गति से गिरती लग रही थी. मगर हिटलर अपने जिद पर अड़ा रहा. वह “पूरी तरह दृढ़” था कि “अपने आन्दोलन के पहले बच्चे को किसी सरकार में शक्तिविहीन हिस्सेदारी की भीख के लिए नहीं बेचेगा”. आगे क्या? का सवाल अनसुलझा बना रहा. साल 1933 की शुरुवात नितान्त निराशा में हुई.
नवम्बर की चुनावी हार के बाद, ग्रेगोर स्त्रास्सेर ने मत व्यक्त किया कि पार्टी को अपनी चान्सलर पद की अड़ियल पूर्वशर्त छोड़ कर विरोध पक्ष से सरकार में जाने की दिशा लेनी चाहिये. उसने हिटलर से यह बात बिलकुल साफ़-साफ़ शब्दों में कही. हिटलर ने इसे अपने प्राधिकार की चुनौती के रूप में लिया और इसके अनुरूप अपनी विषाक्त प्रतिक्रिया दी. गोएबल्स के अनुसार हिटलर स्त्रास्सेर से उसकी ताकत छीनना चाहता था, मगर यह आसन काम नहीं था. राइक का सांगठनिक डायरेक्टर होने के नाते स्त्रास्सेर का पार्टी कार्यकर्ताओं-कतारों में काफी सम्मान था : वह जर्मन उद्योगपतियों की दृष्टि में भी ऐसे गिने-चुने नेशनल सोशलिस्टों में था जिससे कोई बिजनेस की बात कर सकता था.
राइकस्ताग के पहले सत्र की पूर्व संध्या पर, हिटलर ने एन.एस.डी.ए.पी. डेपुटियों को इस तर्क के साथ कड़ा रुख अपनाने का आदेश दिया कि : “हमारा महान आन्दोलन कभी विजयी नहीं हुआ होता अगर हमने समझौते की ढलान का रास्ता लिया होता”. स्त्रास्सेर ने अपने स्तर पर एन.एस.डी.ए.पी. स्टेट इंस्पेक्टरों को बुला कर तर्क दिया कि हिटलर 1932 से ही सिवाय अपने “किसी भी कीमत पर चान्सलर बनने के” और कोई “साफ़ लाइन” ले ही नहीं रहा है. चूंकि ऐसा हो सकने की सचमुच कोई सम्भावना नहीं थी, हिटलर आन्दोलन को बिखराव और पतन के खतरे की ओर ले जा रहा था. स्त्रास्सेर के अनुसार सत्ता की ताकत हासिल करने के दो रास्ते थे : कानूनी- जिसके लिए हिटलर को वाईस-चान्सलर का पद स्वीकार कर के उसे एक राजनीतिक लाभकारी हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहिये था. और दूसरा रास्ता, गैर-कानूनी-जिसके लिए एस.एस. और एस.ए. की मदद से बल पूर्वक सत्ता दखल करना होगा. वह अपने फ्यूहरर का दोनों ही रास्तों पर अनुसरण करने के लिए तैयार था, मगर अब अनन्त काल तक इंतज़ार नहीं कर सकता. इसलिए उसने व्यथित श्रोताओं को बताया कि वह पार्टी छोड़ने जा रहा था.
इस बैठक की खबर मिलने पर, हिटलर अपने होटल के सुइट में स्टेट इंस्पेक्टरों से स्त्रास्सेर के तर्कों की काट के लिए मिला. उसने कहा कि वाईस – चान्सलर बनने पर उसे जल्दी ही पापेन के साथ मूलभूत विभेदों में आ जाना होता जो उसकी ओर से ली जाने वाली हर पहलकदमी को रद्द कर के दिखाता कि हिटलर शासन करने में अक्षम है. “मैं इस रास्ते पर उतरने से इन्कार करता हूँ और तब तक इंतजार करना बेहतर समझता हूँ जब तक कि मुझे चान्सलर पद का प्रस्ताव नहीं मिल जाता” हिटलर ने आगे कहा “वह दिन आयेगा और शायद जितना हम सोच रहे हैं, उससे जल्दी आयेगा”. उसने इंगित किया कि गैर कानूनी रास्ता और भी निष्प्रयोज्य था क्योंकि हिन्डेन्बर्ग और पापेन सेना को गोली मारने का आदेश देने में तनिक भी नहीं हिचकिचायेंगे. अपने आग्रह और मेलोड्रामा की समूची क्षमता का इस्तेमाल करते हुए, हिटलर अन्ततः स्टेट इंस्पेक्टरों की स्वामिभक्ति अपने साथ बनाये रखने में सफल हुआ.
परदे के पीछे से एक और योजना पर काम चल रहा था. स्त्रास्सेर की हैसियत को जानते हुए पापेन के अधीन सरकार के भूतपूर्व रक्षामंत्री और वर्तमान राइक चान्सलर जनरल श्लाइकर ने एन.एस.डी.ए.पी. के माडरेट तत्वों का सरकार बनाने के लिए स्त्रास्सेर की अगुवाई में समर्थन जुटाने की कोशिश की. उसने स्त्रास्सेर को हिन्डेन्बर्ग से मिलवाया जिसने इस विचार से सहमति दी. मगर स्त्रास्सेर अपने साथियों से किसी भी तरह का समर्थन जुटा पाने में विफल रहा. श्लाइकर का खेल पिट गया.
हिटलर को स्त्रास्सेर की हिन्डेन्बर्ग के साथ गुप्त बैठक की जानकारी हुई और उसकी अपने खिलाफ साजिश की आशंका की पुष्टि हो गयी. चारों तरफ से अपने को घिरा पा कर स्त्रास्सेर ने सारे पार्टी पदों से इस्तीफ़ा दे दिया, राइकस्ताग डेपुटी की अपनी जगह छोड़ दी, और अगले दो सालों तक किसी भी राजनीतिक गतिविधि से दूर रहने का वादा किया. वह पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया. ठीक 30 जून 1934 को – लम्बे छुरों की रात में, हिटलर स्त्रास्सेर को गोलियों से भुनवा कर अपने सबसे संभावनामय आतंरिक प्रतिद्वन्दी का काम तमाम कर देगा.
अचानक एन.एस.डी.ए.पी. को सुरंग के अंत पर रोशनी नज़र आयी. 30 जनवरी 1933 को 43 साल की राजनीतिक रूप से कम उम्र में हिटलर मध्य यूरोप के सबसे ताकतवर देश का चान्सलर बन गया. के.पी.डी. ने आम हड़ताल का आह्वान किया और एस.पी.डी. व सारी ट्रेड यूनियनों से फासीवाद के खिलाफ साझा प्रतिरोध मोर्चे में शामिल होने का आग्रह किया. सोशल डेमोक्रेटों ने हड़ताल में शामिल होने के बजाय अपने सदस्यों को संवैधानिक सीमाओं के अन्दर ही लड़ाई जारी रखने और “अनुशासनहीन व्यवहार” से दूर रहने का निर्देश दिया. बच-बचा कर रहने की इस नीति के अनुरूप जनरल जर्मन ट्रेड यूनियन एसोसियेशन के चेयरमैन थियोडोर लेइपर्ट ने 31 जनवरी को कहा : “इस पल की जरूरत प्रदर्शन नहीं, संगठन है”. कहना न होगा कि हड़ताल तो दूर, इस बुरी तरह विभाजित वाम की ओर से कोई भी उल्लेखनीय प्रतिरोध नहीं खड़ा किया जा सका.
मगर यह “अनहोनी अवसर” संभव हुआ कैसे ? वास्तव में यह परदे के पीछे चल रहे उस निकृष्टतम खेल का उत्पाद था जिसे मुट्ठी भर घाघ नेता, खास कर, डी.एन.वी.पी. नेता अल्फ्रेड हुगेनबर्ग, भूतपूर्व चान्सलर पापेन, और निवर्तमान चान्सलर श्लाइकर खेल रहे थे[1]. पापेन, ''किंग मेकर'' बन कर असल ताकत अपने हाथों में बनाये रखने की महत्वाकांक्षा में हिटलर से मिला और वैमनस्य भुला कर श्लाइकर की जगह लेने की डील का आग्रह किया. हिटलर के लिए पापेन के साथ यह डील गतिरोध से निकल कर अपने चिर-वांछित लक्ष्य तक पहुँचने का अवसर था. वह जनता था कि इस भूतपूर्व चान्सलर की प्रेसिडेंट के साथ गहरी छनती है और वह हिटलर को चान्सलर बनाने में हिन्डेन्बर्ग की हिचक तोड़ने में मदगार हो सकता है. इसलिए वह इस अवसर का इस्तेमाल करने से हिचकिचाया नहीं.
गुप्त योजना काम कर गयी. तमाम तरफ से और तमाम कारणों को ले कर हमलों की बौछार में जल्दी ही श्लाइकर ने हिन्डेन्बर्ग का भरोसा खो दिया और पापेन के लगातार उकसावे में प्रेसिडेंट ने श्लाइकर को बर्खास्त कर के अपने विश्वस्त भूतपूर्व चान्सलर को नयी सरकार के गठन का रास्ता तलाशने को कहा. पापेन ने बड़ी मुश्किल से, अन्ततः हिन्डेन्बर्ग को हिटलर को चान्सलर बनाने के लिए इस शर्त पर राजी करा ही लिया कि एन.एस.डी.ए.पी. नेता अपनी सरकार “संविधान के दायरे में और राइकस्ताग (संसद) की सहमति से” बनाएगा. पापेन और हिटलर ने अब अपनी डील को अंतिम रूप देने में तनिक भी देर नहीं की. यह तय हुआ कि एन.एस.डी.ए.पी. को चान्सलर और केवल दो मंत्री पद मिलेंगे और पापेन वाईस चान्सलर बनेगा.
जाहिर तौर पर यह नात्ज़ी पक्ष से बहुत बड़ी छूट थी जिसे ग्यारह सदस्यों की कैबिनेट में केवल दो मंत्रियों से संतोष करना था. अपने भारी बहुमत के साथ, हिटलर के कंजर्वेटिव साझीदारों को भरोसा था कि वे हिटलर को अपनी कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर लेंगे. जब एक परिचित ने पापेन को हिटलर की सत्ता की भूख के प्रति आगाह किया तो उसने जबाब दिया : “तुम गलत हो. हम लोगों ने उसे अपने मतलब के लिये फंसाया है.” बहुतेरे घरेलू और विदेशी विश्लेषकों का भी मानना था कि पापेन और आर्थिक मंत्री के रूप में ह्युगेन्बर्ग के हाथों में ही, हिन्डेन्बर्ग के समर्थन-सहयोग से, जिसकी हिटलर के लिए हिकारत और पापेन के साथ नजदीकी जग जाहिर थी, असली सत्ता की कमान रहेगी.
सितम्बर 1930 के चुनावी नतीजों ने तुरंत एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी. बुर्जुआ पार्टियों और अर्थव्यवस्था के कप्तानों दोनों को ही अचानक एक ऐसी पार्टी एन.एस.डी.ए.पी. का सामना करना था, जो 8 लाख वोटर संगठन से उछाल ले कर साठ लाख की संगठित राजनीतिक ताकत और दूसरी सबसे बड़ी ताकतवर पार्टी बन चुकी थी. एन.एस.डी.ए.पी. अब एक ऐसी ताकत थी जिसे नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता था. मगर इतनी ही महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह ऐसी ताकत थी जो संसदीय अवरोधों – बाधाओं से पार पा कर प्रभुत्व के तानाशाही रूप में “कानूनी” तौर पर संक्रमण की बिलकुल नयी, आश्चर्यजनक, और स्वागत योग्य संभावनायें भी जगा रही थी.
… मगर इसकी संभावित भूमिका और वह नेतृत्व जिसकी अगुवाई में इसे अंजाम दिया जाना था, प्रतिद्वन्दी दावेदारियों की उलझन में था ... इस मामले को सरल करने के लिये चार प्रमुख गुटीय रणनीतियाँ हो सकती थीं :
1: अल्फ्रेड ह्युगेन्बर्ग और उसकी पार्टी (डी.एन.वी.पी.) और इसके साथ खड़े भारी उद्योग व भूस्वामी अभिजात्यों के समूहों ने राइक प्रेसिडेंट पॉल वॉन हिन्डेन्बर्ग पर भरोसा करते हुए, जोर दे कर एन.एस.डी.ए.पी. को जनता को लुभाने वाले जूनियर भागीदार के रूप में साथ ले कर गठबंधन बनाने का दबाव बनाया. दूसरे शब्दों में एक ऐसा गठबंधन, जिसमें ह्युगेन्बर्ग की पार्टी का बुर्जुआ खेमे में वर्चस्व और “राष्ट्रीय तानाशाही” पर नेतृत्व सुनिश्चित होता और जिसकी चरम परिणति अपने काल क्रम में राजशाही की पुनर्स्थापना में होती.
2: मध्य पार्टी (ब्रूनिंग)और भारी उद्योग, केमिकल, इलेक्ट्रिकल उद्योग, निर्यात क्षेत्र और इनके वित्त पोषक बैंकर भी सरकार बनाने के गठबंधन में एन.एस.डी.ए.पी. को जीतना चाहते थे. एन.एस.डी.ए.पी. के समर्थन-सहयोग से उन्हें वेइमार जनतंत्र से एक ऐसे अधिनायकवादी तंत्र की ओर बढ़ने की उम्मीद थी जो भी आगे चल कर लम्बे दौर में राजशाही की पुनर्स्थापना तक पहुँचती.
3: इन रणनीतियों के विपरीत, उद्योगपतियों और बैंकरों के एक अन्य समूह – जो अमेरिकी वित्तीय पूँजी के साथ गहरे जुड़ा हुआ था, के प्रवक्ता-हेमर शास्त और फ्रिट्ज हीसेन हिटलर को किसी भी पुरानी बुर्जुआ पार्टी के मातहत करने के पक्ष में नहीं थे. इसकी जगह उन्होंने हरमन गोरिंग का इस्तेमाल करते हुए, जो उनके और एन.एस.डी.ए.पी. के बीच की कड़ी थी, हिटलर पर सरकार में शामिल होने की पूर्वशर्त के रूप में चान्सलर पद के लिए अड़ने का दबाव बनाया. (गॉसवेइलेर इसके दो पन्नों बाद जोड़ता है...). … शास्त और हीसेन दोनों … को ही डर था कि अपनी पार्टी में गिरावट के संकेत देखते हुए, श्लाइकर और स्त्रास्सेर जैसों के प्रभाव में हिटलर कहीं समझौता समाधान के लिए राजी न हो जाये. इसलिए वे अंतिम निर्णायक सफल नतीजे के प्रति हिटलर का आत्मविश्वास जगाये-बनाए रखने के लिए लगातार वह सब कुछ जो संभव था, करते रहे.
4: जनरल कुर्ट वोन श्लाइकर एन.एस.डी.ए.पी. के सांगठनिक प्रभारी ग्रेगोर स्त्रास्सेर के साथ दिसंबर 1932 में उसकी हत्या हो जाने तक सैन्य तानाशाही स्थापित करने का प्रयास करता रहा.
कुर्ट गॉसवेइलेर
मगर जल्दी की इन सारी उम्मीदों पर तुषारापात हो गया. यह किसी औपचारिक-आधिकारिक पार्टी गठबंधन की सरकार न हो कर प्रेसिडेंट द्वारा नियुक्त मंत्रिमंडल था जिसमें (पापेन और ह्युगेन्बर्ग को छोड़ कर) बाकी सब बिना पार्टी सम्बद्धता अथवा राजनीतिक अनुभव वाले भानुमती के कुनबे से थे. दूसरे, कैबिनेट के अन्य सदस्यों का हिटलर की शातिर धूर्तता और मिथ्यवादिता से कोई मुकाबला ही नहीं था. चन्द हफ़्तों में ही हिटलर ने हिन्डेन्बर्ग की नज़र में वह जगह ले ली जो पापेन की हुआ करती थी और सभी की पीठें दीवार से लग चुकी थीं. गृह मंत्री के रूप में विल्हेल्म फ्रिक और बिना विभाग के मंत्री के रूप में हरमन गोएर्रिंग (आगे अपने क्रम में जिनकी संख्या बढ़ती ही जायेगी) के साथ नात्ज़ी त्रिमूर्ति अब थुरिंगिया प्रयोग को व्यापक राष्ट्रीय पैमाने पर दुहराने के लिए पूरी तरह तैयार थी.
30 जनवरी 1933 को हिटलर ने शपथ ली, और पाँच घंटों के अन्दर वह गुप्त रूप से कैबिनेट की बैठक कर रहा था. कैबिनेट को राइकस्ताग में बहुमत नहीं हासिल था और इसका समाधान निकाला जाना था. ह्युगेन्बर्ग ने के.पी.डी. को प्रतिबंधित कर उसकी सीटें आपस में बाँट कर बहुमत बनाने का सुझाव दिया. हिटलर कहीं ज्यादा चतुर राजनीतिज्ञ था; वह अपना शासन ऐसे भयावह कदम के साथ नहीं शुरू करना चाहता था. उसने कैबिनेट से कहा कि कम्युनिस्टों पर प्रतिबन्ध घरेलू अशांति और शायद आम हड़ताल का भी कारण बन सकता है. उसने कहा : “के.पी.डी. के पीछे साठ लाख लोगों को प्रतिबंधित करना असंभव से कम नहीं है. मगर शायद हम (पूरी कैबिनेट) राइकस्ताग को भंग करने के बाद अगले चुनाव में वर्तमान सरकार के लिए बहुमत हासिल कर सकते हैं.” अपने कंजर्वेटिव साझीदारों की आशंका दूर करने के लिए उसने भरोसा दिलाया कि अगर उसकी अपनी पार्टी चुनाव में बहुत बेहतरीन प्रदर्शन करती है तब भी कैबिनेट की संरचना में कोई बदलाव नहीं होगा. तब यह हिटलर नहीं बल्कि पापेन था जिसने एक रेडिकल सुझाव दिया. वाईस चान्सलर ने घोषित किया : “यह बात पूरी तरह साफ़ हो जानी चाहिये कि अगला चुनाव आखिरी चुनाव होगा जिसके बाद संसदीय व्यवस्था की और वापसी की सम्भावना हमेशा के लिए समाप्त कर दी जाएगी.” हिटलर ने ख़ुशी से इस प्रस्ताव का समर्थन यह कहते हुए किया कि निश्चय ही आगामी राइकस्ताग चुनाव अंतिम होगा और संसदीय जनतंत्र की ओर वापसी को किसी भी कीमत पर रोका जायेगा. प्रतिक्रियावादी सत्ता लोलुपों की समूची जमात की जनतंत्र, कम्युनिज्म, और जनता के अपने प्रतिनिधियों को चुनने के अधिकार को नकारने की सम्पूर्ण आम सहमति के साथ पहली बैठक बेहद ख़ुशगवार माहौल में समाप्त हुई.
1 फ़रवरी 1933 की प्रेसिडेंशियल राजाज्ञा ने नए चुनावों की तारीख 5 मार्च, 1933 घोषित कर दी. असली मकसद छुपाते हुए निर्णय का कारण “जर्मन जनता को राष्ट्रीय एकजुटता की नयी सरकार बनाने में अपना मत देने का अवसर” देना बताया गया. गोएबेल्स ने 3 फ़रवरी को अपनी डायरी में लिखा : “... अब हम राज्य के सारे संसाधनों को अपने काम पर लगा सकते हैं. रेडियो और प्रेस हमारे डिस्पोजल पर हैं. हम प्रोपेगैंडा का शानदार खेल खेलेंगे. और इस बार, स्वाभाविक रूप से, पैसे की कोई कमी नहीं होगी.”
उसी दिन देश ने सार्वजनिक प्रसारण पर चान्सलर के मन की बात सुनी. उसने अपने नवम्बर 1918 के जनतांत्रिक “विश्वासघात” और वेइमार रिपब्लिक के खिलाफ अपने पारम्परिक हमलों (मार्क्सवाद के चौदह सालों ने जर्मनी को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया है) के साथ रूढ़िवादी, क्रिश्चियन, राष्ट्रवादी मूल्यों और परंपराओं को जोड़ा. हिटलर ने कहा कि उसकी सरकार का पहला काम वर्ग वैमनस्य और टकराहटों पर काबू पा कर “भावना और इच्छाशक्ति में हमारे लोगों की एकता” को पुनर्स्थापित करना है. हिटलर ने आगे कहा, ईसाइयत “हमारे मूल्यों का आधार”, “परिवार” लोगों और “राज्य” के रूप में हमारी आंगिकता की आधारभूत कोशिका” और “हमारे महान अतीत” के प्रति सम्मान जर्मनी की युवा पीढ़ी के लिए शिक्षा की नींव होगी (ईसाइयत की जगह हिन्दुत्व कर लीजिये और आप आसानी से नात्ज़ी जर्मनी से आर.एस.एस. इण्डिया में पहुँच जायेंगे). विदेशनीति पर उसका कहना था कि दूसरे राष्ट्रों से बराबरी का अधिकार हासिल करने के बाद जर्मनी की नीति शांति को संरक्षित और सुदृढ़ करना होगा जिसकी आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है. उसने बेरोजगारी पर भी व्यापकतम-चौतरफा हमले की घोषणा की जिससे चार साल में बेरोजगारी का हमेशा-हमेशा के लिए अंत हो जायेगा. हिटलर ने अपने भाषण का अंत उसी जुमले से किया जिसे आगे वह अनन्त बार दुहरायेगा “अब जर्मनवासियों, हमें चार साल का समय दो और तब तुम हमारे लिए अपना फैसला दे सकोगे!”
शांति और जनतंत्र के इन सारे जुमलों को झुठलाते हुए 4 फरवरी 1933 को देश और “जर्मन जनता की रक्षा के लिए राजाज्ञा” के जरिये सरकार ने बोलने और सभा करने-जुटने की आज़ादी के अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया और एस.पी.डी. व के.पी.डी. पर कठोर बंदिशें लगा दी.
जर्मन सेना और नेवी के कमांडरों के साथ अपनी पहली बैठक में ही हिटलर ने अपनी सरकार का पहला लक्ष्य “राजनीतिक ताकत को वापस हासिल करना बताया जो समूचे राज्य नेतृत्व का उद्देश्य” होगा. घरेलू स्तर पर विद्यमान स्थितियों को पूरी तरह से उलट दिया जाना है. शांतिवादी प्रवृत्तियों को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. “जो भी बदलने से इनकार करेगा उसे, मजबूर कर दिया जायेगा”. जर्मनी के युवा और समूची आबादी को इस विचार के साथ जुड़ना होगा कि “केवल युद्ध ही हमें बचा सकता है और सब कुछ इसी विचार के मातहत रहना है”. जर्मनी की “खुद की रक्षा की इच्छाशक्ति” को मज़बूत करने के लिए “कठोरतम, अधिनायकवादी राज्य नेतृत्व” की स्थापना और “जनतंत्र से हुए नुकसान के कैंसर को जड़ से मिटाना” जरूरी था. विदेश नीति के सवाल पर हिटलर का पहला लक्ष्य व्हेरमाष्ट (सेना) को फिर से हथियारबंद करना और सामरिक बराबरी हासिल करके वर्साय संधि के खिलाफ लड़ना था. हिटलर दहाड़ा “सबके लिये अनिवार्य सैन्य सेवा” लागू करनी होगी. जर्मनी के सामरिक महाशक्ति के रूप में अपनी हैसियत वापस ले लेने के बाद अपनी विदेश नीति मंशा का संकेत देते हुए उसने कहा “पूर्व में नए निवास स्थानों की विजय और इनका निर्मम जर्मन एकीकरण”.
दुनिया की एक उम्मीद– बर्तोल्त ब्रेश्त
जनरलों के लिए मार्क्सवाद और शांतिवाद के साथ युद्ध, वर्साय संधि के पुनरीक्षण की मांग, जर्मन सेना का पुनर्शस्त्रीकरण, और इसकी विश्व शक्ति के बतौर हैसियत की बहाली के साथ पूरी तरह जुड़ जाने में भला क्या आपत्ति हो सकती थी? वे हिटलर के इस वादे से खासे रोमांचित थे कि व्हेरमाष्ट ही देश की एकमात्र वैध सेना बनी रहेगी और इसका इस्तेमाल घरेलू विरोधियों के दमन के लिए नहीं किया जायेगा. हिटलर ने घोषित किया कि यह (घरेलू दमन) काम नेशनल सोशलिस्ट पार्टी, खास कर एस.ए. का था.
फ्यूरर (हिटलर) और सैन्य नेतृत्व के बीच शुरुआत में ही बन गयी निकटता दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद थी. चान्सलर अब सैन्य हस्तक्षेप के किसी भी डर से मुक्त हो कर राजनीतिक वाम को कुचलने और समूचे जर्मन समाज को नात्ज़ी विचारों में ढालने पर केन्द्रित कर सकता था. अलावे इसके, सेना का विचलनविहीन समर्थन 1930 दशक के अंतिम वर्षों से शुरू होने वाले राजनीतिक जीवन के उसके संकटपूर्ण-निर्णायक मोड़ों पर काफी काम आने वाला था. बदले में सैन्य नेतृत्व को अपनी एकाधिकारी हैसियत की गारंटी और यह आश्वासन मिला कि उनकी जरूरतों को नयी सरकार में सर्वोच्च प्राथमिकता मिलेगी.
हालांकि बड़े व्यवसाइयों का समर्थन सालों-साल बढ़ रहा था, मगर सबसे बड़े कारपोरेट महाबली अभी भी कुछ हिचक रहे थे. इसके लिए 20 फरवरी 1933 को हिटलर की 27 शीर्ष उद्योगपतियों और बैंकरों के साथ बैठक हुई जिसमे जर्मन उद्योग की राइक एसोसियेशन के प्रेसिडेंट क्रूप्प वों बोह्लें (जो रातों-रात अति उत्साही नात्ज़ी बन गया था), आई. जी. फ़ार्बेन के बोश और स्निज्लर, और यूनाइटेड स्टील वर्क्स का मुखिया वोएग्लर शामिल थे. हिटलर और गोएरिंग ने सरकार की उद्योग के प्रति नीति को साफ-साफ़ रखा. हिटलर ने एक बार फिर से निजी सम्पदा में अपनी आस्था की पुष्टि करते हुए इन अफवाहों का खंडन किया कि वह आमूल-चूल बदलाव का कोई भी आर्थिक प्रयोग करने जा रहा था. उसने बल दे कर कहा कि केवल एन.एस.डी.ए.पी. ही उद्योग और उद्योगपतियों को कम्युनिस्ट आतंक के खतरे से बचा सकती है. उसने वादा किया कि वह व्हेरमाष्ट (एकीकृत सैन्य कमान) की पुनर्बहाली करने जा रहा है, जो क्रूप्प, यूनाइटेड स्टील और आई.जी. फार्बेन जैसों के विशेष औद्योगिक हितों के लिए खास फायदेमंद था. अंत में हिटलर ने घोषित किया : “अब हम अंतिम चुनाव के ठीक पहले खड़े हैं” और वादा किया “परिणाम चाहे जो हो, हम पीछे नहीं हटने जा रहे”. अगर वह बहुमत नहीं जीत पायेगा, तो भी “अन्य तरीकों से” ... “अन्य हथियारों के जरिये” सत्ता में बना रहेगा. हिटलर ने जो कुछ भी कहा था और जिस तरह से कहा था उससे व्यावसायिक जगत के नेता खासे प्रभावित थे.
गोएरिंग ने फौरी जरूरतों पर बात करते हुए “वित्तीय त्याग” पर बल देते हुए कहा कि उद्योग अगर यह समझ ले कि आगामी पाँच मार्च का चुनाव अगले दस वर्षों और शायद अगले सौ वर्षों के लिए भी अंतिम चुनाव होने जा रहा है, उनके लिए यह त्याग करना कुछ भी मुश्किल नहीं होगा. दोनों नेताओं के हॉल से चले जाने के बाद मेजबानों ने चंदा जुटाना शुरू किया और हाथ-के-हाथ तीस लाख मार्क इकठ्ठा हो गए.
4 फरवरी की राजाज्ञा के जरिये अपने मुख्य प्रतिद्वंदियों एस.पी.डी. और के.पी.डी. के लिए आगामी चुनाव लड़ना बेहद मुश्किल बनाने के बाद एन.एस.डी.ए.पी. नेतृत्व को लगा कि जल्दी चुनाव उन्हें पूर्ण बहुमत दे सकता है, जिसके बल पर वे गठबंधन को लात मार कर डावांडोल संसदीय जनतंत्र से एकदलीय नंगी तानाशाही में आराम से संक्रमण कर सकते हैं. इसे सुनिश्चित करने और कोई कसर न छोड़ने के लिए उन्होंने हर संभव प्रशासनिक फेर-बदल, भीतर खाते रास्तों और झूठे गढ़े गए आरोपों पर दमनात्मक उपायों का सहारा लिया. एक बार फिर उन्हें कैबिनेट के समूचे प्रतिक्रियावादी जमावड़े और राजशाही प्रेसिडेंट का भरपूर समर्थन मिला जिनमें से कोई भी यह नहीं समझ रहा था कि ऐसा कर के वे वास्तव में अपने लिए ही कब्र खोद रहे थे.
जब गोएबेल्स राजनीतिक और विचारधारात्मक दीक्षा के सबसे महत्वपूर्ण माध्यम जर्मन रेडियो के कर्मचारियों के व्यापक मनमाफिक बदलाव में व्यस्त था, कार्यवाहक आन्तरिक मंत्री के रूप में गोएरिंग प्रशियन पुलिस और प्रशासन से बचे-खुचे जनतांत्रिक लोगों का सफाया करने में जुटा था. प्रशियन पुलिस विभाग को पूरी ताकत से राष्ट्रीय प्रोपेगैंडा में सहयोग करने और राज्य विरोधी संगठनों की गतिविधियों को कठोरतम कदम उठाते हुए-जरूरत पड़ने पर आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल से भी बिलकुल न हिचकते हुए दमन करने के निर्देश दिए गए. गोएर्रिंग ने अधिकारियों से कहा कि उन्हें यह बात बिलकुल साफ़ रहनी चाहिये कि जो भी पुलिस अधिकारी ड्यूटी के द
फ़रवरी के मध्य में यह अफवाह फैली कि हिटलर की हत्या के प्रयास का झूठा बहाना गढ़ कर नात्ज़ी खून की होली खेलने की योजना बना रहे हैं. ऐसे भयावह अराजक वातावरण में 27 फ़रवरी 1933 को खबर आयी कि राइकस्ताग में आग लग गयी है. हालांकि आग के कारणों का अभी पता लगाया जाना बाकी था, मगर गोएरिंग दहाड़ा “यह कम्युनिस्ट विद्रोह की शुरुवात है. अब वे हमला करेंगे. हाँ अब एक पल भी नहीं गवां सकते !” रुडोल्फ दिएल्स ने, जिसे गोएरिंग ने गेस्टापो का प्रमुख नामित किया था, बाद में याद किया : “हिटलर दहाड़ा ... अब कोई दया-माया नहीं होगी. जो भी हमारे रास्ते में आयेगा, काट डाला जायेगा ... हर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता को वहीं गोली मार दी जायेगी. कम्युनिस्ट डेपुटियों को इसी शाम फाँसी पर लटका दिया जाना चाहिये. कम्युनिस्टों से रिश्ता रखने वाले हर किसी को गिरफ्तार किया जाना है. सोशल डेमोक्रेटों और राइकस्ताग झंडे के साथ भी कोई नरमी नहीं बरती जानी है.”
हिटलर, दिएल्स की इस बात को सुनने के लिए राजी ही नहीं था कि आगजनी में गिरफ्तार आदमी मरिनस वन देर लूबे एक अधपागल था. हिटलर ने कहा “यह बिलकुल साफ़-साफ़ बेहद चतुरायी से बनायी गयी योजना है. अपराधियों ने इसे पूरी तरह से सोच-समझ कर अंजाम दिया है.”
आग के लिए वास्तव में कौन जिम्मेदार था, यह सवाल कभी नहीं सुलझा. जो बात बिलकुल निर्विवाद है वह यह कि (i) के.पी.डी. के शामिल होने का लेश मात्र साक्ष्य भी कभी प्रस्तुत नहीं किया गया, और (ii) नात्ज़ी राइकस्ताग की आग को ले कर लेश मात्र भी दुखी नहीं थे. इसके विपरीत यह के.पी.डी. के खिलाफ निर्णायक चोट करने का मुंहमांगा बहाना बन गया. उसी शाम बाद में जब नात्ज़ी होटल कैसरहोफ में जुटे, काफी तनावहीन-खुशनुमा मूड में थे. गोएबेल्स ने लिखा : “हर कोई पूरे उत्साह में था... ठीक वही हुआ था जिसकी हमें जरूरत थी. अब हम पूरी तरह आगे हैं.” जैसा 27 फ़रवरी 2002 को भारत में गोधरा ट्रेन दुर्घटना में अनुमान लगाया जाता है, सारे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को ध्यान में रख कर इतिहासकार यह निष्कर्ष निकलते हैं कि राइकस्ताग में आग खुद नात्जि़यों ने लगाई थी और इसका आरोप कम्युनिस्टों पर मढ़ दिया.
27-28 फ़रवरी की रात तक के.पी.डी. के अगुआ नेता और करीब-करीब सभी राइकस्ताग डेपुटी गिरफ्तार हो चुके थे. 3 मार्च को के.पी.डी. चेयरमैन एर्न्स्ट थालमन को खोज कर गिरफ्तार कर लिया गया. कार्ल लीबनेश्त के घर से तथाकथित रूप से बरामद दस्तावेज से दिखाया गया कि कम्युनिस्ट “आतंकवादी गिरोहों” को बनाने, सार्वजनिक भवनों में आग लगाने, सार्वजनिक भोजनालयों के खानों में जहर मिलाने, और मंत्रियों व अन्य शीर्ष नेताओं-व्यक्तियों के बीबी-बच्चों को बंधक बनाने की साजिश रच रहे थे. हालांकि कोई भी देख-समझ सकता था कि यह भयावह परिदृश्य फंसाने के लिए गढ़ा गया पूरी तरह झूठा आविष्कार था, मगर इसके आधार पर हिटलर के साथी जनता और राज्य की सुरक्षा के लिए राजाज्ञा जारी करने पर तुरंत राजी हो गए जिसके जरिये “अगली सूचना तक” सारे मूलभूत नागरिक अधिकार – जिनमें निजी आज़ादी, अभिव्यक्ति और एकत्रित होने की स्वतन्त्रता और पत्रों व टेलिफोन बात-चीत की निजता शामिल थी, मुल्तवी कर दिए गए.
28 फ़रवरी की राजाज्ञा को उस आपात कानून के रूप में जाना जाता है जिसके बूते नेशनल सोशलिस्ट तानाशाही तब तक टिकी रही जब तक कि वह खुद ध्वस्त नहीं हो गयी. 3 मार्च को फ्रैंकफर्ट में अपने भाषण में गोएरिंग ने यह बात बिलकुल साफ़ कर दी कि उसे मिली इस नयी ताकत से वह क्या करना चाहता था. उसने निर्देश जारी किये कि इसके प्रावधानों को किसी भी कानूनी बंदिश से सीमित नहीं किया जा सकता है : “इस मामले में, मुझसे किसी न्यायशीलता की अपेक्षा नहीं है. मुझसे एकमात्र अपेक्षा सफाया करने की है और इससे ज्यादा कुछ भी नहीं”.
जैसा कि अन्य सारे मामलों में था, हिटलर को यहाँ भी सरकार में शामिल दूसरे लोगों से किसी भी तरह के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा. हिन्डेन्बर्ग को भी राजाज्ञा पर दस्तखत करने में कोई आपत्ति नहीं थी जिसे उसे “कम्युनिस्ट हिंसा के खिलाफ कदम उठाने के लिए विशेष अधिनियम” के रूप में बेचा गया था. जाने-अनजाने में राइक प्रेसिडेंट के राजनीतिक प्राधिकार को उसने राइक सरकार को हस्तांतरित करने में मदद की.
अमेरिकी राजदूत फ्रेडरिक सैकेट ने 5 मार्च 1933 के चुनावों को “प्रहसन” बताया क्योंकि लेफ्ट विंग पार्टियों को “प्रचार अभियान के अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण हफ्ते में अपने समर्थकों को संबोधित करने के उनके संवैधानिक अधिकारों से पूरी तरह से वंचित कर दिया गया था”.
फिर भी, 88.8% असाधारण वोटिंग के बावजूद एन.एस.डी.ए.पी. सम्पूर्ण बहुमत के घोषित लक्ष्य से काफी दूर रह गयी. उसे 43.9% वोट मिले, नवम्बर 1932 चुनाव से 10.8% ज्यादा. बर्लिन मेट्रोपोलिटन सहित ऐसे कई इलाकों में उन्हें इस बार काफी बढ़त मिली जहाँ वे अब तक कमजोर रहे थे. नात्जि़यों ने पिछली बार वोट न देने वालों की काफी बड़ी संख्या को अपने पक्ष में गोलबंद कर लिया था.
दूसरी ओर तमाम साजिशों और दमन के बावजूद एस.पी.डी. को 18.3% (पिछली बार से 2.1% कम) और के.पी.डी. को 12.3% (4. 6% कम) वोट मिले. सारी बाधाओं का मुकाबला करते हुए दोनों वाम धारा पार्टियों ने करीब एक तिहाई वोट हासिल कर लिए थे. कुल मिला कर नतीजे यही दिखा रहे थे कि नात्ज़ीवाद के खिलाफ वाम-जनतांत्रिक विरोध अभी भी काफी मजबूत था.
जनता की ओर से बार-बार धकियाये जाने और राइकस्ताग में लगायी गयी आग के बाद भी निर्णायक बहुमत ला कर अकेले शासन का प्राधिकार दिला पाने में असफल हो जाने पर, हिटलर अब दूसरे उपायों की ओर बढ़ा जो उसे वस्तुतः तानाशाह बना सकें. इस बार भी उसने जाहिर तौर पर “संवैधानिक” अनुमति हासिल कर ली. इस अनुमति में सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण चुनाव के बाद पारित किया गया “इनेबलिंग” कानून था.
राइकस्ताग भवन में आग लग जाने के बाद उसके उपयोग लायक नहीं रह जाने के कारण राइकस्ताग की बैठक23 मार्च 1933 को क्रोल ओपेराहाउस में बेहद दबाव और धमकी भरी पृष्ठभूमि में हुई. एस.पी.डी. डेपुटी विल्हेल्म होएग्नर के अनुसार : “क्रोल ओपेरा के बाहर का चौक उन्मत्त फ़ासिस्टों से भरा पड़ा था. हमारी अगवानी ‘हमें चाहिये इनेबलिंग कानून’ के उन्मादी नारों से हुई. अपनी छातियों पर स्वातिका टांगे नौजवानों ने हमें ऊपर से नीचे तक नफ़रत से घूरते हुए हमारा रास्ता रोक लिया. “मध्यमार्गी सूअर” और “मार्क्सिस्ट सुअरियां” जैसी गालियों से चुनौती देते-धमकाते हुए उन्होंने हमें दौड़ा लिया. जब हम सोशल डेमोक्रेटो ने असेंबली के बाहरी बायीं तरफ अपनी जगह ले ली, एस.ए. और एस.एस. के आदमियों ने निकास के बाहर और हमारे पीछे की दीवार से लग कर अर्ध चंद्राकार घेरा बना लिया. ग्रैंड स्टैंड (मंच) के आगे, जहाँ सरकार के लोग बैठे थे, एक विशाल स्वास्तिका झन्डा लटक रहा था मानो यह नात्ज़ी पार्टी का कार्यक्रम था न कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का कोई सत्र. दो दिन पहले खुद को नागरिक वेश-भूषा में दिखाने के बाद हिटलर आज फिर ब्राउन शर्ट में था.”
जनता और राइक के संकटों को दूर करने का कानून, जैसा कि इनेबलिंग कानून को आधिकारिक तौर पर कहा गया, एक संविधान संशोधन विधेयक था. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार संविधान संशोधित करने के लिए राइकस्ताग और उपस्थित डेपुटियों, दोनों का दो-तिहाई बहुमत जरूरी था. चूंकि नात्जि़यों और उनके सहयोगियों की संख्या इसके लिए पर्याप्त नहीं थी, इसलिय एक शातिर चाल खेली गयी. सबसे पहले, राइकस्ताग आग राजाज्ञा के तहत गिरफ्तार के.पी.डी. डेपुटियों की 81 सीटों को अवैध-अमान्य कर दिया गया. इससे राइकस्ताग के कुल वैध मतों की संख्या 647 से घट कर 566 हो गयी, जिससे अब कानून के पक्ष में 432 के बजाय 378 मतों की जरूरत रह गयी. दूसरी शर्त (उपस्थिति का दो-तिहाई) के लिए संसदीय नियमों में बदलाव कर के (जिसका कैबिनेट को अधिकार था) बिना कारण बताये अनुपस्थित डेपुटियों को भी उपस्थित मानने का प्राविधान कर लिया गया. इन सारी चालबाजियों से, और के.पी.डी. सदस्यों की गिरफ्तारी के चलते केवल एस.पी.डी. के बचे सदस्यों के जोरदार विरोध को दरकिनार कर कानून पारित करा लिया गया.
कानून के जरिये हिटलर की सरकार को राइकस्ताग और प्रेसिडेंट से स्वतंत्र कानून/ राजाज्ञा जारी करने के “योग्य” बना दिया गया. ऐसे कानून/राजाज्ञा को संविधान के प्राविधानों से इतर कानून भी बनाने की अनुमति थी और प्रेसिडेंट के बजाय चान्सलर को कानूनों को सूत्रबद्ध व प्रकाशित करने का अधिकार मिल गया.
तात्कालिक नतीजा : के.पी.डी. को राइकस्ताग आग राजाज्ञा से पहले ही बुरी तरह से दमित कर चुकने के बाद अब सोशल डेमोक्रेटों के संसदीय दल पर बर्बर दमन तंत्र चला जिन्होंने इनेबलिंग कानून के खिलाफ वोट किया था. एस.पी.डी. सदस्यों में निराशा – हताशा फैलने लगी और बड़ी संख्या में सदस्य पार्टी छोड़ने लगे. इसके बाद भी अभी इस कानून के और भी ज्यादा गंभीर – दीर्घ कालिक प्रभाव पड़ने वाले थे.
पहला : कानून ने कैबिनेट को विधायिका की चिन्ता किये बगैर कानून जारी करने का अधिकार दिया था, मगर व्यवहार में यह अधिकार चान्सलर में निहित हो गया. बड़ी चालाकी से सुनिश्चित किया गया कि कैबिनेट की बैठकें यदा-कदा ही हों और जब हों भी तो उनमें कोई गंभीर बहस न होने पाये जिससे हिटलर को कैबिनेट के नाम पर मनमानी का पूरा मौका मिल सके. यही नहीं, इस संशोधन ने कैबिनेट को नजरअंदाज करते हुए आपात राजाज्ञा जारी करने के प्रेसिडेंट के अधिकार को भी निष्प्रभावी कर दिया. चान्सलर अब अपनी पूरी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र था हालाँकि हिटलर करिश्माई मार्शल के साथ किसी तरह के अनावश्यक टकराव का इच्छुक नहीं था. बहरहाल, अपने सारे इरादों और उद्देश्यों में, हिटलर अब करीब-करीब तानाशाह बन चुका था.
दूसरे : संविधान और संसद, जो पहले ही पापेन और ब्रूनिंग द्वारा अपने चान्सलर काल में व्यर्थ और निष्प्रभावी बना दी गयी थी, के ताबूत पर आखिरी कील ठोंक कर के गैर-नात्ज़ी राजनीतिक पार्टियों ने जाने-अनजाने में अपने अस्तित्व का औचित्य ही समाप्त कर दिया था. आखिर प्रतिनिधित्व की संस्था के अभाव में ये राजनीतिक पार्टियां कौन सी भूमिका अदा कर सकती थीं ?
तीसरे : कानून, जो मूलतः चार साल के लिए था, तीन बार समय अवधि बढ़ाई गई और नात्ज़ी सत्ता के ध्वस्त हो जाने तक फासिस्ट शासन और मानवता के विरुद्ध इस शासन के सारे नृशंस अपराधों का मूल आधार बना रहा. यह कानून तकनीकी तौर पर संविधान के विरुद्ध नहीं था और संसद में बहुमत से पारित किया गया था, इसलिए हम कह सकते हैं कि अन्ततः यह “आत्म निषेध” का संवैधानिक चार्टर बन गया.
सरकार द्वारा स्व-हस्तगत भयावह अधिकारों का कहर यहूदियों पर अब तक नहीं देखे-सुने गए पैमाने पर टूटा. मार्च 1933 में डकाऊ के एक छोटे से शहर के पास एक पुरानी-वीरान हथियार फैक्ट्री में पहला कंसेन्ट्रेशन कैम्प खुला. शुरुवात में, एक राजकीय उपक्रम के रूप में इसकी हिफाजत का जिम्मा बावेरियन पुलिस पर था, मगर 11 अप्रैल से एस.एस. ने इसकी कमान संभाल ली. यह वह पहला सेल बना जहाँ आतंक की राष्ट्रीय प्रणाली तंत्र के बीज अंकुरित हुए. यह एक तरह की प्रयोगशाला थी जहाँ हिंसा के उन विकृत और नृशंसतम रूपों का प्रयोग किया गया जिन्हें जल्दी ही अन्य कंसेन्ट्रेशन कैम्पों में दुहराया जाने वाला था. इन कैम्पों में जो कुछ घटित हो रहा था उसकी कहानियां नात्जि़यों के विरोध को रोकने का सबसे प्रभावी हथियार थीं.
कंसेन्ट्रेशन कैम्पों ने एक और काम किया. 5 मार्च के चुनाव नतीजों के पूरे मनमाफिक न होने की खीझ एस.ए. गुंडों की मनमानी हिंसा के आतंक में निकल रही थी. यहाँ तक कि वे जज भी अपनी जान के लिए आतंकित थे, जिन्होंने अपवादस्वरूप पकडे़ गए उपद्रवियों को दोषी पा कर हलकी-फुलकी सज़ा सुनाई थी. इसे व्यापारिक समुदाय सहित बहुत सारे लोग, कानून-व्यवस्था की अराजकता के रूप में देखने लगे थे, जबकि नात्जि़यों ने पिछले कई सालों से बनी हुई गृह युद्ध जैसी स्थिति के समाधान का वादा किया था. विकेन्द्रित आतंक को संस्थागत आतंक के रूप में कंसेन्ट्रेशन कैंपों में केन्द्रित करने से इस समस्या का आंशिक समाधान हुआ – आंशिक, क्योंकि अनियंत्रित हिंसा कभी भी पूरी तरह से नहीं रुकी.
एक और क्षेत्र में राजकीय हस्तक्षेप की जरूरत महसूस हुई. नात्जि़यों के बार-बार आह्वान के बावजूद बेहद कम लोग यहूदी व्यापार, वकीलों, और डाक्टरों का बहिष्कार कर रहे थे. 1 अप्रैल को एस.ए. के लोग पूरे जर्मनी में यहूदियों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों, डाक्टरों के दवाखानों और वकीलों की फ़र्मों के सामने तख्तियां ले कर खड़े हो गए और आम लोगों को भी इस बहिष्कार में साथ देने के लिए उकसाने लगे. बर्लिन में बहिष्कार के गवाह रहे पत्रकार सेबास्तियन हाफ्नेर ने इसे याद करते हुए लिखा : “यहूदी व्यापार प्रतिष्ठान जैसे ही खुले, एस.ए. के लोग मुख्य दरवाजों के सामने पाँव फैलाए हुए डट गए. आतंक के बावजूद इसके प्रति असहमति की फुसफुसाहट ... पूरे देश में फ़ैल गयी. “ब्रिटिश राजदूत होरास रमबोल्ड के अनुसार बहिष्कार जनता में लोकप्रिय तो नहीं था मगर यहूदियों के पक्ष में जनता के बीच से कोई खास आवाज़ भी नहीं उठी. ग्राहकों के बारे में ऐसी तमाम बातें सुनने में आयीं जिनमें वे जानबूझ कर यहूदी दुकानदारों, डॉक्टरों और वकीलों के पास गए, परन्तु निश्चित रूप से ऐसे साहसी लोगों की तादात बहुत कम थी. बहुसंख्या ने शासन की इच्छा के आगे घुटने टेक दिए. तमाम जर्मन यहूदी इस पहली सरकार प्रायोजित-संगठित यहूदी-विरोधी पहलकदमी से अवाक् थे. विक्टर क्लेम्पेरर ने अपनी डायरी में लिखा : “मैंने हमेशा खुद को जर्मन माना”. ये भावनाएं वही थीं जो आज मोदी के भारत में लांछित-उत्पीडि़त मुसलमान महसूस कर रहे हैं.
“गर्म बिस्तर पर सोते हुए मैं नितान्त अनैतिक महसूस करती हूँ, जब मेरे परम प्रिय दोस्तों को बाहर वहां कहीं कड़कती ठंड में मार गिराया गया है या फिर कहीं गन्दे नाले में फेंक दिया गया है. काँप उठती हूँ, जब मैं उन निकटतम दोस्तों के बारे में सोचती हूँ, जो अब धरती पर विचरने वाले उन क्रूरतम पिशाचों के हवाले किये जा चुके हैं. और सिर्फ इसलिए कि वे यहूदी हैं !”
ऐन फ्रैंक , “द डायरी ऑफ़ अ यंग गर्ल”
[ ऐन खुद ,और उसकी बहन मारगोट की मृत्यु 1945 में
बर्गेन बेल्सेन के कंसेन्ट्रेशन कैम्प में हुई ]
7 अप्रैल को शासन ने पेशेवर नागरिक सेवा के पुनर्गठन का कानून जारी किया. इसके तहत सरकार न सिर्फ राजनीतिक रूप से भरोसेमंद न समझे जाने वाले राज्य कर्मचारियों को बर्खास्त कर सकती थी बल्कि यह भी निर्दिष्ट किया कि “गैर-आर्य पृष्ठभूमि” वाले नागरिक सेवकों को समयपूर्व सेवा निवृत्त कर दिया जाये. हिन्डेन्बर्ग के अनुरोध पर वे यहूदी, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया था अथवा जिनके पिता या बेटे शहीद हुए थे, इससे मुक्त रखे गए. एक बार फिर यहाँ वर्तमान भारतीय परिदृष्य सामने आता है - क्या संघी सरकार “अच्छे मुस्लिमों” को बख्श ही नहीं रही बल्कि पुरस्कृत तक कर रही है. मगर तब यह भी ध्यान में रखना बेहद जरूरी है कि अन्ततः नात्ज़ी जर्मनी में किसी भी यहूदी अथवा अन्य लांछित अल्पसंख्यक को नहीं बख्शा गया था.
राज्यों को राइक की लाइन पर लाने के लिये बड़ी चतुराई से 7 अप्रैल को लाये गए कानून के तहत जर्मन राज्यों की समूची स्वायत्तता को हमेशा के लिए ख़त्म करते हुए वहां “राइक गवर्नर” बहाल कर दिए गए. इस कानून से हिटलर को प्रशिया में भी अपने मनमाफिक सत्ता को पुनर्व्यवस्थित करने का मौका मिल गया. उसने खुद राइक गवर्नर का प्राधिकार अपने हाथ में ले कर पापेन की “राइक कमिश्नर” की हैसियत को अप्रासंगिक बना दिया. तीन दिन बाद गोएरिंग को प्रशिया का प्रेसिडेंट घोषित कर दिया गया और दो हफ्ते बाद हिटलर ने उसे गवर्नर का प्राधिकार दे दिया. वह वाईस चान्सलर, जो अभी 30 जनवरी तक खुद को नात्जि़यों को काबू में रखने वाले रिंगमास्टर के रूप में देख रहा था, राजनीति के हाशिये पर फेक दिया गया.
अपने जीवन अनुभवों से हिटलर जानता था कि वह एकमात्र ताकत जो उसकी तूफानी अग्रगति को रोक सकती है, वह कनफेडरेशन ऑफ़ जर्मन ट्रेड यूनियंस (ए.डी.जी.बी.) के झंडे तले संगठित मजदूर वर्ग है. उसने इसे जहाँ तक हो सके कमजोर करने की गरज से एस.ए. को अपने इस ताकतवर दुश्मन के साथ नियमित छिट-पुट थकावट-घिसावट की लड़ाई में उलझाये रहने के लिए प्रोत्साहित किया. वह निर्णायक युद्ध तब तक के लिए टालता गया जब तक कि उसने बाकी अन्य घरेलू दुश्मनों को ठिकाने लगाने का काम कमोबेश पूरा कर के इस काम के अनुकूल राजनीतिक माहौल नहीं बना लिया.
अप्रैल तक वह निर्णायक घड़ी आ गयी लगती थी. सबसे पहले उसने कम्युनिस्ट और फिर सोशल डेमोक्रेटिक नेताओं को निष्प्रभावी कर के मजदूर वर्ग को परिपक्व राजनीतिक नेतृत्व से वंचित कर दिया. फिर उसने संसदीय जनतंत्र और मुक्त प्रेस की संस्थानिकताओं को नष्ट किया, कैबिनेट के अन्दर जो लोग चुनौती बन सकते थे, यहाँ तक कि प्रेसिडेंट को भी पंगु कर दिया, अपने हाथों में सर्व सत्ताधिकार केन्द्रित किया, अपनी जरूरत और मर्ज़ी के मुताबिक ब्राउनशर्ट्स के अलावे अब तक नात्ज़ीकृत हो चुके पुलिस बल और मित्रवत हो चुकी सेना को उतार सकना सुनिश्चित किया, बुर्जुआ की ओर से सम्पूर्ण समर्थन सुनिश्चित किया जो अभी हाल-फिलहाल तक उसके आन्दोलन को ले कर गहरे संशय में था, और अन्ततः यहूदियों व मजदूर वर्ग अगुआ तत्वों के बर्बरतम उत्पीड़न- हत्याओं के जरिये पूरी तरह से आतंक का वातावरण बन जाने की गारंटी की.
[ ऐन फ्रैंक, डायरी लिखने वाली किशोरी, जिसने दो सालों तक जर्मनों से छिप कर रहने के आतंक को अपनी डायरी में दर्ज किया, और अन्ततः एक जर्मन कंसेन्ट्रेशन कैम्प में ही मरी. उसकी यह लाइन आज की दुनिया की भी अनुगूंज लगती है. आज की दुनिया में बस “यहूदी” की जगह मुस्लिम और भारत में “क्रिश्चियन” की जगह “ हिन्दू” रख कर देख लीजिये.]
– ऐन फ्रैंक
'द डायरी ऑफ़ अ यंग गर्ल'
इस सब के बावजूद हिटलर जर्मन मजदूर वर्ग के साथ अपनी निर्णायक लड़ाई में एक-एक कदम फूंक-फूंक कर, “पुचकार और दुत्कार डंडा” की नीति के साथ, रख रहा था. राइकस्ताग आग के बाद जल्दी ही, हड़ताल का अधिकार व्यवहारतः समाप्त कर दिया गया. हड़ताल के लिए किसी भी तरह के उकसावे पर एक महीने से ले कर तीन साल तक की सज़ा हो सकती थी. कई 'हाउस ऑफ दि पीपुल' पर स्टॉर्मट्रूपर्स ने कब्ज़ा कर लिया[1]. अप्रैल की शुरुवात में फैक्ट्री कमेटियों की सुविधाओं और अधिकारों को समाप्त कर दिया गया : चुनावों पर रोक लगा दी गयी; कमेटियों के सदस्यों को आर्थिक अथवा राजनीतिक कारणों से बर्खास्त कर के उनकी जगह नात्जि़यों द्वारा नामित लोग बैठाये जा सकते थे. राज्य की जरूरत पर समूची कमेटी भी भंग की जा सकती थी. नियोजकों को किसी भी मजदूर को “राज्य के प्रति विद्वेषी” होने की आशंका पर राइक के सामाजिक कानूनों द्वारा गारंटी किये गए बचाव का कोई भी अवसर दिए बगैर बर्खास्त करने का अधिकार मिल गया.
इस दुत्कार डंडे के साथ-साथ, जिसे हथौड़ा कहना ज्यादा ठीक होगा, कुछ पुचकार उपाय भी थे. अंतिम निर्णायक चोट करने से पहले मजदूरों और उनके नेताओं को भरमाने के लिए नात्ज़ी सरकार ने मई दिवस को राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर के अधिकारिक रूप से इसे “राष्ट्रीय श्रम दिवस” का नाम देते हुए अभूतपूर्व शानो-शौकत से मनाया. सरकार ने सारे जर्मनी से श्रमिक नेताओं को हवाई जहाज से बर्लिन लाने की व्यवस्था की. नेताओं ने नात्जि़यों की तरफ से मजदूर वर्ग के प्रति इस अविश्वसनीय मैत्री भाव से अभिभूत हो कर इस दिन को सफल बनाने में हर मुमकिन सहयोग किया. स्वास्तिका झंडों तले यूनियन सदस्यों और नात्जि़यों ने एकसाथ मार्च किया. विशाल रैली से पहले हिटलर ने खुद मजदूर नेताओं की अगवानी यह कहते हुए की : “आप सब खुद देखेंगे कि क्रांति के जर्मन मजदूरों के खिलाफ होने की बात कितनी गलत और अन्यायपूर्ण है.” बाद में एक लाख मजदूरों की रैली को अपने संबोधन में, जो पूरे देश में रेडियो से प्रसारित किया गया, उसने ध्येय वाक्य घोषित किया : “श्रम का मान और मजदूर का सम्मान” ( नरेन्द्र मोदी के पास इसका और संक्षिप्त संस्करण है – “श्रमेव जयते”). इस तरह हिटलर ने अपनी शातिर और धूर्त चाल से जर्मन मजदूर आन्दोलन के लिए पहली मई की परम्परागत प्रतीकात्मकता को हड़पते हुए इसे “सजातीय लोकप्रिय समुदाय” में विस्तारित करने की कोशिश की.
अचानक हमला अगले ही दिन टूट पड़ा. पूरी योजना के साथ स्टॉर्मट्रूपर्स ने यूनियन मुख्यालयों पर कब्ज़ा कर के यूनियन नेताओं को अपनी “संरक्षात्मक हिरासत” में ले लिया. हर जगह लोगों के घरों पर कब्ज़ा कर लिया गया. कुछ दिन बाद एक नए कानून के जरिये एक सर्वग्रासी विशाल “जर्मन लेबर फ्रंट” बना दिया गया जिसमें सारी यूनियनों और एसोसिएशनों को “लाइन में ला कर” समाहित करते हुए चौदह पेशा आधारित फेडरेशनों में समूहीकृत कर दिया गया. यह कोई वर्गीय संगठन न हो कर विशुद्ध प्रोपेगैंडा बॉडी थी जो मजदूर वर्ग को नात्ज़ी राज्य के साथ संगति में लाने का सबसे कारगर औजार बनी. जैसा कि कानून में कहा गया था, इसका उद्देश्य मजदूरों की रक्षा नहीं बल्कि “सारे जर्मनों का एक सचमुच का सामाजिक व उत्पादक समुदाय बनाना” था. जर्मन मजदूरों के पास अब सरकार से स्वतंत्र अपने हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली कोई संगठनिकता नहीं रह गयी. 16 मई को हड़ताल का अधिकार अंतिम रूप से समाप्त कर दिया गया. 19 मई को एक और कानून के जरिये मजदूरों को सामूहिक सौदेबाज़ी और समझौते के अधिकार से वंचित कर दिया गया. अगले साल की शुरुवात से चौदह पेशा आधारित फेडरेशनों को एक-एक कर के भंग करने का क्रम शुरू हो गया.
यूनियनों के बाद राजनीतिक पार्टियों की बारी आई, एक-एक कर के. 10 मई को गोएरिंग ने डी.एस.पी. की सारी सम्पदाएँ जब्त कर लीं. जून के आखीर और जुलाई की शुरुवात में डी.एस.पी., जर्मन स्टेट पार्टी, और जर्मन पीपुल्स पार्टी भंग कर दी गयी. फिर धीरे-धीरे एस.ए. और एस.एस. के आतंक/हमलों के दबाव में अन्य बुर्जुआ पार्टियों ने भी खुद को एन.एस.डी.ए.पी. में अवसरवादी दल बदल या फिर इच्छाशक्ति के ही मर जाने के चलते खुद को समाप्त कर लिया. 14 जुलाई को राइक सरकार ने कानून जारी कर के पार्टियों का पुनर्गठन प्रतिबंधित कर दिया. इसने एन.एस.डी.ए.पी. के जर्मनी में एकमात्र राजनीतिक पार्टी होने की की घोषणा करते हुए किसी अन्य पार्टी को बनाना या बनाये रखना दंडनीय अपराध बना दिया. एक पार्टी राज्य अब हकीकत बन चुका था.
1 फ़रवरी को अपने पहले ही रेडियो संबोधन में हिटलर ने बेरोजगारी पर जबरदस्त-चौतरफा हमले की घोषणा करते हुए चार साल के अन्दर इस समस्या को हमेशा-हमेशा के लिये जड़ से मिटा देने का वादा किया था. मगर वह अच्छी तरह समझता था कि केवल लोक-लुभावन गाल बजाना काफी नहीं होगा, गाड़ी को पटरी पर लाने – अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए प्रोत्साहनों-पहलकदमियों की जरूरत होगी. इसलिए 1933 के मध्य में बेरोजगारी घटाने का कानून जारी किया गया. इसके जरिये पहले एक बिलियन और फिर बाद में 500 मिलियन रेइखमार्क अतिरिक्त रोजगार, खासकर अधिसंरचना विकास में सृजित करने के लिए आवंटित किया गया. अपनी शादी के लिए रोजगार छोड़ने वाली महिलाओं के लिए ब्याज मुक्त विवाह कर्ज जैसे कुछ और उपाय भी लागू किये गए. इसी के साथ शासन ने महिलाओं को श्रम बाज़ार से बाहर कर देने के लिए “दोहरा अर्जन बीमारी” (डबल-अर्नर सिंड्रोम) दूर करने का अभियान चलाया.
सरकार ने स्वैच्छिक श्रम सेवा – वेइमार रिपब्लिक द्वारा अपने अंतिम वर्षों में शुरू की गयी राज्य रोजगार योजना का भी विस्तार किया. इन सब उपायों से आधिकारिक रूप से पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या में कुछ कमी आई. आगे उसी साल एक राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क योजना शुरू की गयी. इस प्रोपेगैंडा के लिए कि हिटलर खुद “श्रम मोर्चे” पर लड़ाई की अगुवाई कर रहा था, हिटलर ने फ्रैंकफर्ट से दर्म्सताद तक के सड़कमार्ग निर्माण में खुदाई के लिए पहला फावड़ा चलाया. धीरे-धीरे सड़क निर्माण और कार उद्योग में रोजगार ने गति पकड़ी – खासकर हिटलर के जर्मनी की स्थितियों के अनुकूल एक छोटी कार उत्पादित करने के आदेश पर फॉक्सवैगन के रूप में “श्रमशील वर्ग के बजट में जनता कार” का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करने के चलते.
मगर आर्थिक पुनरुत्थान को गति देने और बेरोजगारी घटाने का सबसे बड़ा और दीर्घकालिक उत्प्रेरक जर्मनी के सैन्यीकरण से आया. हिटलर ने आदेश जारी किया “बिलियनों में धनराशियों को जुटाया जाना है क्यों कि जर्मनी का भविष्य एकमात्र और पूरी तरह से व्हेरमाष्ट (संयुक्त सैन्य बल) पर निर्भर है. ये सैन्य-औद्योगिक संकुल एक तीर से तीन निशाने मारेंगे – रोजगार सृजन; राष्ट्रीय अंधराष्ट्रवादी अहम् के उन्माद को संतुष्ट करना; और आक्रामक-कब्जाकारी युद्ध के लिए जरूरी नींव तैयार करना.
बर्तोल्त ब्रेश्त
मेरी भूख ने मुझे
दुखते पेट के साथ सुला दिया था.
तभी मैंने चीत्कार सुनी
हे, जर्मनी जागो !
तब ! देखा मैंने भीड़ को कदमताल करते :
थर्ड राइक की ओर, सुना मैंने उनको कहते.
सोचा मैंने, जीने के लिए कुछ भी तो नहीं था मेरे पास
मैं भो तो उन्हीं की राह, कर सकता हूँ कदमताल.
और जब मैं कर रहा था कदमताल, वहां मेरे बगल में था
उस दस्ते का सबसे मोटा आदमी
और जब मैं चीखा ‘हमें चाहिये रोटी और काम’
मोटा आदमी भी चीखा.
चीफ ऑफ़ स्टाफ पहने हुए था बूट
जबकि मेरे पांव थे भीगे हुए
मगर हम दोनों ही कर रहे थे कदमताल
पूरे मन से, कदम से कदम मिलाते हुए.
मैंने सोचा, बायें वाला रास्ता आगे को जाता था
उसने बताया मैं गलत था.
मैं उसके हुक्म के रास्ते गया
और अंधों की तरह घिसटता रहा.
और वे जो भूख से कमजोर थे
कदमताल करते रहे, निस्तेज मगर तने हुए
खाये-अघायों के साथ-साथ
किसी थर्ड रीख जैसी चीज की ओर.
उन्होंने मुझे बताया किस दुश्मन को मारना है
इसलिए मैंने उनकी बन्दूक ली और निशाना लगा दिया
और, जब मैं गोली चला चुका था, देखा मेरा भाई
था वह दुश्मन जिसका उन्होंने नाम लिया था.
अब मैंने जाना : वहां खड़ा है मेरा भाई
वह भूख है जो हमें एक करती है
जबकि मैं कर रहा था कदमताल
मेरे भाई और मेरे खुद के दुश्मन के साथ.
इसलिए मेरा भाई मर रहा है
मेरे अपने ही हाथों वह गिरा
फिर भी मैं जानता हूँ कि यदि वह हारा
मैं भी हार जाऊँगा.
राजनीतिक ताकत पर एकाधिकार हासिल कर चुकने के बाद हिटलर ने कई निर्णायक महत्व के विचारों की पुनर्परिभाषा और पुनर्प्रतिपादन का अभियान शुरू किया. 6 जुलाई को राइक गवर्नरों के सम्मलेन में हिटलर ने घोषित किया कि क्रांति को “स्थायी परिघटना” बने रहने की इजाज़त हरगिज़ नहीं दी जा सकती – क्रन्तिकारी धारा को उद्विकास की आधार भूमि बनने की दिशा में, “जनता की शिक्षा” की दिशा में मोड़ना होगा. गोएबेल्स ने अपने रेडियो संबोधन में इसे और स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया : “हम केवल तभी संतुष्ट हो सकेंगे जब हम सुनिश्चित हो जायेंगे कि समूची जनता हमें समझती है और अपना सबसे बड़ा पैरोकार मानती है”. गोएबेल्स ने साफ़-साफ़ कहा कि नात्जि़यों का लक्ष्य जर्मनी में केवल एक विचार, एक पार्टी और एक आस्था की स्थापना है (इसकी सटीक प्रतिध्वनि भारत में 2014 में सरदार पटेल की मूर्ति बनाने के अभियान में मोदी के आह्वान “एक भावना, एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक प्रतिबद्धता, एक लक्ष्य, एक मुस्कान”, भाजपा के “कांग्रेस मुक्त भारत” के आह्वान, जिसका असली आशय विपक्ष मुक्त भारत से है, और भाजपा व संघ कार्यकर्ताओं द्वारा हर किसी को, जो संघ की विचारधारा से सहमति नहीं रखता, देशद्रोही बता कर उसके लिए भारत में कोई जगह न होने के प्रलापों में देखी जा सकती है). इसका अर्थ यह था कि मीडिया, संस्कृति और शिक्षा के सारे क्षेत्रों को नात्ज़ी विचारों की लाइन में लाया जाना है.
नाज़ीवाद के निर्णायक तत्वों में से एक आदमी और औरत के बीच अन्तर – नस्लीय सम्बन्धों की वर्जना और निषेध था.
माइन काम्प्फ़ (हिटलर की आत्म कथा “मेरा संघर्ष”) में हिटलर यहूदी प
पिछले अध्यायों में हमने नात्ज़ीवाद की उत्पत्ति, विकासक्रम, और मूल विशेषताओं, एन.एस.डी.ए.पी. की राजनीतिक लाइन के उद्दण्ड तख्ता-पलट बगावत से संसदीय व गैर संसदीय (उन्मादी-आतंकी) संघर्ष रूपों के परिणामवादी संश्रय में विकास, और अंत में हिटलर के सबसे पहले राइक चान्सलर और फिर इस आधार कैम्प से निरंकुश तानाशाही के शिखर तक नाटकीय आरोहण-उभार की रूपरेखा प्रस्तुत की है. अब यहाँ इनसे सीखे गए सबकों को रेखांकित करना उपयोगी होगा.
नात्ज़ीवाद महज बेलगाम हिंसा, पुरानी साजिशों, चरम क्रूरता और व्यापकतम पैमाने पर दमन का ही नाम नहीं है. इन सब के साथ यह बराबर से गलाफाडू, व्यापकतम, निरंतर चलने वाला प्रोपेगैंडा और घुट्टी पिलाने वाला जन-दीक्षा (इंडाक्ट्रिनेशन) अभियान भी है. यह सिर्फ लोगों की पाशविक प्रवृत्तियों और प्रतिगामी विचारों/विश्वासों को ही अपील नहीं करती; यह राष्ट्र के प्रति निःस्वार्थ सेवा और महान उद्देश्य के लिए बलिदान-त्याग जैसी आदर्श भावनाओं को भी आवेग दे सकती है. इसलिए यह सिर्फ उजड्ड और लम्पट सर्वहारा को ही नहीं, बल्कि सच्चे देश भक्तों और आदर्शवादी छात्रों व युवाओं को भी आकर्षित करती है.
वस्तुतः उन्मादी वक्तृता और आतंक का सहयोगी – सहजीवी संश्रय दोनों को ही नृशंस और मारक बना देता है. आतंक केवल विरोध को मौन करने, गतिहीन करने, और कुछ हद तक भौतिक रूप से सफाया करने का ही औजार नहीं था : यह फ़ासिस्टों की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत की शो-केसिंग में उन्मादी और प्रदर्शनकारी प्रभाव लाने का भी काम करता था, जिसे बहुतेरे लोग जर्मनी की उस अराजकता और अव्यवस्था की स्थिति में समय की जरूरत के रूप में देखते थे. इस तरह यहूदियों को दी गयी नृशंस यातनायें अन्य तमाम लोगों के लिए सन्देश थीं कि फ़ासिस्टों की नाखुशी मोल लेने वाले व्यक्तियों अथवा सामाजिक समूहों की भी नियति यही होगी.
हिटलर के चान्सलर बनने से पहले के सालों में आतंक और उन्मादी वक्तृता के संश्रय समीकरण में उन्मादी वक्तृता प्राथमिक-मूलभूत तत्व थी. फ़ासिस्ट तानाशाही के सुदृढ़ीकरण काल (जनवरी 1933 से जून 1934) के दौर में इस संश्रय का समीकरण उलट गया. ट्रेड यूनियनों को कुचलने और राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करने के साथ-साथ कम्युनिस्टों, सोशल डेमोक्रेटों, और अन्य सत्ता विरोधियों को नियमित रूप से फासिस्ट ब्राउनशर्ट्स के “ब्राउन हाउसों” में बर्बर यातनायें देने के बाद उन्हें टूटी हुई पसलियों- हड्डियों के साथ उनके घरों और काम करने की जगहों पर जीवन्त चेतावनियों के रूप में भेजा जाता था. इसी के समानांतर यहूदी-विरोधी गोलबंदी और यहूदियों के सामाजिक बहिष्कार का अभियान “जर्मनों! केवल जर्मनों से ही खरीदो”, “जर्मनों ! अपनी चिकित्सा किसी और से नहीं बल्कि सिर्फ जर्मन से कराओ”, “जर्मनों ! केवल जर्मनों को ही अपने ऊपर न्याय करने दो”, जैसे नारों के साथ चलाया जा रहा था. इसी के साथ ही “जर्मनों ! केवल जर्मन साहित्य पढ़ो, केवल जर्मन कला का आनन्द लो” जैसे संकीर्ण राष्ट्रवादी/नस्लीय प्रोपेगैन्डा की भी कोई कमी नहीं थी.
आज ऐसे नारों के प्रतिरूपों से हम काफी परिचित हैं, जिनमें से काफी सारी पिछली सरकारों द्वारा शुरू की गयीं थीं (तब के जर्मनी और आज के भारत में, दोनों जगह). मगर चुनाव अभियान के दौर में किये गए “सबके लिए सब कुछ” के वादों को पूरा करना आसान काम नहीं था. सरकार ने जनता को फुसलाने के लिए घोषित किया कि इसकी पहली प्राथमिकता समूचे नीतिगत फ्रेमवर्क की सच्ची राष्ट्रवादी दृष्टि के साथ पूरी तरह ओवरहालिंग है (भारत में यह काम नीति आयोग को सौंपा गया) जिसके जरिये भविष्य के कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रभावी बदलावों की नींव डाली जा सके. फ्यूरर ने वादा किया कि एकबार फिर से “नयी जर्मनी” एक खुशहाल – फलता-फूलता राष्ट्र, “नेशनल सोशलिस्ट जनता का कृत्रिम रूप से बांटे गए वर्ग विभाजनों से मुक्त अपना समुदाय” होगा ( मोदी वाणी में “सामाजिक सद्भाव” – सबका साथ-सबका विकास !).
राज्य प्राधिकारियों की मिलीभगत और उभरता हुआ नीतिगत मतैक्यजैसा कि हम देख चुके हैं, ज्यादातर मामलों में न्यायपालिका नात्जि़यों के साथ बेहद नरमी से पेश आती रही थी. अगर बावेरिया सर्वोच्च न्यायालय हिटलर के लिए कानून द्वारा निर्दिष्ट पाँच साल की जेल सज़ा पर दृढ़ रहते हुए उसे 1928 के अंत तक सलाखों के पीछे ही रखता तो जर्मनी का ही नहीं, समूची दुनिया का आधुनिक इतिहास शायद बिलकुल अलग होता, क्योंकि तब उसे सत्ता पर कब्जे के पहले की तैयारी के वे निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण चार साल नहीं मिले होते.
न्यायालय द्वारा छोड़े जाने का आदेश जारी होते ही, हिटलर ने बावेरिया सरकार से पार्टी पर से प्रतिबन्ध हटाने की अपील की और वह इस बिना पर मान ली गयी कि “जंगली को अब पालतू बना लिया गया है”. यह दिखाता है कि किस तरह न्यायपालिका और प्रशासन दोनों ने इस जन्मते पिशाच को कितना कम कर के आँका था. इसी तरह, सेना में भी बहुतों ने, जिनमें सेवारत और सेवा निवृत्त दोनों तरह के शीर्षतम अधिकारी शामिल थे, हिटलर का खुल कर समर्थन किया, इस बात के बावजूद कि भूतपूर्व सैनिकों की भारी जमात फासिस्ट आन्दोलन में उसके लठैतों के रूप में शामिल हो रही थी – इसलिए नहीं कि हिटलर भी कभी सेना में रह चुका था, बल्कि इसलिए कि वे हिटलर के आक्रामक अंधराष्ट्रवाद के खुले और उन्मादी समर्थक थे.
यह जरूर था कि राइक प्रेसिडेंट के रूप में मार्शल हिन्डेन्बर्ग ने हिटलर का चान्सलर बनना काफी समय तक रोके रखा था. मगर ऐसा सिर्फ इसलिये था कि वह अच्छी तरह से जानता था कि हिटलर ज्यादा दिनों तक उसके प्राधिकार के मातहत नहीं रहने वाला था. नागरिक सेवाओं में हिटलर से सहानुभूति रखने वाले बहुतेरे अधिकारियों ने भी सैन्य बलों की तरह एन.एस.डी.ए.पी. की तमाम तरीकों से मदद की.
राज्य प्राधिकारियों का सहयोग अथवा सक्रिय मिलीभगत शासक वर्गों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों की वृहत्तर सहमति का प्रतिबिम्बन था कि रिपब्लिकन सरकार को हर हाल में बाहर का रास्ता दिखाना है, बेहतर हो अगर ऐसा संवैधानिक रास्ते से हो सके. इस नीतिगत आकांक्षा के चलते नात्ज़ी नेता के प्रति नफ़रत और भय के बावजूद उसके प्रतिद्वंदियों के लिए उनमें से सबसे ज्यादा भीड़ खींचने वाले को नज़रन्दाज करना असंभव था. यह राजनीतिक अपरिहार्यता अन्ततः वैयक्तिक और पार्टीगत प्रतिद्वंदिता पर भारी पड़ी और हिटलर आम सहमति से चान्सलर बन गया. उसके बाद कैबिनेट में हर किसी ने, यहाँ तक कि राइक प्रेसिडेंट ने भी वस्तुतः अपनी मूर्खता में- अपने विनाश की कीमत पर बुर्जुआ जनतंत्र की समूची नींव व अधिसंरचना को ध्वस्त करने और सारी ताकत अपने हाथों में केन्द्रित कर लेने में हिटलर की मदद की. यदा-कदा होने वाले आतंरिक मन-मुटावों के बावजूद, वाम धारा के अलावा समूचे राजनीतिक वर्ग ने “फ्यूरर स्टेट” बनाने में सहयोगी की भूमिका निभायी.
हिटलर ने अपने से कहीं ज्यादा अनुभवी प्रतिद्वंदियों पर बरतरी इसलिये हासिल की क्योंकि निश्चित रूप से वह उस जमात का सबसे योग्य खिलाड़ी था. राष्ट्रवाद के प्रभावी विमर्श के साथ “सोशलिस्ट” जोड़ कर उसने इसे गरीब हितैषी, मजदूरवर्ग हितैषी रंग-रोगन से सजा कर जर्मनी में सफलता पूर्वक बुर्जुआ राजनीति की एक नयी शैली अथवा प्रवृत्ति की शुरुवात की जिसे आज दक्षिण पंथी पापुलिज्म के नाम से जाना जाता है. दूसरी तरफ इसी के साथ “विशुद्ध जर्मन आर्य नस्ल” के लिए यहूदी के रूप में “अन्य” ईजाद कर के उसने एक ऐसा मनमाफिक निरीह सताए जाने लायक “आतंरिक दुश्मन” गढ़ा जिसके खिलाफ बहुसंख्यावादी जर्मन नस्लीय समुदाय को पार्टी के सामाजिक आधार के बतौर ध्रुवीकृत और गोलबन्द किया जा सकता था. “नेशनल सोशलिस्ट क्रांति” के इस विमर्श में “राष्ट्रीय” का मतलब नस्लवादी-बहुसंख्यावादी अंधराष्ट्रवाद की एक नयी प्रजाति, और “सोशलिस्ट” का मतलब छलावे की जुमलेबाजी के अलावा कुछ नहीं था. फासिस्ट औजारों के समूचे भंडार में उन्मादी वक्तृता और आतंक, राजनीतिक छल-प्रपंच और चालबाजियां, और निश्चय ही फ्यूरर पूजा के इर्द-गिर्द बुना गया यह टीम वर्क शामिल था. हिटलर ने इन सभी औजारों का अदभुत धूर्त दक्षता और दृढ़ निश्चय, कार्यनीतिक लचीलेपन व रणनीतिक चपलता, शातिर प्रवीणता व मिथ्यावादिता के साथ युद्धोत्तर परिस्थितियों को अपने अधिकतम फायदे, अपने वाम विरोधियों को हराते व दक्षिणपंथी प्रतिस्पर्धियों को पछाड़ते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किया. इन सब के बावजूद अन्ततः वह अपने को और अपनी सत्ता को बचा पाने में नाकामयाब रहा, यह एक अलग कहानी है.
“हिटलर के बिना नेशनल सोशलिज्म का उभार सोचा भी नहीं जा सकता था. उसके अभाव में, पार्टी राजनीतिक फलक के दक्षिण के तमाम जातीय-अंधराष्ट्रवादी गुटों में से एक बन कर रह गयी होती. इसके बावजूद युद्ध के तुरन्त बाद के सालों में बावेरिया और जर्मन रीख दोनों की ही विशिष्ट परिस्थितियाँ भी निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण थीं : आर्थिक त्रासदी, सामाजिक अस्थिरता और सामूहिक सदमे के विस्फोटक मिश्रण के बिना पापुलिस्ट आंदोलक-उद्वेलक हिटलर कभी भी गुमनामी के अँधेरे से निकल कर मशहूर राजनीतिज्ञ बनने की राह नहीं तय कर पाता. उस समय की परिस्थितियाँ हिटलर के हाथों में खेल गयीं और वह उनका इस्तेमाल करने में राष्ट्रवादी चरम दक्षिण के अपने किसी भी प्रतिद्वन्दी के मुकाबले कहीं ज्यादा धूर्त, अनैतिक, बेईमान और शातिर था.”
– वोल्कर उलरिश, “हिटलर एसेंट 1889 -1939”
हिटलर और मुसोलिनी दोनों की ही कहानियां हमें बताती हैं कि नात्ज़ीवाद/फासीवाद एकाधिकारी बुर्जुआ की सेवा करता है और अन्ततः उसकी कभी न संतुष्ट होने वाली और विस्तारवादी महत्वाकांक्षा का एक औजार बन जाता है, मगर वह इसके द्वारा उत्पादित नहीं होता[1]. बल्कि वह बुर्जुआ द्वारा अंगीकार किया जाता है जब आर्थिक व सामाजिक-राजनीतिक संकट के दौर में वह सत्ता पर काबिज हो चुका होता है या कम से कम सत्ता तक पहुंचने की दहलीज पर होता है. एक बार सत्ता पर कब्ज़ा कर लेने के बाद फासीवाद जल्द से जल्द खुद को अति-प्रतिक्रियावादी राजनीतिक प्रवृत्ति/आन्दोलन से वित्तीय पूँजी के सबसे प्रतिक्रियावादी-अंधराष्ट्रवादी – साम्राज्यवादी विस्तारवादी तत्वों की खुली आतंकी तानाशाही में बदलने की राह पकड़ता है (नवम्बर-दिसंबर 1933 में कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल की कार्यकारिणी के तीसरे विस्तारित प्लेनम में दी गयी परिभाषा). उल्लेखनीय है कि यह परिभाषा केवल सत्ता पर काबिज हो चुके फासीवाद पर लागू होती है, सत्ता में पहुँचने की जद्दोजहद करती पार्टी पर नहीं.
यह भी जरूरी है कि फासीवादी आन्दोलन की सामाजिक संरचना को फासीवादी प्रोजेक्ट अथवा किसी खास फासीवादी गुट/पार्टी का आम वर्ग चरित्र मान लेने के भ्रम में न रहा जाये. फासीवादी आबादी के हर हिस्से से अपने अनुयायियों की तलाश और भर्ती करते हैं, मगर वे खास रूप से बेरोजगार युवाओं, बिना रोजगार के मजदूरों, हताश-निराश बुद्धिजीवियों, और संकटग्रस्त लघु उत्पादकों – संक्षेप में आर्थिक संकट व सामाजिक अस्थिरता के कारण सबसे ज्यादा पीड़ित लोगों, जो अभी तक वाम दलों के राजनीतिक व संगठनात्मक दायरे के बाहर हैं, के बीच सफल रहते हैं[2]. इस तरह फासीवादी पार्टी का सामाजिक आधार अथवा दूसरे शब्दों में फासीवादी आन्दोलन की सामाजिक संरचना में पेट्टी बुर्जुआ और गरीबों की बहुलता के बावजूद विविधता बनी रहती है. मगर इसका वर्ग चरित्र इसकी वर्ग नीति और विचारधारा उस वर्ग से निर्धारित होती है जिसकी यह सेवा करता है और सत्ता में आने के बाद और भी नंगई के साथ सेवा के लिए राजनीतिक रूप से निर्दिष्ट होता है. अपनी शुरुवात के साथ ही नात्ज़ी पार्टी ने, ट्रेड यूनियनों पर भौतिक और मार्क्सवाद/बोल्शेविकवाद पर विचारधारात्मक हमले शुरू कर दिए, और वह भी ऐसे समय में जब कि जर्मनी अंतर्राष्ट्रीय मजदूर वर्ग आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़ा था. इन हमलों के जरिये नात्ज़ी पार्टी ने जर्मनी और दुनिया के बुर्जुआ की कर्तव्यनिष्ठ सेवा की और सत्ता में आने बाद इसने दुनिया की किसी भी अन्य सरकार के मुकाबले बढ़-चढ़ कर पूँजी की सेवा की. फासीवादी राज्य ने यह सेवा न केवल श्रम के दमन और नियंत्रण, और बुनियादी ढांचे, हथियार व सम्बंधित क्षेत्रों में जबरदस्त राजकीय निवेश के जरिये बाजार की सकल मांग वृद्धि सुनिश्चित करते हुए, बल्कि तमाम सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के निजीकरण जैसे अल्पज्ञात नीतिगत उपायों से भी की.
महान मार्क्सवादी कवि और नाटककार व हिटलर के समवर्ती बर्तोल्त ब्रेश्त ने इस उन्मत्त महत्वाकांक्षी पिशाच के उत्कर्ष को बेहद बारीकी से देखते-परखते हुए कहा था कि इसे रोका जा सकता था. ब्रेश्त के एक बहुत ही मौजूं और महत्वपूर्ण नाटक से इस पुस्तिका का शीर्षक उधार लेते हुए, हम भी इस दृष्टिकोण से सहमत हैं, और हमारा विश्वास है कि यहाँ जुटाए गए सारे तथ्य भी इसकी पुष्टि करते हैं.
क्या हैं ये तथ्य ?
जैसा कि हम देख चुके हैं, हिटलर 50% से ज्यादा के स्पष्ट मतादेश के बल पर सत्ता में नहीं आया था. एक-के-बाद-एक पूर्ववर्ती सरकारों के अल्प जीवन से पैदा होने वाली राजनीतिक शून्यता का फ़ायदा उठाते हुए उसने एक मज़बूत और स्थायी सरकार देने, सामाजिक अराजकता का अंत करने के वादे और अपनी राष्ट्रीय-समाजवादी लफ्फाजियों के बल पर जनता के बड़े हिस्से को आकर्षित किया. सितम्बर 1930 और जुलाई 1932 के दौरान एन.एस.डी.ए.पी. ने इसका चुनावी फ़ायदा उठाने में लगातार बढ़त बनायी, मगर 6 नवम्बर के राइकस्ताग चुनावों में इसे भारी धक्का लगा जब इसकी सीटें चार महीने पहले के 230 से घट कर 196 रह गयीं. दिसंबर में भी नात्ज़ी अश्वमेध का रथ थुरिन्गिया चुनाव में करीब 40% मतों के नुक्सान के साथ ध्वस्त हो गया. मगर इसके बावजूद अगले ही महीने में हिटलर की चान्सलर के रूप में ताजपोशी हो गयी – कैसे, यह हम देख चुके हैं और निश्चय ही यह अपरिहार्य बिलकुल नहीं था.
क्या जर्मनी की जनता यहूदियों के खिलाफ हिटलर के राजनीतिक व भौतिक युद्ध में शामिल थी? बिलकुल नहीं. इसके बावजूद फासिस्ट यहूदी अल्पसंख्या और जर्मन जातीय बहुसंख्या के बीच खायी खोदने में सफ़ल रहे. इस बहुसंख्या ने नंगी बर्बरता के ताण्डव को अनावश्यक व अन्यायपूर्ण अतिरेकों के रूप में देखते हुए भी नस्लीय आधार पर कानूनी भेदभाव और बहिष्करण को निष्क्रिय रह कर स्वीकार कर लिया. नात्ज़ी, यहाँ के संघियों की तरह ही ऐसे अभियानों के बल पर मतदाताओं के सामने बहुसंख्या की तथाकथित श्रेष्ठता के सबसे आक्रामक और इसलिए सबसे प्रभावी चैम्पियन बन कर आये. निःसंदेह इस रणनीति का उन्हें चुनावों में भरपूर फ़ायदा मिला.
इन सब के बावजूद वाम हमेशा ही सबसे मजबूत चुनौती की ताकत बना रहा. अपनी शुरुवात से, वेइमार रिपब्लिक वाम का गढ़ था. 1919 के पहले राइकस्ताग चुनावों में एस.पी.डी. और यू.एस.पी.डी. (जो 1917 में एस.पी.डी. से अलग हुई थी) को मिला कर 45.6% वोट मिले थे. राइकस्ताग के अंतिम चुनाव नतीजों पर भी नजर डालने पर पाते है कि दोनों वाम पार्टियों (एस.पी.डी. और के.पी.डी.) के सम्मिलित जीते प्रतिनिधियों की संख्या (नात्जि़यों के 196 के मुकाबले 221) और मत अनुपात (नात्जि़यों के 33. 09% के मुकाबले 37. 29%) दोनों ही दृष्टियों से नात्जि़यों से कहीं ज्यादा थी[3]. अगर दोनों पार्टियों ने मिल कर चुनाव लड़ा होता और इससे भी महत्वपूर्ण यह कि अगर उन्होंने मिल कर फ़ासिस्टों का सड़कों पर, फैक्ट्रियों और खेतों में मुकाबला किया होता, तो उन्होंने न सिर्फ चुनावी जंग में और भी अधिक प्रभावी और निर्णायक प्रदर्शन किया होता, बल्कि फ़ासिस्टों को राजनीतिक व नैतिक रूप से भी करारी मात दी होती. वाम की लगातार बढ़ती हुई यह चुनौती संभवतः एक बड़ा कारण थी जिसके चलते राजशाही अभिजात्य हिन्डेन्बर्ग समेत शासक वर्गों और उनके प्रतिनिधियों ने अन्ततः पूँजी के शासन को बचाए रखने के लिए अंतिम उपाय के बतौर नात्जि़यों को स्वीकार किया. जिस तरह से विभाजित वाम ने इस विशाल और ज्यादातर संगठित व सचेत व्यापक जन समर्थन को बरबाद कर दिया, वह इतिहास का एक ऐसा नितान्त दुखदायी अध्याय है जिसमें हमारे लिए आज की परिस्थितियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण सबक हैं.
दोनों वाम पार्टियों की एकजुट होने में विफलता उनकी विपरीत विचारधारात्मक व राजनीतिक अवस्थितियों में निहित थी. 1914 से ही, जब एस.पी.डी. नेतृत्व ने प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मन साम्राज्यवादियों का पक्ष लिया था, और इस तरह सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद व क्रन्तिकारी मार्क्सवाद से बुर्जुआ राष्ट्रवाद व संशोधनवाद में पतित हुए थे, और जब पार्टी के क्रन्तिकारी हिस्सों ने अलग हो कर स्पार्टाकस लीग बना ली थी (जो के.पी.डी. की पूर्वपीठिका बनी), दोनों पार्टियां लगातार एक दूसरे से दूर होती चली गयी थीं और अक्सर एक दूसरे से टकराती रहती थीं. 1919 में उन्होंने एक दूसरे को क्रांति और प्रतिक्रांति के विपरीत छोरों पर खड़े पाया : एबर्ट-शायदेमान सरकार ने लक्जेम्बर्ग और लीबनेश्त सहित क्रांतिकारियों के खिलाफ फ्रीकार्प भेड़ियों को छोड़ दिया. इसके बाद से के.पी.डी. लगातार जुझारू गैर-संसदीय संघर्षों के साथ संसदीय संघर्षो को जोड़ने, (गैर-संसदीय पर स्पष्ट बल के साथ) की नीति पर चलती रही. दूसरी ओर एस.पी.डी. ने संसदीय संकीर्णतावाद और अर्थवाद के दलदल में धंसते हुए अपने कृषि सुधार कार्यक्रम से भी किनारा कर लिया. 1929 में बर्लिन ने “ब्लुटमाई” – ख़ूनी रविवार – का त्रासद नज़ारा देखा जब एस.पी.डी. सरकार ने के.पी.डी. रैली पर गोलियाँ चलवा कर तीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. दूसरी ओर के.पी.डी. ने 1931 में अपने को नितान्त हास्यास्पद बना लिया जब पहले तो उसने नाजियों द्वारा प्रशिया सरकार को अपदस्थ करने के लिए प्रायोजित जनमत संग्रह का विरोध किया और जब एस.पी.डी. ने विरोध के लिए उसके संयुक्त मोर्चे में शामिल होने से इंकार कर दिया, उसी जनमत संग्रह को “लाल जनमत संग्रह” बताते हुए उसका समर्थन करना शुरू कर दिया ! फ़ासिस्टों और अन्य धुर दक्षिण पंथी गुटों के साथ कम्युनिस्टों को एक जनतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार को हटाने के लिए अभियान चलाते देखना बेहद तकलीफदेह नज़ारा था. बहरहाल, जर्मनी की जनता कहीं ज्यादा परिपक्व और समझदार निकली और उसने जनमत संग्रह को भारी अन्तर से नकार दिया.
दोनों पार्टियों के बीच लगातार टकराहटों की जड़ एक दूसरे के प्रति उनका नितान्त नकारात्मक राजनीतिक नजरिया और आकलन था. के.पी.डी. का मानना था कि गंभीर पूंजीवादी संकट के सन्दर्भ में यह सामाजिक जनवाद था जो मजदूरों को पूंजीवाद से लड़ कर उसे समाप्त करने से रोकता था (यहाँ तक बात सही थी) और इसलिए वही मुख्य दुश्मन था (जो बिलकुल गलत था); इसके चलते “सामाजिक फासीवाद” की खतरनाक थीसिस ने जन्म लिया जिसमें सोशल डेमोक्रेसी और फासीवाद को जुड़वाँ भाइयों की तरह देखा जाने लगा. कई अवसरों पर के.पी.डी. ने संयुक्त संघर्ष के लिए अपील की मगर एस.पी.डी. हमेशा ठुकराती रही. 1931 के लीप्जिग पार्टी अधिवेशन में एस.पी.डी. चेयरमैन ओट्टो वेल्स ने कहा – “बोल्शेविज्म और फासीवाद भाई हैं. वे दोनों ही हिंसा और तानाशाही पर टिके हैं, भले ही चाहे जितना सोशलिस्ट या रेडिकल वे खुद को दिखायें.” इस स्तर की परस्पर शत्रुता से, यह स्वाभाविक था कि निचले स्तरों पर कुछ अनुकरणीय कामरेडाना उदाहरणों के बावजूद दोनों पार्टियाँ यहाँ तक कि आत्मरक्षा में भी एकजुट नहीं हुईं. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि एस.पी.डी. नेतृत्व की नीतिगत अपंगता के बावजूद उनकी कतारें और राइकस्ताग डेपुटियों समेत कई नेता नात्ज़ी चान्सलर के भयावह कदमों का जोरदार प्रतिरोध करते रहे.
वाम नेतृत्व की राजनीतिक कमियों और पहाड़ जैसी भूलों के सापेक्ष जो बात सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण आश्वस्ति देती है, वह है जर्मन श्रमिकों का फासीवाद के खिलाफ प्रतिरोध में गजब का साहस, प्रतिबद्धता और वर्गीय एकता. प्रोफ़ेसर हेट्ट “वर्ग संघर्ष और हिटलर का उभार” में लिखते हैं : “1930 में राइकस्ताग चुनावों में जब नात्जि़यों ने 18.3% की बढ़त पा ली थी, फैक्ट्री काउंसिलों के चुनावों में उन्हें प्रतिनिधियों की संख्या का नितान्त निराशाजनक मात्र 0.51% ही हासिल हुआ”. मगर पार्टी नेताओं के ऐसे किसी भी संघर्ष के विचार से भय से काँप उठने का हवाला देते हुए, जिसके क्रांति या गृहयुद्ध में विकसित हो जाने की सम्भावना हो, हेट्ट आगे कहते हैं : “1931 में ईजेर्ने फ्रंट (आयरन फ्रंट)[4] की स्थापना नेतृत्व की राजनीतिक निष्क्रियता से कतारों के असंतोष की काट के लिए की गयी थी. आयरन फ्रंट की एक रैली में एक कार्यकर्ता ने कहा कि सोशलिस्ट अगर केवल जनतांत्रिक तरीकों से फ़ासिस्टों का मुकाबला करना चाहते हैं तो वे पागलखाने भेज दिए जाने लायक हैं. और एक एस.पी.डी. दुकान कर्मचारियों की बैठक में किसी ने तर्क दिया कि अगर दूसरे गृह युद्ध की चुनौती दे रहे हैं तो हम उनके सामने शांति का हाथ नहीं लहरा सकते, अगर दूसरे गोलियों की बौछार कर रहे हैं तो हम कैंडी नहीं उछाल सकते. 1931 की गर्मियों में ही एस.पी.डी. नेतृत्व ने सोशलिस्ट यूथ संगठन को भंग कर दिया क्योंकि वह नेतृत्व की कन्जर्वेटिव दिशा-दृष्टिकोण का लगातार विरोध कर रहा था.”
हमारे देश में आज हम और मजदूर वर्ग भाजपा सरकार के खिलाफ संघर्ष के अग्रिम मोर्चे पर मार्च कर रहे हैं. भारतीय वाम सौ साल पहले के अपने जर्मन कामरेडों जितना भले ही मज़बूत न हो, मगर अच्छी बात यह है कि वे न सिर्फ अपनी नज़दीकियाँ बढ़ा रहे हैं, बल्कि दलित संगठनों आदि संघर्षशील ताकतों के साथ भी जुड़ रहे हैं. बुर्जुआ पार्टियों की बहुतायत भाजपा-एनडीए कुनबे में शामिल होने के बजाय शासकीय गंठजोड़ के खिलाफ एक संयुक्त विरोध खड़ा करने का प्रयास कर रही हैं मगर उनमें से ज्यादातर बढ़ते हुए आतंरिक कलह का शिकार हैं. भारत में फासीवाद का निश्चित रूप से सफल प्रतिरोध किया जा सकता है और उसे चुनावी जंग और सामाजिक-राजनीतिक ताकत दोनों ही क्षेत्रों-मोर्चों पर निस्संदेह निर्णायक मात दी जा सकती है.
फुट नोट :
1. उद्योग जगत के महाबलियों ने ट्रेड यूनियन आन्दोलन पर नाज़ी हमलों का समर्थन किया, पर उनके द्वारा फैलाई गयी सामाजिक अव्यवस्था का वे विरोध करते थे. यह प्रेम-बैर वाला संम्बंध 1928 से पूरी तरह नाज़ी समर्थन में बदल गया जब बड़े पूंजीपति वर्ग और उसकी पार्टियों को लगा कि अब खुल कर बोलने का समय आ गया है और नाज़ी पार्टी सत्ता की ओर तेजी से बढ़ रही है.
2. जर्मनी में फासिस्टों और वामपंथियों के बीच समान सामाजिक आधारों के बीच राजनीतिक प्रभुत्व बनाने की रस्साकसी साफ साफ दिखाई दे रही थी. जहां वर्ग सचेत संगठित मजदूर सामाजिक जनवादियों और कम्युनिस्टों का मजबूत आधार बने रहे, वहीं अन्य दमित-उत्पीडि़त तबकों के बीच सामाजिक जनवादी वोट बैंक के बड़े हिस्से को फासीवादी अपनी ओर जीतने में सफल रहे. इस अनुभव से हम सीख सकते हैं कि फासीवाद को रोकने के लिए वाम को अपने पारम्परिक मजदूर/ मजदूर-किसान आधार से आगे जा कर आबादी के अन्य तबकों में राजनीतिक और सांगठनिक कार्यों को विस्तार देना जरूरी है.
3. पिछले चुनावों में (जुलाई 1932) एस.डी.पी. और के.पी.डी. ने 222 सीटें हासिल कीं जो एन.एस.डी.ए.पी. से मात्र 8 कम थीं, और इनका वोट प्रतिशत मिला कर 35.9 था जो एन.एस.डी.ए.पी. के 37.27 प्रतिशत से मात्र 1.37 प्रतिशत कम था.
4. नाज़ी विरोधी, राजशाही विरोधी और कम्युनिस्ट विरोधी अर्धसैन्य संगठन जो दिसम्बर 1931 में एस.पी.डी. ने बनाया था. यह मजदूर वर्ग, उदारवादी समूहों और एस.पी.डी. के युवा संगठन के संयुक्त मोर्चे के रूप में काम करता था.
** डेविड ओलेर को मार्च 1943 से जनवरी 1945 तक आश्वित्ज़ में “सोन्देरकोमान्दो” (एक खास तरह के बंधुआ मजदूर) के तौर पर बन्दी रखा गया था, जिसका काम मृत्युदाह की भट्ठियों में झोंके गए लोगों के अवशेषों को खाली करना और गैसचेम्बरों से लाशों को हटाना था. वह नाज़ियों के पैशाचिक प्रयोगों का भी गवाह था और उससे जबरन चित्रकार और एस.एस. के लिए चिट्ठियां लिखने वाले का काम लिया जाता था. 1945 में मुक्त होने के बाद उसने उन लोगों के प्रति अपने श्रद्धांजलि दायित्व के रूप अपनी कला सर्जना की शुरुवात की जो इस पिशाच लीला में जीवित नहीं बच सके थे.
(अगस्त 1923 के लेबर मासिक पत्रिका में प्रकाशित क्लारा ज़ेटकिन के लेख के चुनिन्दा अंश)
फासीवाद विश्व बुर्जुआ की सर्वहारा के खिलाफ आम आक्रामकता की संघनित अभिव्यक्ति है. इसलिये इसे उखाड़ फेंकना बेहद जरूरी है... हम लोगों के लिए फासीवाद को हराना काफी आसान हो जायेगा, अगर हम इसके चरित्र-स्वभाव का साफ़-साफ़ गहराई से अध्ययन कर सकें. फासीवाद, ... वस्तुगत दृष्टि से देखने पर, बुर्जुआ के खिलाफ सर्वहारा की आक्रामकता की प्रतिक्रिया में बदले की कार्यवाही नहीं, बल्कि रूस में शुरू हुई क्रांति को आगे बढ़ा पाने में सर्वहारा की विफलता की सज़ा है. फासिस्ट नेता कोई छोटी सी अलग-थलग जाति न हो कर आबादी के व्यापकतम तत्वों में गहराई से पैबस्त होते हैं.
हमें फासीवाद पर न सिर्फ सामरिक रूप से, बल्कि राजनीतिक और विचारधारात्मक रूप से भी विजय पानी होगी... फासीवाद, अपने हिंसक कुकृत्यों को अंजाम देने में अपने सारे आवेग के साथ, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के पतन व बिखराव की अभिव्यक्ति और बुर्जुआ राज्य के अंत के लक्षण के अलावा और कुछ नहीं है. यह उसकी जड़ों में से एक है... फासीवाद की दूसरी जड़ सुधारवादी नेताओं की गद्दारी की प्रवृत्ति के चलते विश्व क्रांति को लगे धक्कों में है. पेट्टी बुर्जुआ की बड़ी संख्या ने, जिसमें यहाँ तक कि मध्यम वर्ग भी शामिल हैं, अपनी युद्ध काल की मानसिकता को सुधारवादी समाजवाद के साथ सहानुभूति में इस उम्मीद के साथ त्याग दिया है कि यह सुधारवादी समाजवाद जनतांत्रिक लाइनों पर समाज में सुधार ला सकेगा. वे अपनी उम्मीदों में निराश हुए हैं. वे अब देख सकते हैं कि सुधारवादी नेता बुर्जुआ के साथ समझौतों की गलबहियों में हैं. और सबसे खराब बात यह है कि इन समुदायों ने न सिर्फ सुधारवादी नेताओं, बल्कि समूचे समाजवाद के प्रति अपना विश्वास खो दिया है. समाजवादी सहानुभूति रखने वाले निराश-हताश समुदायों के साथ सर्वहारा – उन मजदूरों के भी बड़े हिस्से जुड़ रहे हैं, जिन्होंने न सिर्फ समाजवाद बल्कि खुद अपने वर्ग के प्रति भी विश्वास खो दिया है. सच्चाई के साथ यह भी कहा जाना चाहिये कि – रूसियों को छोड़ कर – कम्युनिस्ट भी इन तत्वों के फासीवाद की कतारों में चले जाने के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि कई बार हमारी कार्यवाहियां जन समुदायों को पर्याप्त रूप से उद्वेलित – आवेगित कर पाने में विफल रहती हैं.
फासीवाद अलग-अलग देशो में अलग-अलग चरित्र अपनाता है. इसके बावजूद इसकी दो चारित्रिक विशिष्टतायें हर देश में बनी रहती हैं - एक क्रन्तिकारी कार्यक्रम का दिखावा, जो बड़ी शातिर धूर्तता के साथ व्यापक जन समुदायों के हितों और मांगों के अनुरूप गढ़ा जाता है, और दूसरी : नितान्त नृशंस और बर्बर हिंसा...
इटली के बाद फासीवाद जर्मनी में सबसे मज़बूत है. युद्ध के नतीजे, और क्रांति की विफलता के चलते, जर्मनी की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कमजोर है. किसी भी दूसरे देश में क्रांति की वस्तुगत परिस्थितियों की परिपक्वता और मजदूर वर्ग की आत्मगत अपरिपक्वता का अंतर इतना विषम और तीखा नहीं है जितना जर्मनी में. किसी भी दूसरे देश में सुधारवादी इतनी बुरी तरह से विफल नहीं हुए थे जितना जर्मनी में (सन्दर्भ : एस.डी.पी.). पुराने इन्टरनेशनल की किसी भी अन्य पार्टी की विफलता से कही ज्यादा आपराधिक उनकी विफलता थी, क्योंकि ये वही थे जिन पर एक ऐसे देश में में बिलकुल अलग साधनों-तरीकों से सर्वहारा की मुक्ति के संघर्ष को चलाने- आगे ले चलने की जिम्मेदारी थी, जहाँ का मजदूर वर्ग किसी भी अन्य देश की अपेक्षा ज्यादा पुराना और बेहतर संगठित था.
... कम्युनिस्ट पार्टियों को न सिर्फ शारीरिक श्रम के सर्वहारा का वेनगार्ड, बल्कि मानसिक श्रम करने वाले श्रमिकों के हितों का भी उत्साही-आवेगी रक्षक होना चाहिये. उन्हें बुर्जुआ विरोध में अपने-अपने हितों और भविष्य की उम्मीदों के साथ शामिल हुए समाज के तमाम हिस्सों का नेता बनना होगा... हमें यह निश्चित रूप से समझना होगा कि फासीवाद उन लोगों का आन्दोलन है जो हताश-निराश हैं और जिनका अस्तित्व बर्बाद हो चुका है. इसलिए हमें निश्चय ही उन व्यापक समुदायों को जीतने या अपने साथ जोड़ने की कोशिश करनी होगी जो अभी भी फासिस्ट खेमे में हैं. मैं हमारी उस वैचारिकी पर जोर देना चाहूंगी कि हमें इन समुदायों की आत्मा को जीतने-पाने के लिए विचारधारात्मक रूप से संघर्ष करना ही होगा. हमें यह समझना ही होगा कि वे न केवल अपनी वर्तमान त्रासदियों-संकटों से पार पाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि वे एक नए दर्शन की भी चाहना रखते हैं... हमें खुद को सिर्फ अपने राजनीतिक और आर्थिक कार्यक्रम के लिए संघर्ष तक ही सीमित नहीं रखना होगा. हमें इसी के साथ-साथ जन समुदायों को कम्युनिज्म के आदर्शों को एक दर्शन के रूप में भी आत्मसात कराना होगा...
हमें हर हाल में अपने नए कार्यभारों के अनुरूप अपने काम के तरीकों को संयोजित करना होगा. हमें जन समुदायों से उनके समझ में आने वाली भाषा-शैली में ही बात करनी होगी – अपने विचारों से कोई समझौता किये बगैर. इस तरह फासीवाद के खिलाफ संघर्ष हमारे लिए तमाम नए कार्यभार लाता है.
(ज्यार्जी दिमित्रोव, जनरल सेक्रेटरी, कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल द्वारा सातवीं विश्व कांग्रेस में 2 अगस्त 1935 को प्रस्तुत रिपोर्ट के चुनिन्दा अंश)
“कामरेडों, अपनी छठीं कांग्रेस (1928) में ही कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने विश्व सर्वहारा को यह चेतावनी देते हुए कि एक नया फ़ासिस्ट आक्रमण तैयारी में है, इसके खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया था. कांग्रेस ने इंगित किया था : “अपने कमोबेश विकसित रूप में फासीवादी प्रवृत्तियां और कीड़े लगभग सभी जगह पाये जा सकते हैं...
“सत्ता में फासीवाद को कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल की कार्य कारिणी के तेरहवें प्लेनम ने वित्तीय पूँजी के सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे अंधराष्ट्रवादी और सबसे साम्राज्यवादी तत्वों की नंगी तानाशाही के रूप में बिलकुल सटीक चिन्हित किया था...
“फासीवाद और फासीवादी तानाशाही विभिन्न देशों में ऐतिहासिक, सामाजिक व आर्थिक स्थितियों, राष्ट्रीय विशिष्टताओं, और उस देश की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के अनुरूप अलग-अलग रूप ले सकती है. ऐसे देशों में, खासकर जहाँ फासीवाद का व्यापक जनाधार नहीं है, और जहाँ फासीवादी बुर्जुआ के खेमे में उसके विभिन्न गुटों-समूहों के बीच का संघर्ष काफी तीखा है, फासीवाद तुरंत संसद भंग करने का दुस्साहस नहीं करता बल्कि अन्य बुर्जुआ पार्टियों और सामाजिक जनवादी पार्टियों को भी कुछ हद तक वैधता बनाए रखने की इजाजत देता है. दूसरे देशों में, जहाँ शासक बुर्जुआ को जल्दी ही क्रांति के विस्फोट का भय होता है, फासीवाद अपना निर्बाध राजनीतिक एकाधिकार स्थापित कर लेता है – या तो तुरंत या फिर सारी प्रतिस्पर्धी पार्टियों और समूहों के खिलाफ आतंक व हत्या का राज कायम करने के जरिये. मगर यह फासीवाद के, जब वह खासे संकट में होता है, अपना आधार विस्तारित करने, और बिना अपना वर्ग चरित्र बदले, अपनी खुली आतंकी तानाशाही को संसदवाद के भोथरे छद्म के साथ जोड़ने में बाधा नहीं बनता.
“फासीवाद का सत्तारोहण एक बुर्जुआ सरकार से दूसरी में सामान्य संक्रमण नहीं, बल्कि बुर्जुआ वर्ग वर्चस्व के एक राज्य रूप- बुर्जुआ जनतंत्र – से नंगी आतंकी तानाशाही में संक्रमण है. इस विभेद को नज़रन्दाज करना भारी भूल होगी, एक ऐसी भूल जो क्रांन्तिकारी सर्वहारा को फ़ासिस्टों द्वारा सत्ता पर कब्जे के आतंक के खिलाफ लड़ने के लिए शहरों और गाँवों की श्रमशील जनता के व्यापकतम हिस्सों को गोलबंद करने और खुद बुर्जुआ खेमे के अन्दर के अंतर्विरोधों का फायदा उठाने से रोक देगी... आमतौर पर फासीवाद पुरानी बुर्जुआ पार्टियों के परस्पर और कई बार बेहद तीखे संघर्षो के क्रम में, अथवा इन पार्टियों के हिस्सों, यहाँ तक कि खुद फासिस्ट खेमे के अन्दर के संघर्षो के क्रम में सत्ता में आता है...
“फासिस्ट तानाशाही के स्थापित होने से पहले, बुर्जुआ सरकारें आम तौर पर कई प्रारंभिक दौरों से गुजरती हुई, ऐसे प्रतिक्रियावादी उपाय अपनाती हैं, जो फासीवाद के सत्ता तक पहुँचने में सीधे सहायक होते हैं. वे लोग जो इन प्रारंभिक /तैयारी के दौर के बुर्जुआ के प्रतिक्रियावादी उपायों और फासीवाद के उभार के खिलाफ संघर्ष नहीं करते, वे फासीवाद की विजय को रोक पाने की स्थिति में नहीं होते, बल्कि इसके उलट, उस विजय को आसन बना देते हैं...
“जन समुदायों पर फासीवाद के प्रभाव के स्रोत क्या हैं? फासीवाद जन समुदायों को आकर्षित कर लेने में इसलिये सफल हो जाता है कि यह अपने वक्तृत्व कौशल की धूर्तता के जरिये उनकी सबसे जरूरी और आपात मांगों-जरूरतों को अपील करता है. फासीवाद न सिर्फ जन समुदायों के अन्दर गहरे जड़ जमाये हुए पूर्वाग्रहों को हवा देता है, बल्कि उनकी श्रेष्ठतर भावनाओं के साथ भी खेलता है – उनकी न्याय की भावनाओं के साथ, और कभी-कभी उनकी क्रन्तिकारी परम्पराओं के साथ भी. आखिर क्यों जर्मन फासिस्ट, बड़े बुर्जुआ के वे दलाल और समाजवाद के मरणान्तक दुश्मन, जनता के बीच खुद को “सोशलिस्टों” के रूप में पेश करते थे, और अपने सत्तारोहण के अभियान को “क्रांति” का नाम देते थे ? क्योंकि वे क्रांति के प्रति जनता की उस आस्था और समाजवाद के प्रति उस चाहना का शोषण करने की कोशिश कर रहे थे जो जर्मनी के श्रमशील जन समुदायों के दिलों में बसती थी...
“फासीवाद उनके बीच एक ईमानदार और भ्रष्ट न हो सकने वाली सरकार की मांग के साथ आता है. जनता के बुर्जुआ सरकारों के प्रति गहनतम मोहभंग पर दांव खेलते हुए फासीवाद निहायत दोगलेपन के साथ भ्रष्टाचार का विरोध करता है...
“यह बुर्जुआ के सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्सों के हित में है कि फासीवाद जन समुदायों के उन हिस्सों में अपने पैठ बनाये जो पुराने बुर्जुआ को छोड़ चुके होते हैं. यह काम फासीवाद इन समुदायों को बुर्जुआ सरकारों के खिलाफ अपने हमलों के तीखेपन और पुरानी बुर्जुआ पार्टियों के प्रति अपने समझौताविहीन दृष्टिकोण के जरिये आकृष्ट कर के करता है.
बुर्जुआ प्रतिक्रिया की अन्य तमाम किस्मों को अपनी उन्मादी सनक और दोगलेपन में कहीं पीछे छोड़ते हुए फासीवाद अपनी लफ्फाजी की वक्तृता को हर देश की राष्ट्रीय विशिष्टताओं की संगति में और यहाँ तक कि एक राष्ट्र के अन्दर भी विभिन्न सामाजिक समूहों-संस्तरों की विशिष्टताओं के अनुरूप ढाल लेता है. और पेट्टी बुर्जुआ, और यहाँ तक कि मजदूर वर्ग का एक हिस्सा भी, जो अभाव, बेरोजगारी, और अपने अस्तित्व की असुरक्षा का गहनतम संकट झेल रहा होता है, फासीवाद की सामाजिक व अंधराष्ट्रवादी लफ्फाज वक्तृता का शिकार बन जाता है...”
आर.एस.एस. के शुरूआती वर्षों में एम.एस. गोलवलकर ने हिटलर को एक 'रोल मॉडल' के रूप में देखा, लेकिन होलोकॉस्ट (यहूदियों का जनसंहार) और दूसरे विश्व युद्ध के बाद ऐसा करना सम्भव नहीं रह गया था. आज नरेन्द्र मोदी सम्पूर्ण संघ नेटवर्क की मदद से उसी परम्परा को विचारों एवं कार्यवाहियों में पुनर्जीवित और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में स्कूल की किताबों में उन्होंने हिटलर को महान राष्ट्रवादी नेता बता प्रशंसा करते हुए एक लेख शामिल करवाया [1] और गुजरात मॉडल को भारत में फासीवाद के 'पायलट प्रोजक्ट' के रूप में विकसित किया. अब प्रधानमंत्री के रूप में वे अभूतपूर्व रूप से कॉरपोरेट प्रभुत्व वाले और ट्रम्प के अमेरिका से गहरी साझीदारी वाले एक निरंकुश हिन्दू राष्ट्र के बहुप्रतीक्षित लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
हमारी विशिष्ट राष्ट्रीय परिस्थितियों में चल रहे फासीवादी अनुकूलन का एक आकलन अपने पाठकों को देने के लिए हम यहां भाकपा(माले) लिबरेशन के 10वें अखिल भारतीय महाधिवेशन में गृहीत ‘राष्ट्रीय परिस्थिति पर प्रस्ताव’ [2] से उद्धरणों को दे रहे हैं. यह महाधिवेशन ‘फासीवाद को हराओ, जनता का भारत बनाओ’ के केन्द्रीय नारे के साथ 23-28 मार्च 2018 को पंजाब के मानसा में सम्पन्न हुआ था.
“भारत ने पिछले चार सालों में बड़े पैमाने का राजनीतिक बदलाव देखा है. भाजपा ने शासकवर्गों की वर्चस्वशाली प्रतिनिधि पार्टी के बतौर निर्णायक तौर पर कांग्रेस को पीछे धकेल दिया है ... केन्द्र एवं राज्यों में भारत के प्रमुख शासक दल के रूप में भाजपा के इस उभार के चलते यह पार्टी और पूरा संघ परिवार अभूतपूर्व तेजी एवं आक्रामकता के साथ अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सक्षम हुआ है.
“2014 के संसदीय चुनाव के अभियान को भाजपा ने अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव अभियान की तरह संचालित किया. इस दौरान मोदी और उनके तथाकथित गुजरात माॅडल के इर्द-गिर्द एक मजबूत मिथक गढ़ा गया. मोदी द्वारा दिए गए ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ जैसे नारों और ‘भारत-विजय’ जैसी रैलियों में यह आक्रामकता साफ जाहिर थी. तबसे आज तक भाजपा 2014 की चुनावी जीत (केवल 31 फीसदी वोट के साथ) को इस तरह समझ रही है मानो उसने सच में भारत-विजय कर ली हो और संघ-भाजपा की विचारधारा और एजेंडा के अनुरूप हर चीज को बदल देने का लाइसेंस उनको हासिल हो गया हो. भाजपा ने संविधान पर खुलेआम हमला बोल दिया है और मोदी के अनंत हेगड़े जैसे मंत्रियों ने सीधे-सीधे संविधान बदलने के भाजपा के मिशन पर जोर दिया है.
“भारत में फासीवादी हमला राज्य और तमाम गैर-सरकारी ताकतों, दोनों के आपस में तालमेल और घनिष्ठ गठजोड़ द्वारा संचालित है. राज्य मशीनरी लगातार निरंकुश और हस्तक्षेप करने वाली होती गयी है, जबकि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस संघ गिरोह को संरक्षण दे रही है जो भीड़ हत्याओं, असहमति जाहिर करने वाले बुद्धिजीवियों एवं कार्यकर्ताओं की चुन-चुन कर हत्या एवं लगातार चलाये जा रहे जहरीले घृणा अभियान के जरिये सांप्रदायिक व जातिवादी-पितृसत्तात्मक व्यवस्था थोपने की कोशिश कर रहा है. मोदी सरकार नागरिकता की शर्तों से लेकर गणतंत्र के मूल स्वरूप तक में बदलाव कर भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की असल बुनियाद को ही नष्ट करने की कोशिशें कर रही है.
“संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में काम-काज के कैबिनेट सिस्टम को पूरी तरह से नकारते हुए मोदी, अमरीकी राष्ट्रपति की तर्ज पर अपनी सरकार चला रहे हैं... सरकार सत्ता के पूर्ण केंद्रीकरण और बेशर्मी के साथ मोदी की व्यक्तिगत छवि चमकाने में लगी हुई है.
“मोदी सरकार पहले दिन से ही संसदीय संस्थाओं, प्रक्रियाओं और परम्पराओं को सुनियोजित तरीके से धता बता रही है और क्षतिग्रस्त कर रही है. योजना आयोग को खत्म करके संदिग्ध नीति आयोग बनाना, जो अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की सलाह देते समय आम लोगों के मुद्दों पर जुबानी जमाखर्च भी नहीं करता, यहां तक कि चुनाव आयोग को लोकसभा व विधान सभा के चुनाव एक साथ करवाने की सलाह देना और ‘मनी बिल’ का चोला पहनाकर धोखाधड़ी भरे ‘आधार’ समेत ढेर सारे विवादास्पद कदमों को पास करवाना इसके चंद ज्वलंत उदाहरण हैं.
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के लिए भाजपा की बढ़ती चीख-पुकार संघवाद और राजनीतिक विविधता के सिद्धांतों को कमजोर करने की कोशिश है. एक साथ चुनाव का इस्तेमाल करके वे जनता की राजनैतिक पसंद को सीमित करने और राजनीतिक विमर्श को हर स्तर पर सत्ताधारी पार्टी व बड़े मीडिया घरानों द्वारा गढ़े गए आख्यान के मातहत रखने के जरिये और बड़े पैमाने का राजनीतिक वर्चस्व लादना चाहते हैं...
“राज्यपाल के कार्यालयों, जोकि संवैधानिक रूप से इस प्रकार बनाया गया है कि राज्यों के ऊपर केन्द्र की स्थिति मजबूत बन सके, का भाजपा सत्ता हथियाने के औजार के रूप में खुल कर दुरुपयोग कर रही है. इस प्रकार वह राज्यों के अधिकारों एवं हमारे संवैधनिक ढांचे में निहित संघीय संतुलन के प्रत्येक पहलू का हनन कर भारत में पूरी तरह अपनी ही हुकूमत कायम कर लेना चाहती है.
इसके बाद इस प्रस्ताव में मोदी-शाह राज में जिन दो सबसे बड़ी महामारियों से देशग्रस्त है – “क्रोनी पूंजीवाद, भ्रष्टाचार व आर्थिक तबाही” तथा “गहराता कृषि संकट, बढ़ती बेरोजगारी और बढ़ती गैर-बराबरी” – पर चर्चा की गई है. उसके बाद के छह भाग संक्षेप में नीचे दिये जा रहे हैं.
“इस आक्रामक कारपोरेटपरस्त आर्थिक एजेंडा के साथ अति-राष्ट्रवादी लफ्फाजी की जुगलबंदी चल रही है. असहमति जाहिर करने और दिक्कततलब सवाल पूछने वाली हर आवाज को राष्ट्रद्रोही बताकर खामोश कराया जा रहा है और उनको देश की सीमा पर तैनात जवानों के बलिदानों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है. यह अति-राष्ट्रवाद केवल मुस्लिम विरोधी जहरीली नफरत और हिंसा के लिये एक झीने आवरण का काम करता है. बीफ खाने व जानवरों का व्यापार करने से लेकर अंतर्धार्मिक विवाह, जिन्हें संघ परिवार ने ‘लव जिहाद’ का नाम दिया है, या ऐसी कोई अफवाह या झूठे आरोप के कारण कभी भी और कहीं भी मुसलमानों को मारा जा सकता है... यहां तक कि खुद मुस्लिम महिला संगठनों द्वारा लम्बे सामाजिक और कानूनी संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक बार में तीन तलाक की मनमानी प्रथा को अवैधानिक घोषित करने के निर्णय को भी अब मुसलमान पुरुषों के खिलाफ निन्दा और उत्पीड़न के हथियार में तब्दील करने की कोशिश चल रही है.
“... विभिन्न पदों और सत्ता-संस्थानों में संघ-गिरोह के लोगों के पहुंच जाने के कारण दलितों के उत्पीड़न में गुणात्मक रूप से इजाफा हुआ है. बिहार में भूपतियों की निजी सेनाओं से संघ परिवार का जुड़ाव सर्वविदित है जिनमें सबसे कुख्यात रणवीर सेना थी जिसने 1990दशक के अंतिम वर्षों और 2000 के दशक के शुरूआती वर्षों में कई जनसंहारों को अंजाम दिया. आज दलितों के खिलाफ हिंसा का एक ज्यादा व्यापक अभियान दूर-दराज के गांवों से लेकर बड़े शहरों के विश्वविद्यालयों तक चल रहा है... सांप्रदायिकता और जातिवाद, संघ की विचारधारा के एक सिक्के के ही दो पहलू हैं. हालांकि संघ परिवार धार्मिक अल्पसंख्यकों (चाहे वे मुसलमान हों या ईसाई) के खिलाफ सांप्रदायिक आक्रामक अभियान में दलितों को प्यादे की हैसियत से भरती के लिये भी बेताब है.
“इन सांप्रदायिक और जातिवादी हमलों के तीव्र होने के चलते महिलाओं पर होने वाली हिंसा, नैतिक पुलिसगीरी और जकड़बंदी बढ़ी है. अब इसे लागू करने वाली ताकतों में केवल परम्परागत खाप पंचायतें ही नहीं, नवगठित निगरानी गिरोह भी हैं, जो कानून-व्यवस्था की मशीनरी के परोक्ष समर्थन या फिर खुले संरक्षण से स्वयंभू एंटी रोमियो स्क्वाड बनकर सड़कों पर खुलेआम घूम रहे हैं... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह स्त्री-विरोधी संस्कृति मनुस्मृति के सिद्धांतों और परम्परा पर आधारित है जो जातिगत उत्पीड़न और पितृसत्तात्मक वर्चस्व की नियमावली है, जिसे संघ गिरोह भारत का सर्वाेच्च और मूल संविधान मानता है.
“संघ के विचारधारात्मक ढांचे में मुसलमानों, दलितों (और आदिवासियों के एक हिस्से के, जिन्हें माओवादी या ईसाई कहकर निशाना बनाया जाता है) एवं महिलाओं के खिलाफ नफरत और हिंसा का विस्तार कम्युनिस्टों, वाम/उदारपंथी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं तक चला जाता है. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे बुद्धिवादियों और सामाजिक न्याय का अभियान चलाने वालों की हत्या एवं हत्या के बाद उसका उत्सव मनाने से लेकर छात्र-युवा नेताओं व कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह और रासुका के मुकदमे लादने, असुविधाजनक सवाल पूछने वाले, जवाबदेही मांगने वाले और सच उजागर करने वाले पत्रकारों की धरपकड़, सोशल मीडिया और मुख्यधारा के इलेक्ट्रांनिक व प्रिंट मीडिया में असहमति की हर आवाज के खिलाफ एक पूरी ट्रोल सेना खड़ी करने, देश के विभिन्न हिस्सों में कम्युनिस्ट पार्टियों के दफ्तरों, कार्यकर्ताओं और कम्युनिस्ट आन्दोलन के प्रतीकों पर बढ़ते हमले – नफरत भरे झूठों के व्यवस्थित प्रचार तथा राज्य उत्पीड़न और राज्य समर्थित निजी स्तर की हिंसा के सम्मिश्रण के ये उदाहरण मोदी के भारत के हर हिस्से में दिखाई पड़ रहे हैं.
“और कश्मीर जैसे राज्य में, जहां तीखे राज्य दमन का सामना करते हुए लोग आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए लम्बे समय से संघर्षरत हैं, भाजपा अभी सत्ता में हिस्सेदार है. उसने कश्मीर में संवैधानिक शासन का ढोंग भी त्याग दिया है और वह आम कश्मीरियों के साथ वस्तुतः युद्धबंदियों जैसा व्यवहार कर रही है... भाजपा की केन्द्र और जम्मू एवं कश्मीर की सरकारें दिखावे के लिए भी मुद्दे का समाधान करने की कोशिशें छोड़ चुकी हैं और पूरे भारत में अपने इस्लामोफोबिक और अति-राष्ट्रवादी एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए ईंधन के रूप में कश्मीर का इस्तेमाल कर रही हैं.
“बढ़ी हुई कारपोरेट लूट, बेरोकटोक बढ़ती सांप्रदायिक आक्रामकता और जातिगत उत्पीड़न, असहमति का सुनियोजित दमन और कम्युनिस्टों की लानत-मलामत, मोदी सरकार के निर्धारक केंद्रीय तत्व हैं. मुख्यधारा के अधिकांश भारतीय मीडिया ने कड़ी मेहनत के जरिए मोदी को एक ऊर्जस्वी नेता, विकास पुरुष और कोई बकवास न बर्दाश्त करने वाले प्रशासक के रूप में इस तरह पेश किया कि गुजरात 2002 की स्मृतियां लोगों की याददाश्त से मिट जाएं. इस मीडिया का एक हिस्सा तो संघ-भाजपा के प्रचार दस्ते या मोदी सरकार के प्रवक्ता के रूप में काम कर रहा है. 2014 की चुनावी जीत को मोदी के विकास पुरुष के नए अवतार की स्वीकृति के रूप में पेश किया गया. लेकिन शुरूआती दिनों में ‘अच्छे दिन’, काले धन की वापसी और स्वच्छ भारत जैसी लफ्फाजी में देश को उलझाए रखने के बाद मोदी सरकार ने अब अपना असली रंग दुनिया के सामने जाहिर कर दिया है.
“… बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों में स्वयं मोदी द्वारा संचालित प्रचार अभियानों ने बारम्बार स्पष्ट कर दिया है कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की राजनीति ही मोदी ब्राण्ड का केंद्रीय तत्व है. जहां खुद मोदी और भाजपा व आरएसएस के उनके वरिष्ठ सहयोगी संघ गिरोह द्वारा किए गए जघन्य अपराधों पर शर्मनाक चुप्पी साध लेते हैं, वहीं दूसरे नेता खुलकर इन अपराधों को सही ठहराते हैं और यहां तक कि उनका जश्न मनाते हैं, जैसा कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद या बाबरी मस्जिद विध्वंस की 25वीं बरसी के दिन राजस्थान के राजसमंद में मोहम्मद अफराजुल की हत्या करके उसका वीडियो बनाने की घटना में देखा गया.
“स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के दुश्मन भारत के संविधान को तहस-नहस करके भारत को हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान के अपने खाके में बिठाना चाहत हैं. भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन से गद्दारी करने वाले अंगरेजी उपनिवेशवाद के पिट्ठू अब भगत सिंह के ऊपर सावरकर, अम्बेडकर के ऊपर गोलवरकर और गांधी के ऊपर गोडसे को रखने के लिए इतिहास पर कब्जा करना चाहत हैं और उसका पुनर्लेखन करना चाहते हैं.”
– दीपंकर भट्टाचार्य
भाकपा(माले) के 10वें पार्टी महाधिवेशन में उद्घाटन भाषण से
“मौजूदा सरकार की इन प्रमुख विशेषताओं के साथ संघ की विचारधारा और इतिहास को मिलाकर देखें तो हम आज असंदिग्ध रूप से भारत में फासीवाद के उत्थान के सामने खड़े हैं... जहां आपातकाल प्राथमिक तौर पर दमनकारी राज्य के इर्द-गिर्द घूमता है, वहीं मौजूदा मोदी राज, राज्य के नेतृत्व में कारपोरेट हमले और हिंदू वर्चस्व में बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के अभियान के संगम के रूप में दिखाई पड़ता है. संघ गिरोह को प्रायः उन्मादी भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा के जरिए अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की खुली छूट मिली हुई है. यही आपातकाल के दौर की निरंकुशता के हमारे अनुभव को मोदी माॅडल के निरंकुश शासन से अलग करता है.
“... फासीवाद को निरंकुशता से अलग करने वाला एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि फासीवाद राज्य दमन को वैधता प्रदान करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के लिए समाज के एक हिस्से को गोलबंद करने में सक्षम होता है. हाल ही में मोहन भागवत द्वारा कुख्यात रूप से की गई आरएसएस और भारतीय सेना की तुलना हिंदू समाज के सैन्यीकरण और भारतीय सेना के सांप्रदायीकरण/ राजनीतिकरण के आरएसएस के एजेंडा को प्रकट कर देती है. इस एजेंडे पर लम्बे समय से काम किया जा रहा है. इटली के फासीवादी नेता मुसोलिनी से मिलने और उनसे प्रभावित होने वाले हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे द्वारा 1937 में नागपुर में स्थापित की गयी भोंसला मिलिटरी अकादमी इस एजेंडे के दोनों पक्षों को पूरा करती है. 2012 में खुद भागवत ने कहा था कि भोंसला अकादमी, सेना में अधिकारियों की कमी को पूरा करने वाला पूरक संस्थान है. मालेगांव धमाकों में आरोपित एक सेवारत सैन्य अधिकारी ने इसी अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त किया था. सेवानिवृत्त और सेवारत सैन्य अधिकारियों और सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईबी अधिकारियों ने अकादमी में प्रशिक्षकों की भूमिका निभाई है. अकादमी बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को हथियारों का प्रशिक्षण भी देती है जो मुसलमानों के खिलाफ संगठित सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम देते हैं. हिंदू युवाओं का सैन्यीकरण करने की आरएसएस की परियोजना मुसलमानों को ‘पाकिस्तानी’ के रूप में चिन्हित करती है और इस तरह सांप्रदायिक हिंसा को ‘आंतरिक शत्राु’ के खिलाफ ‘राष्ट्रवाद’ का जामा पहना देती है.
“भाजपा-शासित राज्यों में शासन का एक और फासीवादी लक्षण है प्रायोजित ‘मुठभेड़ों’ एवं युद्ध-अपराधों को राज्य की नीति घोषित करना. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चैहान द्वारा भोपाल में फर्जी मुठभेड़ में आठ मुसलमान नौजवानों की हत्या का जश्न मनाना, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ द्वारा सिलसिलेवार फर्जी मुठभेड़ों का खुलेआम पक्ष लेना, कश्मीरी युवक को जीप के आगे बांधकर घुमाने वाले सेना के मेजर का सरकार द्वारा पक्ष लेना, जम्मू में आठ साल की गुज्जर मुस्लिम लड़की से बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए स्पेशल पुलिस ऑपरेशंस के जवान के पक्ष में हिंदू एकता मंच द्वारा रैली निकालना ऐसे कुछ प्रमुख उदाहरण हैं.
“वर्दीधारियों के ऐसे अपराध गैर-भाजपा सरकारों के राज में भी हुए हैं, लेकिन तब आधिकारिक नीति ऐसे मामलों का खुलेआम जश्न मनाने की नहीं, बल्कि उनसे इंकार करने की रही है.
“शिक्षा को विकृत करना और उसका भगवाकरण करना भी संघ की फासीवादी परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें भाजपा सरकारें मददगार हो रही हैं. भाजपा-शासित राज्यों में स्कूलों के पाठ्यक्रमों का भगवाकरण किया जा रहा है. इतिहास की पाठ्य पुस्तकें फिर से लिखी जा रही हैं और यहां तक कि स्कूली बच्चों के लिए संघ के प्रशिक्षण शिविर अनिवार्य किए जा रहे हैं ताकि कच्ची उम्र में ही उनके दिमागों में जहर भरा जा सके. साथ ही उच्च शिक्षा के संस्थानों पर भी लगातार हमला हो रहा है. भाजपा द्वारा नियुक्त उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रमुख बोलने की आजादी, कैंपस लोकतंत्र, सामाजिक न्याय व शोधकार्य को पूरी तरह तबाह करने में लगे हुए हैं और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, असहमति रखने वाली तमाम प्रगतिशील आवाजों पर हमला करने में संघ के आक्रामक जत्थे की भूमिका अदा कर रहा है.
“... यह भी काबिलेगौर है कि 1920 के दशक में अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस ऐतिहासिक रूप से अपने आपको सैन्य-पौरुषवादी अतिराष्ट्रवाद की विचारधारा पर खड़ा करना चाहता था, जिसके प्रतीक-पुरुष मुसोलिनी और हिटलर थे. भीतरी दुश्मन (नाजी जर्मनी में यहूदी, अन्य अल्पसंख्यक एवं कम्युनिस्ट और मोदी के भारत में मुसलमान, दलित एवं हर किस्म के वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों) के खिलाफ घृणा और हिंसा की केन्द्रीयता, एक सर्वाच्च नेता की व्यक्ति पूजा को बढ़ावा देने के लिए जन-भावनाओं का सनकभरा दोहन, झूठ और अफवाहों का सतत प्रचार, नाजी जर्मनी के साथ आज के भाजपा शासित भारत की अद्भुत और वास्तविक समानताएं हैं.
“... 20वीं सदी के यूरोप के फासीवाद की तुलना में 21वीं शताब्दी के भारत का फासीवाद निश्चित तौर पर अपनी अलग विशिष्टताओं वाला होगा लेकिन इससे न तो फासीवाद का खतरा कम वास्तविक होता है और न ही उसकी विध्वंसक क्षमता कम घातक हो जाती है. मौजूदा दौर का अन्तराष्ट्रीय अर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक माहौल एक बार फिर फासीवादी प्रवृत्तियों के उभार के अनुकूल है, जैसा हम दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में देख रहे हैं. लगातार कायम आर्थिक मंदी, बढ़ती बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा, इस्लामोफोबिया और आप्रवासी विरोधी उन्माद, ये तमाम चीजें अमेरिका और बहुतेरे यूरोपीय देशों में फासीवादी और नस्लीय राजनीति के उभार के लिए उर्वर जमीन मुहैय्या कर रहे हैं. संकट में फंसी वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था से नजदीकी और खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइल के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारियों ने भारत में फासीवादी प्रवृत्ति को और भी मजबूत बनाया है.
“... भारत में फासीवाद के उत्थान और विकास का केंद्रीय कारक सांप्रदायिकता है. इस संदर्भ में हमें याद रखना होगा कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन के दौरान सांप्रदायिक राजनीति के उभार, जिसने अंततः भारत को भयावह खून-खराबे और विराट मानवीय विस्थापन वाले बंटवारे की ओर धकेला, को बरतानवी उपनिवेशवाद से पूरी शह मिली थी. आज भारत की विविधतापूर्ण और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान को हिंदू बहुसंख्यवादी वर्चस्वशाली एकरूपी बना देने की कोशिश अमेरिकी साम्राज्यवाद के ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ के सिद्धांत के अनुकूल है. इसके मुताबिक इस्लामी अरब दुनिया और कन्फ्यूशियाई चीन के खिलाफ अमेरिका की अगुवाई में चल रहे पश्चिम के युद्ध में हिंदू भारत मुख्य सहयोगी के रूप में देखा जाता है.
“...भारत में फासीवादी परियोजना में ऊंच-नीच अनुक्रम पर आधारित सामाजिक गैर-बराबरी के चिन्ह और बहिष्करण एवं उत्पीड़न के औजार के रूप में जाति भी केंद्रीय तत्व है. अक्सर इस जातिवादी व्यवस्था का सबसे गहरा आघात महिलाओं पर होता है... भारत में फासीवाद भारतीय समाज में गहरे पैठे अन्याय और हिंसा से शक्ति पाता है और उसको मजबूत एवं प्रसारित करता है, और आरएसएस आज भारतीय इतिहास व परम्परा में जो कुछ भी लोकतंत्र-विरोधी है, उसका प्रतीक बन गया है.
“आरएसएस की स्थापना के बाद शुरूआती पचास वर्षों में उसकी फासीवादी विचारधारा को स्वीकार करने वाले बहुत लोग न थे. इसने खुद को न सिर्फ स्वाधीनता आंदोलन से दूर रखा बल्कि आधुनिक भारत में मौजूद एक प्रमुख समुदाय के रूप में मुसलमानों की स्थिति को कमजोर करने के लिए अंग्रेजी उपनिवेशवाद से कई मोर्चों पर हाथ मिला लिया. गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर न सिर्फ कानूनी प्रतिबंध लगा बल्कि आम लोगों की निगाह में इसकी साख भी गिरी. मगर सांप्रदायिकता के सवाल पर कांग्रेस के विचलन और स्वाधीनता आंदोलन की आकांक्षाओं से गद्दारी ने आरएसएस को फिर से संगठित होने, ताकतवर बनने और वैधता हासिल करने का मौका दिया. 1960 के दशक के शुरूआती वर्षों में आरएसएस ने खोई साख उल्लेखनीय रूप से हासिल कर ली, क्योंकि पहले 1962 के चीन युद्ध, फिर1965 और 71 के पाकिस्तान के साथ सिलसिलेवार युद्धों के दशक में युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद बढ़ता गया. आपातकाल थोपने की घटना ने आरएसएस को मौका दिया कि लोकतंत्र बहाली के लिए चलने वाले लोकप्रिय आंदोलन के माध्यम से वह अपने संगठन व प्रभाव का विस्तार करे. उदारीकरण की आर्थिक नीतियों और अमेरिकापरस्त विदेश नीति को अपनाने के साथ ही कांग्रेस निर्णायक रूप से स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से अलग हट गयी. अब भाजपा और कांग्रेस के बीच विचारधारात्मक और नीति सम्बंधी अंतर धुंधले पड़ गए . ऐसे में भाजपा को विभिन्न अंचलों और सामाजिक समूहों में अपने नये मित्र हासिल करने के लिये बस थोड़ा बहुत व्यावहारिक समायोजन करके अपना प्रभाव बढ़ाने में कोई खास दिक्कत नहीं हुई.
“उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को आक्रामक रूप में लागू करने से पैदा हुआ संकट उसी समय आया है जब कांग्रेस और व्यापक दायरे के विभिन्न क्षेत्रीय दल अपनी साख खो चुके हैं और भारत में एक बड़ा राजनीतिक शून्य बना हुआ है, आरएसएस इस मौके का इस्तेमाल करके भारत की ऐतिहासिक व राजनीतिक संकल्पना को बदल उसकी जगह अपनी खुद की ऐतिहासिक-राजनीतिक संकल्पना कायम करना चाहता है... इस प्रक्रिया में वे नेहरू को खलनायक बनाने; गांधी को अपने लिए सुपाच्य बनाने, अम्बेडकर व भगतसिंह को विकृत करने; अकबर से लेकर ताजमहल तक मुसलमान हस्तियों को बदनाम करने और ऐतिहासिक इमारतों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताने में जुटे हुए हैं. वे जातिगत व लैंगिक ऊँच-नीच, दकियानूस और घृणित सामाजिक प्रथाओं और सांप्रदायिक पूर्वाग्रह को ‘भारतीय संस्कृति की आत्मा’ के रूप में प्रचारित करते हैं!
“इतिहास के पुनर्लेखन औ र उसको हड़प लेने की इस प्रक्रिया का प्रतिरोध फासीवाद-विरोधी संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए. ऐतिहासिक रूप से भारतीय जनता के उपनिवेशवाद-विरोधी जागरण तथा अंग्रेजी राज के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष से अलग-थलग रहने वाला और यहां तक कि उसका विरोध करने वाला आरएसएस हमेशा ही साभ्यतिक या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपना एक काल्पनिक आख्यान गढ़ता रहा है. हमेशा मिथकों का हवाला देना, यहां तक कि उन्हें इतिहास बताना, जालसाजी व हड़पने के रास्ते वास्तविक इतिहास को विकृत करना संघ के सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के झूठे आख्यान में फिट बैठता है. इसलिए भारत को परिभाषित और विकसित करने के अनवरत संघर्ष में इतिहास एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है.
“इतिहास को विकृत करने, झुठलाने और हड़पने के आरएसएस के प्रयासों की मुखालफत करते हुए हमें भारत की जनता के इतिहास की और लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और मनुष्य की मुक्ति के लिए चले ऐतिहासिक संघर्षों की विरासत का झंडा बुलंद रखना चाहिए. हमारे मुल्क के महान लोकतांत्रिक और समाजवादी भविष्य के लिए जारी संघर्ष को ऊर्जस्वित करने एवं सशक्त बनाने के लिए हमारी ऐतिहासिक परम्पराओं में जो भी प्रगतिशील और मुक्तिकामी है, उसे बुलंद करना होगा, विकसित करना होगा और लक्ष्यपूर्ति में लगाना होगा.
“मोदी सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा कमोबेश वही है जिसकी शुरूआत 1990 के दशक की शुरूआत में कांग्रेस ने की थी. लेकिन जिस बढ़ी हुई रफ्तार, आक्रामकता और मनमाने तरीके से मौजूदा सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है, वह इसे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार समेत सभी पूर्ववर्ती सरकारों से अलग करती है. विदेशी निवेश, वित्तीय एकीकरण, डिजिटलीकरण, निजीकरण और श्रम कानूनों पर हमला पहले की सरकारों में कभी भी इतना तीखा और मजबूत न था. योजना आयोग को समाप्त करने, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार गारंटी कानूनों का सुनियोजित उल्लंघन, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की जगह बीमा आधारित निजी स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के एजेंडा को तुच्छ करने के लिये स्व-रोजगार को केंद्र में लाना व अब पकौड़ा बेचने, जो कठिन अनिश्चित जीविका का प्रतीक है, को लाभकारी रोजगार का उदाहरण बताने के जरिए मौजूदा सरकार ने सामाजिक कल्याण की जिम्मेदारी का जिस कदर बेशर्मी से पूर्णतः परित्याग किया है, वैसा पहले किसी सरकार में सम्भव नहीं हुआ था.
“विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी सरकार अमेरिका की रणनीतिक मातहती की नीति को नई ऊंचाइयों पर ले गयी है... कि वह अमेरिका में भारतीय आप्रवासियों पर बढ़ते हमलों पर भी खामोश है. अमेरिका स्थित हिंदुत्ववादी संगठन गोरे लोगों के वर्चस्व के टंम्प के एजेंडे का खुला समर्थन कर रहे हैं... लेकिन मोदी के चौधराहट भरे रुख के चलते भारत अपने पड़ोसी देशों से अलगाव में पड़ गया है.
“नागरिकता संशोध्न बिल के माध्यम से मोदी सरकार भारत की नागरिकता की परिभाषा भी बदल देना चाहती है. इस बिल में बंगलादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रस्ताव है. इजरायल के ‘यहूदी होमलैण्ड’ के माॅडल की तरह ही यह प्रस्ताव पड़ोसी देशों में सताये जा रहे अल्पसंख्यकों के बीच धार्मिक आधार पर भेदभाव करके और नागरिकता आवेदन करने वाले गैर-मुस्लिमों को विशेष लाभ देकर भारत को छुपे रूप में हिन्दू राष्ट्र के रूप में बताने की एक कोशिश है. इस कदम से असम में भी अशांति और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये हैं, जहां पूर्वानुमान है कि भाजपा इस संशोधन के माध्यम से असम समझौते को निष्प्रभावी बना देगी क्योंकि इससे उक्त समझौते में लागू 24 मार्च 1971 की कट ऑफ तारीख बेमानी हो जायेगी.
“इस बीच, असम में सर्वोच्च न्यायालय के निरीक्षण में चल रही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (एनआरसी) को तैयार करने की प्रक्रिया के प्रति भी चिन्तायें व्यक्त की जा रही हैं. असम सरकार के नेताओं के बयान इस बात के संकेत दे रहे हैं कि लाखों लोग जिनके नाम एन.आर.सी. में शामिल नहीं किये गये हैं, उन्हें सामूहिक रूप से देश से बाहर भेज दिया जायेगा. यदि इसे लागू कर दिया तो एक विकराल मानवीय संकट खड़ा हो जायेगा. इस संकट से बचने के लिए केन्द्र सरकार को बंग्लादेश की सरकार के साथ एक समझौता करने और जिनके नाम एन.आर.सी. से बाहर कर दिये गये हैं उन्हें वर्क परमिट देने की संभावनाओं को अवश्य तलाशना चाहिए .
“संघ-भाजपा गिरोह के सत्ता पर काबिज होने और व्यवस्थित रूप से अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में कौन सी चीजें मददगार रही हैं?
“मौजूदा समय में जो चार कारक स्पष्टतः भाजपा के पक्ष में गए हैं, उन पर गहराई से ध्यान देने की जरूरत है. 2014 में भाजपा सिर्फ चुनाव ही नहीं जीती, बल्कि उसने मौजूदा राजनीतिक खालीपन का अधिकतम उपयोग किया. जहां कांग्रेस अपनी साख और नेतृत्व के सबसे बुरे संकट से जूझ रही थी, वहीं लगभग सारी गैर-भाजपा राजनीतिक धाराएं – क्षेत्रीय पार्टियां, तथाकथित ‘सामाजिक न्याय’ के खेमे की पार्टियां और वामपंथ – भी चुनावी ताकत के लिहाज से अपने सबसे बुरे दौर में थे. 2014 में मोदी की असरदार जीत से राजनीतिक संतुलन भाजपा के पक्ष में लगातार झुकता गया...
“दूसरे, पिछले तीन दशकों में हमने सत्ताधारी वर्ग की लगभग सभी पार्टियों के बीच विदेश नीति, आर्थिक नीतियों व आंतरिक शासन के सवाल पर एक वास्तविक सर्वानुमति उभरते हुए देखी है. जब नीतियों में अन्तर नहीं रहा तो भाजपा ने खुद को इन नीतियों के सर्वाधिक आक्रामक और संकल्पबद्ध पैरवीकार के बतौर पेश करने में सफलता पा ली है.
“तीसरे, इस नीतिगत सर्वानुमति के दौर में हम यह भी देख रहे हैं कि रोजाना मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया की मदद से एक सामान्य बोध गढ़ा जा रहा है, जिसके मुताबिक विकास के लिए बड़े पैमाने पर बेदखली अनिवार्य है, उसी तरह राष्ट्रीय एकता की अविलम्ब जरूरत के लिये मानवाधिकारों को छोड़ा जा सकता है, अत्याचारी कानून लागू करने ही होंगे, और आर्थिक दक्षता की सर्वरोगहर दवा के बतौर निजीकरण लाना ही होगा, आदि, आदि.
“अंततः इस हद तक नीतिगत सर्वानुमति और गढ़े गए सामान्य बोध के इन हथियारों के साथ भाजपा के पास गोपनीय रूप से काम करने वाला आरएसएस का संगठन है, जिसके पास नफरत, झूठ, अफवाह और गैर-सरकारी आतंक के नेटवर्क के रूप में अपने खुद के औजार हैं.
अंत में तीन शीर्षक ‘फासीवादी हमले के विरुद्ध जन प्रतिरोध’, ‘वाम एकता और सभी संघर्षशील शक्तियों में परस्पर सहयोेग’ और ‘फासीवाद को हराओ, जनता का भारत बनाओ’ में फासीवाद के विरुद्ध प्रतिरोध संघर्ष के विभिन्न पहलुओं एवं कार्यभारों का वर्णन किया गया हैं. हम यहां अंतिम दो भागों को लगभग पूरा ही प्रस्तुत कर रहे हैं.
“गुजरात से उत्तर प्रदेश तक, महाराष्ट्र से बिहार तक हम दलित प्रतिरोध की प्रेरक घटनाओं के गवाह हैं जिनमें जमीन, शिक्षा, रोजगार और सम्मान के बुनियादी सवालों पर क्रांतिकारी राजनीतिक गोलबंदी की नई सम्भावना निहित है. दलितों के खिलाफ तेज होती आरएसएस-समर्थित हिंसा के मुकाबले एक नई पीढ़ी का दलित आंदोलन उभरा है जिसकी अगुवाई युवा दलित नेता कर रहे हैं. इन दलित आंदोलनों का यह पक्ष सर्वाधिक स्वागतयोग्य है कि वे असुरक्षित मुसलमान समुदाय के पक्ष मे