ध्यान से देखिए. यह चेहरा बताता है कि जीवन में अनगिनत मुश्किलों और दुखों का सामना बड़े धीरज के साथ किया है. आजकल नन्दलाल एक छोटी सी कोठरी में अकेले रहते हैं. वे एक सैनिक थे और दुश्मन की गोलियों का निडर होकर मुकाबला करते होंगे, लेकिन पूरे तीन दिनों तक लाइन में खड़े होने के बाद भी मात्र कुछ सौ रुपये निकाल पाने में विफलता ने अन्दर तक तोड़ दिया. फिर से नई लाइन में लगना होगा और हो सकता है कि शाम को खाली ही लौटना पड़े, वे फफक-फफक कर रो पड़े.
भीड़ में उनके चारों ओर खड़े लोग इस फोटो में कुछ अर्थ जोड़ रहे हैं. हो सकता है इन महिलाओं की उनके प्रति कुछ सहानुभूति हो. लेकिन वे दिलासा देने उनके पास आयेंगी तो लाइन से उनकी जगह भी चली जायेगी. जिन्दगी की जद्दोजहद में सहानुभूति और एकजुटता की भावना पीछे छूट गई. महिलाओं के चेहरे पर भी मायूसी कम नहीं है, क्योंकि उन्हें भी कुछ न कुछ पैसा जरूर चाहिए, घर वापस लौटना है, उनके परिवार परेशान हैं. पूरा देश इस आपदा में एकजुट है, लेकिन काम चलाने के लिए कैश कम है और उसे पाना बहुत मुश्किल है, हर आदमी और हर औरत केवल अपने लिए सोचने को मजबूर है. दूसरों के दुख की चिन्ता बाद में ...
नोटबंदी का दर्द लम्बे समय तक चलने वाला है. और जब इससे उबर जायेंगे, उसके बाद भी गरीबों के जीवन में कोई सुधार नहीं आने वाला है. बैंक/एटीएम की लाइनें खत्म हो भी जायें, सरकार तो वही रहेगी जो जबर्दस्ती उनके ऊपर टेक्नोलाॅजी थोप रही है. अगर कैश निकालने की सीमा को हमेशा के लिए स्थायी कर दिया तो क्या होगा? अगर हम इस निर्णय को महज एक बार उठाया गया सनकी कदम समझते हैं तो यह हमारी मूर्खता होगी; ये न सिर्फ देश चलाने के तौर-तरीकों को बदलने, बल्कि नागरिकों के जीवन को नियंत्रित करने की एक सोची-समझी योजना का हिस्सा है. फिलहाल, लाइनें छोटी होने का नाम नहीं ले रहीं और लोगों की कैश की जरूरत पूरी होने से बहुत दूर है.
ऐसे किस्से आगे भी देखने को मिलेंगे. हो सकता है कि दुनिया नन्दलाल का नाम भूल जाये. फिर भी उनकी छवि हमारी अन्तरात्मा में न सही, हमारी यादों में हमेशा चस्पा रहेगी. यह और बात है कि उन लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता जो उनके दर्द को कम कर सकते थे और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए था, क्योंकि वे तो इस फोटो के दर्द की सच्चाई को स्वीकार ही नहीं करना चाहते.
नोटबंदी ने आम जनता की मुश्किलों को बुरी तरह बढ़ा दिया है. रद्दी बना दिये गये नोटों की जगह नये नोट अभी तक पूरे नहीं आये हैं. दस में से नौ लोग हमारे यहां कैश/नकदी पर निर्भर होते हैं, ऐसे में वे बिल्कुल असहाय हो गये हैं.
अब जब पचास दिन पूरे हो गये हैं तो यह साफ दिखाई दे रहा है कि कैश की कमी ने उत्पादन और रोजगार के क्षेत्र में बहुत बड़ा और गहरा आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है. इससे लोगों की आमदनी पर असर पड़ा है और रोजमर्रा के खर्च पूरे करना कठिन हो गया है. पहले तो सरकार ने कहा कि थोड़े दिनों की असुविधा है, लेकिन अब पता चल रहा है कि मुश्किलें अंतहीन हैं और जो आर्थिक क्षति पहुंची वह स्थायी प्रकृति की है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती.
कहा गया था कि नोटबंदी से काला धन और नकली नोटों को पकड़े जायेंगे, लेकिन यह केवल बहाना था. क्योंकि सरकार तो खुद ही काले धन को सफेद करने की नई स्कीम लेकर आ गयी जिसमें पहले वाली स्कीम से केवल 5 प्रतिशत ज्यादा टैक्स लगेगा. 13,800 करोड़ रुपये के काले धन की घोषणा करने वाले महेश शाह ने खुलेआम कहा कि उसके पास बड़े-बड़े राजनेताओं और व्यापारियों का पैसा है. सरकार ने जांच तक नहीं की और उसे छोड़ दिया. यह भी पता चल गया है कि 8 नवम्बर को प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी घोषित करने से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जगह जगह जमीनें खरीद कर भारी मात्रा में काला धन सफेद कर लिया था और नोटबंदी के दौरान लाखों-करोड़ों रुपये मूल्य के रु. 2000 के नये-नये नोटों के साथ भाजपा के कई नेता विभिन्न स्थानों पर पकड़े गये. जहां आम लोगों को घर में होने वाली शादियां रोकनी पड़ीं और कैश की कमी से जरूरी इलाज तक नहीं करवा पाये, वहीं अरबों रुपये खर्च कर शाही शादियां कराने के लिए जनार्दन रेड्डी और नितिन गडकरी जैसे नेताओं के पास पैसे की कोई कमी नहीं हुई.
अनुमान और अफवाहें चलायी गईं कि नोटबंदी से भारी मात्रा में छुपा गया काला धन नष्ट हो जायेगा, परन्तु लगभग सारी नगदी बैंकों में वापस आ चुकी है. मोदी जन-धन खातों को काले धन का अड्डा बता कर अब गरीबों को अपमानित कर रहे हैं.
बड़े नोटों को रद्द करने की इस भारी भरकम कवायद के पीछे दरअसल एक उद्देश्य बैंकों में नकदी की भारी कमी को दूर करना था. भारत के बड़े पूंजीपतियों और विजय माल्या जैसे ठगों ने – जिसे भाजपा ने राज्यसभा का सदस्य बनाया था और मोदी सरकार ने देश से भाग जाने दिया – बैंकों को लूट कर खाली कर दिया है. साल दर साल बड़ी-बड़ी कम्पनियों को कर्ज के नाम में पैसा बांटा गया जो वापस नहीं आने वाला, इस प्रकार लूटे गये 11 लाख करोड़ रुपये के कर्जों को धीरे-धीरे बट्टेखाते में डालने काम चल रहा है.
नोटबंदी के जरिए आम जनता की कमाई को जमा करवा लिया गया है जिससे बैंकों में नकदी का संकट दूर हो गया है. जमा हुई नई नकदी फिर से अमीरों और भ्रष्टाचारियों को सस्ती दरों पर और नये कर्ज देने के काम आयेगी.
बैंकों में पूंजी ले आने के अलावा नोटबंदी ने डिजिटल इण्डिया अभियान और पूंजी-परस्त आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का काम भी किया है जिससे हमारी सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर बड़े पूंजीपतियों का नियंत्रण कायम हो जायेगा. काॅरपोरेट सेक्टर की आक्रामकता इतनी बढ़ गई है कि उसके आगे छोटी कृषि और व्यापार से लेकर छोटे-छोटे उद्योग और असंगठित क्षेत्र के अन्य सभी तरह के व्यवसायों समेत हर तरह के छोटे उत्पादन के लिए अब अपना अस्तित्व बचाना ज्यादा मुश्किल हो जायेगा.
जो लोग मोदी सरकार द्वारा थोपी गई नोटबंदी आपदा की भारी कीमत चुका रहे हैं, उनके दर्द को एक ऐसे जन आन्दोलन के ज्वार में बदलना जरूरी है जो भाजपा के लिए एक और करारी शिकस्त बन सके.
प्रधानमंत्री मोदी की 8 नवम्बर की नोटबंदी की घोषणा के बाद भारत के आम लोगों ने समझा कि काला धन पकड़ने और काले धन्धेबाजों को सजा देने के अच्छे काम में अगर थोड़े दिनों की परेशानी भी झेलनी पड़े तो कोई बात नहीं. लेकिन जैसे जैसे दिन बीतते गये, और मोदी की 50 दिनों की सीमा भी पार हो गई, तब इसके पीछे की असलियत परत-दर-परत खुल कर सामने आने लगी. दोस्तो, आने वाले पन्नों में किये गये बड़े-बड़े दावों और नोटबंदी के पीछे की कड़वी सच्चाई को देखेंगे.
8 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की:
“मित्रो, आज मध्य रात्रि से वर्तमान में जारी 500 रुपये और 1,000 रुपये के करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं रहेंगे ...”. बताया गया कि यह काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक है. इससे ईमानदार आम लोगों को थोड़ी असुविधा होगी और भ्रष्ट व अमीरों की रातों की नींद हराम हो जायेगी.
शुरू में तो लम्बी-लम्बी लाइनों और तमाम परेशानियों के बाद भी लोगों को लगा कि काले धन के खिलाफ जंग में चलो कुछ दिक्कतें झेली जा सकती हैं. अमीर लोग अपने काले धन को बोरों में भर कर कूड़े पर फेंक देंगे, सुन कर अच्छा लग रहा था. लोगों ने प्रधानमंत्री के कहने पर मान लिया कि नोटबंदी से जाली नोट नष्ट हो जायेंगे, आतंकवाद की रीढ़ टूट जायेगी, और चूंकि राजनीतिक पार्टियों का भी सारा काला धन समाप्त होगा इसलिए चुनाव भी साफ-सुथरे होंगे.
लेकिन नोटबंदी शुरू होते ही उस पर सवाल उठने शुरू हो गये.
सरकार का कहना है कि नोटबंदी एक ऐसा काम है जो हमारी अर्थव्यवस्था से पुराने खराब खून को निकाल कर उसकी जगह नया, ताजा खून भरेगा. 86% खून बाहर निकाल लिया- बाद में बताया कि नया खून तैयार नहीं है अतः इन्तजार में बैठे रहिए! जितने खून (कैश) की जरूरत थी उसके 14% पर ही जिन्दा रहने पर जनता को मजबूर कर दिया.
एक और उदाहरण से नोटबंदी को समझते हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि तालाब का पानी (कैश) गंदा हो गया है और मगरमच्छ (काला धन) भी बहुत हैं, इसलिए पानी निकाल कर नया पानी डालेंगे और मगरमच्छ भी पकड़ में आ जायेंगे. पानी निकाल दिया लेकिन नया साफ पानी डालने के लिए था ही नहीं. मगरमच्छ तो बिना पानी के भी सांस ले सकते थे सो वे बच गये, और छोटी मछलियां (अर्थव्यवस्था और आम जनता) बिना पानी के मरने लगीं!
सरकार और रिजर्व बैंक बार-बार नोट-बदली के नियमों में बदलाव क्यों करते रहे? सरकार का कहना है कि 6 महीनों से इसकी तैयारियां चल रही थीं, नोटबंदी करते समय क्या दिक्कतें आती हैं इसकी जानकारी विशेषज्ञों के पास होती है. तब नियम एक बार में पहले ही बन कर तैयार होने चाहिए थे?
लेकिन:
प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और रिजर्व बैंक ने आश्वस्त किया था कि नोट बदलने के लिए पर्याप्त समय है इसलिए अफरातफरी की जरूरत नहीं है, 30 दिसम्बर तक लाइनें छोटी हो जायेंगी. लेकिन 19 दिसम्बर को रिजर्व बैंक ने एक नया नियम जारी कर दिया कि 5000 से ज्यादा के पुराने नोट केवल एक बार में ही जमा किये जायेंगे और नोट जमा करने में हुई देरी का स्पष्टीकरण भी देना होगा! भारतीय रिजर्व बैंक ने जल्दी-जल्दी नियमों में इतने बदलाव किये हैं कि अब इसे भारतीय रिवर्स (उल्टा) बैंक कह लेना ही उपयुक्त है. फिर एक और नये नियम की चर्चा आयी कि 30 दिसम्बर के बाद जिसके पास 500 और 1000 के पुराने नोट पाये जायेंगे उसे जुर्माना देना होगा. यह बिल्कुल ही हास्यास्पद बात है कि जो नोट रद्दी बना दिये गये, तो रद्दी कागजों को रखना अपराध कैसे हो जायेगा?
धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया कि उचित संख्या में नये नोट छापने में अभी काफी वक्त लगेगा. इसका मतलब है अनिश्चित काल तक लोग अपने बैंक खातों से अपनी जरूरत के अनुसार खुद का पैसा निकाल नहीं पायेंगे. प्रधानमंत्री का वायदा कि 50 दिनों के बाद मुश्किलें समाप्त हो जायेंगी, झूठ साबित हो चुका है. वित्तमंत्री ने तो कह भी दिया है कि मामला 50 दिनों का नहीं है, हो सकता है 3 महीने लगे या 6 महीने भी लग जायें.
बार-बार नियमों में बदलाव और बार-बार वायदे टूटने के बाद जनता अब समझ गयी है कि सरकार के वायदों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है.
मोदी बोले कि नोटबंदी ‘कड़क चाय’ की तरह है जो गरीबों को पसंद आती है और अमीरों को कड़वी लगती है. वे कहते रहे कि सारी परेशानियां गरीब चुपचाप सह लें क्योंकि अमीरों और भ्रष्ट लोगों को कहीं ज्यादा परेशानी हो रही है. काला धन्ध करने वाले अमीरों को सजा मिलेगी और 30 दिसम्बर के बाद गैरकानूनी नकदी रद्दी कागज बन जायेगी.
उमा भारती तो यहां तक बोल गयीं कि मोदी की नोटबंदी इस कदर गरीब परस्त है कि इसे एक मार्क्सवादी कदम कहा जा सकता है. कम से कम उमा भारती ने यह तो मान लिया कि मार्क्सवाद ही गरीबों का सच्चा हितैषी है. भले ही उनकी पार्टी भाजपा उसके विरोध में झूठा प्रचार करती है.
ऊपर दिये गये उदाहरण बताते हैं कि नोटबंदी ने नये-नये रूपों को जन्म दे भ्रष्टाचार बढ़ाने का काम किया है. लाइनों में खड़ी जनता को कैश नहीं मिल पाया लेकिन भ्रष्टाचारियों के पास नये नोटों की कोई कमी नहीं हुई. अब चोरी पकड़ी जाने पर सरकार बैंको को दोषी बता कर अपना पल्ला झाड़ रही है.
बैंकों और रिजर्व बैंक के कुछ अधिकारी बेशक इस भ्रष्टाचार में शामिल हैं. लेकिन आम बैंक कर्मचारी तो आम जनता का गुस्सा झेल कर भी दिन रात मेहनत कर सरकार के पैदा किये संकट को कम करने में ही लगे थे.
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर नोटबंदी के बाद भी भ्रष्टाचार फलता-फूलता रहा तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का झूठा प्रचार कर जनता को इतने बड़े संकट में डालने के पीछे असली मकसद क्या था?
प्रधानमंत्री का कहना है कि नोटबंदी का फैसला इसलिए गुप्त रखा गया था ताकि भ्रष्टाचारियों को इसकी भनक भी न लगे. वे विरोधी दलों के विरोध का यह कह कर मजाक उड़ा रहे हैं कि उन्हें ‘तैयारियां’ करने का वक्त नहीं मिल पाया. असली सवाल तो यह है कि क्या प्रधानमंत्री ने अपने दल और मित्रों को नोटबंदी के फैसले की सूचना पहले देकर काला धन निकालने की तैयारी के लिए पर्याप्त समय दे दिया था?
भाजपा के इस नोटबंदी घोटाले की किसी स्वतंत्र एजेन्सी से जांच जरूर करवाई जानी चाहिए !
प्रधानमंत्री बोल रहे हैं कि ‘कैशलेस’ हो जाइये! देश की 86% नकदी को रद्दी बनाने के बाद, और जानबूझ कर छोटे नोटों की जगह 2000 का नोट छपा कर सरकार अर्थव्यवस्था और जनता को कैशलेस (बिना नकदी के) होने के लिए मजबूर कर रही है. इस तरह जबर्दस्ती कैशलेस बनाने से देश के गरीबों, छोटे दुकानदारों, किसानों, दिहाड़ी मजदूरों और आम जनता पर कितना बुरा असर होगा?
शुरू में जनता ने समझा कि ‘नोटबंदी तो बुरी चीज नहीं है, लेकिन इसे लागू करने में गड़बड़ी हुई’. अब तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नोटबंदी के पीछे इरादे कुछ और ही थे.
क्या नोटबंदी अपने तुगलक और हिटलर जैसे अहं को संतुष्ट करने के लिए एक अति अहंकारी उन्मत्त व्यक्ति की पागलपन भरी सनक का परिणाम भर थी? या इस सनक में भी एक सोची समझी रणनीति छिपी है? आगे देखते हैंः
नोटबंदी के जरिए नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार इस बात का भी जायजा ले रहे हैं कि देश में फासीवादी तानाशाही कितना चल पायेगी. इस निर्णय को लेने में भारतीय रिजर्व बैंक, खुद अपना मंत्रिमण्डल और यहां तक कि संसद के फैसले लेने की प्रक्रिया की अनदेखी की गई. शायद यह जानने की कोशिश हो रही है कि गुप्त, विनाशकारी और अलोकतांत्रिक तरीके से लिया गया निर्णय जनता के ऊपर किस हद तक थोपा जा सकता है.
अब आम लोग महसूस कर रहे हैं कि नोटबंदी को गरीबों के हित में और भ्रष्टाचारी धन्नासेठों के विरुद्ध बता कर मोदी ने झूठ बोला था. इसीलिए अब आर.एस.एस. का पूरा तंत्र अफवाहें फैलाने में लगा दिया गया है जो बताते फिर रहे हैं कि गरीबों को घर और अनेकों लाभ देने की योजनायें मोदी जी बना रहे हैं. ये बिल्कुल झूठा प्रचार है. जबकि सच्चाई यह है कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून समेत गरीबों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं में लगे पैसे में भी मोदी और उनकी सरकार कटौती करती जा रही है.
मोदी ‘भक्तों’ ने छात्रों को ‘देशद्रोही’ कहा और प्रधानमंत्री की आलोचना करने वालों के साथ मार-पीट की. वे असहमति के स्वरों को गुण्डागर्दी और मारपीट से दबाना चाहते हैं, वे प्रधानमंत्री की आलोचना करने पर महिलाओं को भी गन्दी-गन्दी गालियां देते हैं. आजकल नोटबंदी के विनाशकरी फैसले की आलोचना करने वालों को ‘राष्ट्र विरोधी’ बताया जा रहा है. नोटबंदी की आलोचना कर रहे दिल्ली के लल्लन सिंह कुशवाहा की गुण्डों ने पिटाई कर दी.
पत्रकार रवीश कुमार ने ठीक ही कहा है कि भले ही उत्पीड़न कितना भी होता रहे आज सभी नागरिकों को ‘बागों में बहार है’ मजबूरन बोलना पड़ेगा और प्रधानमंत्री के फैसलों की आलोचना बन्द करनी होगी. भारी भय का वातावरण बना कर सवाल पूछने वालों को चुप करा दिया जायेगा. यदि यह आपातकाल नहीं है, तो क्या है?
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में वायदा किया था कि यदि लोगों की परेशानियां 50 दिनों से ज्यादा चलेंगी तो मुझे देश के किसी भी चैराहे पर खड़ा करके सजा दे सकते हैं. 50 दिन पूरे हो चुके हैं और नोटबंदी का दर्द लगता स्थायी रूप ले चुका है. अब हमें सभी चैराहों पर जनता की अदालतें लगानी चाहिए और प्रधानमंत्री से कहना चाहिए कि उनमें हाजिर हों. अगर उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि जनता के गुस्से का सामना कर सकें तो चलिए कम से कम उनका पुतला हर चैराहे पर जरूर जला दिया जाय.
अर्थव्यवस्था के लिए, गरीबों के लिए, और पूरे देश के लिए नोटबंदी एक भारी विपदा बन कर आयी है. जो हाड़तोड़ मेहनत कर बमुश्किल जिन्दा रहने लायक कमा पा रहे थे, नोटबंदी ने ऐसे लोगों को बरबादी के कगार पर पहुंचा दिया है. लोग भारी परेशानी में हैं- कई भुखमरी के मुहाने पर बैठे हैं, बहुतों को अचानक ही बेरोजगार बना दिया गया, और इलाज के पैसे, बच्चों की फीस और रोज की जरूरतें पूरी होना मुश्किल हो गया है. इस अनर्थकारी फैसले की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री को लेनी चाहिए. नोटबंदी की मानव निर्मित आपदा जिसे प्रधानमंत्री ने खुद पैदा किया, की भरपाई के लिए सरकार उन लोगों को मुआवजा दे जिन्हें अंतहीन नुकसान और दर्द झेलना पड़ा.
इसके साथ ही सरकार काला धन के धंधेबाजों पर चोट करने के लिए ठोस कदम उठाये, नोटबंदी की आड़ में इन भ्रष्टाचारियों को बचाना बंद करे.
सरकार बिना देरी किये –
• नोटबंदी आपदा की क्षतिपूर्ति के लिए नागरिकों को 1 लाख रुपये का मुआवजा दे.
• मुफ्त अनाज और अस्पतालों में निशुल्क इलाज की गारंटी करे.
• किसानों के सभी तरह के कर्जे और छात्रों के स्कूल/कालेज की फीस माफ करे.
• बैंकों के बकायेदारों (डिफाॅल्टर्स) और विदेशी बैंकों में काला धन वाले खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करे.
• सभी राजनीतिक दलों के लिए उनकी आय के सभी श्रोतों को सार्वजनिक करना अनिवार्य बनाये.
• मोदी सरकार ने अभी तक लोकपाल की नियुक्ति क्यों नहीं की है? तत्काल लोकपाल की नियुक्ति करे.
नरेन्द्र मोदी ने अपने ‘ऐप’ के जरिए एक सर्वे का नाटक किया उसमें सवाल इस प्रकार सजाये गये कि जवाब देने वाला केवल नोटबंदी के पक्ष में ही बोल सके, असहमति या आलोचना की कोई जगह नहीं दी गई थी. यह कुछ वैसा ही था जैसा कि अर्नब गोस्वामी ने एक बार नरेन्द्र मोदी का इण्टरव्यू लेते समय किया था. इस सर्वे में असहमत होने का कोई विकल्प नहीं था और यह बात अन्तर्निहित थी कि नोटबंदी की आलोचना करने वाले भ्रष्टाचार और आतंकवाद के हिमायती हैं. वैसे भी यह सर्वे एक मजाक से ज्यादा कुछ नहीं था क्योंकि केवल स्मार्ट फोन वाले ही इसमें जवाब दे सकते थे जोकि केवल 17% भारतीयों के पास ही है. छलावे वाले इस सर्वे की जगह हमने ऐसे 10 सवालों को नीचे लिखा है जो एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री अपने सर्वे में जरूर पूछता, उसके आगे 10 राजनीतिक सवाल और दिये गये हैं जिनका जवाब मोदी को संसद, मीडिया और आम जनता के सामने देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
1. बैंक/एटीएम की लाइनों में आपने कितना समय खर्च किया?
2. क्या आप अपनी जरूरत के लायक पैसा बैंक से निकाल पाये? यदि हां, तो इसमें कितना समय लगा?
3. क्या आपके इलाके में बैंक/एटीएम में पर्याप्त कैश मौजूद था?
4. क्या आपके पड़ोस में परचून, चाय, सब्जी, कैण्टीन और दूध वाले तथा स्कूलों कैशलेस पेमेण्ट स्वीकार कर रहे हैं? और आपके पास कैशलेस भुगतान का साधन है?
5. क्या किसी दलाल ने कमीशन लेकर आपके 500 व 1000 के पुराने नोट बदलने की पेशकश की?
6. नोटबंदी से आपको क्या-क्या मुश्किलें आ रही हैं?
7. नोटबंदी से आयी आपदा के लिए –
8. आपके अनुसार निम्नलिखित में से क्या सही है?
9. आपके अनुसार नोटबंदी ने सबसे ज्यादा नुकसान किसे पहुंचाया?
10. नोटबंदी के बारे में आपकी राय?