कुछेक वर्ष पहले, जब अनर्थकारी वित्तीय संकट ने पूंजीवादी विश्व व्यवस्था पर चोट की थी और वह द्रुतगति से महामंदी में रूपांतरित हो गया था, तो हमने “संकट में पूंजी: कारण, तात्पर्य और सर्वहारा का जवाब” शीर्षक से एक छोटी पुस्तिका प्रकाशित की थी.
इस परचे का शुरूआती वाक्य था “पूंजीवाद ने संकटों में और संकटों के जरिये जीना सीख लिया है, लेकिन उनमें से कुछेक संकट युगांतकारी होते हैं. 1930 के दशक की महामंदी इसी किस्म की चीज थी. क्या वर्तमान में जो संकट प्रकट हो रहा है वह दूसरी महामंदी साबित होगा?” हमारा इशारा तो यही था कि ऐसा ही होने वाला है, और हमने वहां वरिष्ठ नोबेल पुरस्कार विजेता पाॅल सैमुअल्सन को उद्धृत किया था, “पूंजीवाद के लिये यह वैसी ही पराजय है जैसी पराजय सोवियत संघ का पतन कम्युनिज्म के लिये थी”. मगर पहले की कई उथल-पुथल के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए -- जैसे 2000 के दशक में डाॅटकाॅम बुलबुले का फटना, जो हमारे सामने वैश्विक प्रणालीगत संकट का अंदेशा तो लाया था, मगर अंततः वैसे संकट में रूपांतरित नहीं हुआ. हमने उस शुरूआती मंजिल में एकदम निर्दिष्ट निर्णय पर पहुंच जाने की इच्छा पर अंकुश लगाया.
लेकिन आज पिछले चार वर्षों के अनुभवों से प्राप्त साक्ष्यों के बल पर हम यह कह सकते हैं कि हां, यह एक युगांतकारी संकट है. इस लिहाज से कि वर्तमान नवउदारवादी प्रणाली में पूंजीवादी संचय के ढांचे और उसकी रणनीतियां संकट में हैं, और वे जिस तरह से 1980 के दशक में काम आ रहीं थीं उस तरह से काम आने में स्थायी रूप से विफल हो रही हैं. इसी लिहाज से हमने और भी विशेष रूप से इसका नाम नवउदारवाद का संकट रखा है और इसी के अनुसार हमने मार्कस और लेनिन से आरम्भ करते हुए बाद के समय के मार्कसवादियों और गैर-परम्परागत (मुख्यधारा के बाहर) अर्थशास्त्रियों की रचनाओं से काफी कुछ ग्रहण करते हुए अपने विश्लेषण के क्षितिज का विस्तार किया है. जहां पिछले परचे में विकसित होते संकट के जरिये पैदा होने वाले जनता के संघर्षों पर संक्षिप्त रूप से ही प्रकाश डाला गया था, वहीं प्रस्तुत आलेख में हमने यह सीखने की भी कोशिश की है कि वर्ग संघर्ष के गति-विज्ञान ने कैसे इतिहास के हर ढांचागत संकट के बाद होने वाले सुधार अथवा ढांचागत पुनर्गठन की विशिष्ट प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण रूप से असर डाला -- या आप कह सकते हैं कि उसका अति निर्धारण किया है. उदाहरणार्थ, 1930 के दशक के जोशीले अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में अमरीकी मजदूर वर्ग की बहादुराना लड़ाइयों ने पूंजीपति वर्ग को ‘न्यू डील’ अपनाने को मजबूर किया था और कैसे एक विपरीत राजनीतिक परिदृश्य में मजदूर संघर्षों को लगे धक्कों ने 1970 के ढांचागत संकट के बाद नवउदारवादी “ढांचागत पुनर्गठन” का रास्ता साफ कर दिया. हमने सोचा कि वर्तमान संकट के वर्गीय आयामों, राजनीतिक तात्पर्यों और संभावित नतीजों की समझदारी हासिल करने -- ऐसी समझदारी जिसके बिना हम दुनिया की आबादी के 99 फीसदी लोग, 1 प्रतिशत लोगों के खिलाफ अपने हितों को आगे बढ़ाने हेतु “संकट का इस्तेमाल” (सामिर अमीन के शब्दों में) नहीं कर सकते -- के लिये ऐसी समीक्षा करना आवश्यक है.
साम्राज्यवाद के जमाने में, जिसे लेनिन ने वित्तीय पूंजी के प्राधान्य वाले मरणासन्न एकाधिकारी पूंजीवाद के बतौर परिभाषित किया था, हमें प्राप्त होने वाला वैश्विक अनुभव व्यापार चक्रों और पूंजीवादी संकट के बारे में मार्कसवादी-लेनिनवादी व्याख्या की प्रतिभाशाली ढंग से पुष्टि करता है. हम आशा करते हैं कि प्रस्तुत प्रकाशन, जिसमें पूर्व में आरम्भ की गई चर्चा को अद्यतन रूप दिया जायेगा और उसके आयामों का विस्तार किया जायेगा, हमारे कार्यकर्ताओं और प्रेक्षकों को आर्थिक संकट एवं उसके राजनीतिक तात्पर्यों की अधिक गहरी समझ हासिल करने में मदद करेगा.
18 सितम्बर 2008. अमरीकी ट्रेजरी सचिव बेन बर्नान्के का चेहरा उदास था और उन्होंने विधि-निर्माताओं (अमरीकी कांग्रेस के सदस्यों) से कह दिया कि अगर सरकार ने (वित्तीय) बाजारों की रक्षा नहीं की तो हो सकता है कि भविष्य में कोई बाजार ही न बचे.
वे एक सच्चाई बयान कर रहे थे: वर्ष 2007 और 2008 के दौरान 100 से ज्यादा बंधकी कर्जदाता दिवालिया घोषित हो चुके थे. निवेशक बैंक बीयर स्टीयर्न्स का भी पतन हो जायेगा, इसी चिंता का परिणाम हुआ कि उस बैंक की परिसम्पत्तियों को बेहद कम दामों में जेपी मार्गन चेज के हाथों मार्च 2008 में बेच दिया गया. वित्तीय संकट सितम्बर और अक्टूबर के महीनों में शिखर पर जा पहुंचा. कई प्रधान संस्थाएं या तो चैपट हो गईं, या फिर दबाव में उनका अधिग्रहण कर लिया गया, अथवा सरकार ने उनकी पूरी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली. इन संस्थानों में शामिल थे लेहमन ब्रदर्स, मेरिल लिंच, फैनी मे, फ्रंडी मैक, वाशिंगटन म्यूचुअल, वाचोविया, सिटीग्रुप, और एआईजी इन्श्योरेंस. ये ऐसे संस्थान थे जिन्हें “इतना विशाल माना जाता था कि उनका पतन हो ही नहीं सकता”. ऐसी स्थिति में “इमर्जेन्सी इकनाॅमिक स्टैबिलाइजेशन ऐक्ट पफ 2008” (आपातकालीन आर्थिक स्थायीकरण अधिनियम, 2008) पारित किया गया जिसके तहत संकटापन्न: परिसम्पत्ति राहत कार्यक्रम (ट्रबुल्ड एसेट रिलीफ प्रोग्राम, टीएआरपी) के माध्यम से वाल स्ट्रीट की मुटाई बिल्लियों के संकटमोचन हेतु 700 अरब डाॅलर की विशाल धनराशि निर्गत करने की स्वीकृति दी गई. इसके खिलाफ भारी जन-विरोध का इजहार हुआ, और इस विरोध में खासकर दो नोबेल पुरस्कार विजेताओं समेत कोई 400 अर्थशास्त्री भी शामिल थे. उनका मुख्य बिंदु यह था कि जो वित्त-सम्राट इस दुर्गति के लिये जिम्मेवार हैं, उन्हें सजा देने के बजाय इस पैकेज के जरिये उनके ही हाथों में विशाल मात्रा में सार्वजनिक धनराशि सौंप दी गई है और इस प्रकार आने वाले दिनों के लिये एक गलत उदाहरण, एक “नैतिक विध्वंस” प्रस्तुत किया गया है. स्वभावतः बैंकरों की सरकार ने इन विरोधी मतों पर कान नहीं दिया.
जैसे-जैसे यह छूत का रोग बिजली की गति से अन्य धनी देशों में जा पहुंचा (वास्तव में वहां इस समस्या की शुरूआत पहले ही हो चुकी थी. अगस्त 2007 में फ्रांसीसी विशालकाय कम्पनी बीएनपी पैरिबस ने तीन हेज फंडों [हेज फंड ऐसे निवेश फंड होते हैं जो कुछेक खास संस्थानों और निवेशकों के लिये खुले होते हैं और वे विभिन्न निवेश रणनीतियां अपनाकर जोखिमों से निवेश की रक्षा करते हैं] से निवेश की निकासी यह कहते हुए समाप्त कर दी थी कि “नकदी का पूरा सफाया हो चुका है”), और इन देशों ने भी अपने-अपने यहां संकट से उबारने के लिये पैकेज देने शुरू किये. इस प्रकार सरकारों ने सम्पूर्ण वित्तीय विनाश (मेल्टडाउन) से तो बचा लिया और करदाताओं के पैसे
मगर हालात इस मुकाम पर पहुंचे तो कैसे?
सीधे-सादे शब्दों में कहा जाय तो लेहमन ब्रदर्स, एआईजी इंश्योरेंस, फैनी मे और फ्रेडी मैक (अंतिम दो कम्पनियां सरकार द्वारा प्रायोजित उद्यम हैं) इसलिये चैपट हुए क्योंकि वे जरूरत के वक्त पर अपने अल्पकालीन ऋण का भुगतान स्थगित करने या नई शर्तों के साथ वित्तीय इकरारनामे पर समझौता करने के लिये बाजार से पैसा नहीं जुटा सके. वर्ष 2004-07 के दौरान, पांच चोटी के अमरीकी निवेश बैंकों ने अपने वित्तीय लीवरेज ;पैसा उधर लेने, स्थिर परिसम्पत्तियां खरीदने तथा अन्य उपायों के जरिये लाभ-हानि को प्रतिसंतुलित करने के साधनों को लीवरेज कहते हैं) को अनैतिक ढंग से बढ़ा दिया. उन्होंने वित्तीय वर्ष 2007 के लिये 4100 अरब डाॅलर से अधिक धनराशि का कर्ज बताया, जो वर्ष 2007 में अमरीकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 30 प्रतिशत था, जिसने उनकी वित्तीय झटकों का शिकार बनने की संभावना को बढ़ा दिया.
सब-प्राइम (कम साख वाले) बंधकी बाजार के सामने अपने दरवाजे जरूरत से ज्यादा खोल देने और डेरिवेटिव्स -- किसी सुदूर स्थित परिसम्पत्ति के कार्य-व्यापार से व्युत्पन्न आर्थिक उपकरणों (इसीलिये उसका नाम “डेरिवेटिव्स” या व्युत्पन्न उपकरण पड़ा है) -- पर अत्यधिक निर्भर हो जाने के कारण इन बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा और उन्होंने बाजार का विश्वास खो दिया. निवेशक इन सम्मानित वित्तीय संस्थानों तक को पैसा उधार देने में आनाकानी करने लगे. अपनी देयताओं की भरपाई न कर पाने के कारण, मूलतः वे दिवालिये हो गये, हालांकि अधिकांश मामलों में (इसका सबसे जाना-माना अपवाद लेहमन ब्रदर्स है) सरकार ने उनको संकट से उबार लिया.
यहां “सब-प्राइम बंधकी बाजार” अथवा “सब-प्राइम कर्ज” से हमारा आशय मुख्यतः उन लोगों द्वारा लिया गया आवासीय कर्ज है, जो ऐसे कर्ज का बोझ नहीं उठा सकते थे और जिन मामलों में शुरूआती सूद की दर सब-प्राइम (बहुत नीची) थी मगर बंधकी की अवधि में ही वह दर महज इस अनुमान के आधार पर काफी बढ़ गई कि चूंकि कर्ज लेने वाले की आर्थिक स्थिति में प्रगति हुई है इसलिये सूद की किश्त भरने की उनकी क्षमता में भी इजाफा हुआ है. इस अनुमान पर सब-प्राइम कर्ज के उपकरणों की ‘डाइसिंग’ और ‘स्लाइसिंग’ (फल-सब्जियों की तरह काटना-कतरना) की गई. (यानी उन्हें अन्य अधिक संभावनामय कर्जों के साथ मिलाकर फेंट दिया गया) और इसके परिणामस्वरूप उपजे डेरिवेटिव्स (व्युत्पन्न उपकरणों) को मूल बंधकी संस्थाओं द्वारा अन्य बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं को बेच दिया गया.
इस प्रकार एक छाया (शैडो) बैंकिंग प्रणाली का उदय हुआ. सब-प्राइम एवं अन्य जोखिमभरे कर्जों की ‘डाइसिंग’ और ‘स्लाइसिंग’ करने से पैदा हुए डेरिवेटिव्स की नई पौध से उम्मीद की गई कि इससे ढेर सारे वित्तीय संस्थानों में जोखिम का वितरण हो जायेगा और इसके फलस्वरूप प्रत्येक द्वारा वहन किये जाने वाला जोखिम घट जायेगा.
आज चाहे यह जितना आश्चर्यजनक लगे, पर हकीकतन सब-प्राइम कर्जों की अत्यधिक मात्रा को लेकर रची गई अत्यंत ऊंचे जोखिम वाली रणनीति पर, और प्रतिभूतिकरण (सिक्योरिटाइजेशन) अथवा डेरिवेटिव्स के सृजन के अंतहीन मकड़जाल पर, किसी भी सार्वजनिक अथवा निजी प्राधिकरण ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया अथवा उनका विनियमन नहीं किया. इसके बजाय इस रणनीति की यह कहकर खूब तारीफ की गई कि यह तो समृद्धि की ओर जाने का सुनिश्चित मार्ग है – कारपोरेशनों के लिये भी और देश के लिये भी. वर्ष 2005 के वार्षिक पुरस्कार,जो प्रतिभूति उद्योग का सर्वाधिक सम्मानित पुरस्कार है के वितरण की घोषणा करते हुए इंटरनेशनल फिनान्सिंग रिव्यू (आईएफआर) ने कहा, “[लेहमन ब्रदर्स ने] नये उत्पादों को विकसित करने तथा कर्ज लेने वालों की आवश्यकताओं की यथोचित पूर्ति करने के लिये लेन-देन में काट-छांट करने के जरिये ... न सिर्फ बाजार में अपनी समग्र उपस्थिति को बरकरार रखा है बल्कि अधिमान्य स्थान हासिल करने में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है. ... लेहमन ब्रदर्स अधिमान्य स्थान में सबसे कल्पनाशील संस्था है, जो ऐसे कारनामे कर रही है जिसे आप अन्यत्र नहीं देख सकते.”
हां, लेहमन ने बहुत ज्यादा चालाकी दिखाई और इसी कारण उसका यह अंजाम हुआ. चूंकि विनाशकारी भूकम्प का मूलकेन्द्र और उसके बाद लगने वाला धक्का, दोनों का स्थान वित्तीय क्षेत्रा में यानी ऋण के नेटवर्क में है, इसलिये संकट के कारणों के बारे में हमारी जांच-पड़ताल भी वहीं से शुरू होनी चाहिये.
हम आगे बढ़ें, इससे पहले हमें स्मरण कर लेना होगा कि मार्कस पूंजीवादी संकट के विस्तृत सिद्धांत को खोज निकाल पाते, इससे पहले ही उनको अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा से अलविदा कहना पड़ा था. उनके जीवनकाल में पूंजी के द्वितीय खंड और तृतीय खंड को, अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांतों (थ्योरीज आॅफ सरप्लस वैल्यू) को और ग्रंड्रिस को, प्रकाशन के उपयुक्त नहीं बनाया जा सकता था, न ही वे पूंजीवादी अर्थतंत्र और राजप्रणाली के बहुतेरे अन्य पहलुओं की जांच-परख करने की अपनी योजना को ही साकार रूप दे सके थे. स्वाभाविक रूप से मार्कस के सिद्धांत की ढेर सारी किस्म की परस्पर भिन्न व्याख्याएं मौजूद हैं, मसलन रोजा लक्जमबर्ग का लेनिन से विरोध, और अर्नेस्ट मेंडल द्वारा पाॅल स्वीजी के खिलाफ की गई बहस, इत्यादि. इन विचार-शाखाओं के बीच समृद्ध और जारी बहस की समीक्षा करने का यहां स्थान नहीं है ऋ पूंजीवादी संकटों के सम्बंध में बुनियादी मार्कसवादी समझ की हमारी धारणा की संक्षिप्त रूपरेखा को ही हम यहां पेश कर सकते हैं.
सामान्य रूप से पूंजीवादी दौर की ही भांति साम्राज्यवाद अथवा एकाधिकारी पूंजीवाद (जिसे लेनिन ने साम्राज्यवाद की आर्थिक अंतर्वस्तु के बतौर चिन्हित किया था) के युग में या फिर उससे अधिक, एकाधिकारी वित्तीय पूंजीवाद (स्वीजी और बरान द्वारा दी गई संज्ञा) के द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर युग में संकटों ने कई नई चारित्रिक विशेषताएं ग्रहण कर ली हैं, जिसके चलते हमारे लिये मार्कस से आगे बढ़ना और पिछले सौ वर्षों के दौरान हासिल अनुभव की रोशनी में अपनी समझदारी को समृद्ध करना जरूरी हो गया है.
कोई संकट या तो (अ) सांयोगिक/प्रसंगवश हो सकता है या फिर (ब) ढांचागत/प्रणालीगत हो सकता है. सांयोगिक संकट व्यवस्था के केवल कुछेक हिस्सों या खास-खास परिक्षेत्रों -- जैसे कि वित्तीय अथवा वाणिज्यिक -- अथवा उत्पादन की किसी खास शाखा को, अथवा देशों के खास समूह को प्रभावित करता है. वह नाटकीय रूप से गंभीर भी हो सकता है. उदाहरणार्थ 1990 के दशक का दक्षिण एशियाई विगलन (मेल्टडाउन) या फिर वर्तमान शताब्दी के पहले दशक में डाॅटकाॅम बुलबुले का विस्फोट -- मगर फिर भी उसका आंशिक उपायों के जरिये, पूंजी संचय के मौजूदा तौर-तरीकों और ढांचों को ज्यादा उलट-पुलट किये बिना ही, अस्थायी अथवा आंशिक तौर पर समाधान किया जा सकता है. ऐसे संकट “विशाल गरजते तूफानों” (मार्कस के शब्दों में) की तरह हैं, जिनके जरिये वे अपने संकट का भार-विसर्जन और “समाधान” कर सकते हैं, जिस हद तक दी हुई स्थितियों में ऐसा करना सम्भव हो. ऐसा इसलिये संभव होता है क्योंकि वे फौरी मायनों में स्थापित वैश्विक ढांचे की चरम सीमाओं को कोई चुनौती नहीं देते. मगर संकट की गहराई में जमे बैठे पूंजीवाद के ढांचागत अंतरविरोध अगले उग्र विस्फोट की शक्ल में एक बार फिर अपना असर दिखलाने का इंतजार करते रहते हैं. इस प्रक्रिया में एक ऐसा बिंदु आता है जहां इन अंतर्विरोधों का सतही उपायों से कोई तदर्थ समाधान हो ही नहीं पाता और उनका क्रमशः संचित होने वाला असर खुद को किसी ढांचागत संकट के रूप में जाहिर करता है. ऐसे संकट के रूप में जो स्वभाव में सार्वभौमिक है (यानी अंतर्राष्ट्रीय अर्थतंत्र के सभी अनुभागों को समान रूप से प्रभावित करता है) और जिसका दायरा वैश्विक है (जो किसी भी देश या अंचल को अपने प्रभाव से मुक्त नहीं रखता). हम जिस संकट में जी रहे हैं वह इसी किस्म का संकट है. यह संकट ‘बुनियादी ढांचे’ को, पूंजीवादी व्यवस्था को उसकी ‘सम्पूर्णता’ में और उसके हृदयस्थल को प्रभावित करता है ऋ और हमारे समय में उसका हृदय वर्चस्वशाली वित्तीय परिक्षेत्र में स्थित है.
गरजते तूफानों जैसे सांयोगिक संकट की तुलना में, ज्यादा संभव है कि किसी ढांचागत संकट का ‘समय-पैमाना’ अपेक्षाकृत कम तात्कालिक अथवा आक्षेपकारी हो और कहीं ज्यादा विस्तारित और दीर्घकालिक हो; और उसके ‘प्रकट होने की प्रणाली’ को ‘रेंगना’ कहा जा सकता है ऋ हालांकि उसकी शुरूआत वर्ष 2008 में लेहमन ब्रदर्स एवं अन्य बड़ी-बड़ी कम्पनियों के पतन और “महामंदी” के पूर्व आने वाले विराट ध्वंस” जैसे उग्र विस्फोटों से हो सकती है.
संकट के मूल उद्गम वाले देश में संघीय (अमरीकी) सरकार और फेडरल रिजर्व (केन्द्रीय बैंक) ने बैंकों को संकट से राहत दिलाई और उन्हें “प्रोत्साहन” देने वाला एक कानून पास किया जिसने अर्थतंत्र के असहाय भाव से पतन पर रोक लगाई. पूरे यूरोप में सरकारों ने इसी रास्ते का अनुसरण किया. मगर देश की 99 प्रतिशत जनता की समस्याओं को -- ऊंचे दर्जे की बेरोजगारी, निम्न स्तर की मजदूरी, कर्ज अदा करने में लाचारी, आवासहीनता और डूब चुकी बंधकी जैसी समस्याओं को हल करने के लिये कुछ भी नहीं किया गया. आज कारपोरेशनों के पास धनराशि की भरमार है मगर वे निवेश करने में हिचकिचा रहे हैं क्योंकि उपभोक्ताओं के पैसे से लाचार अथवा बेरोजगार होने के कारण मांग में तो कोई इजाफा हो नहीं रहा. अमरीकी हाउस आॅफ रिप्रेजेन्टेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) द्वारा वर्ष 2011 में पारित “कमखर्ची का फैसला” के तहत अमरीकी सरकार अपने खर्चों में कटौती कर रही है जिसके फलस्वरूप बाजारों में और भी मंदी छा गई है. आवासीय परिक्षेत्र को पांच वर्ष पहले जो झटका लगा था उससे आज भी वह नहीं संभल सका है.
“रोजगार संकट की समस्या को हल कर पाने तथा सरकारी (सॉवरेन) ऋण विपदा को रोकने तथा वित्तीय क्षेत्र की दुर्बलता को बढ़ने से रोकने में नीति-निर्माताओं, खासकर यूरोप और अमरीका के नीति निर्माताओं की नाकामी ही वर्ष 2012-13 की संभावनाओं में विश्व अर्थतंत्र के समाने सबसे तीखा चोखिम बन गई है. नये सिरे से वैश्विक मंदी (रिसेशन) आने को तैयार खड़ी है. विकसित अर्थतंत्र चार कमजोरियों के कारण चक्रीय गति में पतन के कगार पर पहुंच गये हैं, और ये कमजोरियों आपस में एक-दूसरे को बल पहुंचा रही हैं – सरकारी ऋण विपदा, बैंकिंग परिक्षेत्र की दुर्बलता, कमजोर सकल मांग (जिसके साथ ऊंचे दर्जे की बेरोजगारी और वित्तीय कमखर्ची के कदम जुड़े हुए हैं) और राजनीतिक जाम तथा संस्थानिक त्रुटियों के चलते नीति के मामलों में लकवे का शिकार होना.”
वर्ल्ड इकनॉमिक सिचुएशन एंड प्रास्पेक्ट्स 2012 (संयुक्त राष्ट्रसंघ प्रकाशन) की एक्जीक्यूटिव समरी से
कुल मिलाकर, व्यापार चक्र की रोग-निवृत्ति (रिकवरी) होने के दौर के आरंभ होने के तीन वर्षों बाद, जून 2009 में जब अमरीका में महामंदी (ग्रेट रिसेशन) सरकारी तौर पर समाप्त घोषित हुई, तब भी अमरीकी अर्थतंत्र में ठहराव बरकरार है -- चाहे आप इसे पाॅल क्रुगमान के शब्दों में “तीसरी मंदी” (थर्ड डिप्रेशन) कहिये या फिर अमेरिकन इकनाॅमिक एशोसियेशन (एईए) के तत्कालीन अध्यक्ष राॅबर्ट ई. हाॅल द्वारा जनवरी 2011 में एईए के अधिवेशन में दिये गये भाषण के दौरान व्यवहृत शब्द “लम्बी गिरावट” (द लांग स्लम्प) कहिये. अपने बेस्टसेलर (सबसे ज्यादा बिकनेवाली किताब) ‘द ग्रेट स्टैग्नेशन’ में टायलर कोवेन ने दिखलाया है कि “बहु-दशकीय ठहराव” (ए मल्टी-डिकेड स्टैग्नेशन) अमरीकी अर्थतंत्र की एक चारित्रिक विशिष्टता बन गई है, जिसका आरंभ देश में आर्थिक संकट के आगमन के काफी पहले हो चुकी थी. वर्तमान ठहराव की प्रमुख विशेषता उसकी लड़खड़ाते हुए, रुक-रुक कर होने वाली रोग-निवृत्ति है, जिसके बीच-बीच में फिर से रोग के लक्षण प्रकट हो जाते हैं. अमरीका में 1930 के दशक में ऐसा ही हुआ था और ब्रिटेन में तो उससे भी पहले हो चुका था. ब्रिटेन के अनुभव के बारे में एंगेल्स ने 19वीं सदी के मध्य में लिखा था: “स्थायी रूप से ठहराव की स्थिति बने रहना ... जिसमें न तो पूरी तरह से विध्वंस (क्रैश) आयेगा; न ही बहुआकांक्षित समृद्धि का दौर आयेगा ... यह एक नीरस मंदी (डिप्रेशन) है -- सारे बाजारों और व्यापारों की स्थायी रूप से दिखने वाली अनचाही प्रचुरता -- जिसमें हम लगभग दस साल से जीते आ रहे हैं.” (इंगलैंड में मजदूर वर्ग की स्थिति)
यूरोप और जापान में भी स्थिति कोई बेहतर नहीं है. जापान में वृद्धि की दर इस वर्ष के मध्य में धीमी होकर 0.3 प्रतिशत पर आ गई है. 1 अगस्त 2012 को जारी किये गये सर्वेक्षणों ने दिखाया है कि परिधीय देशों में शुरू हुई गिरावट ने केन्द्र में भी गहरी जड़ें जमा ली हैं, जिसके फलस्वरूप 17-राष्ट्रों के यूरो जोन (इन देशों की साझी मुद्रा को यूरो कहते हैं) में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि लगातार ग्यारहवें महीने में भी संकुचित होती जा रही है, और चमत्कारपूर्ण प्रदर्शन करने वाले देश -- जर्मनी या इस अंचल के दूसरे सर्ववृहत् अर्थतंत्र फ्रांस -- भी इसके चंगुल से नहीं बच पाए. (यहां याद दिला दें कि जून 2012 में भारत की औद्योगिक उत्पादन 1.8 प्रतिशत संकुचित हो गया था). यूरोप के मुख्य भूभाग से पृथक इंगलैंड का क्रय-सम्बंधी प्रबंधक सूचकांक (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स, पीएमआई, जिसकी गणना निजी क्षेत्र के प्रबंधकों द्वारा मालों के नये आर्डरों, पैदावार, रोजगार, आपूर्तिकर्ता द्वारा डिलीवरी में लिये गये समय, और खरीदे माल के भंडार जैसे विषयों को शामिल करते हुए भेजी गई मासिक सांख्यिकीय रिपोर्टों के आधार पर की जाती है) तीन वर्षों से ज्यादा अवधि में अपनी सबसे तेज दर से संकुचित होकर, त्रिवर्षीय अवधि के न्यूनतम बिंदु से नीचे गिर गया. आर्गनाइजेशन फाॅर इकनाॅमिक कोआॅपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के सचिवालय के अनुसार, यूरोपीय संघ के 27 देशों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि 2011 की पहली तिमाही में 2.4 प्रतिशत से गिरकर अंतिम तिमाही में महज 0.8 प्रतिशत रह गया है. गिरावट कितनी तीखी है, इसे रोजगार के आंकड़ों से भी देखा जा सकता है.
संकट हमेशा वर्ग संघर्ष को तीव्र करता है. सीमित स्थान रहने के कारण यहां हम केवल संकट-वर्ग संघर्ष के बीच सम्पर्क-सूत्र के सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरम बिंदुओं -- पूंजी और श्रम दोनों के समक्ष नई चुनौतियां पेश करने वाले ऐतिहासिक मोड़ों पर ही संक्षिप्त नजर डाल सकते हैं.
पिछले संकटों की तरह वर्तमान संकट के साथ भी, या कहिये कि संकट की सम्पूरक परिघटना की हैसियत से, हर जगह रोजगार के अवसरों का खात्मा, वेतन जाम, सब्सिडी वापस लिये जाने, कारपोरेट कम्पनियों द्वारा कानूनी तौर पर की जाने वाली लूट के बतौर प्राकृतिक संसाधनों को हड़प लेने इत्यादि के खिलाफ सशक्त आंदोलन जुड़े हुए हैं. आइये, हम आर्थिक संकट के इन राजनीतिक परिणामों के कुछेक सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयामों पर संक्षिप्त नजर डालें.