बथानी टोला जनसंहार मामले में निचली अदालत ने जिन 23 हत्यारों को सजा सुनाई थी, उसे पलटते हुए पटना उच्च न्यायालय द्वारा उन तमाम हत्यारों को साफ बरी करने के आदेश ने देश भर के लोगों को मर्माहत और आक्रोशित कर दिया है. इस अन्यायपूर्ण न्यायादेश ने सामंती भूस्वामी सेना -- रणवीर सेना द्वारा 1990 के दशक में बिहार के ग्रामीण इलाकोें में किये गये जनसंहारों के पीड़ितों के लिये न्याय के सवाल को ज्वलंत सवाल बना दिया है. इस पुस्तिका में हम उन जनसंहारों की सामाजिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि और न्याय के लिये चले विविध स्तरीय संघर्षों को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं. हम उन हत्यारी ताकतों को मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण और उन वीभत्स कांडों में राजनीतिक संलिप्तता तथा न्याय के लिये जारी संघर्ष का भी ब्यौरा प्रस्तुत कर रहे हैं. यह पुस्तिका अविलम्ब न्याय के लिए एक आह्नान है -- सामंती-साम्प्रदायिक जनसंहार करने वालों के विरुद्ध न्याय, बथानी टोला और बिहार के लोगों के लिए न्याय, एक समतामूलक व शोषणमुक्त समाज के लिए लड़ रही और अपने संघर्षों की राह में चरम बर्बरतापूर्ण कोशिशों के सामने कभी न झुकने वाली बिहार की जनता के लिए न्याय.
सोलह वर्ष पूर्व मध्य बिहार के भोजपुर जिला अंतर्गत बथानी टोला में दिन-दहाड़े 21 लोगों- लगभग सभी महिलाएं, बच्चे और नवजात शिशु -- को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था. उस समय संपूर्ण देश की निगाहें इस अनजान बस्ती के अस्तित्व और रणवीर सेना की कड़वी सच्चाई की ओर घूम गईं -- रणवीर सेना एक सामंती निजी सेना थी जिसने 1990 दशक के अंतिम वर्षों में एक के बाद एक अनेक भयावह जनसंहार रचाए थे और मध्य बिहार के समूचे इलाके में सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा था.
वह बीसवीं सदी थी, और अब हम नई सदी और नई सहस्त्राब्दि के दूसरे दशक की यात्रा कर रहे हैं. बिहार में अब ऐसी सरकार का शासन है, जो ‘न्याय के साथ विकास’ करने का दावा जताती है. जनसंहार प्रत्यक्षतः रूक गए हैं और मई 2010 में आरा डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने बथानी टोला में जनसंहार के लिए 23 लोगों को अभियुक्त बनाया, तथा उनमें से तीन को सजा-ए-मौत और शेष बीस को उम्र कैद की सजा सुनाई.
सरकार ने दावा किया -- अंततः, पिछले वर्षों के जनसंहार के पीड़ितों को न्याय दिया गया; और नवंबर 2010 के चुनाव में और बड़े बहुमत के साथ सत्ता की कुर्सी पर विराजमान हुई. हाशिए पर खड़े उत्पीड़ित ग्रामीण गरीबों, नया नाम पाए ‘महादलितों’, ‘अति पिछड़ों और पसमांदा मुसलमानों -- इन सब ने नए शासन में अपनी गहरी आस्था जताई.
दो वर्ष बाद, अप्रैल 2012 में, पटना उच्च न्यायालय ने उन तमाम 23 सजायाफ्ता अभियुक्तों को बरी कर दिया, और हर किसी को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि 1996 के 11 जुलाई की इस दुर्भाग्यपूर्ण दुपहरी में बथानी टोला के उन इक्कीस अभागों को आखिर किसने मारा.
उच्च न्यायालय के इस आदेश का हम क्या मतलब निकाल सकते हैं. क्या यह महज कोई न्यायिक अपवाद का मामला है ? इसके विपरीत, पिछले रिकाॅर्ड तो यही बताते हैं कि यह तो बिहार का आम चलन बन गया है-- ग्रामीण गरीबों का संहार रचानेवालों में लगभग सब-के-सब अंततः बरी कर दिए गए, अलबत्ता उनमें से कुछ को जरूर विचाराधीन कैदियों की तरह चंद वर्ष जेल में बिताने पड़े. लेकिन, तब क्या बिहार में हालात कुछ बदल नहीं गये हैं ? क्या नीतीश कुमार के ‘बदले’ बिहार में सामंती पूर्वाग्रहों के बारे में चर्चा करना कोई पुराने दिन की बात नहीं हो गई है ?
ठीक जैसे कि जुलाई 1996 के बथानी टोला जनसंहार ने लालू शासन के सामाजिक-राजनीतिक चरित्र को रेखांकित किया था, अप्रैल 2012 के उच्च न्यायालय का आदेश-- इसे न्यायिक संहार या बथानी टोला-II कहिए -- नीतीश कुमार के बिहार में वर्चस्वशाली सामाजिक-राजनीतिक माहौल का ही प्रतिबिंब दिखला रहा है. जहां सर्वोच्च न्यायालय को निश्चय ही उच्च न्यायालय के आदेश की समीक्षा करनी चाहिए और बथानी टोला के पीड़ितों के लिए कानूनी न्याय की गारंटी करनी चाहिए, वहीं राजनीतिक और सामाजिक न्याय हमसे मांग करता है कि हम बथानी टोला के संदर्भ और तात्पर्य को समझें तथा मर्यादा व जनवाद के लिए पीड़ितों की लड़ाई में उनके साथ खड़े हों.
जब बथानी टोला-II हुआ, तो कई लोगों ने सोचा कि यह, बस, एक दूसरा जनसंहार है, जिसका कारण किसी भूमि विवाद निहित है. लेकिन इस सामान्य समझ के विपरीत, बथानी टोला साफ तौर पर एक राजनीतक जनसंहार था जो भाकपा(माले) समर्थकों को सबक सिखाने के खुले मकसद से अंजाम दिया गया था. यह जनसंहार भरी दोपहरी में किया गया था, जिसमें गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं समेत महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया गया; और इसे ऐसी नृशंसता से अंजाम दिया गया, जैसी नृशंसता सिर्फ कुछ खास समूहों के सफाए के मकसद से किए जानेवाले नरसंहारों में ही दिखती है. महिलाओं को निशाना बनाया गया, क्योंकि वे नक्सलाइटों को जन्म देंगी; बच्चों को मारा गया, क्योंकि जिंदा रहने पर वे नक्सलाइट बनेंगे.
कुछ लोग यकीन करते हैं कि बिहार में रणवीर सेना जैसी निजी सेनाएं जमीन और मजदूरी के संघर्षों में भाकपा(माले) द्वारा की गई ‘अतियों’ की सामाजिक प्रतिक्रिया के बतौर पनपी थीं. यह बताने की कोशिश की गई कि मध्य बिहार के भोजपुर या इसके अगल-बगल के जिलों में उस तरह की बड़ी भू-जोतें नहीं हैं, जो आम तौर पर सामंतवाद के लक्षण होते हैं और इसीलिए भाकपा(माले) का सामंतवाद-विरोधी संघर्ष का समूचा सिद्धांत और व्यवहार ही गलत अवधरणाओं पर टिका हुआ है.
भोजपुर और बिहार के कई दूसरे हिस्सों में भाकपा(माले) का इतिहास स्पष्टतः दिखाता है कि जमीन और मजदूरी महत्वपूर्ण मुद्दे जरूर रहे हैं, किंतु निर्णायक लड़ाइयां प्रायः मानवीय मर्यादा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवालों पर लड़ी गई हैं. हमें इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर हम स्मरण करें कि सामंती सत्ता प्रमुखतः गैर-आर्थिक उत्पीड़न के जरिए ही लागू की जाती है और पुनरुत्पादित भी होती है. सामाजिक उत्पीड़न, विभिन्न रूपों और मात्रा में बंधुआ श्रम तथा राजनीतिक बहिष्करण ऐतिहासिक रूप से पूरी दुनिया में सामंती वर्चस्व के प्रमुख लक्षण रहे हैं.
अगर हम बिहार में भाकपा(माले) आंदोलन के इतिहास को देखें तो हम पाएंगे कि वोट देने का अधिकार उन चंद मुद्दों में से एक है, जिसपर सबसे तीखी लड़ाई चली है. वस्तुतः, भोजपुर में भाकपा(माले) का अभ्युदय 1967 के विधनसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में ही हुआ था, जिसमें कामरेड राम नरेश राम ने माकपा उम्मीदवार के बतौर चुनाव लड़ा था . और सामंती ताकतों ने उन्हें और उनके सभी घनिष्ठ सहयोद्धाओं को बुरी तरह पीटा था और तंग-तबाह किया था, क्योंकि उन ताकतों को उत्पीड़ित और पद-दलित की यह ‘राजनीतिक धृष्टता’ तनिक भी पच नहीं पाई.
वर्षों बाद, 1989 के लोकसभा चुनाव में, जब बड़ी संख्या में दलितों को पहली बार मताधिकार का प्रयोग करने में, और आरा से लोकसभा में पहले ‘नक्सलाइट’ सांसद के बतौर कामरेड रामेश्वर प्रसाद को निर्वाचित करने में सफलता मिली तो मतदान के ठीक बाद दनवार-बिहटा में खून की होली खेली गई, और वोट डालने के अधिकार के लिए बाइस लोगों को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ी.
बथानी टोला की भी लगभग ऐसी ही पृष्ठभूमि है. 1978 के पंचायत चुनाव में मोहम्मद युनुस सहार प्रखंड के खड़ांव पंचायत में मुखिया बने थे. उनकी जीत से उस इलाके की सामंती-सांप्रदायिक शक्तियां खार खाए बैठी थीं. इस लोकप्रिय मुखिया के नेतृत्व में खड़ांव के और इसके आसपास के गरीब मुसलमान बड़ी संख्या में भाकपा(माले) में शामिल हुए. वर्ष 1995 के विधानसभा चुनाव में भाकपा(माले) ने पहली बार सहार और साथ ही बगल के संदेश क्षेत्रों पर जीत हासिल की. विजयी विधायक और कोई नहीं, स्वयं कामरेड राम नरेश राम थे -- 1967 का भाकपा उम्मीदवार आज बिहार में भाकपा(माले) का कद्दावर नेता था -- और थे कामरेड रामेश्वर प्रसाद, आरा से इंडियन पीपुल्स फ्रंट के भूतपूर्व सांसद.
भोजपुर के सामंती खेमा के अंदर घोर निराशा और घबराहट छा गई. बिहार की धरती से भाकपा(माले) को मिटा देने के घोषित उद्देश्य के साथ रणवीर सेना का गठन किया गया. खड़ांव में इमामबाड़ा और कर्बला की जमीन पर मुस्लिम लोगों के परंपरागत अधिकार को खत्म करने के लिए सांप्रदायिक गोलबंदी शुरू हो गई. अपनी जमीन और अधिकार की रक्षा करने के संघर्ष के क्रम में अनेक मुस्लिम परिवार उजाड़ दिए गए, जो बाद में खड़ांव पंचायत के बथानी टोला की प्रमुखतः दलित बस्ती में जाकर बस गए. दलित और मुस्लिम ग्रामीण गरीबों की यही वह मिलीजुली बस्ती थी, जिसे 11 जुलाई 1996 के दिन मौत का भारी तांडव देखना पड़ा.
इस जनसंहार के बाद बिहार में व्यापक प्रतिवाद शुरू हो गए. लोग आशा कर रहे थे कि लालू प्रसाद -- गरीबों के स्वघोषित मसीहा, खासकर पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के स्वघोषित रहनुमा -- फौरन कदम उठाएंगे. लेकिन कामरेड रामेश्वर प्रसाद और अस्सी वर्ष से भी ज्यादा उम्र के भाकपा(माले) नेता कामरेड तकी रहीम द्वारा कई सप्ताह तक भूख हड़ताल (अनशन) चलाने के बाद ही लालू प्रसाद ने भोजपुर के डीएम का तबादला भर कर दिया, क्योंकि वे इस पैमाने के जनसंहार को रोकने में विफल रहे, जो घंटों चलता रहा था और जनसंहार स्थल से महज दो किलोमीटर की दूरी पर मौजूद पुलिस चुपचाप बैठी रही. रणवीर सेना को कागज पर प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन उसका कोई सदस्य गिरफ्तार नहीं हुआ और हर बीतते वर्ष में जनसंहारों की फेहरिस्त लंबी होती चली गई. अपने एक सर्वाधिक स्पष्ट राजनीतिक वक्तव्य में, लालू प्रसाद ने भोजपुर की एक सार्वजनिक सभा में ऐलान किया कि भाकपा(माले) का मुकाबला करने के लिए वे नरक की ताकतों से भी हाथ मिलाने को तैयार हैं !
इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बथानी टोला के कुछ समय बाद ही लक्ष्मणपुर बाथे की घटना हो गई. वर्ष 1997 के अंत में, जब समूचा देश नव वर्ष के आगमन की तैयारियां कर रहा था, रणवीर सेना ने जहानाबाद जिला के लक्ष्मणपुर बाथे गांव में ठंडे दिमाग से लगभग 60 लोगों को गोलियों से भून डाला. सोन नदी के दो किनारों पर बसी दो अनजान बस्तियां बथानी और बाथे राष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियों में छा गईं. भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने बाथे जनसंहार को ‘राष्ट्रीय शर्म’ की संज्ञा दी. बाध्य होकर लालू प्रसाद को रणवीर सेना को मिलनेवाले राजनीतिक व प्रशासकीय संरक्षण की जांच करने के लिए न्यायमूर्ति अमीरदास की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन करना पड़ा. बहरहाल, यह आयोग लगातार शिकायत करता रहा कि उसे काम करने के लिए जरूरी स्टाफ, शक्ति और संसाधन नहीं मुहैया कराए जा रहे हैं. इस दरम्यान, रणवीर सेना लगातार जनता से अलगाव में पड़ती चली गई, और वर्ष 2002 में सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह ने राज्य के समक्ष ‘आत्मसमर्पण’ कर दिया.
नवंबर 2005 में बिहार में सरकार बदली और भाजपा के समर्थन से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने. सरकार ने सबसे पहले जो कदम उठाए, उनमें अमीर दास आयोग को भंग करना भी एक था. भाजपा और जद-यू के नेताओं ने, और यहां तक कि राजद व कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने -- जिन सब को आयोग ने अपने समक्ष पेश होने का आदेश निर्गत किया था -- बड़ी राहत की सांस ली. नीतीश सरकार की दूसरी पारी जब शुरू हुई तो ब्रह्मेश्वर सिंह को जमानत मिल गई. और अब, उच्च न्यायालय ने बथानी के अभियुक्तों को बरी करके बथानी के भविष्य को अधर में लटका दिया है. बेशक, नीतीश कुमार ‘न्याय के साथ विकास’ की रट लगा रहे हैं, और उनके शासनकाल में बिहार ‘क्रांतिकारी परिवर्तनों की लहरों’ पर सवार हो चुका है.
यकीनन, बिहार बदला है. पूर्व के वर्षों के जगन्नाथ मिश्र और बिंदेश्वरी दुबे सरीखे लोगों के हाथों से निकलकर सत्ता अब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसों के हाथों में आ गई है. फिर भी बथानी-I और बथानी-II हमें स्पष्ट रूप से बताते हैं कि यह सत्ता अब भी उतनी सामंती है, जितनी पहले थी, नीतीश कुमार खुल्लमखुल्ला भाजपा के साथ संश्रय में है, जो बिहार में सामंती सांप्रदायिक खेमे का सर्वाधिक संगठित प्रतिनिधि है. यहां तक कि लालू प्रसाद यादव भी सवर्ण वर्चस्व के खिलाफ अपनी तमाम जुगालियों के बावजूद, खास तौर पर ग्रामीण गरीबों और भाकपा(माले) के बरक्स, सामंती शक्तियों को संतुष्ट करने में सारी हदें पार कर गये. इसे कोई अपवाद नहीं समझना चाहिए कि भूमि सुधर आयोग की रिपोर्ट को कूड़ेदानी में फेंक दिया गया; या कि अमीर दास आयोग अपनी रिपोर्ट पेश कर सके इसके पहले ही उसे भांग कर दिया गया. अथवा यह कि बथानी के तमाम अभियुक्तों को बरी कर दिया जाता है और दर्जनों जघन्य जनंसहारों का प्रमुख साजिशकर्ता जमानत पा लेता है.
बिहार में वास्तविक परिवर्तन शासकों के बदलते जातीय स्वरूप में नहीं निहित है. वास्तविक परिवर्तन शासकों की बदलती राजनीतिक जुमलेबाजियों में भी नहीं निहित है-- चाहे वह लालू प्रसाद का ‘सामाजिक न्याय’ हो या नीतीश कुमार का ‘सुशासन’ का मंत्र ही क्यों न हो. वास्तविक परिवर्तन बिहार के अर्ध-सामंती राजनीतिक अर्थतंत्र के साथ जुड़े वैश्वीकरण और काॅरपोरेटीकरण की उस चमक-दमक में भी नहीं निहित है, जो कागज पर आंकड़ों में बड़ी वृद्धि के रूप में झलकती है.
वास्तविक परिवर्तन तो इस दृढ़ता और साहस और संकल्प में निहित है जिसके साथ बथानी और बाथे अपने न्याय के लिए, अपनी मर्यादा और अपने जनवाद के लिए संघर्ष कर रहा है. हां! न्याय, मर्यादा और जनवाद वर्ग-निरपेक्ष शब्द नहीं हैं; और यकीनन, इनपर धनिकों व शक्तिशालियों की इजारेदारी भी नहीं है. अप्रैल 1986 में अरवल जनसंहार के बाद, जब बिहार में जालियां-वाला बाग कांड दुहराया गया था, कामरेड विनोद मिश्र ने लिखा, “जब एक अनजाने, गुमनाम, गर्द-गुबार से सने कीचड़-भरे रास्तों वाले छोटे से कस्बे अरवल में किसानों के सबसे गरीब तबके के लोगों की अन्यथा ‘मामूली सी मौत’ बिहार में सत्ताधरियों के राजनीतिक संकट का स्वरूप तय करने लगे, तो बेहिचक ऐलान किया जा सकता है कि आखिरकार नायक रंगमंच पर आ पहुंचे हैं.” न्यायालय के आदेशों के बावजूद, अरवल, बथानी और बाथे ने मिटने से इंकार कर दिया और वे आज भी बिहार में न्याय और जनवाद के लिए लड़ाइयों में लगातार नई ऊर्जा का संचार कर रहे हैं.
1974 में बिहार ने नौजवानों के सपनों और आकांक्षाओं के साथ दिल्ली में पनप रही निरंकुशता को चुनौती दी थी. जब लालू प्रसाद का ‘सामाजिक न्याय’ का शासन घोटालों और जनसंहारों के शासन में पतित हो गया बिहार ने यह कहते हुए उसके खिलाफ संघर्ष किया कि सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक रूपांतरण अनिवार्य है. आज, जब नीतीश कुमार का ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा तेजी से ‘अन्याय के साथ लूट’ में बदल रहा है, और उनका ‘सुशासन’ बेलगाम पुलिस राज बनता जा रहा है, तो लोकतंत्र के हर स्वपनद्रष्टा और रक्षक को बथानी टोला के पीड़ितों के पक्ष में खड़ा हो जाना पड़ेगा ताकि न्याय और वास्तविक परिवर्तन का झंडा बुलंद करते हुए बिहार को आगे बढ़ाया जा सके.
11 जुलाई 1996 को सवर्ण भूस्वामियों की एक निजी सेना (रणवीर सेना) ने बिहार के भोजपुर जिले के बथानी टोला में 21 लोगों की निर्मम हत्या की थी (इनमें 11 महिलाएं, 10 वर्ष से कम उम्र की 5 बच्चियां, 8 वर्ष से कम उम्र के 4 बच्चे और एक पुरुष शामिल थे). ये सभी दलित और मुस्लिम भूमिहीन गरीब थे. जनसंहार दिन के 2 बजे शुरू हुआ. हमलावर पड़ोस के बड़की खड़ांव गांव से आये थे जो अगले तीन घण्टों तक फूस की झोपड़ियों में आग लगाते रहे, औरतों व बच्चों को तलवारों से काटते रहे, गोलीबारी करते रहे. महज 100 मीटर की दूरी पर थाना था और विभिन्न दिशाओं में 1-2 किमी की दूरी पर 3 अन्य पुलिस कैम्प अवस्थित थे. लेकिन भरी दुपहरी में मौत के उस तांडव को रोकने के लिये कहीं से कोई पुलिस नहीं आई और बथानी टोला को उसके अपने हाल पर छोड़ दिया गया.
आरा सेशन कोर्ट ने वर्ष 2010 में इसी जनसंहार के लिये दोषी 23 लोगों को सजा सुनाई -- 3 लोगों को मृत्युदंड दिया गया और 20 को उम्रकैद. लेकिन अप्रैल 2012 में पटना हाइकोर्ट ने इन सभी 23 लोगों को बरी कर दिया. नीतीश कुमार की बिहार राज्य सरकार ने कहा है कि वह इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जायेगी. लेकिन इस औपचारिक भंगिमा के पीछे उसकी असली मंशा उसके एक मंत्री गिरिराज सिंह के इस कथन से जाहिर हो जाती है कि “बथानी टोला जनसंहार के मामले को जल्द-से-जल्द खत्म कर देना चाहिये. इस मुद्दे पर अधिक चर्चा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि इससे माहौल बिगड़ सकता है.” इस प्रकरण ने एक बार फिर नीतीश सरकार के सामंती आधार को उजागर कर दिया जो उनकी गरीबपरस्त भंगिमा और ‘न्याय के साथ विकास’ की जुमलेबाजी के पीछे छिपा रहता है.
(लिबरेशन, जनवरी 1998 से.)
(7 सितम्बर 1996 की मेनस्ट्रीम पत्रिका में छपे विनोद मिश्र के लेख के कुछ अंश)
… बहरहाल सिर्फ इस वजह से कि श्री किशुन चौधरी कुछ अभियुक्तों को पहचान नहीं सके उनके पूरे बयान को खारिज नहीं किया जा सकता. ... इस गवाह का साक्ष्य (अनेक अभियुक्तों की शिनाख्त और अन्य गवाहों के साक्ष्य से पुष्ट- संपादक) सच और भरोसेमंद प्रतीत होता है.
आम तौर पर साफ है कि राधिका देवी ने अभियुक्त बच्चा सिंह और मनोज सिंह के बारे में अपनी गवाही में कोई नमक मिर्च लगाकर ... बात नहीं बनाई है क्योंकि अपने साथ और नईम की बेटी के साथ अभियुक्तों के आचरण का उनका बयान सुसंगत रहा है. इसलिए राधिका देवी की गवाही सच और भरोसेमंद लगती है तथा मंजूर की जाती है. (खेतिहर मजदूर राधिका देवी और उनकी माँ खेत में काम कर रही थीं जब उन्होंने हमलावरों को देखा. उसने कहा कि जब हमलावर मारवाड़ी चैधरी के घर में घुसे तो वह खाट के नीचे छिपी हुई थी जहां से दिमंगल और श्री किशुन चौधरी की पत्नी को निकालकर उन्हें काट डाला गया. राधिका और उसकी माँ मालती, नईम की लड़की के साथ छिपी रहीं. बच्चा सिंह ने राधिका को बहलाकर न मारने का वादा करते हुए बाहर निकाला. जब वह बाहर आई तो उसने देखा कि मनोज सिंह ने दो महीने की नईम की बेटी को हवा में उछाला और उसे दाव से काट डाला. बच्चा सिंह ने उसकी छाती पर गोली चलाई और जब वह गिर गई तो उसकी उंगलियों को ईंट से कुचलकर सुनिश्चित किया कि वह मर गई है। वह मुख्य गवाहों में थी जिसने अनेक अभियुक्तों को पहचाना. सदर अस्पताल में राधिका देवी का इलाज करने वाले डाक्टर ने गवाही दी कि उसकी छाती और सांस की नली में गहरे घाव थे और नईम की बेटी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि उसके घाव और मौत की वजह राधिका देवी के आंखों देखे बयान के मुताबिक ही थे - संपादक)
... गवाह पलटन राम का बयान कि उसने अपनी बेटी (दस साल की- संपादक) फूल कुमारी को घर से बाहर भागते हुए देखा, अभियुक्त अजय सिंह ने उस पर और अभियुक्त नागेंद्र सिंह ने रामरतिया देवी पर गोली चलाई, पुख्ता साबित हुआ है और डाक्टर अर्जुन सिंह (वह डाक्टर जिसने फूल कुमारी और राम रतिया देवी के पोस्टमार्टम की गवाही दी) के बयान से समर्थित और पुष्ट है.
साफ है कि गवाह नईमुद्दीन ने हमलावरों को बीस से पचीस गज नजदीक से देखा था. यह भी साफ है कि इस गवाह ने घटनाक्रम का सही बयान किया है. ... सही है कि अभियुक्तों की पहचान के मामले में उसने थोड़ा असंगत बयान दिया लेकिन सिर्फ इसी वजह से (उसके) बयान को दरकिनार नहीं किया जा सकता क्योंकि अन्यथा (यह) किसी भी झोल, तोड़-मरोड़ या अतिकथन से दूर लगता है और (अन्य) गवाहान से अच्छी तरह पुष्ट है. सरकारी गवाह इमाम हुसैन उर्फ इमामुद्दीन और राधिका देवी ने निर्भूल बयान दिया है इसलिए उनकी शिनाख्त संदेह से परे है.
फैसले के समय (12.5.2010) आज अभियुक्त मनोज सिंह, बेला सिंह, दिलीप सिंह और संतोष सिंह की ओर से आवेदन दिया गया कि घटना के वक्त वे नाबालिग थे जैसा कि उन्होंने धरा 313 सी.आर.पी.सी. के तहत दर्ज बयान में कहा था इसलिए इस आवेदन पर संज्ञान लेकर सुनवाई की जाय. इस मसले में ... मुझे दावे में कोई दम नहीं नजर आया ... क्योंकि आवेदन तब किया गया जब अभियुक्तों को दोषी पाया गया और पफैसले का समय आया जबकि पिछले बारह साल से घिसट रहे इस मुकदमे के दौरान अभियुक्तों की ओर से यह आवेदन कभी नहीं दिया गया था. साफ है कि सभी आरोपी अपने साथियों के साथ सिर्फ हत्याकांड के ही मकसद से बथानी टोला गए थे और उन्होंने 3 महीने से लेकर 35 साल तक के बच्चों और औरतों का कत्ल किया. इसलिए सरकारी गवाहान के बयान से प्रकट तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर यह मामला विरल से विरलतम मामलों की श्रेणी में आता है. साफ है कि आरोपी नं.-1 अजय सिंह द्वारा दस साल की लड़की फूल कुमारी के कत्ल का ठोस सबूत है जबकि आरोपी मनोज सिंह ने नईम की 3 महीने की बच्ची को मारा और आरोपी नं.-3 नागेंद्र सिंह उर्फ नरेंद्र सिंह ने दस साल की फूल कुमारी का हाथ काटने के अलावा संझारो देवी और रामरतिया देवी का कत्ल किया. इसी तरह आरोपी बच्चा सिंह उर्फ हरेकृृष्ण सिंह के खिलाफ सबूत है कि उसने राधिका देवी के सीने पर गोली चलाई जिससे वह बच गई. ... ऐसे हालात में आरोपी 1 से 3 अर्थात अजय सिंह, मनोज सिंह और नागेंद्र सिंह उर्फ नरेंद्र सिंह फाँसी की सजा पाने लायक ठहरते हैं ... जबकि आरोपी बच्चा सिंह को दंड संहिता की धारा 307 के तहत आजीवन कारावास की सजा दी जाती है ... और अन्य आरोपी बच्चा सिंह, हरे राम सिंह, अक्षयबर सिंह, कन्हैया सिंह, दिलीप सिंह, संजय सिंह, अशोक सिंह, मुन्ना सिंह, डिग्री सिंह, संतोष सिंह, कमलेश सिंह, सूबेदार सिंह, बेला सिंह, माधे मौर, महेंद्र मौर, श्री भगवान मौर, भरत मौर, झम्मन उर्फ वेंकटेश मौर, राम पूजन ओझा और मंगल राय को धारा 302/149 के तहत आजीवन कारावास की सजा दी जाती है.
अजय कुमार श्रीवास्तव,
एडीशनल डिस्ट्रिक्ट सेशन जज-1, भोजपुर, आरा
मुख्य सरकारी गवाह के साथ विस्तार से बचाव पक्ष ने जिरह की और इस मामले में कुछ दिलचस्प पहलू सामने आए. उसने माना कि 11/7/1996 की शाम वह सदर एस.डी.ओ के साथ जीप से कानून व्यवस्था की ड्यूटी पर सहार पुलिस थाने से 6 किलोमीटर दूर नाढ़ी गया हुआ था. नाढ़ी में ही शाम 4 बजे वायरलेस पर उसे सहार थाने से बथानी टोला संहार की खबर मिली. वायरलेस संदेश जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत सभी पुलिस अधिकारियों को भेजा गया था. उसने माना कि यह सूचना साफ तौर पर संज्ञेय अपराध की सूचना थी. उसने माना कि पिछले 6 या 8 महीनों से बड़की खड़ांव में बिहार मिलिटरी पुलिस का कैंप था जिसके इंचार्ज रघुराज तिवारी (गवाह बचाव पक्ष-1) थे. उसने माना कि रघुराज तिवारी (गवाह बचाव पक्ष-1) ने ही चैकीदार निर्मल यादव (गवाह बचाव पक्ष-2) के हाथ संहार की लिखित सूचना सहार थाने भिजवाई जिसके आधार पर वायरलेस संदेश भेजा गया. उसने माना कि इस लिखित सूचना के आधार पर न तो थाने में कोई केस दर्ज किया गया न इसे सुरक्षित रखा गया, न केस डायरी में इसमें लिखित बातों को दर्ज किया गया, न ही उसने इसे पढ़ा. वायरलेस संदेश मिलते ही वह तुरंत बथानी टोला की ओर भागा. तकरीबन 5 बजे वह खैरा गाँव आया जहां उसकी मुलाकात डिप्टी एस पी, सब इंस्पेक्टर, अगियाँव और सशस्त्रा पुलिस बल से हुई और वे सभी बथानी टोला की ओर ट्रैक्टर से चले क्योंकि बारिश के कारण जीप से चलना नामुमकिन था. उसने माना कि वह 11/7/1996 को शाम 5.45 या 6 बजे बथानी टोला पहुंचा.
फिर हमारे पास गवाह बचाव पक्ष-2 के रूप में निर्मल यादव है. वह बड़की खड़ांव गांव का चैकीदार था. वह बताता है कि करीब 2.30 बजे जब गोलीबारी शुरू हुई, रघुराज प्रताप सिंह (गवाह बचाव पक्ष-1) ने उसे एक लिखित रिपोर्ट सहार थाने में देने के लिए दी. वह तत्काल सहार थाने के लिए चला गया और वहां रिपोर्ट दे दी. ध्यान देने योग्य बात है कि इस संदेश को पाने के बाद ही सहार थाना से वायरलेस संदेश पूरे जिले में प्रसारित किया गया. लेकिन अभियोजन पक्ष द्वारा न तो वह लिखित संदेश और न ही वायरलेस संदेश रिकाॅर्ड में लाया गया है. उसने एक चैंका देने वाला खुलासा किया. जब दोनों तरफ से सैकड़ों राउण्ड गोलियां आधे घण्टे से अधिक समय तक चलती रहीं, पुलिस ने एक भी कारतूस बरामद नहीं किया. यह भी ध्यान देने लायक है कि कोई भी हथियार, आग्नेयास्त्र बरामद नहीं किया गया और उसके जनसंहार में इस्तेमाल होने का सबूत नहीं दिया गया. अभियोजन पक्ष यह बताने में कि, क्यों इन दोनों गवाह, बचाव पक्ष-1 और गवाह बचाव पक्ष-2, को गवाह अभियोजन पक्ष के रूप में जांच नहीं की गई, जबकि चार्जशीट में गवाहों में इनका नाम था.
चार गवाहों द्वारा ऊपर वर्णित घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि अभियोजन पक्ष द्वारा बतायी गयी कहानी सच से परे है. एक जनसंहार हुआ था जिसमें करीब 20 लोगों की जानें चली गईं. उनका बर्बरता से कत्लेआम किया गया था, लेकिन वास्तव में क्या घटा उसे सत्यपूर्वक और सही-सही दर्ज नहीं किया गया था. वह सूचना जो सबसे पहले प्राप्त हुई अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में कभी पेश नहीं की गई. स्पष्ट है कि फर्दबयान बहुत बाद में बनाया गया और इसके दर्ज होने के समय में हेराफेरी की गई.
यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि डी.एम., एस.पी. और अन्य वरिष्ठ अधिकारी वहां पूरी रात क्या कर रहे थे. प्रशासन घायलों को उनके बयान दर्ज करवाये बिना वहां से हटा रहा था. क्यों लाशें रात भर पड़ी रहीं, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। हालांकि फर्दबयान के बारे में बताया गया है कि उसे 12.07.96 को 4.30 बजे सुबह दर्ज किया गया, लेकिन एफ.आई.आर. कब दर्ज की गयी, नहीं मालूम. एफ.आई. आर. को अदालत के लिए 13.07.96 को भेजा गया, लेकिन वह सी.जे.एम., आरा के पास 14.07.96 को पहुंची।
(राधिका देवी) के प्रथम दर्ज बयान का कुछ महत्व है क्योंकि बाद में जब अदालत में गवाह अभियोजन पक्ष-4 के रूप में परीक्षण के समय उसने घटना का सजीव चित्रण करते हुए स्वयं को मारवाड़ी चैधरी (अभियोजन पक्ष गवाह नं. 6) के घर में बताया, जहां अपने चारों ओर वह कत्लेआम होते देख रही थी. फिलहाल यहा बयान और चोटों की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि वह पूरी रात अधिकारियों और पुलिस के समक्ष मौजूद थी लेकिन तत्काल उसका बयान दर्ज करने का कोई प्रयास नहीं किया गया.
(डा. रोहित राम कनोजिया) ने राध्किा देवी, गवाह अभियोजन पक्ष-4, समेत चोटों की कुछ रिपोर्टों को प्रमाणित किया है जहां उन्होंने चोटों की प्रकृति और कारण पर अपनी राय सुरक्षित रखते हुए उसे पी.एम.सी.एच. में रेफर किया। राज्य की ओर से राधिका देवी के पी.एम.सी.एच. में इलाज और चोटों की रिपोर्ट के किसी सबूत को पेश नहीं किया गया है.
आश्चर्य की बात है कि उसका (राधिका देवी) पी.एम.सी.एच. में इलाज हुआ और वहां से डिस्चार्ज भी हो गयी, उसके वहां इलाज या चोट की प्रकृति के बारे एक पर्ची भी सबूत के तौर पर नहीं दी गई. ... एक अन्य उल्लेखनीय बात कि उसका आरोप था कि उसकी उंगलियों को यह जानने के लिए कुचला गया कि वह जिन्दा तो नहीं है, लेकिन चोटों के किसी भी विवरण में इसको नहीं दर्शाया गया. उसने स्वीकार किया है कि उसके ब्लाउज पर जलने के निशान नहीं थे, यद्यपि उसकी छाती की चमड़ी बन्दूक की गोली से जली हुई थी. ... इस पर विचार करते हुए हमारी राय में उसे जख्म कैसे और कहां लगा स्थापित नहीं हो सका, मारवाड़ी चैधरी के घर में उसकी उपस्थिति भी उसके विरोधभासी बयानों के कारण संदेहास्पद है, गवाह के रूप में वह पूरी तरह अविश्वसनीय है.
(जांच अधिकारी) ने स्वीकार किया है कि घटना के स्थान पर उसने कोई भी जंगल, झाड़ी या गड्ढे नहीं पाये, जोकि जाहिराना तौर पर गवाहों द्वारा बताये गये छुपने के विभिन्न स्थानों के संदर्भ में था। इतने बड़े जनसंहार की छानबीन के बाद अभियोजन पक्ष इतना कमजोर साक्ष्य ही ला सका.
जांच अध्किारी (गवाह अभियोजन पक्ष-13) के इस बयान का विश्लेषण करने पर जनसंहार होने की बात स्थापित होती है, संज्ञेय अपराध की लिखित और मौखिक सूचनायें 4.30 बजे सायं तक पुलिस को घटना के दिन ही प्राप्त हो चुकी थीं परन्तु उसने उन्हें रिकार्ड से बाहर रखे रहा. पुलिस के लोग, सरकार के उच्च अधिकारीगण घटनास्थल पर चार घण्टे के अंदर ही पहुंच चुके थे लेकिन अगली सुबह सूचनाकर्ता के फर्दबयान होने तक कोई भी बयान दर्ज नहीं किये जा रहे थे, और लोगों को आपस में मिलने, विचार करने और कहानी की योजना बनाने के लिए काफी समय दिया गया। बचाव पक्ष ने ठीक ही तर्क दिया है कि अभियोजन पक्ष ने प्रथम सूचना को सोच-समझ कर छिपाया ताकि इतना समय मिल सके कि कहानी को अपने हिसाब से गढ़ा जा सके यह अपीलकर्ताओं की सत्यता को अविश्वसनीय बनाता है। क्यों इसे छिपाया गया, स्पष्ट नहीं किया गया है।
इस बारे में हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि अभियोजन को कहानी गढ़ने के लिए समय दिया गया क्योंकि शुरू वाली कहानी को पचाना मुश्किल था। ऐसी परिस्थिति में अदालत न केवल आरोप को खारिज करेगी ,बल्कि छानबीन के संबंध में भी उल्टा मतलब ही निकालेगी.
यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि इतने लोग मारे गये, सैकड़ों राउण्ड गोलियां चलीं लेकिन एक भी खाली कारतूस जब्त नहीं हुआ. यहां तक कि आरोपियों से जब्त लाइसेन्सी राइफल और बंन्दूकों की जांच नहीं की गयी. सभी आरोपियों को घरों में चुपचाप बैठे हुए या एक लाॅज से गिरफ्तार किया गया. यह काफी गम्भीर बातें हैं खासकर तब जब हम जानते हैं कि कितनी निर्दयता से लोगों को मारा गया. हम यही कह सकते हैं कि जांच एजेन्सी और प्रशासन के कारण असली अपराधी बच निकले.
अब हम बचाव पक्ष के तीन गवाहों पर आते हैं. गौर करने की बात है कि इन तीनों गवाहों को चार्जशीट में अभियोजन पक्ष का गवाह बताया गया है. वे महत्वपूर्ण गवाह हैं, लेकिन बिना किसी कारण के अभियोजन पक्ष ने उनका परीक्षण नहीं किया. बड़की खड़ांव गांव के पुलिस कैम्प के आॅफिसर इनचार्ज रघुराज तिवारी का परीक्षण बचाव पक्ष के गवाह नं. 1 के रूप में हुआ है. बड़की खड़ांव गांव के चैकीदार निर्मल चैधरी का परीक्षण गवाह नं. 2 बचाव पक्ष के रूप में और शिवनाथ यादव का बचाव पक्ष गवाह नं. 3 के रूप में, वह भी गांव का चैकीदार है. वे सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने घटना को होते हुए देखा और उसकी रिपोर्ट दी.
... इन सभी नाबालिगों (मनोज सिंह, दिलीप सिंह, बेला सिंह, जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने सजा सुनाई थी - सम्पादक) ने ट्रायल जज की इस मुद्दे पर संवेदनहीनता के कारण कानून के विरुद्ध जेल में लम्बा समय बिताया है. इस गम्भीर खामी के लिए हम अपनी तरफ से इस संस्था (न्यायपालिका - संपादक) की ओर से खेद और क्षमा-प्रार्थना ही व्यक्त कर सकते हैं।
अपराध की प्रकृति और इसे अंजाम देने के तरीके को देखते हुए इसमें कोई संदेह नहीं कि अपराध हुआ, और वास्तव में बचाव पक्ष ने इसे चुनौती भी नहीं दी है, इस बर्बर कार्य के लिए मृत्युदण्ड की सजा बिल्कुल उपयुक्त है, परन्तु सवाल यह है कि अपराध किसने किया.
एक घायल गवाह राधिका देवी जो कथित रूप से मारवाड़ी चैधरी के घर में मौजूद थी और जिसने बर्बर घटना के बड़े हिस्से को घर के अंदर होते हुए देखा, जहां करीब 18 लोग जिनमें तीन महीने के नवजात बच्चे भी शामिल थे को काट डाला गया था। हमने उसकी गवाही पर गौर किया है और एक बार कहना होगा कि उसके बदलते बयानों ने उसे अविश्वसनीय बना दिया है. उसने पी.एम.सी.एच. में दिये गये अपने बयान, जो एक्जिविट ए 10.30 बजे सुबह 12.07.96 में दिया गया है से बिल्कुल अनभिज्ञता जाहिर की. उस बयान में (एक्जिविट ए) उसने इस बात का जिक्र तक नहीं किया है कि वह मारवाड़ी चैधरी के घर में मौजूद थी. जबकि बाद में अपने साक्ष्य में उसने इसका दावा किया ह.। जांच अधिकारी ने इस विषय पर अपनी गवाही में उससे विपरीत बयान दिया है. उसका दावा है कि तीन फुट की दूरी से उसकी छाती में गोली मारी गयी. उसकी उंगलियों को कुचल दिया गया. वह पूरे घटनाक्रम को देखने के लिए बच गई, लेकिन दुर्भाग्य से उसके जख्मों की रिपोर्ट और पी.एम.सी.एच. में उसके इलाज के सबूत रिकार्ड में दर्ज नहीं करवाये गये जिनसे कथित जख्मों की सत्यता जांची जा सकती. अदालत के सूचनाकर्ता ने मारवाड़ी चैधरी के घर लौटने पर जिन लोगों को देखा उन घायलों में उसका नाम नहीं है. इन्ही कारणों से हम उसकी गवाही को विश्वास योग्य नहीं समझते।
मौजूदा मामले में, हम आरोप और कार्रवाई को परस्पर-विरोधी पाते हैं कि गांव में बदमाश लोग सबको मार देने के लिये आये थे. हत्या करने के बाद उन लोगों ने घरों में आग लगा दी. वे लोग गांव के ही बिल्कुल बगल में छिपे लोगों को खोजने की कोशिश क्यों नहीं कर सके? गवाह और आरोपी पड़ोसी हैं, वे पड़ोस के टोला में रहने वाले हैं. वे दिनदहाड़े अपनी पहचान जाहिर नहीं करेंगे, ताकि लोगों को उन्हें पहचानने का मौका मिल जाये. अभियोजन पक्ष के कुछ गवाह कहते हैं कि वे एक गड्ढे में छिपे थे. जांच अधिकारी कहते हैं कि उन्हें वहां कोई गड्ढा या छिपने लायक कोई अन्य स्थान नहीं दिखा. आहर तो खुली जगह होती है, लेकिन आश्चर्य है कि गवाह वहीं छिपे होते हैं और समय-समय पर वे अपनी सुरक्षा की परवाह किये बगैर सिर उठाकर झांक भी लेते हैं, यह तो बिल्कुल अस्वाभाविक है. कुछ गवाहों ने कहा कि वे लोग जंगली झाड़ियों में छिप गये थे. लेकिन जांच अधिकारी की वस्तुपरक खोज में वहां ऐसी कोई जगह नहीं मिली. जो लोग हर किसी को मार देना चाहते थे, स्वभावतः जब उन्होंने वहां किसी पुरुष को नहीं देखा होगा तो उन्होंने उन पुरुषों की जरूर खोज की होगी, जो उसी गांव के बिल्कुल बगल में छिपे हुए थे. अभियोजन गवाहों के लिये यह अस्वाभाविक है. इन्हीं कारणों से, हम मृत्युदंड या उम्र कैद जैसे इस चरम दंड की खातिर अभियोजन गवाहों द्वारा की गई पहचान को भरोसे के लायक नहीं पाते हैं.
अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट करने में सफल नहीं हो सका कि क्यों बचाव पक्ष गवाह 1, बड़की खड़ावं पुलिस पिकेट के प्रभारी, द्वारा भेजे गये घटना के लिखित वक्तव्य को एपफ.आई.आर. के रूप में दर्ज नहीं किया गया, यहां तक कि रिकार्ड में ही दर्ज नहीं किया गया, उल्टे बचाव पक्ष द्वारा गवाह 1 को सस्पेंड कर दिया गया. बचाव पक्ष ने इस बात को जोरदार तरीके से उठाया है कि यह लिखित सूचना प्रशासन/अभियोजन पक्ष के लिए कड़वा सच था.
इसलिए पूरी सामग्री पर विचार करने के बाद हमें इस बात का खेद है कि इतनी घृणित घटना हुई जिसमें 20 से ज्यादा लोगों, जिनमें केवल एक पुरुष था, का बर्बर कत्लेआम किया गया, तीन महीनों के नवजात शिशु को भी जिन्दा नहीं छोड़ा गया, इस घृणित अपराध को अंजाम देने वाले व्यक्तियों को पकड़ने के लिए उचित जांच नहीं की गई. साफ है कि जांच को एक खास दिशा में ले जाया गया जो सत्य से दूर थी और संदेह से परे नहीं. जांच ऐजेन्सी और अभियोजन पक्ष द्वारा सत्य को जानबूझ कर दबाया गया, ताकि आरोपी व्यक्तियों को इसमें शामिल दिखाया जा सके, गवाहों की जांच की गई वे पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं। दुर्भाग्य से इस पूरी कवायद में असली अपराधी साफ बच निकले. लोगों ने पीड़ा सही, उनके परिवारों को भी शांति नहीं मिल सकी क्योंकि अपराधकर्ताओं को सजा नहीं मिल पायी. यह सब गलत दिशा में जांच और अभियोजन पक्ष के कारण हुआ. हमें और कुछ नहीं कहना.
जस्टिस नवनीति प्रसाद सिंह
अश्वनी कुमार सिंह
कुख्यात रणवीर सेना के संस्थापक और इस सेना द्वारा वर्ष 1995 से लेकर 2000 के बीच की अवधि में बिहार के शाहाबाद एवं मगध अंचलों में किये गये दर्जनों जनसंहारों के सूत्रधर ब्रह्मेश्वर सिंह को 1 जून 2012 के तड़के आरा में गोलियों से भून दिया गया. अगले दिन शाम को पटना में अंतिम संस्कार हुआ. पूरे दो दिन तक सेना के समर्थक तांडव मचाते रहे; आरा में उन्होंने दलित छात्रों के होस्टलों पर हमला किया, आरा से पटना के रास्ते पर जहां कहीं मिला, सड़क के किनारे खड़े सार्वजनिक अथवा निजी वाहनों को आग के हवाले कर दिया, रास्ते में जो मिला उसको पीटा और उनकी आगजनी व तोड़फोड़ की कार्यवाही की तस्वीरें ले रहे पत्रकारों को भी जमकर पीटा. 1 जून को आरा में और 2 जून को पटना में सन्नाटा सा छाया रहा जबकि राज्य प्रशासन वस्तुतः पूरे परिदृश्य से गायब सा हो गया और उसने लोगों को बलवाइयों के इस हिंसक जत्थे की दया पर छोड़ दिया. जिस समय यह लेख प्रेस मे जा रहा है, राज्य के कई कोनों से एक बार फिर सामंती उन्माद फैलाने की कोशिशों की सूचनायें मिल रही हैं. नीतीश कुमार के राज में सुशासन और कानून के राज का असली मतलब क्या है, इसे समझाने के लिये इतना ही काफी है!
यद्यपि रणवीर सेना अपने गठन के तुरंत बाद औपचारिक रूप से प्रतिबंधित हो गई थी, मगर सेना को एक-के-बाद-एक हत्याकांड रचाने की खुली छूट मिली हुई थी ; आम तौर पर ये जनसंहार रात में ही किये जाते थे मगर कभी-कभार दिन-दहाड़े भी होते थे और इनमें सैकड़ों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारा गया था. इन जनसंहारों में औरतों, बच्चों या बूढ़ों -- किसी को नहीं बख्शा जाता था. इन वीभत्स हत्याकांडों को जायज ठहराने के लिये सबसे घिनौना तर्क दिया जाता था -- कि जनसंहार रचाना ही भाकपा(माले) का सफाया करने का एकमात्र रास्ता है! औरतों को यह कहकर निशाना बनाया जाता था कि वे नक्सलवादियों को जन्म देंगी, और बच्चों का कत्ल यह कहकर किया जाता था कि वे आगे चलकर नक्सलवादी ही तो बनेंगे! अक्सर इन हत्यारों के साथ पुलिस की सांठगांठ रहती थी. जब रणवीर सेना के लोग बथानी टोला में लोगों को तलवारों से काट-काटकर टुकड़े कर रहे थे, तब वहां से 100 मीटर से 2 किलोमीटर के दायरे में तीन पुलिस कैम्पों और एक पुलिस थाना में मौजूद पुलिस वालों ने एक गोली तक नहीं चलाई. एक बार तो भोजपुर के एकवारी गांव में पुलिस ने घरों पर इसलिये छापा मारा था ताकि सेना के लोग गांव में घुस सकें और लोगों की हत्या कर सकें.
वर्ष 2002 में जाकर, जब रणवीर सेना के कुकृत्यों का पूरी तरह से पर्दाफाश किया जा चुका था और उसे अलगाव में डाला जा चुका था, तब सेना के मुखिया को अंततः गिरफ्तार किया गया, पर अधिकांश लोग इस गिरफ्तारी को सारतः आत्मसमर्पण का मामला ही मानते थे. दिसम्बर 1997 में लक्ष्मणपुर-बाथे जनसंहार के बाद जस्टिस अमीर दास के नेतृत्व में एक जांच आयोग की नियुक्ति की गई, जिसका मकसद रणवीर सेना के राजनीतिक-प्रशासनिक सम्पर्कों की जांच करना था, लेकिन इस आयोग को कभी काम ही नहीं करने दिया गया और बिहार का मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार ने आधिकारिक रूप से अमीर दास आयोग को भंग कर दिया, जिससे बिहार की कई बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियों को काफी राहत मिली. गौरतलब है कि अमीर दास आयोग द्वारा पूछताछ के लिए बुलाये गये भाजपा, जद(यू), राजद और कांग्रेस के लगभग सभी राजनीतिक नेता ब्रह्मेश्वर सिंह के अंतिम संस्कार में पूरी शान से शामिल हुए.
अंत में जब जनसंहार के मामलों पर मुकदमे चलने लगे, तो न्यायिक प्रक्रियाओं का मखौल उड़ाते हुए ब्रह्मेश्वर सिंह को बथानी टोला और बाथे, दोनों मामलों में ‘फरार’ घोषित किया गया, जबकि उस समय वह खुद जेल की सलाखों में मौजूद था और अन्य आरोपियों को सजा सुनायी गयी! नीतीश कुमार के दुबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद 2011 में ब्रह्मेश्वर को जमानत पर छोड़ दिया गया.
बथानी टोला जनसंहार के मामले में आरा जिला न्यायालय ने गत मई 2010 में 23 अभियुक्तों को सजा सुना दी थी. हाल ही में जब पटना हाइकोर्ट ने उक्त फैसले को उलटकर उन सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया, तो ब्रह्मेश्वर ने सरकार को चेतावनी दी थी कि वह अभियुक्तों को बरी किये जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील न करे. ब्रह्मेश्वर द्वारा उत्तेजक वक्तव्य दिये जाने तथा नये सिरे से सामंती हिंसा भड़काने के प्रयासों के बाद भाकपा(माले) ने नीतीश सरकार से मांग की थी कि वे ब्रह्मेश्वर की जमानत को खारिज करवाएं. वास्तव में पटना, आरा और दाऊदनगर में भाकपा(माले) के नेतागण जिन मांगों पर 26 मई 2012 से अनिश्चितकालीन अनशन कर रहे थे, उनमें यह मांग भी शामिल थी.
जहां ब्रह्मेश्वर सिंह के समर्थकों और यहां तक कि मीडिया के एक हिस्से ने भी उनकी छवि ‘हीरो’ अथवा किसानों के रक्षक के बतौर पेश करने की पुरजोर कोशिश की है, वहीं बिहार और बाकी देश भर के जानकार लोकतंत्र पसंद लोग उनको बिहार में पतनशील सामंती वर्चस्व के सर्वाधिक घृणित प्रतीक के रूप में मानते हैं. दुनिया भर में ब्रह्मेश्वर की पहचान किसी किसान आंदोलन के नेता के रूप में नहीं है, बल्कि उनकी पहचान रणवीर सेना द्वारा किये गये सर्वाधिक वीभत्स जनसंहारों के जरिये ही कायम हुई है. कोई अचरज नहीं कि ब्रह्मेश्वर की मौत की खबर फैलने के बाद कोई आंसू बहाने वाला तक नहीं था और उनके समर्थकों को उनके निधन का “शोक मनाने” के लिये उपद्रव मचाने का सहारा लेना पड़ा.
रणवीर सेना का गठन अपने-आपमें गुजरे जमाने के पतनशील सामंती वर्चस्व को फिर से कायम करने की अंतिम सामंती हताशापूर्ण कार्रवाई थी. मगर इन हत्याकांडों ने जनता में दहशत फैलाने के बजाय, ग्रामीण गरीबों के बीच मुंहतोड़ जवाबी लड़ाई लड़ने के संकल्प को फौलादी ही बनाया और भाकपा(माले) द्वारा लगातार चलाई गई राजनीतिक लड़ाई ने सेना का सम्पूर्णतः पर्दाफाश कर दिया तथा उसे अलगाव में डाल दिया. ब्रह्मेश्वर सिंह द्वारा नये सिरे से किये जा रहे प्रयासों और जद(यू)-भाजपा सरकार द्वारा उनको दिये जा रहे तमाम संरक्षण के बावजूद कभी खूंखार रही सामंती निजी सेना में फिर से जान नहीं फूंकी जा सकी. अब कई लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या ब्रह्मेश्वर सिंह का प्रस्थान एक बार फिर रणवीर सेना को पुनरुज्जीवित कर सकेगा? शुरूआती रिपोर्टों से यकीनन एक जज्बाती प्रतिघात का इशारा मिल सकता है, मगर हम यही उम्मीद करते हैं कि लोग समझदारी से काम लेंगे और रणवीर सेना के गठन जैसी नादानी फिर से नहीं की जायेगी.
ब्रह्मेश्वर सिंह के चले जाने को बिहार में जड़ जमाये बैठे सामंती अवशेषों में एक सबसे कुख्यात प्रतीक का प्रस्थान कहा जा सकता है, मगर इसे बिहार की सामंती शक्तियों के खुद-ब-खुद कमजोर पड़ जाने के बतौर कत्तई नहीं देखा जाना चाहिये. बिहार के विधान मंडलों, न्यायपालिका और नौकरशाही, सभी संस्थाओं में सामंती शक्तियां अब भी बहुत ज्यादा भारी पड़ती हैं, जिसका अनुमान अमीर दास आयोग को भंग किये जाने से लेकर भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल देने, और फिर एकदम हाल में, हाइकोर्ट द्वारा बथानी टोला जनसंहार को अंजाम देने वाले हत्यारों को रिहा कर दिये जाने जैसे संकेतों से मिलता है. लेकिन अगर यह इक्कीसवीं सदी में सामंती निजी सेना जैसी प्रणालियों की समाप्ति का भी संकेत हो, तो यह सामाजिक बदलाव और सच्चे लोकतंत्र के लिए भारत के दीर्घकालीन युद्ध के एक ऐतिहासिक रणक्षेत्र में जनता के लिये कोई कम बड़ी जीत नहीं है.