हमारे पार्टी सदस्यों को मार्क्सवाद के बुनियादी उसूलों तथा अपनी पार्टी से संबंधित बुनियादी बातों की जानकारी अवश्य होनी चाहिए. इसके बगैर एक मजबूत कम्युनिस्ट पार्टी की कल्पना नहीं की जा सकती. पार्टी का सामान्य कार्यक्रम और पार्टी संविधान हमारी पार्टी के बुनियादी दस्तावेज हैं, मगर हमारे बहुतेरे सदस्य ऐसे हैं जो इसकी जानकारी नहीं रखते हैं. हमारी पार्टी में नए-नए सदस्यों की भर्ती का सिलसिला भी जारी है और जारी रहेगा. उन्हें पार्टी की बुनियादी बातों की जानकारी अवश्य रखनी चाहिए.
आज देश सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों के चुंगल में फंसता जा रहा है. कम्युनिस्टों समेत सभी तरह की जनवादी ताकतों पर उनका चौतरफा हमला तेज हो रहा है. देश में संविधान की रक्षा तथा न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष भी तेज होता जा रहा है. इस लड़ाई का नेतृत्व करने तथा सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों पर निर्णायक जीत हासिल करने के लिए अपनी पार्टी की शानदार क्रांतिकारी परम्परा के बारे में जानना व कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में अध्ययन, मनन एवं उस पर अमल करना हर सदस्य के लिए जरूरी है.
बहरहाल, पार्टी सदस्य बुनियादी बातों की जानकारी हासिल कर सकें तथा उन्हें अध्ययन में मदद मिल सके, इसी लिहाज से इस पुस्तिका का प्रकाशन किया जा रहा है. कार्यक्रम-संविधान से जुड़ी बातें पार्टी के रांची महाधिवेशन (2013) में पारित दस्तावेज पर आधारित है.
1. पार्टी का नाम व झंडा : पार्टी का नाम है – भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी). इसे संक्षेप में भाकपा(माले) या सीपीआई(एमएल) या ‘माले’ कहते हैं. राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग के यहां यह इस नाम से रजिस्ट्रीकृत है – कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (लिबरेशन). पार्टी का झंडा है – आयताकार लाल झंडा, जिसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 हो और जिसके बीच सफेद हंसिया और हथौड़ा अंकित हो.
2. प्रस्तावना : भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) अपने सर्वोच्च वर्ग लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संघर्षरत भारतीय सर्वहारा का सर्वोच्च संगठन है. इसका गठन जनता के अगुआ दस्तों को लेकर हुआ है. यह लिंग, जाति, धर्म-सम्प्रदाय, भाषा या राष्ट्रीयता का भेद किए बिना स्वतंत्र नागरिक के रूप में भारतीय जनता की सामंती बेड़ियों और बड़ी पूंजी एवं साम्राज्यवादी लूट और वर्चस्व से मुक्ति पाने तथा समान अधिकार और तीव्र प्रगति हासिल करने के संघर्ष में नेतृत्व-केन्द्र का कार्य करती है.
भारत में नवजनवादी क्रांति को पूरा करने से शुरू करके पार्टी समाजवादी रूपांतरण और साम्यवाद लाने के कार्यक्रम तक, मानव द्वारा मानव के शोषण के सभी रूपों के खात्मे के अंतिम लक्ष्य के प्रति अपने-आपको समर्पित करती है.
पार्टी अपना विश्व-दृष्टिकोण मार्क्सवादी दर्शन से ग्रहण करती है और मार्क्सवाद-लेनिनवाद व माओत्सेतुंग विचारधारा की एकल प्रणाली को अपने कामकाज के मार्गदर्शक उसूल के बतौर स्वीकार करती है.
यह समूची दुनिया के मजदूरों, उत्पीड़ित जनगण और राष्ट्रों के संघर्ष का समर्थन करती है तथा समूची मानवजाति की पूर्ण मुक्ति के अंतिम लक्ष्य के साथ साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी शक्तियों के विरूद्ध होनेवाले तमाम आंदोलनों में अपने को साझीदार मानती है.
पार्टी कार्यशैली के तीन आधारभूत उसूल हैं – सिद्धांत को व्यवहार के साथ मिलाना, जनसमुदाय के साथ घनिष्ठ संपर्क बनाए रखना और आलोचना, आत्मालोचना तथा समयोचित सुधार करने पर अमल करना. पार्टी अपने व्यवहार को उन्नत करने के लिए हमेशा तथ्यों से सत्य की तलाश करने तथा गहन जांच-पड़ताल व गंभीर अध्ययन संचालित करने की नीति का अनुसरण करती है.
पार्टी सदस्य जनता से असीम प्यार करते हैं, भारतीय समाज की तमाम उत्कृष्ट क्रांतिकारी परंपराओं का पक्षपोषण करते हैं तथा खुद अपनी जान की बाजी लगाकर भी सत्य और साम्यवाद का झंडा बुलंद करने का साहस रखते हैं.
3. पार्टी का जन्म व विकास : भारत में 1925 में सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) का गठन किया गया. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भगत सिंह कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित हुए और 1931 में देश में एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की बात कही. लेकिन, उनकी शहादत के कारण उनका कार्य अधूरा रह गया.
सीपीआई ने तेलंगाना में हैदराबाद निजाम के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चलाया, लेकिन बाद में उसने वर्ग समझौतावादी रुख अख्तियार कर लिया. इस सवाल पर सीपीआई में मतभेद बढ़ा. वह 1964 में टूट गई और सीपीआई(एम) [भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी] का गठन हुआ. 1964 में जब विभाजन हुआ तो तमाम क्रांतिकारी कम्युनिस्ट सीपीआई(एम) में शामिल हो गए. लेकिन, सीपीआई(एम) ने भी तुरंत ही दुलमुलपन दिखाना शुरू कर दिया. उसने भी संशोधनवादी रास्ता अख्तियार कर लिया. अतः सीपीआई(एम) के अंदर प्रारंभ से ही एक अंतःपार्टी संघर्ष शुरू हो गया. का० चारु मजुमदार के सुप्रसिद्ध ‘आठ दस्तावेज’ इस बहस से निकलकर सामने आए. लेकिन का. चारु मजुमदार उस समय पार्टी में बहस चलाने के साथ-साथ बंगाल के दार्जिलिंग जिले में भूमिहीन-गरीब किसानों को संगठित भी कर रहे थे.
1967 में पश्चिम बंगाल में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी जिसमें सीपीआई(एम) प्रमुख घटक थी. सरकार कायम होते ही हर जगह कतारों में क्रांतिकारी जोश उमड़ पड़ा. पार्टी ने कहा भी था कि संयुक्त मोर्चा सरकार संघर्ष का हथियार है. पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों में भूमि संघर्ष फूट पड़े. नक्सलबाड़ी में बटाईदार गरीब-भूमिहीन किसान जमीन से बेदखली के विरोध में जमींदार-पुलिस के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध में उतर पड़े और राज्य मशीनरी के खिलाफ खड़े हो गए. आंदोलन को कुचलने के लिये खूनी उपायों का सहारा लिया गया. संयुक्त मोर्चा सरकार संघर्ष नहीं दमन का हथियार बन सामने आई. नक्सलबाड़ी में शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने गोलियां चलाकार 11 गरीब-भूमिहीन महिला-पुरुष-बच्चों की हत्या कर दी. नक्सलबाड़ी की यह घटना 25 मई 1967 को हुई. इससे समूची पार्टी के अंदर विरोध भड़क उठा. का० चारु मजुमदार ने संसदवाद के बरखिलाफ सशस्त्र क्रांति का नारा दिया और नक्सलबाड़ी की चिनगारी पर पूरे देश में फैल गई. नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह के समर्थकों को लोग ‘नक्सलवादी’, ‘नक्सलपंथी’, ‘नक्सलाइट’ नाम से पुकारने लगे. सीपीआई(एम) विभाजित हो गई.
सीपीआई(एम) से अलग होकर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी शक्तियों ने सबसे पहले अपने को कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति (एआईसीसीसीआर) में संगठित किया जो 22 अप्रैल 1969 को, लेनिन के जन्म दिवस पर, एक नई क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी “भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)” के रूप में सामने आई. का० चारु मजुमदार पार्टी के प्रथम महासचिव बने. यही हमारी अपनी पार्टी है.
नवगठित भाकपा(माले) के खिलाफ केन्द्र व विभिन्न राज्यों की सरकारों ने भयानक दमन-चक्र चलाया. 28 जुलाई 1972 को कोलकाता के लाल बाजार थाने में पुलिस हाजत में का० चारु मजुमदार की हत्या कर दी गई. इसी तरह का० सरोज दत्त सहित कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की हत्या सीपीआई(एम) सरकार ने कर दी. का० नागभूषण पटनायक को फांसी की सजा सुनाई गई. सर्वोच्च नेतृत्व समेत हजारों-हजार पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा भारतीय क्रांति की बलिवेदी पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए जाने की वीरता और दिलेरी की यह महागाथा हमारी एक महत्वपूर्ण विरासत है. 1960 के दशक के आखिरी और 1970 के शुरूआती वर्षों में हमारी पार्टी के नेतृत्व में संचालित सशस्त्र संघर्ष को भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में भारत में सशस्त्र क्रांति संगठित करने के अब तक के प्रयासों में सर्वाधिक गंभीर प्रयास के रूप में याद किया जाएगा.
बहलहाल, सशस्त्र संघर्ष को गहरा धक्का लगा. पार्टी भी बहुतेरे टुकड़ों में बंट गई. पुरानी लाइन पर पार्टी को पुनर्जीवित और एकताबद्ध करने के तमाम प्रयास असफल रहे. कई धड़े अवसरवाद और पतन की दलदल में गले तक डूब गए तो कुछ अन्य धड़े पक्के अराजकतावादी ग्रुपों में विकसित हो गये. पीपुल्सवार और एमसीसी (आज सीपीआई-माओवादी) इनमें सबसे प्रमुख हैं. बिखराव, भ्रम व नेतृत्वविहीनता के उस माहौल में 1974 में का० जौहर (सुब्रत दत्त) के नेतृत्व में भाकपा(माले) का पुनर्गठन किया गया. तीन सदस्यीय केंद्रीय कमेटी का गठन हुआ. जिसमें का० जौहर के अलावा का० विनोद मिश्र व का० स्वदेश भट्टाचार्य थे. इन सबसे मुश्किल दौरों में भी पार्टी ने खुद को कदम-ब-कदम पुनर्गठित किया और बिहार के भोजपुर में नक्सलबाड़ी की मशाल को जलाए रखा. का० जौहर 1975 में भोजपुर के बाबूबांध में पुलिस की गोली से शहीद हो गए. अब का० विनोद मिश्र पार्टी के तीसरे महासचिव बने.
पार्टी के पुनर्गठन का काम जारी रहा. यह देश में आपातकाल का दौर था और इंदिरा तानाशाही के खिलाफ देश भर में जनआंदोलन की ऊंची-ऊंची लहरें उठ रही थीं. बदली हुई राष्ट्रीय परिस्थिति में नई पहलकदमी समय की मांग बन गई थी. अंततः पार्टी ने 1978 में शुद्धिकरण आंदोलन चलाया, मौजूदा परिस्थिति का व्यापक व गहरा अध्ययन किया तथा अपनी तमाम कार्यवाहियों की गंभीर समीक्षा की. 1979 में पार्टी का विशेष सम्मेलन हुआ और सशस्त्र क्रांति की अवधारणा पर अडिग रहते हुए जनआंदोलन की कार्यनीति अख्तियार की गई. इसके बाद कई तरह के जनसंगठनों का निर्माण शुरू हुआ. तुरन्त ही मध्य बिहार के जिलों में विराट किसान आंदोलन उठ खड़ा हुआ. इंदिरा निरंकुशता के खिलाफ इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के गठन ने इन आंदोलनों को और भी नई ऊंचाई व राजनीतिक पहचान प्रदान की. बाद में आईपीएफ के बैनर से चुनाव में सक्रिय हस्तक्षेप किया गया. 1989 में पहली बार आरा लोकसभा क्षेत्र से का० रामेश्वर प्रसाद निर्वाचित हुए और 1990 में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी के सात विधायक विजयी हुए. सीपीआई-सीपीआई(एम) के संसदीय व्यवहार के बरखिलाफ चरम क्रांतिकारी विपक्ष का संसदीय व्यवहार विकसित करने का प्रयास शुरू हुआ. इस तरह दुश्मन के किला के बाहर और भीतर दोनों जगह इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष चलने लगा. भारत में गैरसंसदीय व संसदीय संघर्षों को मिलाने का अनोखा प्रयोग पार्टी ने शुरू किया.
सोवियत रूस के पतन के बाद जब चारों ओर पूंजीवादी लोग मार्क्सवाद के ही खत्म होने का प्रचार करने लगे, 1992 में पार्टी खुलकर सामने आ गई. का० विनोद मिश्र ने भाकपा(माले) को देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी बनाने का लक्ष्य रखा.
दिसंबर 1998 को लखनऊ में आयोजित पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की बैठक के दौरान हृदय गति रुक जाने से का० विनोद मिश्र का निधन हो गया और हमने भारतीय क्रांति का एक महान नेता खो दिया. उनके निधन के बाद का० दीपंकर भट्टाचार्य पार्टी के महासचिव बने और पार्टी का कारवां आगे बढ़ता रहा.
1. भातीय राज्य एवं जनता का जनवादी राज्य : साम्राज्यवाद परस्त बड़ा पूंजीपति वर्ग जोतदारों व कुलकों के साथ सांठगांठ कर भारतीय राज्य का नेतृत्व करता है. भारतीय राज्य भी क्रमशः एक आंचलिक प्रभुत्ववादी शक्ति के रूप में उभर रहा है, लेकिन ऐसा वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की वैश्विक योजना के एक प्रमुख सहयोगी के बतौर ही कर रहा है. यह राज्य तमाम तरह की जनविरोधी कार्रवाइयों का संचालन करता है.
बड़े पूंजीपतियों-जोतदारों के संश्रय के शासन को उखाड़ फेंकने के बाद विजयी क्रांति मजदूरों, किसानों व अन्य क्रांतिकारी वर्गों तथा जनवादी तबकों के शासन – अर्थात् जनता की जनवादी राजसत्ता की शुरूआत करेगी जो निम्नलिखित बुनियादी कार्यभारों को लागू करेगी. इसका मतलब है : (क) राज्य के ढांचे और कामकाज का पूर्ण जनवादीकरण, (ख) संघीय, जनवादी व धर्मनिरपेक्ष राज्यप्रणाली के आधार पर राष्ट्रीय एकता का पुननिर्माण, (ग) तीव्र, आत्मनिर्भर, टिकाऊ व संतुलित आर्थिक विकास तथा व्यापक गरीबी उन्मूलन, समग्र सार्वजनिक सुविधाओं एवं जनकल्याण को सुनिश्चित करना, (घ) समूचे समाज का आधुनिक, जनवादी सांस्कृतिक रूपांतरण तथा (च) साम्राज्यवाद विरोधी प्रगतिशील विदेश नीति को बढ़ावा देना.
हमारी क्रांति की मंजिल जनता की जनवादी क्रांति है जिसे केवल मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही संपन्न की जा सकती है. जनता की जनवादी क्रांति को विजय की ओर ले जाने के लिए जरूरी है कि मजदूर वर्ग एकताबद्ध एवं स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति के बतौर उभरे और आम जनवादी आंदोलन पर अपना नेतृत्व कायम करे.
मजदूर वर्ग द्वारा संचालित जनवादी क्रांति की मुख्य शक्ति किसान समुदाय है. पार्टी ग्रामीण सर्वहारा एवं गरीब किसानों पर पूर्णतः निर्भर करती है. मध्यम किसानों से एकताबद्ध होती है, पूंजीवादी फार्मर व धनी किसानों के एक हिस्से को अपने पक्ष में कर लेती है और शेष को तटस्थ कर देती है, ताकि उनके बहुमत को क्रांति के दुश्मनों के साथ जाने से रोका जा सके. शहरी गरीब और मेहनतकश जनसमुदाय पार्टी के शहरी जनाधार के प्रमुख स्तंभ है जबकि मध्य वर्ग के कुछेक हिस्से महत्वपूर्ण संश्रयकारी हैं. छोटे व्यापारी, मैनुफैक्चरर तथा छोटे-मंझोले पूंजीपति और बुर्जुआ बुद्धिजीवी जनवादी क्रांति के दुलमुल व अस्थिर संश्रयकारी हैं.
जनता की जनवादी क्रांति को अपने लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए यह आवश्यक है कि इन तमाम वर्गो को लेकर मजदूर वर्ग के नेतृत्व में जनता के एक जनवादी मोर्चे का निर्माण किया जाये जिसकी बुनियाद मजदूर-किसान एकता हो. इसकी खातिर पार्टी विविध वर्गीय एवं तबकाई तथा बहु वर्गीय मोर्चा संगठनों का निर्माण करती है. जनता के विभिन्न हिस्से का विभिन्न तरह का संगठन खड़ा करती है तथा इन सबको लेकर मोर्चा बनाती है. इसके जरिए वह मजदूर, किसान, छात्र-युवा, शिक्षक-कर्मचारी, अन्य पेशाकर्मी, छोटे दुकानदार व व्यापारी तथा समाज के हरेक कमजोर तबके – दलित, महिला, आदिवासी, अल्पसंख्यक समुदाय, उत्पीडि़त राष्ट्रीयताओं के लोगों को संगठित करती है, उनके सहयोग से उनके भीतर रहकर कार्य करती है. परिस्थिति के मुताबिक वह अन्य जनवादी शक्तियों के साथ मुद्दा आधारित अभियानों और साझा कार्यक्रम आधारित अल्पकालिक संश्रय में भी जाती है.
भारत जैसे विशाल और विविधताओं व जटिलताओं वाले देश में जनता की जनवादी क्रांति को पूरा करने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी को काम के हर उपलब्ध रास्ते का - संघर्ष के गैर-संसदीय व संसदीय रूपों का - इस्तेमाल करने तथा संघर्ष के विविध रूपों को तेजी से एक-दूसरे में बदलने की कला में विशेष रूप से महारत हासिल करनी होगी. लिहाजा, पार्टी संघर्ष व संगठन के सभी आवश्यक रूपों के जीवंत संश्रय के जरिए सुसंगत क्रांतिकारी व्यवहार विकसित करने का प्रयास करती है.
सामान्य परिस्थितियों में भारतीय राजप्रणाली कम्युनिस्टों को खुले, कानूनी और संसदीय तरीकों के कार्य करने की इजाजत देती है. पार्टी को संयुक्त मोर्चा की अपनी बुनियादी लाइन के साथ संगति रखकर उपयुक्त चुनावी कार्यनीति विकसित करते हुए लंबे अरसे तक संसदीय रंगमंच पर क्रांतिकारी विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना होगा. चुनावी संघर्ष के दौर में यह संभव है कि कम्युनिस्ट स्थानीय निकायों में और यहां तक कि राज्य विधायिका में भी बहुमत हासिल कर लें. दीर्घकालीन और जोरदार राजनीतिक संघर्षों के जरिए वर्ग शक्तियों के संतुलन को अपने पक्ष में झुकाने के साथ-साथ पार्टी स्वतंत्र रूप से अथवा समान विचारों वाली शक्तियों के साथ संश्रय कायम करके ऐसे अवसरों का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है, बशर्ते कि पार्टी के पास मतदाताओं के साथ किए गए अपने वादों को पूरा करने की शक्ति हो.
हर हालत में ऐसे स्थानीय निकायों और सरकारों के साथ पार्टी का संबंध और उनके अंदर पार्टी की भूमिका का मार्गदर्शन निम्नलिखित बुनियादी उसूलों के जरिए होगा :
(क) पार्टी हर कीमत पर अपना स्वतंत्र सांगठनिक कार्यकलाप चलाती रहेगी और राजनीतिक पहलकदमी अपने हाथों में रखेगी,
(ख) स्थानीय निकायों/सरकारों को प्राप्त अधिकारों का पूरा उपयोग क्रांतिकारी जनवादी सुधार संचालित करने और जन-चेतना को एक नए जनवादी विकल्प की दिशा में मोड़ने के लिए किया जाएगा.
(ग) ऐसे स्थानीय निकायों/सरकारों को केंद्रीय सत्ता समेत अपने उच्चतर सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ व्यापक क्रांतिकारी विपक्ष के अभिन्न अंग के रूप में कार्य करना होगा तथा
(घ) पार्टी और उसके नेतृत्व में चलने वाले स्थानीय निकायों/सरकारों को इस बात की गारंटी करनी होगी कि जनवादी शक्तियों, जनवादी चेतना और जनवादी आंदोलन के स्वतंत्र विकास की राह में किसी भी स्थिति में कोई रुकावट पैदा न हो.
सर्वहारा की पार्टी को सभी तरह के संभावित प्रतिक्रांतिकारी हमलों का मुकाबला करके अंतिम निर्णायक विजय हासिल करने और उसे टिकाए रखकर क्रांति संपन्न करने के लिए खुद को मुकम्मल तौर पर तैयार करना होगा. लिहाजा, जनता का जनवादी मोर्चा और जनसेना पार्टी के शस्त्रागार में क्रांति के दो सर्वाधिक बुनियादी औजार हैं.
1. पार्टी सदस्यता : 16 वर्ष या उससे अधिक आयु का कोई भी भारतीय नागरिक, जो पार्टी के कार्यक्रम और संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार हो, किसी भी पार्टी संगठन के मातहत काम करने, सौंपे गए कार्यभार को पूरा करने और पार्टी द्वारा निर्धारित सदस्यता राशि यानी सदस्यता शुल्क व लेवी नियमित रूप से अदा करने के लिए तैयार हो, पार्टी की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकता है.
2. पार्टी सदस्य के बुनियादी मानदंड : पार्टी सदस्यों को भारतीय मजदूर वर्ग के हिरावल के बतौर काम करना होगा. उन्हें गैरवाजिब सुविधाओं की आकांक्षा नहीं करनी चाहिए, अवश्य ही सीधा-सादा जीवन बिताना चाहिए, अपने व्यक्तिगत हितों को पार्टी व जनता के हितों के मातहत रखना चाहिए, उन्हें खुले दिमागवाला, निष्कपट व व्यापक सोच वाला होना चाहिए, मेहनतकश जनता तथा समाज के वंचित एवं सुविधाहीन तबकों के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए और महिलाओं के सम्मान एवं स्वतंत्रता का पक्षपोषण करना चाहिए. पार्टी सदस्यों को नहीं भूलना चाहिए कि वे जनता के निःस्वार्थ सेवक हैं न कि उनके मालिक. उन्हें कुर्बानी में आगे और सहूलियत हासिल करने में पीछे रहना चाहिए. उन्हें जनता के संघर्षों की उपलब्धियों के बड़े हिस्से को हड़प लेने की लालच नहीं पालनी चाहिए. उन्हें पार्टी, जनता व क्रांति की खातिर सर्वस्व न्योछावर करने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए.
पार्टी सदस्यों को संघर्ष में मिली जीत से न तो अतिउत्साहित व आत्मसंतुष्ट होना चाहिए और न धक्के से निराश. उन्हें जनता और पार्टी पर भरोसा रखना चाहिए. पार्टी सदस्यों को आपस में कामरेडाना संबंध बनाना चाहिए न कि गैर उसूली निजी दोस्ताना संबंध, क्योंकि ऐसे संबंध ही पार्टी में उदारतावाद, व्यक्तिवाद, पक्षपात व गुटबंदी पैदा करते हैं. कामरेडाना संबंध से बढ़कर कोई संबंध नहीं होता क्योंकि यह निःस्वार्थ व वैज्ञानिक उसूल पर आधारित होता है.
3. पार्टी सदस्य के अधिकार : (क) चुनने या चुने जाने व मत देने का अधिकार, (ख) पार्टी लाइन और नीतियों पर बहस में भाग लेने का अधिकार,
(ग) गोपनीय मामले को छोड़कर पार्टी लाइन व नीति में विकास व पार्टी कार्य की रिपोर्ट जानने व निर्णयों के बारे में स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार, (घ) पार्टी बैठकों में किसी पार्टी संगठन या नेता-कार्यकर्ता की आलोचना करने का अधिकार, (च) केन्द्रीय कमेटी तक कोई सलाह, अनुरोध, शिकायत अथवा आलोचना पेश करने और जिम्मेदाराना जवाब पाने का अधिकार, (छ) अपने खिलाफ प्रस्तावित अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार करने के लिए पार्टी संगठन द्वारा आयोजित बैठक में भाग लेने का अधिकार (अन्य पार्टी सदस्य भी उनके पक्ष में गवाही दे सकते हैं), (ज) मामले का अंतिम निपटारा होने तक संगठन के निर्णय का पालन करते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई के खिलाफ अपील का अधिकार और (झ) पार्टी के किसी निर्णय अथवा नीति से असहमति की स्थिति में अपना विचार सुरक्षित रखने तथा इसे उच्चतर पार्टी संगठनों के पास भेजने का अधिकार, बशर्ते कि वे तयशुदा नीति या निर्णय का पालन करते हों.
केन्द्रीय कमेटी समेत पार्टी का कोई संगठन पार्टी सदस्यों को उपरोक्त अधिकार से वंचित नहीं कर सकता, बल्कि पार्टी संगठन को चाहिए कि अपने उपरोक्त अधिकारों के इस्तेमाल के लिए वे पार्टी सदस्यों को प्रोत्साहित करें.
4. पार्टी सदस्य के कर्त्तव्य : (क) मार्क्सवाद-लेनिनवाद और माओत्सेतुंग विचारधारा, पार्टी कार्यक्रम, संविधान, लाइन, उसूलों, वर्तमान नीतियों और पार्टी साहित्य व इतिहास का परिश्रमपूर्वक अध्ययन करना और आम वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना, (ख) पार्टी शिक्षा प्राप्त करना, (ग) जनसमुदाय और जनआंदोलनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखना, जनता के पक्ष में दृढ़तापूर्वक खड़ा होना, उसके बीच से पार्टी सदस्य भर्ती करना, पार्टी की लाइन व स्थितियों का प्रचार करना, जनसमुदाय से सीखना और अपनी चेतना का मान उन्नत करने में जनसमुदाय की मदद करना, (घ) पार्टी के निर्णयों को दृढ़तापूर्वक लागू करना, वे जिस पार्टी संगठन में शामिल हैं उसकी गतिविधियों में नियमित रूप से भाग लेना, अगर छूट न दी गई हो तो जनसंगठनों में काम करना, (ङ) पार्टी की अविभाज्य एकता और सचेत अनुशासन की रक्षा करना तथा पार्टी में उकसावेबाजों, कैरियरवादियों, पार्टी विरोधी तत्वों, दोमुहां लोगों और अन्य बुरे तत्वों की घुसपैठ के विरुद्ध चौकसी बरतना, (च) विभिन्न गैर सर्वहारा विचारो के खिलाफ लगातार संघर्ष चलाते रहना, (छ) पार्टी के प्रति ईमानदार रहना, कथनी और करनी में सामंजस्य कायम करना, अपने राजनीतिक विचारों को न छिपाना और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर न पेश करना, आलोचना और आत्मालोचना करना, अपनी गलतियों को स्वीकार करने, उन्हें दूर करने और सही का पक्ष लेने व गलत का विरोध करने का साहस करना और (ज) पार्टी संगठन द्वारा निर्धारित सदस्यता लेवी व शुल्क नियमित रूप से अदा करना. (झ) प्रत्येक पार्टी सदस्य को एक पार्टी ब्रांच से जुड़ना होगा और उसके अनुसार काम करना होगा.
(ञ) पार्टी सदस्यता एक वर्ष के लिए दी जाती है और हरेक सदस्य को 5/- रु. नवीकरण शुल्क व निर्धारित लेवी देकर अपना नवीकरण करा लेना होगा. उपार्जन करने वाले पार्टी सदस्यों को अपनी आमदनी का एक हिस्सा लेवी के बतौर देना होगा.
5. उम्मीदवार सदस्य के अधिकार व कर्तव्य : इनके वही कर्त्तव्य हैं जो पूर्ण पार्टी सदस्यों के होते हैं. मत देने, चुनने व चुने जाने के अधिकार को छोड़कर उन्हें पूर्ण सदस्यों के अन्य सभी अधिकार प्राप्त हैं.
6. जनवादी केन्द्रीयता : पार्टी संगठन जनवादी केन्द्रीयता के उसूल पर चलता है. यह नौकरशाही, उदारतावाद, अराजकतावाद, व्यक्तिवाद, अतिजनवाद और गुटबाजी का विरोधी है. जनवादी केन्द्रीयता के निम्नलिखित बुनियादी उसूल हैं – (क) व्यक्ति संगठन के मातहत है, (ख) अल्पमत बहुमत के मातहत है,
(ग) निचली कमेटी ऊपरी कमेटी के मातहत है और (घ) समूची पार्टी केन्द्रीय कमेटी के मातहत है. हरेक स्तर की पार्टी कमेटियां अपने स्तर के पार्टी सम्मेलनों में चुनी जाती हैं.
7. अनुशासनिक कार्रवाई : किसी पार्टी सदस्य द्वारा अनुशासन भंग किए जाने की हालत में संबंधित पार्टी संगठन अपने अधिकार व कार्यक्षेत्र के अनुसार और मामले के गुण-दोषों पर विचार करके उचित अनुशासनिक कार्रवाई करेगा, जैसे -- चेतावनी देना, भर्त्सना करना, सार्वजनिक भर्त्सना करना, पदावनत करना, पार्टी पदों से बर्खास्तगी, पार्टी सदस्यता से निलंबन और पार्टी से आजमाइशी तौर पर रखना जिसकी अवधि एक साल से ज्यादा न हो, तथा पार्टी से निष्कासन. अधिकतम सजा है पार्टी से निष्कासन. महिलाओं की मर्यादा का उल्लंघन करनेवाले दोषी सदस्यों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे.
(क) पार्टी ब्रांच : पार्टी ब्रांच पार्टी का प्राथमिक संगठन है. यह पार्टी संगठन की प्राथमिक इकाई है. यह अपने इलाके के मजदूरों, किसानों और जन समुदाय के अन्य हिस्सों और पार्टी की नेतृत्वकारी कमेटी के बीच की जीवित कड़ी है. पेशा व क्षेत्र के आधार पर इसका गठन होता है. इसके नीचे कोई पार्टी संगठन नहीं होता है, ऐक्टिविस्ट ग्रुप सक्रिय लोगों का ग्रुप होता है, जिसके बीच से उम्मीदवार सदस्य भर्ती किए जाते हैं.
गठन : पार्टी ब्रांच का गठन संबंधित इलाके के पूर्ण व उम्मीदवार सदस्यों को लेकर होता है. एक ब्रांच में ज्यादा से ज्यादा 15 और कम से कम 5 सदस्य होने चाहिए. ब्रांच के भीतर सचिव सहित पूर्ण सदस्यों को लेकर न्यूनतम 3 सदस्यीय लीडिंग टीम का गठन किया जाएगा. हर ब्रांच को पार्टी पत्रिका की कम से कम दो प्रतियां लेनी होगी.
कार्य : नियमित जन संपर्क का कार्य करना एवं सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्य करना, बीपीएल में नाम दर्ज करवाने, जॉब कार्ड, वृद्धा पेंशन/सामाजिक सुरक्षा अधिकार, वोटर लिस्ट, आई कार्ड आदि से संबंधित कार्य करवाने एवं अपने इलाके में अन्य कार्य करना, जन संगठनों के सदस्यता अभियान में भागीदारी करना एवं जनआंदोलनों की अगुवाई करना, ऊपरी कमेटी द्वारा निर्धारित कार्यक्रमों में प्रचार व जन गोलबंदी का कार्य करना, नए-नए पार्टी सदस्य भर्ती करना तथा लेवी उगाही, सदस्यता नवीकरण का कार्य आदि करना.
हर पखवारे में यानी 15 दिन में ब्रांच की बैठक होनी चाहिए और कम से कम महीने में एक बार जनसमुदाय की बैठक का आयोजन करना चाहिए. जिला अथवा एरिया कमेटी द्वारा आयोजित तिमाही बैठकों में ब्रांच सचिवों या ब्रांचों की लीडिंग टीमों के सदस्यों को अवश्य उपस्थित होना होगा.
(ख) पार्टी ब्रांचों के ऊपर लोकल पार्टी कमेटी (न्यूनतम तीन ब्रांचों, 50 सदस्यों, जनसंगठनों के 500 सदस्यों व एक या अधिक ग्राम पंचायतों/वार्डों के आधार पर) होती है. इसके ऊपर क्रमशः एरिया कमेटी (एक प्रखंड या जरूरत के मुताविक कई प्रखंडों को मिलाकर), जिला कमेटी, राज्य कमेटी और सबसे ऊपर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी होती है. ब्रांच के ऊपर की तमाम कमेटियों का गठन पार्टी संविधान के तहत निर्धारित अंतरालों पर होता है. सम्मेलनों में उनके कार्यक्षेत्र से चुने हुए प्रतिनिधि भाग लेते हैं और कमिटियों का चुनाव करते हैं.
(ग) अखिल भारतीय पार्टी महाधिवेशन पार्टी का सर्वोच्च संगठन है, जो पांच वर्ष पर आयोजित होता है. इसे पार्टी कांग्रेस भी कहते हैं. दो महाधिवेशनों के बीच की अवधि में केन्द्रीय कमेटी सर्वोच्च संगठन है. केन्द्रीय कमेटी का चुनाव महाधिवेशन करता है. केन्द्रीय कमेटी अपने सदस्यों के बीच से महासचिव का चुनाव करती है तथा अपने सदस्यों के बीच से पोलित ब्यूरो का गठन करती है. जब केन्द्रीय कमेटी का अधिवेशन न हो रहा हो उस समय पोलित ब्यूरो केन्द्रीय कमेटी के कार्यों का संपादन करता है और उसके अधिकारों का प्रयोग करता है.
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(क) अंग्रेजी मुखपत्र : लिबरेशन
(ख) हिंदी मुखपत्र : समकालीन लोकयुद्ध, samkaleenlokyuddh.net/
(क) समकालीन जनमत
(ख) श्रमिक सॉलिडैरिटी
(ग) आधी जमीन
(घ) विप्लवी किसान संदेश
विभिन्न राज्य व अन्य जनसंगठन भी पत्रिका निकालते हैं.
(i) लिबरेशन पब्लिकेशंस, दिल्ली
(ii) पुस्तक केंद्र, बिहार
(क) ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (एक्टू)
(ख) अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा (खेग्रामस)
(ग) अखिल भारतीय किसान महासभा
(घ) अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा)
(च) ऑल इंडिया स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन (आइसा)
(छ) इंकलाबी नौजवान सभा (इनौस)