वी एम की चयनित रचनाएं बीसवीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन की सहज सरल, सीधी-सादी आत्मआलोचनात्मक और आत्मकथात्मक गाथा है. नकसालबाड़ी में बसंत के वज्रनाद में और बिहार के धधकते खेत-खलिहानों में उसकी अनुगूंज में आपने मार्क्स, लेनिन और माओ को पढ़ने वाले स्वातंत्रयोतर मार्क्सवादी वीएम के सर पर न तो लंदनपंथी सामाजिक जनवाद का बोझ था और न कांग्रेस-समाजवाद तथा भारतीय राष्ट्रवाद के गांधी-नेहरू विमर्श का भार ही लदा था. बुर्जुआ लोकतंत्र के भारतीय संस्करण के साथ उनका संघर्ष एक व्यावहारिक क्रांतिकारी का संघर्ष था, जो इस प्रणाली के अन्दर से संचालित हो रहा था, लेकिन जिसने अपने विश्लेषण और दृष्टिकोण को बुर्जुआ उदारवाद और संवैधानिकता की लगातार सिकुड़ती परिधि तक सीमित नहीं होने दिया. इसीलिए उनका सम्पूर्ण लेखन उनके क्रांतिकारी उद्देश्य की स्पष्टता और सच्चाई से देदीप्यमान है.
दीपंकर भच्टाचार्य
महासचिव
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)
समकालीन प्रकाशन
द्वितीय संस्करण : 2013
समकालीन प्रकाशन :
शहीद चन्द्रशेखर स्मृति भवन,
जगतनारायण रोड, कदमकुआं,
पटना - 800003
केन्द्रीय कमेटी
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)
द्वारा संग्रहित, संपादित तथा
केन्द्रीय प्रकाशन विभाग की ओर से
प्रभात कुमार द्वारा प्रकाशित
यू-90, शकरपुर, दिल्ली - 110092
(द टेलिग्राफ में सन् 1993 में प्रकाशित)
राजनीति के अतिरिक्त, जो मेरे ख्याल से समाज की जटिलताओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है, खगोलशास्त्र (कास्मोलॉजी) में मुझे बड़ी दिलचस्पी है, जहां ब्रह्मांड अनंत दिक्काल में प्रकट होता है; जहां आकाशगंगाएं ब्रह्मांड की सतत विलुप्त होती सरहदों में एक दूसरे से तेजी से दूर चली जाती हैं; जहां तारे अस्तित्व में आते हैं, चमकते हैं और विस्फोट के साथ मृत्यु का वरण करते हैं और जहां बिलकुल साफ-साफ गति वस्तु के अस्तित्व की प्रणाली है.
गति, अर्थात परिवर्तन और रूपांतर – हमेशा निम्नतर स्तर से उच्चतर स्तर की ओर – प्रसंगवश मानव समाज के अस्तित्व की भी प्रणाली है. कोई विचार परम नहीं होता, कोई समाज पूर्ण नहीं होता. जब-जब किसी समाज को किसी परम विचार का मूर्तरूप माना गया तब-तब उसकी गहराइयों से उठे भूकंप के झटकों ने उसकी बुनियाद को हिलाकर रख दिया है और तब चारों ओर फैली निराशा के घुप्प अंधेरे के बीच नए सपने खिलखिला उठे हैं. कुछ सपने कभी सच नहीं होते, क्योंकि वे मानव मस्तिष्क – ‘अपने-आप में मस्तिष्क’ – की बेलगाम मौज होते हैं. जो थोड़े-से सपने साकार होते हैं वे मूलत: मानव मस्तिष्क – ‘खुद अपने लिए मस्तिष्क’– की अमूर्त कृतियां होते हैं. तथापि सपने चाहे बेलगाम हों या सत्यभासी, वे मानव उद्यम का स्रोत रहे हैं – संभवत: मानवता की उत्पत्ति के समय से ही.
मेरे सपनों का भारत निस्संदेह एक अखंड भारत है जहां एक पाकिस्तानी मुसलमान को अपने विवर्तन की जड़े तलाशने के लिए किसी ‘वीसा’ (ठहरने का अनुमति पत्र) की आवश्यकता नहीं होगी; जहां, इसी तरह, किसी भारतीय के लिए महान सिंधुघाटी सभ्यता विदेश में स्थित नहीं होगी; और जहां बंगाली हिंदू शरणार्थी अंतत: ढाका की कड़वी स्मृतियों के आंसू पोंछे लेंगे और बांग्लादेशी मुसलमानों को भारत में विदेशी कहकर चूहों की तरह नहीं खदेड़ा जाएगा.
क्या मेरी आवाज भाजपा की आवाज से मिलती-जुलती लगती है? लेकिन भाजपा तो भारत के मुस्लिम पाकिस्तान और हिंदू भारत – अलबत्ता उतना ‘विशुद्ध’ नहीं – में महाविभाजन पर फली-फूली. चूंकि भाजपा इस विभाजन के तमाम विनाशकारी नतीजों के साथ चरम बिंदु तक पहुंचा रही है इसलिए इन तीनों देशों में महान विचारक यकीनन पैदा होंगे और वे इन तीनों के भ्रातृत्वपूर्ण पुनरेकीकरण के लिए जनमत तैयार करेगे. निश्चिंत रहिए, वो दिन भाजपा जैसी ताकतों के लिए कयामत का दिन होगा.
मेरे सपनों के भारत में गंगा और कावेरी तथा सिंधु और ब्रह्मपुत्र एक दूसरे में मुक्त भाव से मिलेंगे और सुबह की सफेदी महान भारतीय संगीत के धुनों की जुगलबंदी के साथ छाएगी. और तब कोई राजनेता अपने विवरणों को ‘भारत की पुनर्खोज’ में संकलित करेगा.
मेरे सपनों का भारत राष्ट्रों के समुदाय में एक ऐसे देश के रूप में उभरेगा जिससे कमजोर से कमजोर पड़ोसी को भी डर नहीं होगा और जिसे दुनिया का सबसे ताकतवर देश भी धमका नहीं सकेगा, न ब्लैकमेल कर सकेगा. आर्थिक ताकत का मामला हो या ओलंपिक की पदक तालिका हो, मेरा देश दुनिया के पहले पांच देशों में होगा.
मेरे सपनों का भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य होगा जिसकी आधारशिला ‘सर्वधर्म संभाव’ की जगह ‘सर्वधर्म विवर्जित’ का उसूल होगी. किसी की व्यक्तिगत धार्मिक आस्थाओं में हस्तक्षेप किए बगैर राज्य वैज्ञानिक व तार्किक विश्व दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करेगा.
यह कहना बिलकुल सही है कि धर्म अपने परिवेश के समक्ष मनुष्य की असहायता की अभिव्यक्ति है. लिहाजा इसका उन्मूलन भौतिक व आध्यात्मिक जीवनदशाओं में आमूल परिवर्तन की मांग करता है. जहां मनुष्य अपने परिवेश पर आधिपत्य कायम करने के लिए खड़ा हो सके. भारत में जब कभी अनुदार दार्शनिक विचार प्रणालियां जनता पर पहाड़ बनकर लद गई हैं, तब-तब यहां हमेशा सुधार आंदोलनों का उदय हुआ है. इस प्रकार मैं वैज्ञानिक विचारों के पुनरुत्थान का सपना देखता हूं, जहां भगवान के रूप में पराया बन गया मानव-सार मनुष्य फिर वापस पा सकेगा. मानव मस्तिष्क के इस महान रूपांतरण के साथ-साथ एक सामाजिक क्रांति होगी जहां संपत्ति के उत्पादक अपने उत्पादों के मालिक भी होंगे.
मेरे सपनों के भारत में प्रतिनिधि सभाओं में महिलाएं 50 फीसदी होंगी, प्रेम विवाह रिवाज बन जायेगा और तलाक देना सहज होगा. बच्चे तंगहाली से अनभिज्ञ होंगे और उनकी देखभाल की जिम्मेवारी माता-पिता से ज्यादा राज्य पर होगी.
मेरे सपनों के भारत में अछूतों को हरिजन कहकर गौरवान्वित करने का अंत हो जाएगा और दलित नाम की कोई श्रेणी न रहेगी. जातियां विघटित होकर वर्गो का रूप ले लेंगी और उनके हर सदस्य की अपनी व्यक्तिगत पहचान होगी.
मेरे सपनों के भारत के हर शहर में एक कहवाघर होगा जहां ठंडी काफी की घूंटें भरते-भरते बुद्धिजीवी गर्मागर्म बहसें करेंगे. वहां कुछ वेदनाविदग्ध व्यक्ति धुएँ के छल्लों के बीच अपनी प्रेयसियों के प्रतिरूप तलाशेंगे तो कई अतृप्त हृदय कला व साहित्य की विविध रचनाओं से मंत्रमुग्ध हो उठेंगे. जबकि कला व साहित्य की किसी भी रचना पर राज्य की ओर से कोई सेंसर नहीं लगेगा. वहां तमाम सार्वजनिक स्थानों में धूम्रपान सख्ती से मना रहेगा – बेशक, कहवाघरों को छोड़कर.
मेरे प्रारंभिक विषय पर लौटने हुए, मेरा सपना है कि भारतीय अंतरिक्ष यान गहरे आकाश को भेदता हुआ उड़ता चलेगा तथा भारतीय वैज्ञानिक व गणितज्ञ प्रकृति की मौलिक शक्तियों को एक अखंड समग्र में समेटने के समीकरण हल करेंगे.
अंतत:, मेरे तमाम सपनों की मां मातृभूमि है, जिसके हर नागरिक की राजनीतिक मुक्ति को सबसे ज्यादा कीमती समझा जाएगा; जहां असहमति की वैधता होगी और जिस व्यवस्था में थ्येन आनमेन को नैतिक रूप से शक्तिशाली राजनेता और जन-मिलिशिया की निहत्थी शक्तियां निपटाएंगी.
मेरे सपनों का भारत भारतीय समाज में कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं पर आधारित है जिसे साकार करने के लिए मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने अपने खून की अंतिम बूंद तक बहाने की शपथ ले रखी है.
अंग्रेज इतिहासकार ई एच कार के अनुसार “इतिहास, अतीत और वर्तमान के बीच कभी न खत्म होने वाला संवाद” है. भारत में मोदी-योगी-भागवत गिरोह के विनाशकारी उभार की वर्तमान पृष्ठभूमि में यहाँ हम एडोल्फ़ हिटलर के धूमकेतु सरीखे उभार और अंत की कहानी फिर से कहने की कोशिश करेंगे. यह उस सतत संवाद का हिस्सा है जिसमें हम सवाल करते हैं, हासिल जबाबों पर फिर से काम करते हैं और फिर इनके सबक को अपने आगे बढ़ने का नया रास्ता तैयार करने के काम में लगाते हैं जिससे भगवा फासिस्टों को उनके सर्वसत्तावादी हिन्दूराष्ट्र के चिर वांछित लक्ष्य तक पहुँच पाने के बहुत पहले ही पराजित किया जा सके. इतिहास हमारे लिए भविष्य की सकारात्मक सक्रिय दृष्टि के साथ अतीत और वर्तमान के बीच अंतर्क्रिया है.
इस अध्ययन में हमने नात्ज़ीवाद और फासीवाद को एक-दूसरे में परिवर्तनीय अर्थों में इस्तेमाल किया है: नात्ज़ीवाद, अपने मूल, फासीवाद का ही एक विशिष्ट रूप है. उम्बर्तो ईको 1995 के अपने लेख “उर फासिज्म” (शाश्वत फासीवाद) में इंगित करता है कि “नात्ज़ीवाद केवल एक था जब कि फासीवादी खेल बहुतेरे रूपों में खेला जा सकता है और खेल का नाम वही रहेगा.” उपन्यासकार-संकेतशास्त्री ईको फासीवाद को परिभाषित करने के बजाय मोटे तौर पर इसकी “परम्परा पूजन”, “आधुनिकता का निषेध”, “असहमति को राष्ट्रद्रोह मानने”, “परिभाषा और प्रवृत्ति में नस्लवादी होने” आदि पंद्रह विशेषतायें गिनाता है. इनमें से ज्यादातर, थोड़े-बहुत स्थानीय अन्तर के साथ (जैसे हमारे देश में जाति श्रेष्ठतावाद हिन्दुत्व फासीवाद की एक अतिरिक्त विशेषता है) इटली, जर्मनी और भारत में देखे-पहचाने जा सकते हैं.
निश्चित रूप से पिछले सौ वर्षों से, जब से इसने इटली में जन्म लेने के बाद जर्मनी में अपनी ठोस – परिपूर्ण शक्ल ली, फासीवाद ने विभिन्न समय और राष्ट्रों के सन्दर्भों में खुद को बहुतेरे रंगों-आयामों में ढाला है. मगर इन सारे बदलावों में इसने अपनी मूल चारित्रिक विशिष्टताओं-प्रवृत्तियों को हमेशा बरकरार रखा है जो इसे दक्षिणपंथी पापुलिज्म, अधिनायकवाद, सैन्यशासन आदि तमाम मिलती-जुलती प्रवृत्तियों से अलग और विशिष्ट श्रेणी में ला देती है. इन तमाम विशेषताओं में सबसे निर्णायक रूप से महत्वपूर्ण है – नस्लीय/साम्प्रदायिकतावादी/श्रेष्ठतावादी राष्ट्रीय-उग्र अंधराष्ट्रवादी जनोन्माद को सत्ता के गलियारों में अपनी घुसपैठ के लिए उकसाना-हवा देना और फिर समूचे राज्य तंत्र पर सम्पूर्ण फासीवादी कब्जे की कोशिश को अंजाम देना है. इस समूची प्रक्रिया में फासीवाद जनोन्माद और आतंक के शातिर और धूर्त संयोजन का सहारा लेते हुए लगातार बड़ी पूँजी का समर्थन हासिल करता जाता है. इस पुस्तिका में हम हिटलर की जर्मनी के, जहाँ फासीवाद अपने चरम पर पहुँचा था, क्लासिक सन्दर्भों में इन कुछेक विशेषताओं का सार रूप में अध्ययन करेंगे. हमारा मानना है कि मूल का गहन-गंभीर ज्ञान हमें उससे निकले वर्तमान रूप, जिसका हम यहाँ अभी सामना कर रहे हैं यानी वर्तमान भारतीय संस्करण को बेहतर समझ पाने में मददगार होगा.
क्या हिटलर के तेज उभार को सचमुच नहीं रोका जा सकता था? क्यों इस उभार को रोक पाने में वाम और जन तांत्रिक ताकतें बुरी तरह असफल रहीं? और वह भी उस देश में, जिसे दुनिया के सबसे अगुआ मजदूर वर्ग आन्दोलनों में एक होने और मार्क्स, एंगेल्स और उनके आगस्त बेबेल, विल्हेल्म, कार्ल लीबनेश्त, रोज़ा लक्जे़म्बर्ग व क्लारा ज़ेटकिन जैसे अनुयाईयों के नेतृत्व का गौरव हासिल था. क्या हम तब के जर्मनी और आज के भारत के परिदृश्य में भारी अन्तर के बावजूद उस अनुभव से दो-एक चीजें सीख सकते हैं ?
अपने देश में फासीवाद का प्रतिरोध करने और उसे हराने के विशिष्ट राजनीतिक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, इस पुस्तिका में हमने एडोल्फ़ हिटलर के उभार और पराभव की समूची कहानी के बजाय फासीवादी उत्कर्ष के काल खंड: 1920 (जब हिटलर की अगुवाई में राजनीतिक ताकत के रूप मे नात्ज़ीवाद का जन्म हुआ) से 1933 तक की (जब हिटलर ने चान्सलर बन कर संसदीय जनतंत्र को ध्वस्त कर के सर्वसत्तावादी फासीवादी तानाशाही के अभियान की शुरुआत की) कहानी कहने का प्रयास करेंगे.
यह पुस्तिका किसी मूल शोध का दावा नहीं करती. जीवनी कथा-क्रम और उससे जुड़े तथ्य मुख्यतः वोल्कर उलरिश के “हिटलर: एसेन्ट – 1889 -1939 (पेन्गुइन रेण्डम हाउस एल.एल.सी., न्यूयॉर्क, 2016 ) और कुछ और क़िताबों व लेखों – विलियम एल. शायरर की “दि राईज एंड फाल ऑफ़ द थर्ड राइक, अ हिस्ट्री ऑफ़ नात्ज़ी जर्मनी (सायमन एण्ड शुस्टर, 1960) और कुर्ट गॉसवेइलेर की “इकोनोमी एंड पालिटिक्स इन द डिस्ट्रकशन ऑफ़ वेइमार रिपब्लिक” (मार्गित कोवेस और शास्वती मजूमदार द्वारा सम्पादित व लेफ्ट वर्ल्ड बुक्स, नयी दिल्ली, 2005 से प्रकाशित संकलन “द रजिस्टिबल राइज: अ फासिज्म रीडर” का एक लेख) से लिए गए हैं. हम शुरुआत में ही इन लेखकों और प्रकाशकों के प्रति अपना आभार ज्ञापित कर रहे हैं, क्योंकि हम कार्यकर्ताओं की इस पुस्तिका को विस्तृत उद्धरणों से बोझिल नहीं करना चाहते. हमने परिशिष्ट में क्लारा ज़ेटकिन, जो न सिर्फ कम्युनिस्ट महिला आन्दोलन की महानतम अगुआ थीं, बल्कि फासीवाद के खिलाफ संघर्ष की भी प्रमुख सिद्धान्तकर और योद्धा थीं, के फासीवाद पर लेख के कुछ अंश दिए हैं. अगस्त 1923 में प्रकाशित यह लेख फासीवाद के सबसे पहले कम्युनिस्ट आकलनों और इससे लड़ने के मार्गदर्शक लेखों में से एक है. अपने राजनीतिक अर्थ, निष्कर्षों, और सम्पूर्ण प्रस्तुतीकरण का दायित्व स्वाभाविक रूप से लेखक पर है.
हैस, जर्मनी में फ्रेंकफर्ट सिटी हॉल के सामने रोमेरबर्ग स्क्वायर में
1933 में किताबें जलाने की त्रासदी की याद में बना स्मारक, इस पर लिखा है -
-हाइनरिक हाइन, 1820
उपनिवेश विरोधी स्वाधीनता आन्दोलन से भारत का जन्म हुआ. संघर्षों से मिली आजादी के 75वें वर्ष में अपने स्वाधीनता संघर्ष की स्मृतियों और उससे मिले सबकों के साथ आगे बढ़ने के रास्ते में आज हमारे सामने बहुत बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं.
स्वाधीनता आन्दोलन में भाग लेने वाले व्यक्तियों और समूहों के बीच विभिन्न प्रकार की विविधतायें इस चुनौती का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है. ऐसा वैविध्य कि आजादी के संघर्ष का कोई भी एक-रेखीय अथवा एक-आयामी इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता. इस आन्दोलन के सभी घटकों पर पूरा ध्यान दिये बगैर स्वाधीनता आन्दोलन को पूरी तरह से समझ पाना असम्भव है.
स्वाधीनता आन्दोलन को याद करने और उसे पूर्ण सम्मान देने के रास्ते में आज सबसे बड़ा अवरोध वर्तमान सरकार और शासक पार्टी खड़ा कर रही है. भाजपा का पितृ संगठन आरएसएस स्वाधीनता आन्दोलन से पूरी तरह दूर रहा था: यह ऐसा सच है जिसे आज भाजपा छुपा रही है. स्वाधीनता आन्दोलन के भागीदारों की विविधतायें आज धर्म के आधार पर भारत को परिभाषित करने की कोशिश में लगे आरएसएस और भाजपा के लिए बहुत बड़ी समस्या है. इसीलिए आज हम देख रहे हैं कि किस प्रकार भाजपा और आरएसएस ‘देश’ और ‘आजादी’ के मूल अर्थों को ही विकृत करने की कोशिश में लगे हैं.
भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों को बनाने के लिए भारत के स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास के सबक हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं. आज हमारे सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने के लिए और भारत की विविधता और लोकतंत्र को बचाने के संघर्ष में इस आन्दोलन की गौरवशाली विरासत को याद करना बहुत जरूरी है.
इस पुस्तिका में कामरेड दीपंकर भट्टाचार्य (महासचिव, भाकपा-माले) और कामरेड कविता कृष्णन (पोलित ब्यूरो सदस्य, भाकपा-माले) के आजादी के पचहत्तरवें वर्ष में अगस्त 2021 और अगस्त 2022 के बीच एक साल तक चले ‘आजादी75’ (Freedom75) अभियान के दौरान लिबरेशन पत्रिका में छपे लेखों को शामिल किया गया है. इनके अतिरिक्त एक लेख में स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर 1997 में दीपंकर भट्टाचार्य द्वारा लिखित पुस्तिका ‘भारत की आजादी की लड़ाई : दूसरा पहलू’ के उद्धृत व संपादित अंश हैं, इस उम्मीद के साथ कि पाठकों को इनके माध्यम से भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महत्व को समझने में मदद मिलेगी और कई अनजाने पहलुओं को जानने के प्रति उनकी उत्कंठा बढ़ेगी.
1 अगस्त 2022